इस शहर में धूल ज्यादा है या पॉल्यूशन ये तो मालूम नहीं लेकिन जब भी हज़रतगंज चौराहे पर मेरी गाड़ी लाल बत्ती पर रूकती है और कोई दस साल का बच्चा गाड़ी के शीशे साफ करता है तो ये जरूर लगता है की हवा साफ नहीं है। आज भी मेरी गाड़ी हज़रतगंज चौराहे, लाल बत्ती पर रुकी थी और मेरी सूनी आँखे किसी को ढूंढ रही थी। बस एक उम्मीद में कि शायद वो दिख जाये।
मुझे याद आने लगा जब तीन महीने पहले मुझे रेलवे स्टेशन जाना था किसी को लेने, शायद कोई मित्र था। उस दिन शहर में धुल भरी आंधी चल रही थी और गहरे काले बादल भी मंडरा रहे थे। हज़रतगंज चौराहे पर मेरी गाड़ी रुकी थी और मैं ग्रीन सिग्नल का इंतजार कर रहा था। मेरी ड्राइविंग सीट के साइड वाले शीशे पर धूल की मोती परत जमा थी और बाहर कुछ दिख नहीं रहा था। तभी शीशे साफ होते गए और वो मुझे दिखा शीशे साफ करते हुए और फिर कुछ पैसे मांगते।
"कुछ करते क्यों नहीं, भीख मांगते शर्म नहीं आती।" मुझे बड़ी कोफ़्त हुई और दो बातें सुना गया, शायद मैं जल्दी में था।
"भीख नहीं मांग रहा साहब, शीशे साफ किया है।" उसकी आवाज सुनी।
मैंने न चाहते हुए उसे पांच रूपये दे दिया, लेकिन उसकी स्वाभिमान में डूबी आवाज मेरे दिल में बैठ गयी।
ऑफिस मेरा कैंट रोड पर था और हर दिन मुझे उसी चौराहे से जाना होता था। अक्सर मुझे वो लड़का दिखने लगा और मैं उसे पहचानने लगा। मेरी गाड़ी जब भी लालबत्ती पर रूकती वो आता और शीशे साफ कर जाता फिर मैं कुछ पैसे दे जाता। अब तो उसे और मुझे इसकी आदत सी हो गयी थी। एक दिन मैंने उससे उसका नाम पूछा।
"कोई भी किसी नाम से बुला लेता है, वैसे मेरे साथ के लोग राजू कह कर बुलाते हैं।" उसने कहा
"और माता पिता।" मैंने पूछा
" माता-पिता का मालूम नहीं और एक चाचा हैं जो शाम में सारे पैसे ले लेते हैं।" उसकी आवाज में दर्द था।
मुझे कुछ और पूछने का मन था लेकिन तभी ग्रीन सिग्नल हो गयी और मैं चल दिया। दिन भर यही सोचता रहा इतने तीखे नैन-नक्श, इतना साफ रंग जरूर किसी अच्छे घर का रहा होगा। हो सकता है अवैद्य संतान हो और किसी ने छोड़ दिया हो या माँ बाप से कहीं बिछड़ गया हो या किसी ने चुरा लिया हो। लेकिन ये सच है की किसी अच्छे घर में होता तो फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहा होता या किसी टीवी के रियलिटी शो में होता। अब तो हर दिन चौराहे पर उससे बात करता और मुझे देखकर वो भी दौरा चला आता। एक दिन ऑफिस में काफी मूड ख़राब था और थका भी था। लौटते वक़्त मेरी गाड़ी फिर उसी लाल बत्ती पर रुकी और वो मेरे पास चला आया। पता नहीं क्यूँ मैंने गाड़ी पार्किंग में खड़ी की और उसे अपने साथ लेकर एक अच्छे से रेस्टोरेंट में चला गया। मैंने कॉफी पी और उसे भर पेट खाना खिलाया। वो इसका आदी नहीं था और एक संकोच एवं कशमकश में खाये जा रहा था।
मैंने पूछा "बेटा पढाई करना है।"
वो कुछ समझ नहीं पा रहा था और मेरी बातों में बस सर हिला रहा था। शायद मुझसे ज्यादा ध्यान उसका खाने में था। खाना ख़तम करने के बाद हमलोग बाहर निकले और मैं कुछ सोचता हुआ उसे छोर अपने घर निकल गया। कल मुझे ऑफिसियल टूअर पर एक हफ्ते के लिए बंगलोर जाना था और घर पहुँच कर उसकी भी तैयारी करनी थी। अगले दिन मैं बंगलोर चला गया।
एक हफ्ते बाद वापस लौट कर जब ऑफिस जा रहा था तो उस लालबत्ती पर मुझे वो नहीं दिखा। फिर जब शाम में घर जाने के लिए लौटा तब भी मुझे वो नहीं दिखा। ऐसे ही तीन-चार दिन बीत गए और मुझे वो नहीं दिखा। अब मन में कुछ संशय सा होने लगा परन्तु मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया शायद ऑफिस और घर के तनाव ने ज्यादा सोचने का मौका नहीं दिया। लेकिन छठे दिन भी वो नहीं दिखा तो मैं गाड़ी पार्क कर चौराहे पर पहुंचा। थोड़ी पूछताछ की लेकिन कोई भी बता नहीं सका, तभी उसके एक दोस्त पर मेरी नजर पड़ी। मैंने उसे बुलाया और जब उससे पूछा तो वो बताने लगा "साहब दस दिन पहले किसी राजनीतिक पार्टी की गाड़ियों का काफिला इधर से गुजर रहा था। वो सड़क किनारे खड़ा उन गाड़ियों को देख रहा था तभी किसी तेज गाड़ी ने आकर उसे जोर की टक्कर मार दी, अस्पताल पहुँचने के पहले ही उसने दम तोड़ दिया।" इतना कहकर वो रोने लगा।
मैं अपने आँसुओ को सँभालने की कोशिश कर रहा था और कदम तो शायद वहीँ जम गए थे। मैं बोझिल कदमो से घर वापस जाने की ओर मुड़ा, शायद एक दर्द को पीने की कोशिश कर रहा था। मन ही मन सोच रहा था कौन हैं ये, क्यों पैदा हुए ये, गाड़ी पोछने के लिए या गुब्बारे बेचने के लिए या लाल बत्ती और ग्रीन बत्ती के बीच के फासले को कम करने के लिए।
- अभय सुमन "दर्पण"