Monday, October 1, 2018

"रेप" एक स्याह सच - कहानी

"मम्मी-मम्मी उसने मेरी पीठ में चिकोटी काटी", शिखा ने लगभग चीखते हुए कहा।
"किसने-कौन", आरती ने पलट कर पूछा।
"वो मम्मी, ब्लू शर्ट वाला " शिखा ने जोर से कहा
"अरे रुक " सोनिया उसकी तरफ दौड़ी।
लेकिन तबतक वो भीड़ का फायदा उठा कर भीड़ में गुम हो गया था। आज 15 अगस्त की छुट्टी की वजह से मॉल में भीड़ भी बहुत ज्यादा थी। काफी दिनों के बाद आरती अपने चौदह साल की बेटी के साथ एक बड़े से मॉल में उसके लिए ड्रेस खरीदने आयी थी। दो साल हो गए शिखा के पापा को गुजरे तब से दोनों में माँ बेटी से ज्यादा दोस्त का रिश्ता बन गया था। बेटी के चेहरे पर एक शिकन बर्दास्त नहीं थी आरती को। पति क्लास टू आफिसर थे, इसीलिए अच्छी खासी पेंशन और पैसा छोड़ गए थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। पर बड़ी होती बेटी की चिंता हमेशा सताती रहती थी, खासकर आज कल के माहौल में। अभी शिखा सिर्फ चौदह साल की थी, लेकिन लोगो की भेदती निगाह आरती अच्छे से पकड़ लेती थी। उसे हमेशा डर सताता की उसकी बेटी, कम उम्र में ही बड़ी न हो जाये। अभी जो शिखा की चीख सुनी तो उसका डर सच में बदलने लगा। अभी तो उसके शरीर में बस थोड़ा सा बदलाव हुआ है और उसकी मानसिक यंत्रणा शुरू। किसी तरह आरती ने शिखा को समझाया और मॉल मैनेजमेंट से शिकायत दर्ज की। 
घर पहुँच कर दोनों ने डिनर किया और दोनों शांत बैठे रहे। दोनों के मन में कुछ उधेरबुन चल रही थी।
तभी शिखा ने तन्द्रा भंग कर आरती से पूछा, "मम्मी उसने मुझे चिकोटी क्यों काटी।"
"कुछ नहीं बेटा, कुछ लोगो के मम्मी पापा उसे अच्छी शिक्षा नहीं देते, इसीलिए वो लोग ऐसा करते हैं " आरती ने कहा।
"नहीं मम्मा, कुछ और बात है ", शिखा ने कहा।
आरती का दिल धड़क उठा, पूछ उठी, "क्या "
" वो मेरा रेप करना चाह रहा था " , शिखा ने कहा।
"नहीं बेटा, ऐसा नहीं बोलते। हम जहाँ रहते हैं ,वहां कुछ अच्छे लोग होते हैं और कुछ बुरे", आरती ने कहा।
"नहीं मम्मा, मैंने TV के न्यूज़ में देखा था, एक बच्ची के साथ रेप हुआ था। मैं भी तो बच्ची हूँ " शिखा ने कहा। 
"हां बेटा, तू मेरी बच्ची नहीं मेरी जान है ,मेरा सब कुछ है" कहकर आरती ने शिखा को बाहों में समेत लिया। मन में एक डर और कई सवाल आरती के दिमाग में घूम रहे थे। सबसे बड़ा डर की कबतक और कहाँ तक मैं साथ रहूंगी। अभी चौदह की है ,कल सोलह फिर बीस......। कहाँ तक मैं साथ चलूंगी। हर दिन कुछ न कुछ सुनने को मिलता है। कल ही तो अख़बार में आया था की किसी बच्ची का अपहरण हो गया। कुछ साल पहले के दिल्ली के निर्भया कांड को कोई भुला नहीं अब तक। क्या हो गया है पुरुष के पुरुषत्व को। कहाँ चले गए द्रौपदी के लाज बचाने वाले श्री कृष्ण।
अगले दिन शिखा को स्कूल भेज आरती थोड़ा आराम करने लगी। आज उसकी तबियत भी कुछ अच्छी नहीं लग रही थी और कुछ बुखार सा लग रहा था। शाम में दोनों ने अपने दिन भर की दिनचर्या पर बाते की और सब कुछ सामान्य सा हो चला था। 
आज दो दिन हो गए थे आरती को बीमार पड़े। खाना बनानेवाली और कामवाली काम कर के चली जाती थी। लेकिन शिखा को स्कूल भेजना, टिफिन देना, फिर घर में भी कई काम और खुद बीमार इन सबो ने आरती को परेशान  कर रखा था। खुद से दवा ली थी लेकिन बुखार जाने का नाम नहीं ले रहा था। आज शाम में आरती ने डॉक्टर को दिखाने का सोच रखा था। दिन के एक बजे थे, तभी घंटी बजी। शायद शिखा स्कूल से आ गयी ये सोच कर आरती दरवाजे की तरफ बढ़ी, लेकिन शिखा तो तीन बजे आती है। अभी कौन आ गया, सोचते हुए आरती ने दरवाजा खोला तो एक लगभग पैतींस-छत्तिस साल का आदमी दरवाजे पर खड़ा था। 
"आप शिखा की मम्मी हैं", उसने पूछा। 
"हाँ, क्या हुआ शिखा को,कहाँ है वो ", आरती ने घबराते हुए पुछा। 
"घबराने की कोई बात नहीं, वो ठीक है। बस आपको मेरे साथ अस्पताल चलना पड़ेगा", उसने शांत भाव से कहा। 
"अस्पताल? क्या हुआ मेरी बेटी को, वो तो स्कूल गयी थी", आरती ने रोते हुए पूछा। 
"अरे आप चिंता ना करे, बस मेरे साथ चलिए" उस आदमी ने कहा। 
आरती तुरंत उस आदमी के साथ चल दी। अस्पताल पहुँच कर देखा तो शिखा एक बिस्तर पर लेती थी और उसके सर पर पट्टी बंधी थी। आरती दौर कर उससे लिपट गयी और रोने लगी। 
"ये कैसे हुआ शिखा", आरती ने रोते हुए पुछा "तुम तो स्कूल गयी थी"। 
आरती का मन घबरा रहा था, तरह तरह के बुरे ख्याल आने लगे। 
"कुछ नहीं मम्मा, बस थोड़ी सी चोट लग गयी है", शिखा बोली और धीमे से मुस्कुराई।
"लेकिन कैसे लग गयी और यहाँ " आरती ने सर छूते हुए कहा। 
"बस मम्मा, सुबह स्कूल जाने निकली तो सिर्फ तुम याद आ रहे थे और तुम्हारी तबियत", शिखा ने गहरी सांस लेते हुए कहा "मैं स्कूल के भीतर ना जाकर पास में डॉक्टर के क्लिनिक पर चली गयी ताकि तुम्हारी तबीयत उसे बता सकूँ। डॉक्टर के आने में एक घंटे की देर थी, मैं वहीँ बैठ गयी। वहां एक आदमी साफ़ सफाई कर रहा था। दस मिनट के बाद एक आदमी आया जो डॉक्टर का असिस्टेंट था। मेरे बारे में उसने सफाई वाले से पूछा फिर अंदर डॉक्टर वाले कमरे में मुझे बुलाया। मैं अंदर गयी और तुम्हारे बारे में सब बाते उसे बता दी। फिर उसने पूछा क्या मम्मी को सरदर्द भी कर रहा और ये कहकर मेरे सर को छूने लगा। मैं डर गयी और दरवाजे की तरफ जाने को हुई, तो वो मेरे हाथ पकड़ कर खींचने लगा। मैं तेजी से दरवाजे की ओर दौड़ी और टेबल से टकराकर गिर गई जिससे सर में चोट लग गयी। मैं काफी जोर से चिल्लाई, मेरी आवाज सुन कर वो सफाईवाला दरवाजा खोल कर अंदर आ गया। तभी उस सफाईवाले ने सब कुछ समझते हुए उस आदमी की पिटाई शुरू कर दी। तब तक कुछ लोग और आ गए थे और उसे पकड़ के पुलिस के हवाले कर दिए। बस मम्मा मुझे उस वक़्त सिर्फ तुम याद आ रहे थे" कहकर शिखा फूट फूट कर रोने लगी। 
"मेरे बच्चे इतना सब कुछ सह लिया तूने सिर्फ मेरी चिंता में, मुझे क्या हो जाता मामूली सा बुखार ही तो आया था। आज शाम में चली जाती डॉक्टर के पास, आगे से कभी ऐसा मत करना" आरती ने कहा। 
हाँ मम्मी, जिस सफाई वाले ने मेरी मदद की थी ये वही व्यक्ति हैं" कहकर शिखा ने उस व्यक्ति को देखा जिसने आरती को घर से बुलाया था। 
" मैं आपको कैसे धन्यवाद करूँ भैया", आरती ने उस आदमी से कहा,"आपका ये अहसान मुझ पर पूरी जिंदगी रहेगा "
"नहीं दीदी ऐसा मत कहो, मुझे मालूम है एक नारी का सम्मान और इज़्ज़त क्या होता है। अगर वो किसी की बहन-बेटी है तो क्या वो हम सब की बहन-बेटी नहीं। अगर सब ये सोचे तो क्या समाज का यह पाप नहीं मिट जायेगा", उसने कहा। 
तभी शिखा ने कहा, " माँ, मुझे रेप का थोड़ा मतलब तो मालूम हो गया है, पर हर पुरुष रेप नहीं करता। जिनके घर के दिए संस्कार अच्छे नहीं होते वही रेप करते हैं, वही बुरी नजर रखते हैं। घर से बाहर निकला हर पुरुष, किसी स्त्री को बुरी नजर से देखते वक़्त ये सोच ले कि उसकी बहन को भी कोई बुरी नजर से देख रहा होगा तो शायद उसकी सोच में बदलाव हो जाये और ये सीख सिर्फ उसके मम्मी-पापा ही दे सकते हैं"।
"तू बहुत बड़ी हो गयी है बेटा", ये कहकर आरती ने शिखा को बाँहों में भींच लिया। 

                                                                                                - अभय सुमन "दर्पण"


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