Tuesday, December 18, 2018

कविता - स्वेटर


ऊन की उलझी-सुलझी ये गोले
गिरती,संभलती,इठलाती कभी
नए जाल और रिश्तों को रचती
रंग-बिरंगी अनमोल ये स्वेटर

काँटों संग खेलती-टकराती कांटे
बनती दरो-दिवार और इमारते 
नये नये डिजाइन के संग
सुर्ख पैगाम,दिलो-जान है स्वेटर


माँ के हाथों से गुंथी,  बुनी
नाप पर नाप लेती धुनी
उन नर्म मखमली एह्सासो का
कोमल,सुखद अहसास है स्वेटर

कहाँ दिखती उन काँटों की मोहब्बत
सुलझती-बिगड़ती नयेपन की चाहत
पैसों की खनकती हंसी में दबी
अब बड़े मॉल में तैयार है स्वेटर

                ---   अभय सुमन दर्पण

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