Thursday, August 31, 2017

कविता - मम्मी पापा का

जी करता मम्मी पापा का
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ
हाथ से उनके रोटी खाऊं
गोद में रख सर सो जाऊँ
जीवन के सारे उलझन को
रो रो कर उनको बतलाऊँ
कोई मुझको आँख दिखाए
पापा के पीछे छुप जाऊँ
जीवन के सारी मुश्किल को
खोल पोटरिया उन्हें बताऊँ
लम्बी लम्बी गाड़ी को भूल
साईकल की घंटी बजाऊँ
माँ की मीठी लोरी में खोकर
खोई हुई नींद-चैन ले आऊं
बारिश में भींगू और नाचू
फिर मम्मी की डाँट भी खाऊं 
जो थी जीवन की राजदार
उससे ना कोई राज छुपाऊं
जी करता मम्मी पापा का
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ

                             -   अभय सुमन "दर्पण"


                                                                                               (अगर अच्छी लगे तो follow करें एवं कमेंट लिखें। धन्यवाद )