"ठक ! ठक ! ठक ! भाभी दरवाजा खोलो" रागिनी की हल्की धीमी आवाज ने नेहा को जगा दिया।
फिर से आवाज आयी "भाभी दरवाजा खोलो, सब लोग आँगन में बैठे हैं, देर हो जाएगी"।
नेहा ने बिस्तर पर उबासी ली, अपने अस्त व्यस्त कपड़ो को ठीक किया और दरवाजे को थोड़ा सा खोला। सामने छोटी ननद मुस्कुराते हुए धीरे से बोली "भाभी आठ बज चुके हैं, जल्दी से आ जाओ। सब लोग इंतजार कर रहे, दिल्ली वाली मामी की ट्रेन का समय हो गया है, मिलना चाहती है"।
"बस रागिनी, पांच मिनट में आयी, तुम जाओ" नेहा ने कहा। फिर धीरे से दरवाजा बंद करके बिस्तर के पास आयी। देखा निखिल एक गहरी नींद लिए बिस्तर पर सो रहे थे। नेहा ने उसे एक प्यार भरी नजरो से देखा और उसके घुंघराले बालो में हलकी सी उंगली की फिर धीरे से उसे जगाया और बोली " मामी के ट्रेन का समय हो गया है ,मिल लो उनसे"।
निखिल ने आंखे खोल अलसाई नजरो से नेहा को देखा और उसे अपनी ओर खींच लिया। तभी दरवाजे पर फिर ठक ठक की आवाज आयी, "भाभी दरवाजा खोलो"।
नेहा हड़बड़ाकर उठ बैठी और दरवाजे को धीरे से खोल बोली "अभी आयी बस थोड़ी देर"।
तभी रागिनी दरवाजे के अंदर धड़धराते घुस आयी और बोली "भाभी, प्लीज जल्दी करो ना। अब दरवाजा बंद हुआ तो पता नहीं कितना समय लगे। इसीलिए मैं यही बैठती हूँ"।
फिर भैया को देखकर बोली "भैया तुम तो जानते हो मामाजी का गुस्सा"।
"अच्छा बाबा चलो मैं चलता हूँ, नेहा तुम भी तैयार हो जाओ" निखिल ने उठते हुए कहा ।
नेहा और निखिल की दो दिन पहले ही शादी हुई थी। दोनों पहली बार पंद्रह दिन पहले मिले थे, अपने इंगेजमेंट में। निखिल आर्मी में ऑफिसर था, काफी मुश्किल से बीस दिनों की छुट्टी लेकर आया था। गोरखपुर में अपना बड़ा पुश्तैनी मकान, बड़ा सा संयुक्त परिवार सब मिल-जुल कर रहते थे। नेहा लखनऊ की रहने वाली एक बड़े घर से ताल्लुक रखती थी। एकलौती संतान, पिता सरकारी अधिकारी, लखनऊ में आलीशान कोठी और ढेरों शानो-शौकत और अपने पापा के आँखों का तारा। जब छः साल की थी तभी माँ का देहांत हो गया। पिता ने दूसरी शादी नहीं की शायद ये सोच कर की नई माँ उसे प्यार दे पाए की नहीं। घर पर तो सुबह दस बजे के बाद ही नेहा की आँख खुलती थी। पापा कहते सो लेने दो मेरी बेटी को ,शादी के बाद पता नहीं कितने बजे जागना पड़े।
एक हफ्ते से शादी की रस्मो रिवाज निभाते निभाते नेहा का बदन टूट रहा था। कल नेहा और निखिल की सुहागरात थी, रात पार्टी खत्म होते एक बज गए और जब दोनों कमरे में गए तो थक कर चूर। फिर बाते करते सुबह के पांच बजे जाकर सोना हुआ। दो तीन घंटे की नींद भी पूरी नहीं हुई थी की दरवाजे पर ठक ठक की आवाज ने जगा दिया।
नेहा तैयार होकर कमरे से बाहर निकली, देखा आँगन मेहमानो से भरा हुआ था। तभी सासु माँ आकर बोली "बहु सभी बड़ो को प्रणाम कर के आशीर्वाद ले लो"। नेहा ने एक हलकी नजर डाली और गिनती की शायद तीस-बत्तीस लोग तो होंगे ही। निखिल पास आकर बोला, माँ मैं नेहा के साथ उसकी मदद करा देता हूँ। शायद यह बात पटना वाली मौसी ने सुन ली और बोली "निखिल तू रहने दे, देखूं तो सही बहु को कितना खिलाया पिलाया गया है" फिर जोर से हंस दी। तभी छोटी बुआ ने कहा " सुना है बहु अपने घर दोपहर में जगती थी, अब तो भाभी को ही बहु के लिए खाना तैयार करना पड़ेगा"। नेहा इन सबों की अभयस्त नहीं थी। नया घर, नए लोग, नयी जिम्मेदारियाँ ये सोचकर वो चुप रही। निखिल ने सब सुन धीरे से नेहा की उंगली दबा दी, शायद एक भरोसे का इशारा था की मैं हूँ तुम्हारे साथ। किसी तरह दो घंटे नेहा ने वहां अपने समय को बिताया। आँखों की नींद और थकान उसे वहां बैठने की इजाजत नहीं दे रही थी। निखिल ने यह बात समझ ली और उसे बहाने से कमरे में ले आया। आते ही नेहा निढाल हो बिस्तर पर सो गयी। निखिल को मैरिज रजिस्ट्रेशन ऑफिस जाना था कुछ फॉर्म भरने, वो चला गया।
दोपहर के डेढ़ बज चुके थे और नयी बहु का खाने पर इंतजार हो रहा था। नेहा को बुलाया गया, आयी तो देखा घर के सारे लोग बड़ी सी मेज के दोनों तरफ बैठे हैं शायद बीस-बाइस लोग होंगे। नेहा को थोड़ी असमंजस हुई शायद अकेले रहने के आदत के कारन। उसके पापा ने शायद इसी लिए ऐसे घर में शादी की थी की उसे वो सब कुछ मिले जो वह दे नहीं पाए थे। वह बैठी ही थी की एक आवाज आयी "बहु सर के पल्लू पूरी तरह रखो यहाँ घर के कई बड़े बैठे हैं"। उसने देखा सबसे बड़ी चाची की निगाह उस पर ही थी, तभी छोटी चाची ने कहा "जाने दो दीदी घर में कोई बताने वाला नहीं होगा"। नेहा धड़कते दिल से सब सुन रही थी, तभी बड़ी चाची ने कहा "बहु सभी को सब्जी परोस दो"। तभी रागिनी ने कहा "रहने दो भाभी मैं कर देती हूँ"। वो उठी ही थी की बड़ी चाची ने कहा "घर के नियम मत तोड़ो रागिनी"। बड़ी चाची और बड़े चाचा का कहा घर में कोई नहीं काटता था। नेहा ने उठ कर सभी को सब्जी परोसना शुरू किया शायद पहली बार, तभी बड़े चाचा को देते समय उसके हाथ से सब्जी की हांड़ी गिर गई और वो भी बड़े चाचा के सिल्क के नए कुर्ते पर। उसे घबराहट में कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसने हांड़ी वहीँ टेबल पर रखी और तेज कदमो से अपने कमरे में चली गयी। उसे इस वक़्त सिर्फ अपने पापा की याद आ रही थी और आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। उसने तकिये में सर दबा लिया और अपने आंसुओ को बहने के लिए छोर दिया। थोड़ी देर हुआ होगा की उसने अपने कंधे पर किसी का हाथ पाया। उसने पलट कर देखा तो पीछे निखिल खरा था, अपना हाथ उसके कंधे पर रखे। नेहा की सूजी आँखे बहुत कुछ कह रही थी, बाकि उसे सब कुछ मालूम चल चूका था। उसने धीरे से नेहा को उठाया और कहा "मैं जानता हूँ तुम्हे तकलीफ पहुंची है, मैं ये भी जानता हूँ की तुम्हे इन सबो की आदत नहीं। ये भी सच है की तुम अपने घर में बड़े लाड़ प्यार से पली हो और अभी शायद तुम्हे अपने पापा की सबसे ज्यादा याद आ रही हो, लेकिन आज से ये घर भी तुम्हारा है। कई लोग हैं कई तरह की बाते हैं, उन सबो के बीच में तुम्हे अपनी जगह बनानी है। सबसे बड़ी बात ये कि तुम्हारे साथ हमेशा मैं खड़ा मिलूंगा एक भरोसे के साथ, एक विश्वास के साथ। तुम्हारे हर सुख-दुःख में खड़ा तुम्हारी हर उम्मीद और आशा के साथ"।नेहा ने सारी बाते सुनी और अपने आंसुओ को पोछा, अपने पापा के बाद उसे किसी पर एक भरोसे का एहसास हो रहा था । उसने मन ही मन सोचा शायद नई बहु का नया दिन ऐसा ही होता होगा। उसने निखिल की आँखों में देखा और खुद को उसकी बाहों में सिमटा लिया एक नयी सोच के साथ।
- अभय सुमन "दर्पण"
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