Sunday, July 22, 2018

देखो, इश्क की सुबह हो गयी - कविता

सूरज के पहले स्पंदन से,
भँवरों ने ली अंगराई है,
फूल कमल खिल आयी है,
लाज का घूंघट बिखर-सिमट गयी,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

              अलसाई उन नजरो में,
              ख्वाब सुनहरी मद्यम थी,
              मेरी आँखों के बंदन से,
              परिचय नयनों की हो गयी,
              देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

 तेरे आने में राज भी था,
 तेरे जाने में भेद भी है,
 चुपके से झलक को पाते ही,
 ख्वाब को पंख लग गई,
 देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               कदमो की आहट थी संभली,
               पायल भी थी थोड़ी खनकी,
               आतुर थी तोड़ने को हर बंधन
               प्रेम - अगन जग गयी
               देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

मिलन को व्याकुल अधरो में,
थरथराते अल्फाज़ भी थे,
खिली तबस्सुम चेहरे पर,
जब लवों की रंगत बदल गई,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               -  अभय सुमन "दर्पण"








Friday, July 13, 2018

ट्रैन की नीचे वाली सीट - कहानी

शुक्ला जी की ट्रैन की टिकट कन्फर्म हो गयी थी। काफी मुश्किल से तत्काल में कल टिकट बनवायी थी वो भी वेटिंग में। लखनऊ से भोपाल जाना था तीन बच्चे और पत्नी के साथ, किसी रिश्तेदार की शादी में। पहले तो ना-ना होती रही, लेकिन अन्त समय में प्लान बन ही गया। यहाँ भी तो छोड  कर जाया नहीं जा सकता था। अमीनाबाद में इतने बड़े किराने की दुकान किसके भरोसे छोड़ कर जाता। खैर अब तो निकल चुके थे। ए.सी. में टिकट नहीं मिल पाया तो स्लीपर में लेना पड़ा, सोचा चलो रात भर की यात्रा है किसी तरह काट लेंगे।
रात के दस बज चुके थे, सभी अपने बिस्तर लगा कर सोने की तैैैयारी में लगे थे। शुक्ला जी को पांच सीट में सिर्फ एक सीट नीचे की मिली थी और बाकी सभी मिडिल और ऊपर की थी। नीचे वाली सीट पर अभी बच्चो ने कब्ज़ा कर रखा था।  अपनी बड़ी सी तोंद लेकर उनका ऊपर जाने का कोई इरादा नहीं था। बच्चे अपनी मस्ती में खिड़की के पास बैठकर बाहर का मज़ा ले रहे थे। तभी एक सज्जन उनके सीट पर कोने में बैठ गए।  शुक्ला जी ने थोड़ी सी घुरकी दी "भाईसाहब अपनी सीट पर बैठ जाइये"। उसने कहा "भैया वेटिंग है, किसी तरह रात काट लूँ"। शुक्ला जी के बैठे बैठे पेट में गैस बन रही थी, उन्होंने गुस्से में जोर से कहा "भाईसाहब नीचे वाली सीट को मैं छूने नहीं दूंगा।आप अपनी तशरीफ कहीं और ले जाएँ।  वो सज्जन उठकर कहीं और चले गए। शुक्ला जी ने बच्चों को डांट लगाई, "जाओ सब सो जाओ"। बच्चो को काफी मजा आ रहा था, काफी दिनों बाद कहीं घूमने जा रहे थे। पापा की डांट सुन कर सब खामोश हो गए। सभी ने अपनी अपनी बिस्तर लगाई और सोने चले गये। शुक्ला जी ने नीचे की बिस्तर लगायी और अपने तोंद सँभालते हुए सो गए। एक घंटे बीते होंगे की उन्होंने अपने पैर के पास कुछ सरसराहट महसूस किया। आँखे खोल कर देखा तो एक चौबीस-पचीस साल का युवक उनकी सीट के कोने में जगह बना रहा था। उन्होंने आव देखा न ताव, अपने पैर से उसे एक धक्का दे दिया। वो बेचारा नीचे फर्श पर गिर पड़ा।  उठते ही शुक्ला जी पर चढ़ बैठा "क्यूँ ताऊ, आपने धक्का क्यों दिया"। शुक्ला जी बौराये बैठे थे कहा "तुम मेरी सीट पर बैठे क्यों"। उसने पलट कर कहा "बैठा था तो कौन सा आपकी सीट लिए जा रहा था, एक तो गन्दी गैस छोर रहे, उस पर खर्राटे की आवाज, कोई शौक नहीं आपके पास बैठने की अगर मजबूरी नहीं होता तो"। बस शुक्ला जी उठ कर बैठ गए, लगे उससे बहस करने। इसी हो-हल्ले में काफी लोग जग गए और तमाशा देखने लगे। शुक्ला जी की पत्नी ऊपर वाली सीट से सारा तमाशा देख रही थी और कुछ बुदबुदा रही थी। तभी कुछ लोग उस युवक के पक्ष में आ गए और शुक्ला जी को भला बुरा कहने लगे। अब बात शुक्ला जी के बर्दाश्त से बाहर हो गया था, वो उठ कर बैठ गए और सारी लाइटें जला दी। शुक्ला जी अब पुरे मूड में आ चुके थे और बात अब हाथा-पाई तक आ चुकी थी। शुक्ला जी की पत्नी और तीनो बच्चे आँखे मलते अपने पिताजी को देख रहे थे। तभी किसी ने टिकट कलेक्टर को बुला लिया। अब टीटी साहेब, शुक्ला जी और उस युवक के झगड़े को निपटने में लग गए। उस युवक ने बताया की किसी इंटरव्यू के सिलसिले में भोपाल जा रहा था, परसो ही मालूम चला और एकाएक जाना पड़ा। उसने टीटी से काफी अनुरोध किया कि एक सीट मिल जाये तो आराम से कल इंटरव्यू दे दूँ। वैसे ही आधा मूड ख़राब हो चूका था। उधर शुक्ला जी अलग भन्नाये बैठे थे। भीड़ काफी होने के कारण रास्ते में और दोनों सीट के बीच में नीचे काफी लोग लेते हुए थे। टीटी ने पहले सीट की असमर्थता व्यक्त की, फिर उस युवक को एक तरफ बुलाकर कहा कि, "बस पांच सौ रूपये दे दो तो मैं कुछ इंतजाम करूँ"। उस युवक ने कहा "लेकिन अंकल मैं इंटरव्यू के लिए जा रहा हूँ, गरीब परिवार से हूँ और गिनती के पैसे हैं। यह मुझ से सम्भब नहीं है"। सामने वाली खिड़की के साथ वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला लेटी थी। वो सारा हंगामा देख रही थी और टीटी की बातें सुन रही थी। उसने उस युवक से कहा, " कोई नहीं बेटा, तू मेरी वाली सीट पर बैठ जा मुझे मुंबई तक जाना है कल दिन में मैं सो लुंगी, लेकिन तेरा इंटरव्यू ख़राब नहीं जाना चाहिये। सभी लोग उस बुजुर्ग महिला की बात सुन कर काफी शर्मिंदा हुए। तभी टीटी ने कहा, "ठीक है मैं तुम्हे एक सीट दे रहा हूँ लेकिन कल इंटरव्यू में पास जरूर होना"। इधर शुक्ला जी के तेवर भी ढीले हो चुके थे, उन्हें भी लग रहा था की कुछ गलत कर दिया। उन्होंने भी कहा, "ठीक है बेटा बैठ जा मेरी थोड़ी सी जगह पर। वो युवक मुस्कुरा कर कहा, " नहीं अंकल आप आराम से सोयें, बस थोड़ा कम खायें। शुक्ला जी अपनी तोंद संभाले धीरे से मुस्कुराने लगे।

                                                                                              
                                                                                                      - अभय सुमन "दर्पण"