Tuesday, December 10, 2019

कहानी - हेलमेट

आज फिर सिंह साहेब चौराहे पर खड़े  थे हाथो में 4 -5 हेलमेट लेकर। रोज की तरह वही उलझी बाल, थकी नजरे, पुराने से कपड़े पहने, अपनी उसी जगह पर चौराहे के नजदीक। तभी उन्हें एक 16 -17  साल का लड़का बाइक से आता दिखा बिना हेलमेट लगाए।  सिंह साहेब ने आवाज देकर उसे रोका और पूछा। 
"बेटा, बिना हेलमेट के जा रहे, ये लो हेलमेट मेरी तरफ से लगा लो", सिंह साहेब
"नहीं नहीं अंकल, मेरे पास है लेकिन घर पे है " लड़का ने कहा
"तो लगाया क्यों नहीं", सिंह साहेब
"बिना हेलमेट काफी मज़ा आता है, खुली हवा में बालो का लहराना, लड़कियों का देखना। अरे अंकल हेलमेट पहन कर वो बात कहाँ।", लड़के ने हँसते हुए कहा
"बात तो ठीक कह रहे, लेकिन जिंदगी भी तो उस सबसे ज्यादा जरूरी है।" सिंह साहेब ने सोचते हुए कहा
"अरे अंकल जाने दो देर हो रही, लेकिन एक बात बताओ ", लड़का
"क्या "
"आप ऐसे फ्री में हेलमेट क्यों बाँट रहे", लड़का
"क्योंकि मैं तुम जैसे लड़को से बहुत प्यार करता हूँ " सिंह साहेब
"क्यों मजाक कर रहे अंकल, मेरे मम्मी पापा मुझसे बहुत प्यार करते हैं ", लड़का
"बेटा अगर वो प्यार कर रहे होते तो बिना हेलमेट तुम्हे घर से निकलने नहीं देते" सिंह साहेब
"अरे अंकल कैसी बाते कर रहे, तुम शायद कोई पागल जान परते हो।"  कहकर लड़का बाइक आगे बढ़ा देता है 

पास में खडे दो लड़के बाते कर रहे थे।
"कौन है ये आदमी, अक्सर देखता हूँ यहाँ खडा रहता है और लोगो को हेलमेट बांटता रहता है ", पहले ने कहा
"पता नहीं कौन है, पर मुझे भी अक्सर दिखता है, होगा कोई पागल। कोई अपने पैसे इस तरह लुटाता है क्या " दूसरे ने कहा
पास में खड़ा एक आदमी उनकी बात सुन रहा था , वो पास आकर कहता है  "क्या तुम इन्हे नहीं जानते, ये मिस्टर दिनेश सिंह हैं, शहर के जाने माने रईस थे, अपनी आधी से ज्यादा सम्पति ईन्होंने दान कर दी, आज कल हर दिन शाम में किसी भी चौराहे पर खडे हो कर हेलमेट बांटते हैं, खासकर जो युवा बिना हेलमेट के जाते हैं उसे रोक कर।"
 "लेकिन ऐसा क्यों" , पहले ने पूछा
फिर वो कहानी सुनाने लगता है।
"ज्यादा नहीं बस एक साल पहले की बात है, एक दिन अपने घर पर वो बैठे थे......
साथ में उनका कोई जूनियर भी बैठा था, तभी उनका 16 -17 साल का लड़का कमरे से निकल रहा थ। 
"पापा मैं जरा दोस्तों के साथ नई बाइक से घूम कर आ रहा", बेटे ने कहा
"अरे, इतनी जल्दी भी क्या है, आओ मेरे पास बैठो।" सिंह साहेब
"नहीं पापा, सभी दोस्तों को पार्टी देनी है, आज तो बहुत मजा आने वाला है " बेटा
"जा बेटा, लेकिन ध्यान से।  पैसे की जरूरत हो तो एटीएम से निकल लेना, और हाँ हेलमेट लगा लेना" ,सिंह साहेब
"अरे पापा, हेलमेट तो बोझ लगती है सर पे, फिर कहाँ वो मस्ती हो पायेगी ", बेटा
"ठीक है जा, लेकिन संभाल के", सिंह साहेब
बेटा निकल जाता है। तभी उनका जूनियर कहता है।
"सर, इनकी उम्र क्या है," जूनियर
"अभी सोलह पूरा कर के सत्रह लगा है, हीरो है पुरे स्कूल का" सिंह साहेब ने गर्व से कहा

"पर सर, इतनी काम उम्र में बाइक दिलाना......., बिना हेलमेट बाइक चलना....... ", जूनियर ने हिचकते हुए कहा
हाँ तो क्या हुआ, खुली हवा में बाले लहरायेंगे, लड़किया देखेगी। हा  हा हा , अरे भाई यही तो उम्र है जिंदगी जीने का, तुम परेशांन मत हो।", सिंह साहेब
"पर सर, आजकल तो फाइन भी काफी बढ़ गयी है", जूनियर
"देखो मिश्रा कर दी न छोटी बात, सिंह साहेब का बेटा है, हजार क्या, लाखो में भी फाइन चला जाये तो दूंगा, आखिर कमाता किस लिए हूँ।", सिंह साहेब
"जी सर ", जूनियर ने कहा और शांत हो गया
सिंह साहेब ने चाय की एक कप उठाई ही थी कि तभी फ़ोन की घंटी बजी। उधर से आवाज आयी।
"हेलो, सिंह साहेब है", उधर से आवाज
"हाँ , बोल रहा हूँ " सिंह साहेब
"सर, आपके बेटे का एक्सीडेंट हो गया है, सर फ्रैक्चर हो गया है, हेलमेट नहीं लगा रखा था,ऑन द स्पॉट डेथ हो गयी है ," उधर से आवाज आयी
सिंह साहेब के हाथ से फोन गिर गया।
  
    फिर आगे बताने लगा
...... बस उसी दिन के बाद इनका जैसे सब ख़तम हो गया, इकलौता लड़का था, अगर हेलमेट लगायी होती तो शायद उसकी जिंदगी बच जाती।", उस आदमी ने अपनी बात पूरी की। (पीछे सिंह साहेब की धुंधली तस्वीर दिख रही, जिसमे वो लोगो को हेलमेट दे रहे होते हैं।)
वो दोनों लड़के सिंह साहेब के पास जाते हैं और उनके साथ लोगो को हेलमेट देने में मदद करते हैं।

कहानी - पापा बेटी

ट्रिंग - टिंग।
तीन बार फ़ोन बज चुकी थी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं।  प्रिया ने धड़कते दिल से फिर एक बार फ़ोन मिलाया।  इस बार फ़ोन उठ गयी।
"हैलो",  उधर से बलबीर सिंह की आवाज आयी।
प्रिया ने जब अपने पापा की आवाज सुनी तो एक सिहरन सी पुरे शरीर में फैल गई।  उसे जबाब देने की हिम्मत नही हो रही थी। वो स्तब्ध सी फ़ोन पर अपने पापा की आवाज सुन रही थी।
" हैलो, हैलो", कई बार बलबीर सिंह ने कहा , "पता नहीं कौन है जवाब ही नहीं दे रहा " फिर फ़ोन को रख दिया।
इस बार प्रिया ने फिर हिम्मत की और फोन मिलाई।  फिर फ़ोन उसके पापा ने उठाया, "हैलो ", लेकिन फिर उधर से कोई आवाज नहीं आयी।  फिर वो जोर से चिल्लाया "पता नहीं कौन है , बार बार फोन कर परेशान कर रहा।
"पापा मैं, प्रिया " , प्रिया बोल बैठी
"कौन प्रिया , मैं किसी प्रिया को नहीं जानता " बलबीर ने कहा
"पापा मैं आपकी बेटी, प्रिया ", प्रिया ने कहा
"कौन बेटी, मर चुकी मेरी बेटी, दुबारा फ़ोन मत करना", बलबीर ने कहा और फ़ोन रख दिया।
प्रिया ने फिर फ़ोन मिलाया, बलबीर ने सोचते हुए फ़ोन उठाया।
"पापा प्लीज फ़ोन मत रखना ", प्रिया ने कहा, "मुझे माफ़ कर दो पापा "
"माफ़ कर दूँ , पर किस लिए, जब तुम मेरी बेटी ही नहीं " बलबीर ने कहा
"नहीं पापा ऐसा मत कहो, काफी हिम्मत जुटा कर आपसे बात कर रही हूँ , मुझे माफ़ कर दो ", प्रिया ने कहा
"कैसे माफ़ कर दूँ , अच्छा बता कैसे माफ़ कर दूँ।  जीते जी तुमने मुझे मार दिया , तेरी माँ ने पिछले तीन सालो से मौन धारण कर रखा।  मैंने पुरे समाज से नाता तोड़ लिया ", बलबीर ने कहा
"सॉरी पापा " , प्रिया ने कहा
"ना ही तेरे से बात करनी और ना ही तेरी शक्ल देखनी", बलबीर ने कहा
"ठीक है पापा, मेरी शक्ल न देखो, लेकिन पीहू की तो देख लो, मेरी बेटी एक साल की होने वाली है", प्रिया ने कहा
" अच्छा एक साल की होने वाली है, कैसी दिखती है , तेरे जैसी ही ना ", बलबीर ने भावुक होकर कहा।
"हाँ पापा, बिलकुल मेरे जैसी", प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा
"उसके जन्म के समय बहुत मन किया था, तुमसे मिलने का, लेकिन ... ," बलबीर ने आंसू पोछे
"पापा बहुत मिस करती मैं आपको", प्रिया ने कहा
"तो तूने ही तो ऐसा काम किया। भाग कर शादी करने की क्या जरूरत थी ?", बलबीर ने कहा
"पापा उसे बहुत चाहती थी मैं ", प्रिया ने कहा
 "अच्छा कितने साल से तू उसे जानती थी ", बलबीर ने पूछा
"पापा, दो साल से " प्रिया ने कहा
"और... और मेरा क्या, जिसने चौबीस साल तुझे अपनी आँखों के सामने बड़ा होते देखा। मेरे प्यार का कोई मूल्य नहीं। इतनी सी थी तू , गोद में लेकर कितना खेलता था। मेरी हर मुस्कान की वजह तुम थी, एक झटके में सब तोड़ दिया।" बलबीर ने कहा
"पापा ऐसा मत बोलिये, बहुत प्यार करती हूँ आपसे।  लेकिन मजबूर थी मैं ", प्रिया ने कहा

" और मेरी मजबूरी कुछ नहीं, सोचा नहीं मेरा कुछ भी।  मेरा मान , सम्मान , बरसो की कमाई प्रतिष्ठा।  बस भाग गई घर छोड़ के। रातो रात।  अरे बताया तो होता एक बार। " बलबीर ने कहा
" I am sorry papa, माफ़ कर दो मुझे, मैं बहुत शर्मिंदा हूँ", प्रिया ने कहा,
"जाने दे बेटा,बस थोड़ा ख्याल रखी होती मेरा,कितने सपने सजाये थे तेरे ब्याह के, कितने अरमान थे मेरे, खैर।
बलबीर ने कहा।
"मैं आपकी अच्छी बेटी नहीं बन सकी पापा " , प्रिया ने कहा
"ना बेटा ना, ऐसा नहीं बोलते, तू तो मेरी सबसे अच्छी बेटी है। गलती मेरी ही थी, मेरी परवरिश में कुछ कमी रह गयी होगी। अपनी बेटी को संस्कार देने में कभी कमी न करना। ध्यान रखना की कभी वो तुझे बिना बताये घर न छोर दे। मैं नहीं चाहता की जो दुःख मैंने झेला, तुझे भी झेलनी पड़े। " बलबीर ने यह कह कर फ़ोन रख दिया।

                                                                              - अभय सुमन "दर्पण"