वक़्त भी अजीब होता है। उसे सिर्फ अपनी फिक़र होती है, इंसानी जज्बात शायद उसके रूह तक दखल नहीं रखता। तभी तो एक अदाकारा जो करोड़ों लोगों की खुशी का कारण थी, अपनी खुशी और अपनों के खुशी के पल में हमेशा के लिए छोड़ कर उस वक़्त की तरफदारी करने चली गई। कई बातें श्रीदेवी की मौत के बारे में कही गई या कही जाती रहेंगी पर क्या उनका व्यक्तित्व इतने में ही सिमट कर रह जाएगा । कहा जाता है कि उन्होंने पांच साल में अभिनय की शुरुआत की थी, और चौबन साल की उम्र में भी फिल्में कर रही थी। यानी लगभग आधी शताब्दी तक उन्होंने इस फिल्मी दुनिया को जिया है। कितने हैं ऐसे, शायद अँगुलियों पर गिनती के ही होंगे।
तमिलनाडु के शिवकाशी में 13 अगस्त 1963 को श्रीदेवी का जन्म 'अयय्पन ' और 'राजेश्वरी ' की पुत्री के रुप में हुआ था। श्रीदेवी का पूरा नाम 'श्री अम्मा यंगर अयप्पन ' था पर यह नाम पर्दे पर शायद काफी भारी था और पुकारने में भी जुबान पर नहीं आता था, इसीलिए एक छोटा सा नाम 'श्रीदेवी' का जन्म हुआ जो अपने नाम के अनुरूप परदे पर देवी साबित हुई। हिंदी फिल्मो के अलावा तमिल, तेलगु , कन्नड़ , मलयालम की भी वो सुपरस्टार रह चुकी थी। संभवतः पहली लेडी सुपरस्टार थी जो अपने फिल्म के हीरो से ज्यादा पैसे लेती थी। फिल्मफेयर के दस से ज्यादा अवार्ड और भारत सरकार द्वारा 2013 में पदमश्री से नवाजी गयी। उनकी फिल्मे सफलता की गारंटी थी और उन्हें ध्यान में रखकर फिल्मे लिखी जाती थी। हर कलाकार उनके साथ काम कर के अपने कैरियर को आगे बढ़ाना चाहता था। हिंदी फिल्मे मसलन मिस्टर इंडिया, चालबाज़, चांदनी, सदमा, खुदा गवाह, नगीना इत्यादि वो फिल्मे थी जो श्रीदेवी के बिना कल्पना भी नहीं की सकती।

शुरुआत में उनकी हिंदी भाषा पर पकड नहीं थी और उनकी आवाज़ किसी और के द्वारा डब की जाती थी। पहली बार चांदनी (1989) में उनकी आवाज़ सुनने को मिली। आखरी रास्ता (1986) में रेखा ने उनकी आवाज़ डब की थी। शायद अनगिनत बाते हैं उनकी कही-अनकही।
उनकी लव लाइफ काफी उतार चढाव वाली रही। एक समय मिथुन चक्रवर्ती से उनका रिश्ता काफी प्रगाढ़ रहा जो बोनी कपूर के दूसरी पत्नी बनने पर खत्म हुआ। ग्लैमर की चकाचौंध में, सच्चे प्यार को ढूँढ़ते ढूढ़ते इंसान को जो भा जाये वो उसी का हो जाता है। ये अलग बात है की वो प्यार में तृप्त है या अतृप्त। शायद इसीलिए इसे मायानगरी कहा जाता है।
उनकी मृत्यु 24 फरबरी 2018 को दुबई में हुई, जब वो एक पारिवारिक समारोह में गयी थी। मृत्यु भी अजीब परिस्थियों में और एक अनचाहा विवाद खरा कर गयी। वैसे सिर्फ चौबन (54) साल में जाना एक अजीब सी खामोशी दे गया और सीख भी की अपनी ख्वाहिशों को कल पर मत टाले और जी ले हर अरमान।
क्या पता कल हो न हो।