Wednesday, October 4, 2023

खुद को खुद में ढूंढ रहा

हर आहट से पूछ रहा

दौर ये कैसी दौर रही

ऐ जिन्दगी अब तू ही बता।


पाया क्या और खोया क्या

मोती चुगने जब तू चला

मोती मिली तो सीप नहीं

छाया है पर धूप नहीं 


दर्पण में जब देखा खुद को 

धुंधली सी तस्वीर मिली 

पा लिया जो सपना था

खो गया जो अपना था।


मन दर्पण जब देखा मैंने

ख़ुद को न पहचान सका

दौर ये कैसी दौर रही

ऐ जिन्दगी अब तू ही बता।


बचपन की मीठी झोंकों से

जीवन की इस बेला तक

कितने यादें लूट गई

कितने सपने छूट गये।


पल दो पल के आंगन में

लम्बी लम्बी कहानी है 

पीछे मुड़कर देखो तो

जीवन बहता पानी है 


जीवन के खोये नग्मे भी

अपनी ही जिन्दगानी है

ढूंढ के ला दो कोई फिर

कर दी ऐसी कौन खता


सोचो समझो जानो तो

ये जीवन एक कहानी है 

नाते, रिश्ते, इश्क़, खफा 

खट्टी मीठी जिंदगानी हैं 


अपने खुद की परछाई में 

बीते किस्से बस खोज जरा 

दौड़ ये कैसी दौड़ रही

ऐ जिन्दगी अब तू ही बता।