मैं
औरत हूँ , मैं औरत
हूँ ,
मैं
औरत हूँ , मैं औरत
हूँ ,
मैं
कोमल हूँ, मैं शिखचंडी
मैं
शीतल हूँ, मैं तापपूर्ण
मैं
खिली हँसी, मैं आँचल
हूँ
मैं
मातृ छांव. मैं धरती
हूँ
मैं
जननी हूँ, मैं चंचला
हूँ
मैं
दुर्गा हूँ, मैं
विद्या हूँ
मैं
धनवर्षा, मैं संतोषी
मैं
राधा हूँ, मैं मीरा
हूँ
मैं
सीता और सावित्री हूँ
मैं
मेनका और ऊर्वशी हूँ
मैं
माँ भी हूँ, मैं बहु
भी हूँ
मैं
बेटी हूँ , मैं बहना
हूँ
मैं
मम्मी की, मैं पापा
की
मैं
घर-आँगन फुलवारी
की
मैं
माटी हूँ, मैं गहना
हूँ
मैं
रजिया सुल्ताना
मैं
वीरा हूँ, मैं झाँसी
हूँ,
मैं
वीर पद्मिनी, जौहर
हूँ
मैं
इंदिरा हूँ, मैं
सानिया हूँ
मैं
सोच हूँ एक, मैं भोर
हूँ एक
मैं
प्रीतम की, मैं साजन
की
मैं
यौवन हूँ , मैं लज्जा
हूँ
मैं
सौंदर्य बोध, मैं
श्रृंगार में हूँ
मैं
कला में हूँ, मैं
रास-रंग
मैं
भ्रमर गीत, मैं जीवन
संगीत
मैं
सुर में हूँ, मैं
ताल मे हूँ
मैं
माता हूँ, मैं दाता
हूँ
मैं
जज्वा हूँ , मैं ममता
हूँ
मैं
कल्पना में, मैं
हकीकत हूँ
मैं
फिक्र भी हूँ, मैं
जिक्र भी हूँ
मैं
पूजा में, मैं बाटी
में
मैं
यत्र तत्र ,मैं चहुँ
ओर
मैं
बहती नदियां और धारा हूँ
मैं
गंगा हूँ, मैं यमुना
हूँ
मैं
बृद्धा और जवानी हूँ
मैं
इश्क विश्क, मैं
अहले वफ़ा
मैं
रूह फ़ना, मैं कायनात
मैं
आज भी हूँ, मैं कल
भी थी
मैं
आने वाले, पल में
भी
मैं
सखी रूप, मैं सहयोगी
मैं
प्रेम गीत, मैं
प्रीत-मीत
मैं
तेज धुप, मैं छौंव
भी हूँ ,
मैं
पत्नी रूप ,मैं
प्रियतमा
मैं
सोलह श्रृंगार, मैं
विध्वंस रूप
मैं
सिमटी सिमटी, मैं
लाज रूप
मैं
दिल में हूँ, मैं
धड़कन में
मैं
अर्धांगिनी, मैं
मृगनयनी
मैं
फूलों में, मैं
कलियों में
मैं
भंवरो के स्पंदन में
मैं
प्रेम में हूँ, मैं
विरह में भी
मैं
बलखाती, मैं मदमाती
मैं
माया हूँ ,मैं छाया
हूँ
मैं
सोते बच्चो के आँखों में
मैं
ख्वाब भी हूँ, मैं
नींद भी हूँ
मैं
थपकी में , मैं लोरी
में
मैं
आंसू में, मैं क्रंदन
में
मैं
पायल में, मैं बिंदी
में
मैं
दहकते जिस्म के शोलों में
मैं
भीड़ में भी, मैं
तन्हा भी
मैं
देह भी हूँ, मैं रूह
भी हूँ
मैं
औरत हूँ , मैं औरत
हूँ ,
मैं
औरत हूँ ,मैं औरत
हूँ ।
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अभय सुमन
"दर्पण"
