Sunday, July 22, 2018

देखो, इश्क की सुबह हो गयी - कविता

सूरज के पहले स्पंदन से,
भँवरों ने ली अंगराई है,
फूल कमल खिल आयी है,
लाज का घूंघट बिखर-सिमट गयी,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

              अलसाई उन नजरो में,
              ख्वाब सुनहरी मद्यम थी,
              मेरी आँखों के बंदन से,
              परिचय नयनों की हो गयी,
              देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

 तेरे आने में राज भी था,
 तेरे जाने में भेद भी है,
 चुपके से झलक को पाते ही,
 ख्वाब को पंख लग गई,
 देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               कदमो की आहट थी संभली,
               पायल भी थी थोड़ी खनकी,
               आतुर थी तोड़ने को हर बंधन
               प्रेम - अगन जग गयी
               देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

मिलन को व्याकुल अधरो में,
थरथराते अल्फाज़ भी थे,
खिली तबस्सुम चेहरे पर,
जब लवों की रंगत बदल गई,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               -  अभय सुमन "दर्पण"








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