अग्नि की धधकती ज्वाला में सोलह हज़ार रानियों संग खुद को आहुति देती महारानी पद्मावती और द्वार पर खड़ा एक वहशी कामुक दरिंदा जो उन सबों को नोचने, खसोटने अपने हरम का सामान बनाने बढ़ा आ रहा है। वीर राजपूत महाराजा रतन सिंह अपने योद्धाओ के संग वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। अपने मान, सम्मान, लाज को बचाने और उस दुष्ट से चीर हरण को बचने का कोई यत्न न पा महारानी पद्मावती ने सोलह हज़ार रानियों संग जौहर का निर्णय किया। क्या इतना आसान था जौहर। जब अग्नि की एक लौ शरीर पर गहरे दाग दे जाती है, वहां अपना शरीर अग्नि को होम कर देना। कितना बड़ा निर्णय, कितना कठिन डगर।
ये वक्त तेरहवीं शताव्दी का था, जब अलाउद्दीन खिलजी का आतंक हिंदुस्तान के जर्रे जर्रे में मौजूद था। खिलजी की सेना जिस गावं से गुजरती वहाँ या तो लाशों का सैलाब दिखता या इंसानो का चीत्कार। नारियाँ तो खिलजी के भोग्या की बस्तु थी और उनके सूबेदारों द्वारा उन्हें प्रस्तुत करना अपनी तरक्की की सीढ़ी। इसी समय चित्तौड़ राज्य में राजा रतन सिंह अपने वीरता और सुशासन के लिए जाने जाते थे और उनकी पत्नी रानी पद्मावती अपने अप्रितम सौंदर्य के लिए। रानी पद्मावती जिसे उन्होंने सिंघला प्रदेश (श्रीलंका ) से स्वयंवर में जीता था, अपने खूबसूरती के लिए पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध थीं। राजा रतन सिंह की वीरता एवं पद्मावती की सुंदरता के चर्चे जहाँ आम थे वहीँ उनकी मुहब्बत किसी की भी ईर्ष्या का कारण था। उन दोनों की खूबसूरत जिंदगी लम्हा-लम्हा पंख लगा कर उड़ रहा था और समय के पन्ने पर अपनी यादें अंकित कर रहा था। लेकिन उस खूबसूरत संसार को शायद किसी की नजर लग गयी और नजर भी ऐसी की लाखो लोगो की मौत भी कम पर गयी।
चित्तौर राज्य का एक व्यक्ति राघव सिंह अपने कुछ गलत कृत्यों के कारण दरबार मे हाजिर हुआ और दरवार से दोषारोपित होकर राजा रतन सिंह से सजा पाया। राजाज्ञा से उसे सजा के तौर पर देश निकाला दे दिया गया। राघव सिंह इसमें अपना अपमान जान बदले की तलाश में रहने लगा। उसे ये मालूम हुआ की खिलजी ने भारत के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्ज़ा कर रखा है पर चित्तौर के वीर राजपूतो को हरा नहीं सका है। हमेशा की तरह भारत भूमि का एक गद्दार फिर से भारतवर्ष को कलंकित करने निकल पड़ा। उसने अलाउद्दीन खिलजी से मुलाकात की और चित्तौर, राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती के बारे में बताया। उसे मालूम था की खिलजी के हरम में हजारों औरते रहा करती है और युद्ध के बाद यही उसकी पसंद है। उसने खिलजी को पद्मावती की सुंदरता के बारे में बताया और अपनी रानी बनाने के लिए उकसाया। खिलजी ने पद्मावती को देखने और पाने की इच्छा से चित्तौर पर आक्रमण कर दिया। उधर रतन सिंह और पद्मावती इन सबो से बेखबर अपने सुन्दर संसार में प्यार और मनुहार के कोमल पलों के साथ अपनी जिंदगी के खूबसूरत क्षण बिता रहे थे। तभी संदेशा आया की खिलजी ने चित्तौर पर आक्रमण कर दिया है। एक राजपूत अपनी आन, बाण और शान के लिए अपना सब कुछ लुटा सकता है पर अपने मान-मर्यादा पर आंच नहीं आने देता। कुछ ऐसा ही मंजर था और इधर से चितौड़ की सेना भगवा साफा पहन कर युद्ध की रणभेरी बजा दी। खिलजी आया तो जरूर पर उसे राजपूतों के शौर्य और पराक्रम का अंदाजा था। चितौड़ किले के बाहर से उसने खबर भिजवाई की वह राजा रतन सिंह से दोस्ती करना चाहता है और रानी पद्मावती को बहन मानता है। यह भी खबर भिजवाई की रानी पद्मावती के बारे में काफी सुना है और एक भाई की हैसियत से उनसे मिलना चाहता है। एक राजपूत रानी जहाँ कभी किसी पराये पुरुष के सामने बिना परदे के ना जाती हो वहां उनसे मिलना, ये कतई सम्भब न था।
राजा रतन सिंह को खिलजी की क्रूरता का अंदाजा था और मालूम था की युद्ध लाखो लोगो की बलि ले लेगा। इसिलिए सभी से विचार कर ये फैसला हुआ की एक आईने में खिलजी, रानी पद्मावती के प्रतिबिंब को देख सकता है। खिलजी अपने कुछ विश्वासपात्र के साथ चित्तौर के किले में दाखिल हुआ पर उसके दिमाग में कुछ और चल रहा था। उसने आईने में रानी पद्मावती को देखा और रानी को देखकर वह मदहोश सा हो गया और किले के बाहर शिष्टाचार बस छोड़ने आये रतन सिंह को बंदी बना लिया। उसने घोषणा की कि अगर कल रानी पद्मावती नहीं आती है तो राजा रतन सिंह का सर चित्तौर के किले पर टंगा मिलेगा। किले में हाहाकार मच जाता है, और एक करूण स्थिति पैदा हो जाती है। शायद नजर लगाने वाले को भी अंदाजा नहीं रहा होगा की दो मुहब्बत करने वाले दिल जीवन के इस मोड़ पर खरे हो जायेंगे।
चित्तौर के सेना नायक गोरा और बादल एक योजना बनाते हैं और घोषणा करते हैं की कल रानी पद्मावती अपने 150 सखियों के साथ खिलजी के पास जाएँगी। इधर 150 पालकियां तैयार की गयी और हर पालकी में चार सैनिक कहार बन कर अपने जीवन की अंतिम युद्ध की तैयारी में जुट गए। हर पालकी में सशस्त्र राजपूत योद्धा, रानी पद्मावती के सखी के भेष में अपनी आन,बान और शान की रक्षा में जुट गए। खिलजी को खबर मिली की रानी पद्मावती अपने 150 सखियों के साथ उसके पास आ रही और अंतिम बार राजा रतन सिंह से मिलना चाहती है। खिलजी इजाजत देता है और रतन सिंह को आज़ाद करता है। जैसे ही रतन सिंह पालकी के पास आते हैं, गोरा और बादल उन्हें घोड़े में बिठाकर किले की ओर दौर पड़ते हैं। सारे सैनिक खिलजी की सेना से युद्ध करते हैं और उसे रोकते हैं। इसी लड़ाई में गोरा मारा जाता है परन्तु बादल राजा रतन सिंह को सकुशल किले में ले आता है। उधर गुस्से में आगबबूला खिलजी किले की घेराबंदी करता है और युद्ध की घोषणा करता है। रतन सिंह की सेना युद्ध करती है और उस युद्ध में रतन सिंह मारे जाते हैं। अब खिलजी किले की दरवाजे की ओर किले में प्रवेश करने के लिए बढ़ता है। किले के अंदर हजारो नारियाँ चीत्कार कर रही की अब हमारा शरीर इन वहशी दरिंदो द्वारा नोचा जायेगा और इनके हरम की वो बस्तुएें बन जाएँगी। तब रानी पद्मावती ने निर्णय लिया की कुछ भी हो जाये पर इन दरिंदो का साया भी अपने शरीर पर नहीं परने देंगे। सभी राजपूत योद्धा को साफा के लिए तैयार किया गया और सोलह हजार रानियों संग खुद को जौहर के लिए। क्या इतना आसान था जौहर। किले के आँगन में चिता सजाई गयी और रानी पद्मावती सोलह हजार रानियों संग उस चिता पर बैठ गयी। उधर बचे हुए योद्धा खिलजी की सेना से युद्ध कर बीरगति को प्राप्त हो रहे थे इधर जौहर की आग की लपटे धीरे धीरे तेज हो रही थी। आग की लपटे शोलों में बदलने लगी और पद्मावती का शरीर भस्म होता गया। खिलजी जब किले के अंदर बढ़ा तो आग की तपिश उसे बेचैन कर गई और जब चिता के पास गया तो सिर्फ राख और हड्डियों का ढ़ेर। । युद्ध कर, लाखो लोगो के मौत का कारण बनने के बाद भी वो पद्मावती को पा न सका। वो युद्ध जरूर जीता परन्तु वास्तव में वो हार चूका था और रानी पद्मावती हार कर भी जीत चुकी थी। अपने मान-मर्यादा के लिए रानी पद्मावती द्वारा किया त्याग सदियों के लिए अमर हो गया। राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती के एक खूबसूरत मुहब्बत भरी जिंदगी का दुखद अंत हो गया।
नोट : लेखक किसी भी तरह के ऐतिहासिक सत्यता का दावा नहीं करता। अगर आलेख पसंद आये तो FOLLOW अवश्य करें। धन्यवाद
ये वक्त तेरहवीं शताव्दी का था, जब अलाउद्दीन खिलजी का आतंक हिंदुस्तान के जर्रे जर्रे में मौजूद था। खिलजी की सेना जिस गावं से गुजरती वहाँ या तो लाशों का सैलाब दिखता या इंसानो का चीत्कार। नारियाँ तो खिलजी के भोग्या की बस्तु थी और उनके सूबेदारों द्वारा उन्हें प्रस्तुत करना अपनी तरक्की की सीढ़ी। इसी समय चित्तौड़ राज्य में राजा रतन सिंह अपने वीरता और सुशासन के लिए जाने जाते थे और उनकी पत्नी रानी पद्मावती अपने अप्रितम सौंदर्य के लिए। रानी पद्मावती जिसे उन्होंने सिंघला प्रदेश (श्रीलंका ) से स्वयंवर में जीता था, अपने खूबसूरती के लिए पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध थीं। राजा रतन सिंह की वीरता एवं पद्मावती की सुंदरता के चर्चे जहाँ आम थे वहीँ उनकी मुहब्बत किसी की भी ईर्ष्या का कारण था। उन दोनों की खूबसूरत जिंदगी लम्हा-लम्हा पंख लगा कर उड़ रहा था और समय के पन्ने पर अपनी यादें अंकित कर रहा था। लेकिन उस खूबसूरत संसार को शायद किसी की नजर लग गयी और नजर भी ऐसी की लाखो लोगो की मौत भी कम पर गयी।
चित्तौर राज्य का एक व्यक्ति राघव सिंह अपने कुछ गलत कृत्यों के कारण दरबार मे हाजिर हुआ और दरवार से दोषारोपित होकर राजा रतन सिंह से सजा पाया। राजाज्ञा से उसे सजा के तौर पर देश निकाला दे दिया गया। राघव सिंह इसमें अपना अपमान जान बदले की तलाश में रहने लगा। उसे ये मालूम हुआ की खिलजी ने भारत के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्ज़ा कर रखा है पर चित्तौर के वीर राजपूतो को हरा नहीं सका है। हमेशा की तरह भारत भूमि का एक गद्दार फिर से भारतवर्ष को कलंकित करने निकल पड़ा। उसने अलाउद्दीन खिलजी से मुलाकात की और चित्तौर, राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती के बारे में बताया। उसे मालूम था की खिलजी के हरम में हजारों औरते रहा करती है और युद्ध के बाद यही उसकी पसंद है। उसने खिलजी को पद्मावती की सुंदरता के बारे में बताया और अपनी रानी बनाने के लिए उकसाया। खिलजी ने पद्मावती को देखने और पाने की इच्छा से चित्तौर पर आक्रमण कर दिया। उधर रतन सिंह और पद्मावती इन सबो से बेखबर अपने सुन्दर संसार में प्यार और मनुहार के कोमल पलों के साथ अपनी जिंदगी के खूबसूरत क्षण बिता रहे थे। तभी संदेशा आया की खिलजी ने चित्तौर पर आक्रमण कर दिया है। एक राजपूत अपनी आन, बाण और शान के लिए अपना सब कुछ लुटा सकता है पर अपने मान-मर्यादा पर आंच नहीं आने देता। कुछ ऐसा ही मंजर था और इधर से चितौड़ की सेना भगवा साफा पहन कर युद्ध की रणभेरी बजा दी। खिलजी आया तो जरूर पर उसे राजपूतों के शौर्य और पराक्रम का अंदाजा था। चितौड़ किले के बाहर से उसने खबर भिजवाई की वह राजा रतन सिंह से दोस्ती करना चाहता है और रानी पद्मावती को बहन मानता है। यह भी खबर भिजवाई की रानी पद्मावती के बारे में काफी सुना है और एक भाई की हैसियत से उनसे मिलना चाहता है। एक राजपूत रानी जहाँ कभी किसी पराये पुरुष के सामने बिना परदे के ना जाती हो वहां उनसे मिलना, ये कतई सम्भब न था।
राजा रतन सिंह को खिलजी की क्रूरता का अंदाजा था और मालूम था की युद्ध लाखो लोगो की बलि ले लेगा। इसिलिए सभी से विचार कर ये फैसला हुआ की एक आईने में खिलजी, रानी पद्मावती के प्रतिबिंब को देख सकता है। खिलजी अपने कुछ विश्वासपात्र के साथ चित्तौर के किले में दाखिल हुआ पर उसके दिमाग में कुछ और चल रहा था। उसने आईने में रानी पद्मावती को देखा और रानी को देखकर वह मदहोश सा हो गया और किले के बाहर शिष्टाचार बस छोड़ने आये रतन सिंह को बंदी बना लिया। उसने घोषणा की कि अगर कल रानी पद्मावती नहीं आती है तो राजा रतन सिंह का सर चित्तौर के किले पर टंगा मिलेगा। किले में हाहाकार मच जाता है, और एक करूण स्थिति पैदा हो जाती है। शायद नजर लगाने वाले को भी अंदाजा नहीं रहा होगा की दो मुहब्बत करने वाले दिल जीवन के इस मोड़ पर खरे हो जायेंगे।
चित्तौर के सेना नायक गोरा और बादल एक योजना बनाते हैं और घोषणा करते हैं की कल रानी पद्मावती अपने 150 सखियों के साथ खिलजी के पास जाएँगी। इधर 150 पालकियां तैयार की गयी और हर पालकी में चार सैनिक कहार बन कर अपने जीवन की अंतिम युद्ध की तैयारी में जुट गए। हर पालकी में सशस्त्र राजपूत योद्धा, रानी पद्मावती के सखी के भेष में अपनी आन,बान और शान की रक्षा में जुट गए। खिलजी को खबर मिली की रानी पद्मावती अपने 150 सखियों के साथ उसके पास आ रही और अंतिम बार राजा रतन सिंह से मिलना चाहती है। खिलजी इजाजत देता है और रतन सिंह को आज़ाद करता है। जैसे ही रतन सिंह पालकी के पास आते हैं, गोरा और बादल उन्हें घोड़े में बिठाकर किले की ओर दौर पड़ते हैं। सारे सैनिक खिलजी की सेना से युद्ध करते हैं और उसे रोकते हैं। इसी लड़ाई में गोरा मारा जाता है परन्तु बादल राजा रतन सिंह को सकुशल किले में ले आता है। उधर गुस्से में आगबबूला खिलजी किले की घेराबंदी करता है और युद्ध की घोषणा करता है। रतन सिंह की सेना युद्ध करती है और उस युद्ध में रतन सिंह मारे जाते हैं। अब खिलजी किले की दरवाजे की ओर किले में प्रवेश करने के लिए बढ़ता है। किले के अंदर हजारो नारियाँ चीत्कार कर रही की अब हमारा शरीर इन वहशी दरिंदो द्वारा नोचा जायेगा और इनके हरम की वो बस्तुएें बन जाएँगी। तब रानी पद्मावती ने निर्णय लिया की कुछ भी हो जाये पर इन दरिंदो का साया भी अपने शरीर पर नहीं परने देंगे। सभी राजपूत योद्धा को साफा के लिए तैयार किया गया और सोलह हजार रानियों संग खुद को जौहर के लिए। क्या इतना आसान था जौहर। किले के आँगन में चिता सजाई गयी और रानी पद्मावती सोलह हजार रानियों संग उस चिता पर बैठ गयी। उधर बचे हुए योद्धा खिलजी की सेना से युद्ध कर बीरगति को प्राप्त हो रहे थे इधर जौहर की आग की लपटे धीरे धीरे तेज हो रही थी। आग की लपटे शोलों में बदलने लगी और पद्मावती का शरीर भस्म होता गया। खिलजी जब किले के अंदर बढ़ा तो आग की तपिश उसे बेचैन कर गई और जब चिता के पास गया तो सिर्फ राख और हड्डियों का ढ़ेर। । युद्ध कर, लाखो लोगो के मौत का कारण बनने के बाद भी वो पद्मावती को पा न सका। वो युद्ध जरूर जीता परन्तु वास्तव में वो हार चूका था और रानी पद्मावती हार कर भी जीत चुकी थी। अपने मान-मर्यादा के लिए रानी पद्मावती द्वारा किया त्याग सदियों के लिए अमर हो गया। राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती के एक खूबसूरत मुहब्बत भरी जिंदगी का दुखद अंत हो गया।
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नोट : लेखक किसी भी तरह के ऐतिहासिक सत्यता का दावा नहीं करता। अगर आलेख पसंद आये तो FOLLOW अवश्य करें। धन्यवाद
Excellent
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