आज जब नरेंद्र घर से निकला तो यह सोच कर रखा था कि मैं आज किसी की नहीं सुनूंगा, अगर बॉस ने कुछ भी कहा तो इस्तीफा दे दूंगा अगर साथ के किसी ने कुछ कहा तो उसकी पिटाई तक कर दूंगा। ऑफिस से निकलने के पहले उसकी पत्नी से काफी लड़ाई हुई थी, उसने गुस्से में टिफिन भी नहीं लिया था । आज वह काफी परेशान था ऐसा लग रहा था कि संसार की सारी मुसीबतों ने सिर्फ उसे ही घेर रखा है। ऑफिस की गंदी राजनीति, मां-बाप की बीमारी और पत्नी का उसे ना समझ पाना उसे काफी दुखी कर रखा था । वह अपनी बात किस से कहें उसे समझ नहीं आ रहा था । दोस्त तो उसके कई थे परंतु जो उसे समझ सके ऐसा एक भी नहीं था । लगता सभी उसके साथ है पर वह अन्दर से अकेला था। शाम में जब वो ऑफिस से आया तो चुपचाप ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखने लगा, पत्नी ने एक कप चाय सामने लाकर रख दिया और बाहर जाकर बैठ गई। उसने चाय पी और कुछ सोच कर बाहर निकल गया और पास के पार्क में एक बरगद के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया। हवा में डोलते पेड़ की साख और उस पर लगे पत्ते और पेड़ की छांव उसे काफी सुकून दे रहे थे। पेड़ के ऊपर बैठे पक्षियों की चहचहाहट और हवा की सांय-सांय की आवााज उसे काफी अपना सा लग रहा था। एकाएक वह उठा और उस पेड़ को गौर से देखने लगा । फिर उसने उस पेड़ के मोटे तने को छुआ और उसे हल्की सी थपकी दी। पता नहीं उसके मन में क्या ख्याल आया कि उसने उस पेड़ से कहा, "तुम्हारे छांव में मुझे सबसे ज्यादा सुकून मिल रहा इसीलिए मैं आज से तुम्हें अपना दोस्त बना रहा हूंं । मेरा कोंंई ऐसा साथी नहीं जिसे मैं अपना दुख बता सकूं लेकिन आज से मैं तुम्हें अपना हर दुख बताया करूंगा।" इतना कहकर वह वहां से चला गया।
अगली शाम वह ऑफिस से आने के बाद पुनः उसी पेड़ के नीचे बैठ गया । आज की छांव उसे और भी सुखद लग रही थी । उसने उस पेड़ को अपनी दिन भर की सारी बातें बताई। उसने बताया कि उसकी ऑफिस में कितनी दिक्कतें हैं, कंपनी आजकल घाटे में चल रही और नौकरी जाने का भी खतरा है। ऑफिस की सभी अच्छी-बुरी बातें उसने उस बरगद के पेड़ से कह सुनाया । आज उसे काफी शांति महसूस हो रही थी और काफी सुकून भी । अब तो उसकी यह आदत बन चुकी थी हर शाम ऑफिस से आ कर उस पेड़ के नीचे बैठना और अपने सारे दुख उससे कह डालना । उसे अपना एक साथी मिल गया था । वैसा साथी जिससे वह सब कुछ कह सकता अपनी सारी पीड़ा दुख और मन की बातें। उस पेड़ के पास आते ही उसे लगता वह पेड़ भी उससे कुछ कह रहा , उसके आते ही वह पेड़ भी शायद थोड़ा झूमने मचलने लगता । यह उसकी सोच सोच थी या सच पता नहीं ।
आज वह फिर उस पेड़ के पास आया लेकिन आज वह थोड़ा ज्यादा दुखी था ।उसने पेड़ को बताना शुरू किया "मेरे दोस्त मुझ पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया है, आज सुबह ही पत्नी से काफी झगड़ा हुआ उसके बाद जैसे ही ऑफिस पहुंचा तो फोन आया की मां बाबूजी की दवा की डोज बढ़ गई हैं और इलाज बढ़ने से पैसे की जरूरत काफी बढ़ गई है। जब ऑफिस से निकलने का वक्त हुआ तो मालूम हुआ कि कंपनी दिवालिया हो गई है और हम सब की नौकरी जाती रही है ।अब इतने सारे दुख लेकर मैं कहां जाऊं, किससे कहूं। मुझे तुम्हारे सिवा कोई दिखा नहीं , कोई ऐसा साथी नहीं जिससे मैं यह सब कह सकूं । मुझे शायद यह शहर छोड़ना पड़े और मैं सब कुछ बेच कर अपने गांव वापस चला जाऊं । पता नहीं हमारी तुम्हारी मुलाकात कब तक की है यह कहकर वह वापस घर चला आया । इसके बाद वह 3 दिन उस पार्क में नहीं गया । खुद की उलझन इतनी बड़ी थी कि वह उसी में उलझा रहा । चौथे दिन वह फिर पार्क में उसी पेड़ के पास गया और उसके नीचे बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा और उस बरगद के पेड़ को बताने लगा, "मेरे दोस्त मैं शहर छोड़ कर जा रहा हूं , मैंने अपना मकान बेच दिया है नौकरी मेरी छूट गई है । मैं कुछ जमा पूंजी लेकर कल सबके साथ अपने गांव जा रहा । वहीं पर कुछ व्यवसाय करूंगा और अपने को स्थिर करूंगा । तुम मेरे सबसे अच्छे साथी हो तुम्हें मैं काफी याद करूंगा । हां मेरा कुछ हिसाब-किताब बकाया रह गया है ठीक 3 महीने बाद 1 दिन के लिए मैं इस शहर में आऊंगा । जब मैं आऊंगा तो तुमसे जरूर मिलूंगा तुम मेरे लिए प्रार्थना करना। यह कहकर वह रोते हुए तेज कदमो से वहां से चला गया।
नरेन्द्र ने अपने गांव जाकर कारोबार शुरू किया । अपना घर, अपने लोग उसका कारोबार 2 महीने में ही रफ्तार पकड़ने लगा। माता-पिता की तबीयत भी अपने घर की खुशबू पाकर सुधरने लगी। ठीक 3 महीने बाद वह अपने पुराने शहर वापस आया। उसे कुछ लेनदेन के हिसाब किताब करने थे। सारे काम निपटा कर वह वापस उसी पार्क में आया और बरगद के पेड़ के नीचे आकर उसे अपनी कहानी सुनाने लगा, "मेरे दोस्त मैंने तुमसे वादा किया था कि 3 महीने बाद मैं जब आऊंगा तो तुमसे जरूर मिलूंगा। गांव जाकर मैंने अपना कारोबार शुरू किया , 3 महीने में ही सब कुछ काफी अच्छा हो गया, माता-पिता भी स्वस्थ हो गए, मेरा कारोबार भी ठीक-ठाक जम गया । मेरी आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी, सब कुछ काफी सुंदर हो गया। मुझे तुम्हारी बहुत याद आती थी । एक तुम ही थे जिसे मैं अपने दिल की साभी बातें कहता था। लेकिन ये क्या, 3 महीने पहले तो तुम काफी हरे भरे थे, तुम्हारे डाल पर काफी चिड़िया बैठकर अठखेलियां खेला करती थी। लेकिन आज तो तुम बिल्कुल पहचान में नहीं आ रहे। तुम्हारे सारे पत्ते सूख कर झड़ चुके हैं, यह तुम्हें क्या हो गया है।" यह कहकर वह उसे छूकर महसूस करने लगा। पूरे पेड़ को देखने लगा। उसके डाल और उस पर लगे सूखे और निर्जिव पत्ते, बिना चिड़ियों के चहचाहट और सूनापन उसे उदास कर रहा था । नरेंद्र वहां से उठकर जाने लगा लेकिन जाने से पहले फिर कहा, "ठीक है, तो मत बताओ । मैंने सिर्फ तुम्हें अपना समझा था तभी मैंने अपनी सब बातें तुमसे कहीं। तुम वैसे भी मेरे कौन हो। ठीक है मैं जा रहा, आज हमारी अंतिम मुलाकात है।आज के बाद मैं इस शहर में कभी नहीं आऊंगा।" यह कहकर वह जाने लगा। जैसे ही वह पेड़ से थोड़ी दूर गया कि उसे आवाज सुनाई दी, "रुको मित्र" । वह पलट कर देखने लगा लेकिन उसे कोई दिखाई नहीं दिया। फिर वह जैसे ही चलने को हुआ, आवाज आई, "मित्र मैं हूं तुम्हारा दोस्त , जिसे तुम इतने दिन अपने सुख-दुख की कहानी कहते आए हो।" नरेंद्र ठिठक कर रुक गया और उस पेड़ को देखने लगा तभी उस पेड़ से फिर आवाज आई, "मित्र तुम्हारी कहानी सुनकर मुझे काफी तकलीफ होती थी। मुझे लगता था काश मैं तुम्हारी कुछ मदद कर पाता। जिस दिन तुम मुझे आखरी बार मिलने आए थे उस दिन मैंने तुम्हारे सारे दुख ओढ़ लिए थे । मैंने ईश्वर से प्रार्थना की थी कि तुम्हें हर सुख मिले और तुम्हारे सभी दुख मुझे मिले। मैं तो उसी दिन प्राण त्याग देता, लेकिन तुमने कहा था कि 3 महीने बाद तुम आओगे । इसीलिए मैंने अपने प्राण बचा रखे थे।" तभी नरेंद्र पूरे पेड़ को गौर से देखता है तो पाता है कि पूरा पेड़ सुखा है बस गिनती के दो चार पत्ते हरे थे। तभी फिर आवाज आई "मित्र अब मैं अपने प्राण त्याग रहा हूं तुमसे कभी मुलाकात नहीं होगी। यह हमारी आखिरी मुलाकात है । तुमने मुझे अपना दोस्त समझा मुझसे हर दुख कहे, मुझ पर विश्वास किया मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सका, शिवाय ईश्वर से प्रार्थना करने के । तुम खुश रहना और अपने दोस्त को कभी मत भूलना।" इसके बाद आवाज आनी बंद हो गई तभी जैसे नरेंद्र की तंद्रा भंग हुई तो देखता है उस पेड़ के 2-4 हरे पत्ते भी सूख चुके थे और उस पेड़ से झड़ रहे थे । वह स्तब्ध सा सब देखता और सुनता रहा। अपने दोस्त के त्याग से वह जैसे अभिभूत हो गया। पेड़ से लिपटकर वो पागलों की तरह रोने लगा। उसके आखिरी दुख को भी इस पेड़ ने आत्मसात कर लिया था । उसका एकमात्र दोस्त भी आज उसे छोड़ कर जा चुका था। नरेंद्र बोझिल कदमों से धीरे धीरे अपनी मंजिल की ओर लौटने लगा।
लेखक – अभय सुमन "दर्पण"
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