Friday, September 7, 2018

अख़बार की छुट्टी - कहानी

सुबह के आठ बज चुके थे। शर्मा जी कुछ बुदबुदाते हुये अपने बॉलकनी में चहलकदमी कर रहे थे। सुबह से तीन कप चाय हो चुकी थी और तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा था। मिसेज शर्मा उनकी परेशानी देखकर तीन बार टोक चुकी थी। तभी सामने से निगम साहेब गुजरे, उन्होंने भी शर्मा जी को परेशानी से टहलते देखा और पूछ बैठे, " क्यों शर्मा साहब, सब ठीक तो है कुछ परेशान दिख रहे"। 
शर्मा जी बस उबल परे, "अब बताइये निगम साहेब, ये भी भला कोई बात हुई। कल ही कर्णाटक में सरकार गिरी है, सलमान के नए लव अफेयर शुरू हुए हैं। सब्जियां महंगी हुई है। भारत के क्रिकेट टीम की घोषणा हुई है। और... और देखिये आज की अख़बार नहीं आयी है। हर दिन तो सुबह छः बजे दे जाता था, लेकिन आज पता नहीं क्यों अब तक नहीं आया। 
निगम साहब ठठाकर हंस परे और बोले, "अच्छा तो ये कारण है आपके परेशानी का, अरे साहेब आजकल तो मोबाइल पर भी अख़बार आते हैं वहां देख लीजिये पर बी.पी. मत बढ़ाइये"। शर्मा जी झुंझला बैठे और कहा, "अरे कहाँ ? छप्पन की उम्र में मोबाइल ज्यादा समझ नहीं आता"। फिर मुस्कुराते हुए बोले, "भाई निगम साहेब, सुबह-सुबह अख़बार को छूना, उसकी सोंधी-सोंधी खुश्बू, पन्ने पलटना, साथ में चाय की चुश्की, भला इन सबों का मुकाबला क्या मोबाइल करेगा"। निगम साहब निरुत्तर हो गए और चलते बने। 
तभी मिसेज शर्मा ने आवाज दी "क्योँ जी, आज ऑफिस नहीं जाना। नहीं आयी अख़बार तो रास्ते में खरीद लेना। तुमने आज बी.पी. की गोली भी नहीं खायी। अब जल्दी तैयार हो जाओ।"
शर्मा जी ने गुस्से में कहा, "तुम्हे तो मालूम नहीं अख़बार की कीमत, दिन भर सास-बहु सीरियल में पड़ी रहती हो। जब से नेहा विदेश गयी है, अपना भी ख्याल नहीं रखते। हाँ, मुझे बी.पी. का पेशेंट जरूर बना दिए। आज तो लगता है पूरा दिन ख़राब हो गया। 
शर्मा जी जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल गए। आधे रास्ते में स्कूटर बंद हो गयी, देखा तो पेट्रोल ख़तम हो गयी थी। तब उन्हें याद आया की पेट्रोल तो दो दिन पहले रिज़र्व में आया था, उन्हें लगने लगा की शायद उनकी यादाश्त भी अब कम हो गयी है। आधे किलोमीटर पर पेट्रोल पंप थी, वहां तक इतनी तेज गर्मी में स्कूटर को ले जाना भी एक बड़े मिशन का काम था। खैर किसी तरह ऑफिस पहुंचे, बस थोड़ा लेट। 
बैठा ही था कि सिंह साहेब ने पूछा, " क्यों शर्मा जी, आज कहाँ लेट हो गए।
शर्मा जी ने कहा, "वो थोड़ी स्कूटर में दिक्कत थी, इसिलिए थोड़ा लेट हो गए। 
तभी किरण मैडम ने चुटकी ली, "स्कूटर ख़राब थी या गर्ल्स कॉलेज के चक्कर लगाते आ रहे।"
बस शर्मा जी बिफर पड़े, "बस यही एक काम बाकी रह गया है, ठीक है कल से वो भी कर लूँगा। आपकी भी कोई दोस्त वहां प्रोफेसर हो तो बता दीजियेगा मिल भी आऊंगा। 
उन्हें गुस्से में देख सब शांत हो गए, धीरे-धीरे सब अपने काम में लग गए। आज ऑफिस में भी उनका मूड सही नहीं था। 
शाम में घर पहुंचे तो पत्नी से पुछा, "अख़बार आया की नहीं ?"  
पत्नी ने कहा, "आज तो दिया नहीं"। 
बस उनका बड़बड़ाना शुरू हो गया। थोड़ी बहुत सही मूड थी, वो भी ख़राब हो गयी। पत्नी ने सोचा, आज तो रात का खाना भी ख़राब हो गया। मालूम होता तो बाहर से एक अख़बार खरीद कर ले आती। किसी तरह रात बीती। शर्मा जी सुबह जल्दी जग गए और पांच बजे से ही बालकनी में बैठ गए, बस छः बजने का इंतजार कर रहे थे। मिसेज शर्मा ने एक कप चाय बना कर दी। बड़े अनमने ढंग से शर्मा जी ने चाय पी, लेकिन उनकी निगाहे हर अख़बार वाले पर और कान साईकल की घंटी पर। सुबह के सात बज चुके थे, लेकिन अभी तक आज की अख़बार नहीं आयी। मिसेज शर्मा तीन कप चाय दे चुकी थी। तभी  7.30 बजे एक बारह साल का लड़का गेट पर घंटी बजाया। 
"कौन है ?"   शर्मा जी ने पूछा। 
"साहब, आज की अख़बार है।"  एक मासूम सी आवाज आयी। 
तभी मिसेज शर्मा भी बालकनी में आ चुकी थी। देखी एक भोला सा सांवले रंग का लड़का गेट के दरवाजे पर खड़ा है। 
" इतनी देर से क्यों आये और सूरज कहाँ है जो अख़बार देता है और कल की अख़बार कहाँ है" शर्मा जी की तेज आवाज एक सांस में गूंजी।
" साहेब, बाबूजी का परसो रात एक्सीडेंट हो गया था। उस समय से सिविल अस्पताल में भर्ती हैं, अभी भी बाबूजी  अस्पताल में ही हैं, कल इसिलिये नहीं आया। अब अख़बार नहीं बाटूंगा तो खाऊंगा क्या।" उसने भोलेपन से कहा। 
तभी मिसेज शर्मा ने कहा, "कोई बात नहीं बेटा, कुछ चाहिए तो बता देना। अपने बाबूजी का ख्याल रखना। अख़बार की चिंता मत करना।" ये कहकर उसने शर्मा जी की तरफ देखा। 
शर्मा जी अख़बार पाकर कुछ शकुन में दिखे। 
मिसेज शर्मा ने उनसे पूछा "आज बी.पी. की दवा खानी है की नहीं।" 
शर्मा जी धीरे से मुस्कुरा दिए और कहा "ऑफिस से आने के बाद सिविल अस्पताल चलेंगे सूरज को देखने।"
मिसेज शर्मा के चेहरे पर भी शकुन नजर आ रहा था क्योंकि अख़बार की छुट्टी ख़तम हो गयी थी।                                                              
                                   - अभय सुमन "दर्पण"