Sunday, December 30, 2018

इश्क - कविता

कोई इश्क़, सिर्फ इश्क़ के लिए इश्क़ करता है।
कोई जीतने पाने की हसरत लिए इश्क़ करता है।
ख्वाहिशे के समंदर तो होती है दोनों में बराबर।
कोई फ़ना तो कोई खता-ए-वफ़ा कर जाता है।

कोई इश्क़ नदिया बन सागर में मिल जाता है।
कोई इश्क़ बर्फ् बन रिस-रिस पिघल जाता है।
हर इश्क़ में होती है गांठ और गिरह मुकद्दर् की।
कोई उलझा तो कोई ख़ामोशी से निकल जाता है।

हर दीये की फितरत है खुद को जला मिटा लेना
जब कोई तव्वसूम चेहरा दिल मे घर बना लेता है।
हर इश्क़ को नहीं मिलता बाहों का बेताज समंदर
कहां शर्तो तकरीरों पर सदा इश्क़ हुआ करता है।
                                         -- अभय सुमन "दर्पण" 









Tuesday, December 18, 2018

कविता - स्वेटर


ऊन की उलझी-सुलझी ये गोले
गिरती,संभलती,इठलाती कभी
नए जाल और रिश्तों को रचती
रंग-बिरंगी अनमोल ये स्वेटर

काँटों संग खेलती-टकराती कांटे
बनती दरो-दिवार और इमारते 
नये नये डिजाइन के संग
सुर्ख पैगाम,दिलो-जान है स्वेटर


माँ के हाथों से गुंथी,  बुनी
नाप पर नाप लेती धुनी
उन नर्म मखमली एह्सासो का
कोमल,सुखद अहसास है स्वेटर

कहाँ दिखती उन काँटों की मोहब्बत
सुलझती-बिगड़ती नयेपन की चाहत
पैसों की खनकती हंसी में दबी
अब बड़े मॉल में तैयार है स्वेटर

                ---   अभय सुमन दर्पण