ऊन की उलझी-सुलझी ये गोलेगिरती,संभलती,इठलाती कभी
नए जाल और रिश्तों को रचती
रंग-बिरंगी अनमोल ये स्वेटर
काँटों संग खेलती-टकराती कांटे
बनती दरो-दिवार और इमारते
नये नये डिजाइन के संग
सुर्ख पैगाम,दिलो-जान है स्वेटर
माँ के हाथों से गुंथी, बुनी
नाप पर नाप लेती धुनी
उन नर्म मखमली एह्सासो का
कोमल,सुखद अहसास है स्वेटर
कहाँ दिखती उन काँटों की मोहब्बत
सुलझती-बिगड़ती नयेपन की चाहत
पैसों की खनकती हंसी में दबी
अब बड़े मॉल में तैयार है स्वेटर
--- अभय सुमन दर्पण
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