Friday, July 13, 2018

ट्रैन की नीचे वाली सीट - कहानी

शुक्ला जी की ट्रैन की टिकट कन्फर्म हो गयी थी। काफी मुश्किल से तत्काल में कल टिकट बनवायी थी वो भी वेटिंग में। लखनऊ से भोपाल जाना था तीन बच्चे और पत्नी के साथ, किसी रिश्तेदार की शादी में। पहले तो ना-ना होती रही, लेकिन अन्त समय में प्लान बन ही गया। यहाँ भी तो छोड  कर जाया नहीं जा सकता था। अमीनाबाद में इतने बड़े किराने की दुकान किसके भरोसे छोड़ कर जाता। खैर अब तो निकल चुके थे। ए.सी. में टिकट नहीं मिल पाया तो स्लीपर में लेना पड़ा, सोचा चलो रात भर की यात्रा है किसी तरह काट लेंगे।
रात के दस बज चुके थे, सभी अपने बिस्तर लगा कर सोने की तैैैयारी में लगे थे। शुक्ला जी को पांच सीट में सिर्फ एक सीट नीचे की मिली थी और बाकी सभी मिडिल और ऊपर की थी। नीचे वाली सीट पर अभी बच्चो ने कब्ज़ा कर रखा था।  अपनी बड़ी सी तोंद लेकर उनका ऊपर जाने का कोई इरादा नहीं था। बच्चे अपनी मस्ती में खिड़की के पास बैठकर बाहर का मज़ा ले रहे थे। तभी एक सज्जन उनके सीट पर कोने में बैठ गए।  शुक्ला जी ने थोड़ी सी घुरकी दी "भाईसाहब अपनी सीट पर बैठ जाइये"। उसने कहा "भैया वेटिंग है, किसी तरह रात काट लूँ"। शुक्ला जी के बैठे बैठे पेट में गैस बन रही थी, उन्होंने गुस्से में जोर से कहा "भाईसाहब नीचे वाली सीट को मैं छूने नहीं दूंगा।आप अपनी तशरीफ कहीं और ले जाएँ।  वो सज्जन उठकर कहीं और चले गए। शुक्ला जी ने बच्चों को डांट लगाई, "जाओ सब सो जाओ"। बच्चो को काफी मजा आ रहा था, काफी दिनों बाद कहीं घूमने जा रहे थे। पापा की डांट सुन कर सब खामोश हो गए। सभी ने अपनी अपनी बिस्तर लगाई और सोने चले गये। शुक्ला जी ने नीचे की बिस्तर लगायी और अपने तोंद सँभालते हुए सो गए। एक घंटे बीते होंगे की उन्होंने अपने पैर के पास कुछ सरसराहट महसूस किया। आँखे खोल कर देखा तो एक चौबीस-पचीस साल का युवक उनकी सीट के कोने में जगह बना रहा था। उन्होंने आव देखा न ताव, अपने पैर से उसे एक धक्का दे दिया। वो बेचारा नीचे फर्श पर गिर पड़ा।  उठते ही शुक्ला जी पर चढ़ बैठा "क्यूँ ताऊ, आपने धक्का क्यों दिया"। शुक्ला जी बौराये बैठे थे कहा "तुम मेरी सीट पर बैठे क्यों"। उसने पलट कर कहा "बैठा था तो कौन सा आपकी सीट लिए जा रहा था, एक तो गन्दी गैस छोर रहे, उस पर खर्राटे की आवाज, कोई शौक नहीं आपके पास बैठने की अगर मजबूरी नहीं होता तो"। बस शुक्ला जी उठ कर बैठ गए, लगे उससे बहस करने। इसी हो-हल्ले में काफी लोग जग गए और तमाशा देखने लगे। शुक्ला जी की पत्नी ऊपर वाली सीट से सारा तमाशा देख रही थी और कुछ बुदबुदा रही थी। तभी कुछ लोग उस युवक के पक्ष में आ गए और शुक्ला जी को भला बुरा कहने लगे। अब बात शुक्ला जी के बर्दाश्त से बाहर हो गया था, वो उठ कर बैठ गए और सारी लाइटें जला दी। शुक्ला जी अब पुरे मूड में आ चुके थे और बात अब हाथा-पाई तक आ चुकी थी। शुक्ला जी की पत्नी और तीनो बच्चे आँखे मलते अपने पिताजी को देख रहे थे। तभी किसी ने टिकट कलेक्टर को बुला लिया। अब टीटी साहेब, शुक्ला जी और उस युवक के झगड़े को निपटने में लग गए। उस युवक ने बताया की किसी इंटरव्यू के सिलसिले में भोपाल जा रहा था, परसो ही मालूम चला और एकाएक जाना पड़ा। उसने टीटी से काफी अनुरोध किया कि एक सीट मिल जाये तो आराम से कल इंटरव्यू दे दूँ। वैसे ही आधा मूड ख़राब हो चूका था। उधर शुक्ला जी अलग भन्नाये बैठे थे। भीड़ काफी होने के कारण रास्ते में और दोनों सीट के बीच में नीचे काफी लोग लेते हुए थे। टीटी ने पहले सीट की असमर्थता व्यक्त की, फिर उस युवक को एक तरफ बुलाकर कहा कि, "बस पांच सौ रूपये दे दो तो मैं कुछ इंतजाम करूँ"। उस युवक ने कहा "लेकिन अंकल मैं इंटरव्यू के लिए जा रहा हूँ, गरीब परिवार से हूँ और गिनती के पैसे हैं। यह मुझ से सम्भब नहीं है"। सामने वाली खिड़की के साथ वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला लेटी थी। वो सारा हंगामा देख रही थी और टीटी की बातें सुन रही थी। उसने उस युवक से कहा, " कोई नहीं बेटा, तू मेरी वाली सीट पर बैठ जा मुझे मुंबई तक जाना है कल दिन में मैं सो लुंगी, लेकिन तेरा इंटरव्यू ख़राब नहीं जाना चाहिये। सभी लोग उस बुजुर्ग महिला की बात सुन कर काफी शर्मिंदा हुए। तभी टीटी ने कहा, "ठीक है मैं तुम्हे एक सीट दे रहा हूँ लेकिन कल इंटरव्यू में पास जरूर होना"। इधर शुक्ला जी के तेवर भी ढीले हो चुके थे, उन्हें भी लग रहा था की कुछ गलत कर दिया। उन्होंने भी कहा, "ठीक है बेटा बैठ जा मेरी थोड़ी सी जगह पर। वो युवक मुस्कुरा कर कहा, " नहीं अंकल आप आराम से सोयें, बस थोड़ा कम खायें। शुक्ला जी अपनी तोंद संभाले धीरे से मुस्कुराने लगे।

                                                                                              
                                                                                                      - अभय सुमन "दर्पण"

Friday, June 22, 2018

"नई बहु,नया दिन" - कहानी

"ठक ! ठक ! ठक !  भाभी दरवाजा खोलो"  रागिनी की हल्की धीमी आवाज ने नेहा को जगा दिया। 
फिर से आवाज आयी "भाभी दरवाजा खोलो, सब लोग आँगन में बैठे हैं, देर हो जाएगी"। 
नेहा ने बिस्तर पर उबासी ली, अपने अस्त व्यस्त कपड़ो को ठीक किया और दरवाजे को थोड़ा सा खोला। सामने छोटी ननद मुस्कुराते हुए धीरे से बोली "भाभी आठ बज चुके हैं, जल्दी से आ जाओ।  सब लोग इंतजार कर रहे, दिल्ली वाली मामी की ट्रेन का समय हो गया है, मिलना चाहती है"।
"बस रागिनी, पांच मिनट में आयी, तुम जाओ" नेहा ने कहा। फिर धीरे से दरवाजा बंद करके बिस्तर के पास आयी। देखा निखिल एक गहरी नींद लिए बिस्तर पर सो रहे थे। नेहा ने उसे एक प्यार भरी नजरो से देखा और उसके घुंघराले बालो में हलकी सी उंगली की फिर धीरे से उसे जगाया और बोली " मामी के ट्रेन का समय हो गया है ,मिल लो उनसे"।
निखिल ने आंखे खोल अलसाई नजरो से नेहा को देखा और उसे अपनी ओर खींच लिया। तभी दरवाजे पर फिर ठक ठक की आवाज आयी, "भाभी दरवाजा खोलो"। 
नेहा हड़बड़ाकर उठ बैठी और दरवाजे को धीरे से खोल बोली "अभी आयी बस थोड़ी देर"। 
तभी रागिनी दरवाजे के अंदर धड़धराते घुस आयी और बोली "भाभी, प्लीज जल्दी करो ना। अब दरवाजा बंद हुआ तो पता नहीं कितना समय लगे। इसीलिए मैं यही बैठती हूँ"।
फिर भैया को देखकर बोली "भैया तुम तो जानते हो मामाजी का गुस्सा"। 
"अच्छा बाबा चलो मैं चलता हूँ, नेहा तुम भी तैयार हो जाओ"  निखिल ने उठते हुए कहा ।
नेहा और निखिल की दो दिन पहले ही शादी हुई थी। दोनों पहली बार पंद्रह दिन पहले मिले थे, अपने इंगेजमेंट में। निखिल आर्मी में ऑफिसर था, काफी मुश्किल से बीस दिनों की छुट्टी लेकर आया था। गोरखपुर में अपना बड़ा पुश्तैनी मकान, बड़ा सा संयुक्त परिवार सब मिल-जुल कर रहते थे। नेहा लखनऊ की रहने वाली एक बड़े घर से ताल्लुक रखती थी। एकलौती संतान, पिता सरकारी अधिकारी, लखनऊ में आलीशान कोठी और ढेरों शानो-शौकत और अपने पापा के आँखों का तारा। जब छः साल की थी तभी माँ का देहांत हो गया। पिता ने दूसरी शादी नहीं की शायद ये सोच कर की नई माँ उसे प्यार दे पाए की नहीं। घर पर तो सुबह दस बजे के बाद ही नेहा की आँख खुलती थी। पापा कहते सो लेने दो मेरी बेटी को ,शादी के बाद पता नहीं कितने बजे जागना पड़े। 
एक हफ्ते से शादी की रस्मो रिवाज निभाते निभाते नेहा का बदन टूट रहा था। कल नेहा और निखिल की सुहागरात थी, रात पार्टी खत्म होते एक बज गए और जब दोनों कमरे में गए तो थक कर चूर। फिर बाते करते सुबह के पांच बजे जाकर सोना हुआ। दो तीन घंटे की नींद भी पूरी नहीं हुई थी की दरवाजे पर ठक ठक की आवाज ने जगा दिया। 
नेहा तैयार होकर कमरे से बाहर निकली, देखा आँगन मेहमानो से भरा हुआ था। तभी सासु माँ आकर बोली "बहु सभी बड़ो को प्रणाम कर के आशीर्वाद ले लो"। नेहा ने एक हलकी नजर डाली और गिनती की शायद तीस-बत्तीस लोग तो होंगे ही। निखिल पास आकर बोला, माँ मैं नेहा के साथ उसकी मदद करा देता हूँ। शायद यह बात पटना वाली मौसी ने सुन ली और बोली "निखिल तू रहने दे, देखूं तो सही बहु को कितना खिलाया पिलाया गया है"  फिर जोर से हंस दी। तभी छोटी बुआ ने कहा " सुना है बहु अपने घर दोपहर में जगती थी, अब तो भाभी को ही बहु के लिए खाना तैयार करना पड़ेगा"। नेहा इन सबों की अभयस्त नहीं थी। नया घर, नए लोग, नयी जिम्मेदारियाँ ये सोचकर वो चुप रही। निखिल ने सब सुन धीरे से नेहा की उंगली दबा दी, शायद एक भरोसे का इशारा था की मैं हूँ तुम्हारे साथ। किसी तरह दो घंटे नेहा ने वहां अपने समय को बिताया।  आँखों की नींद और थकान उसे वहां बैठने की इजाजत नहीं दे रही थी। निखिल ने यह बात समझ ली और उसे बहाने से कमरे में ले आया। आते ही नेहा निढाल हो बिस्तर पर सो गयी। निखिल को मैरिज रजिस्ट्रेशन ऑफिस जाना था कुछ फॉर्म भरने, वो चला गया।
दोपहर के डेढ़ बज चुके थे और नयी बहु का खाने पर इंतजार हो रहा था। नेहा को बुलाया गया, आयी तो देखा घर के सारे लोग बड़ी सी मेज के दोनों तरफ बैठे हैं शायद बीस-बाइस लोग होंगे। नेहा को थोड़ी असमंजस हुई शायद अकेले रहने के आदत के कारन।  उसके पापा ने शायद इसी लिए ऐसे घर में शादी की थी की उसे वो सब कुछ मिले जो वह दे नहीं पाए थे। वह बैठी ही थी की एक आवाज आयी "बहु सर के पल्लू पूरी तरह रखो यहाँ घर के कई बड़े बैठे हैं"। उसने देखा सबसे बड़ी चाची की निगाह उस पर ही थी, तभी छोटी चाची ने कहा "जाने दो दीदी घर में कोई बताने वाला नहीं होगा"। नेहा धड़कते दिल से सब सुन रही थी, तभी बड़ी चाची ने कहा "बहु सभी को सब्जी परोस दो"। तभी रागिनी ने कहा "रहने दो भाभी मैं कर देती हूँ"। वो उठी ही थी की बड़ी चाची ने कहा "घर के नियम मत तोड़ो रागिनी"। बड़ी चाची और बड़े चाचा का कहा घर में कोई नहीं काटता था। नेहा ने उठ कर सभी को सब्जी परोसना शुरू किया शायद पहली बार, तभी बड़े चाचा को देते समय उसके हाथ से सब्जी की हांड़ी गिर गई और वो भी बड़े चाचा के सिल्क के नए कुर्ते पर। उसे घबराहट में कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसने हांड़ी वहीँ टेबल पर रखी और तेज कदमो से अपने कमरे में चली गयी। उसे इस वक़्त सिर्फ अपने पापा की याद आ रही थी और आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। उसने तकिये में सर दबा लिया और अपने आंसुओ को बहने के लिए छोर दिया। थोड़ी देर हुआ होगा की उसने अपने कंधे पर किसी का हाथ पाया। उसने पलट कर देखा तो पीछे निखिल खरा था, अपना हाथ उसके कंधे पर रखे। नेहा की सूजी आँखे बहुत कुछ कह रही थी, बाकि उसे सब कुछ मालूम चल चूका था। उसने धीरे से नेहा को उठाया और कहा "मैं जानता हूँ तुम्हे तकलीफ पहुंची है, मैं ये भी जानता हूँ की तुम्हे इन सबो की आदत नहीं। ये भी सच है की तुम अपने घर में बड़े लाड़ प्यार से पली हो और अभी शायद तुम्हे अपने पापा की सबसे ज्यादा याद आ रही हो, लेकिन आज से ये घर भी तुम्हारा है। कई लोग हैं कई तरह की बाते हैं, उन सबो के बीच में तुम्हे अपनी जगह बनानी है। सबसे बड़ी बात ये कि तुम्हारे साथ हमेशा मैं खड़ा मिलूंगा एक भरोसे के साथ, एक विश्वास के साथ। तुम्हारे हर सुख-दुःख में खड़ा तुम्हारी हर उम्मीद और आशा के साथ"।
नेहा ने सारी बाते सुनी और अपने आंसुओ को पोछा, अपने पापा के बाद उसे किसी पर एक भरोसे का एहसास हो रहा था । उसने मन ही मन सोचा शायद नई बहु का नया दिन ऐसा ही होता होगा। उसने निखिल की आँखों में देखा और खुद को उसकी बाहों में सिमटा लिया एक नयी सोच के साथ।
                                     
                                                                                                        - अभय सुमन "दर्पण"

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Saturday, June 2, 2018

कविता - "दिल को रखो ताखे पर"

दिल को रखो ताखे पर
मनवा रखो बताशे पर
गोल गोल ये दुनिया है
झोल झोल ये लफड़े हैं
सोच समझकर बातें कर
तोल-मोल कर नाते कर
किसिम किसिम के लोग यहाँ
बड़े बड़े सब ढोल यहाँ
सूट-बूट में दंगल है
बहार हैं कुछ अंदर है
बनते सभी सयाने हैं
पहने फटे पजामे हैं
पूछ जरा सा उनका हाल
सूरत बेहाल,दिल है कंगाल
सोच न भाई ज्यादा कुछ
जीवन एक, मिली छुक-छुक
झूम ले, कर ले, मन की बात
नाच-कूद,कर रिमझिम बरसात
आएंगे भाई अच्छे दिन ,
रात है तो क्या सुबह नहीं
तो,दिल को रखो ताखे पर
मनवा रखो बताशे पर।



                           -      अभय सुमन "दर्पण"

Friday, April 13, 2018

लाल बत्ती

इस शहर में धूल ज्यादा है या पॉल्यूशन ये तो मालूम नहीं लेकिन जब भी हज़रतगंज चौराहे पर मेरी गाड़ी लाल बत्ती पर रूकती है और कोई दस साल का बच्चा गाड़ी के शीशे साफ करता है तो ये जरूर लगता है की हवा  साफ नहीं है। आज भी मेरी गाड़ी हज़रतगंज चौराहे, लाल बत्ती पर रुकी थी और मेरी सूनी आँखे किसी को ढूंढ रही थी। बस एक उम्मीद में कि शायद वो दिख जाये। 
मुझे याद आने लगा जब तीन महीने पहले मुझे रेलवे स्टेशन जाना था किसी को लेने, शायद कोई मित्र था। उस दिन शहर में धुल भरी आंधी चल रही थी और गहरे काले बादल भी मंडरा रहे थे। हज़रतगंज चौराहे पर मेरी गाड़ी रुकी थी और मैं ग्रीन सिग्नल का इंतजार कर रहा था। मेरी ड्राइविंग सीट के साइड वाले शीशे पर धूल की मोती परत जमा थी और बाहर कुछ दिख नहीं रहा था। तभी शीशे साफ होते गए और वो मुझे दिखा शीशे साफ करते हुए और फिर कुछ पैसे मांगते। 
"कुछ करते क्यों नहीं, भीख मांगते शर्म नहीं आती।"  मुझे बड़ी कोफ़्त हुई और दो बातें सुना गया, शायद मैं जल्दी में था। 
"भीख नहीं मांग रहा साहब, शीशे साफ किया है।" उसकी आवाज सुनी। 
मैंने न चाहते हुए उसे पांच रूपये दे दिया, लेकिन उसकी स्वाभिमान में डूबी आवाज मेरे दिल में बैठ गयी। 
ऑफिस मेरा कैंट रोड पर था और हर दिन मुझे उसी चौराहे से जाना होता था। अक्सर मुझे वो लड़का दिखने लगा और मैं उसे पहचानने लगा। मेरी गाड़ी जब भी लालबत्ती पर रूकती वो आता और शीशे साफ कर जाता फिर मैं कुछ पैसे दे जाता। अब तो उसे और मुझे इसकी आदत सी हो गयी थी। एक दिन मैंने उससे उसका नाम पूछा। 
"कोई भी किसी नाम से बुला लेता है, वैसे मेरे साथ के लोग राजू कह कर बुलाते हैं।" उसने  कहा
"और माता पिता।" मैंने पूछा
" माता-पिता का मालूम नहीं और एक चाचा हैं जो शाम में सारे पैसे ले लेते हैं।" उसकी आवाज में दर्द था। 
मुझे कुछ और पूछने का मन था लेकिन तभी ग्रीन सिग्नल हो गयी और मैं चल दिया। दिन भर यही सोचता रहा इतने तीखे नैन-नक्श, इतना साफ रंग जरूर किसी अच्छे घर का रहा होगा। हो सकता है अवैद्य संतान हो और किसी ने छोड़ दिया हो या माँ बाप से कहीं बिछड़ गया हो या किसी ने चुरा लिया हो। लेकिन ये सच है की किसी अच्छे घर में होता तो फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहा होता या किसी टीवी के रियलिटी शो में होता। अब तो हर दिन चौराहे पर उससे बात करता और मुझे देखकर वो भी दौरा चला आता। एक दिन ऑफिस में काफी मूड ख़राब था और थका भी था। लौटते वक़्त मेरी गाड़ी फिर उसी लाल बत्ती पर रुकी और वो मेरे पास चला आया। पता नहीं क्यूँ मैंने गाड़ी पार्किंग में खड़ी की और उसे अपने साथ लेकर एक अच्छे से रेस्टोरेंट में चला गया। मैंने कॉफी पी और उसे भर पेट खाना खिलाया। वो इसका आदी नहीं था और एक संकोच एवं कशमकश में खाये जा रहा था। 
मैंने पूछा "बेटा पढाई करना है।" 
वो कुछ समझ नहीं पा रहा था और मेरी बातों में बस सर हिला रहा था। शायद मुझसे ज्यादा ध्यान उसका खाने में था। खाना ख़तम करने के बाद हमलोग बाहर निकले और मैं कुछ सोचता हुआ उसे छोर अपने घर निकल गया। कल मुझे ऑफिसियल टूअर पर एक हफ्ते के लिए बंगलोर जाना था और घर पहुँच कर उसकी भी तैयारी करनी थी। अगले दिन मैं बंगलोर चला गया। 
एक हफ्ते बाद वापस लौट कर जब ऑफिस जा रहा था तो उस लालबत्ती पर मुझे वो नहीं दिखा। फिर जब शाम में घर जाने के लिए लौटा तब भी मुझे वो नहीं दिखा। ऐसे ही तीन-चार दिन बीत गए और मुझे वो नहीं दिखा। अब मन में कुछ संशय सा होने लगा परन्तु मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया शायद ऑफिस और घर के तनाव ने ज्यादा सोचने का मौका नहीं दिया। लेकिन छठे दिन भी वो नहीं दिखा तो मैं गाड़ी पार्क कर चौराहे पर पहुंचा। थोड़ी पूछताछ की लेकिन कोई भी बता नहीं सका, तभी उसके एक दोस्त पर मेरी नजर पड़ी। मैंने उसे बुलाया और जब उससे पूछा तो वो बताने लगा "साहब दस दिन पहले किसी राजनीतिक पार्टी की गाड़ियों का काफिला इधर से गुजर रहा था। वो सड़क किनारे खड़ा उन गाड़ियों को देख रहा था तभी किसी तेज गाड़ी ने आकर उसे जोर की टक्कर मार दी, अस्पताल पहुँचने के पहले ही उसने दम तोड़ दिया।" इतना कहकर वो रोने लगा। 
मैं अपने आँसुओ को सँभालने की कोशिश कर रहा था और कदम तो शायद वहीँ जम गए थे।  मैं बोझिल कदमो से घर वापस जाने की ओर मुड़ा, शायद एक दर्द को पीने की कोशिश कर रहा था। मन ही मन सोच रहा था कौन हैं ये, क्यों पैदा हुए ये, गाड़ी पोछने के लिए या गुब्बारे बेचने के लिए या लाल बत्ती और ग्रीन बत्ती के बीच के फासले को कम करने के लिए।

                                                                                                           -    अभय सुमन "दर्पण"

Tuesday, March 27, 2018

कामवाली की छुट्टी

सुबह के सात बजे थे। मिसेज चंद्रा चाय की पहली घूँट ले अखबार के पन्ने पलट रही थी। तभी  What's App की आवाज ने तन्द्रा भंग की। वैसे आज मिसेज चंद्रा काफी खुश थी, उनके भैया-भाभी अपने दोनों बच्चो के साथ दोपहर की ट्रैन से दिल्ली आ रहे थे। मिसेज चंद्रा ने काफी सारा प्लान बना रखा था, घूमने का और नए नए तरह के डिश बनाने का, वो भी अपने हाथो से। उन्हें काफी कुछ बनाने का शौख था और नयी नयी डिश सीखा करती थी। 
वो मोबाइल हाथ में ले What's App देखने को हुई, मन में आया शायद भैया का होगा ट्रैन की सुचना देनी होगी या किसी दोस्त की गुड मॉर्निंग वाली मैसेज। जैसे ही पहला मैसेज देखा, तो कामवाली "लल्लो" का था। दिल धरक उठा। शायद देर से आएगी, यह सोचकर उसने मैसेज देखी। 
" मैडम तबीयत अच्छी नहीं, चार दिन छुट्टी पर रहूंगी।"  लल्लो का मैसेज था। 
मिसेज चंद्रा ने गिन कर सात बार ये मैसेज पढ़ा। यही सोच रही थी शायद गलती से किसी और का मैसेज आ गया होगा। जब पूरी तरह विश्वास हो गया तो लल्लो को फोन मिलाया।  फोन उसके पति ने उठाया और बताया लल्लो की तबियत कल रात से खराब है, चार दिन डॉक्टर ने आराम को बोला है। मिसेज चंद्र को काटो तो खून नहीं, ये क्या हो गया, आज ही तबीयत ख़राब होना था। भैया को भी तो चार दिन ही रहना है। किचेन में बर्तन की ढेर लगी है, घर की भी सफाई फिर सबों के लिए खाना बनाना। भाभी वैसे ही नकचढ़ी है, ठीक से स्वागत ना करो तो भैया को ताने देगी। खैर चाय की पहली चुस्की को आखिरी चुस्की बना मिसेज चंद्रा काम में जुट गयी। समझ नहीं आ रहा था कंहा से शुरू करूँ। अभी तो पतिदेव भी नहीं जगे, वैसे भी वो कोई मदद करने से रहे। इसी जद्दोजहद में पतिदेव की आवाज कानों में गूंजी " बेड टी नहीं आयी" । गुस्से में मिसेज चंद्रा कभी किचन को, कभी पति को और कभी घर को देख रही थी। खैर पति को चाय देकर वो काम में जुट गयी। 
पति बेड पर चाय का लुफ्त लेते हुए किचन की बर्तनो की आवाज सुन रहे थे। सोच रहे थे बर्तनो की इतनी तेज आवाज, शायद लल्लो ने आज छुट्टी ले ली है। चाय ख़तम कर वो फिर से बिस्तर पर लेट गए, वैसे भी आज उन्हें ऑफिस देर से जाना है। 
उधर मिसेज चंद्रा मन ही मन खुद को कोस रही थी की कल क्यों घर में भैया-भाभी के आने की चर्चा कर दी। बता बच्चो को रही थी और वो कलमुही बर्तन मांजते कान इधर कर रखी थी। काश कल वो न सुनी होती तो कम से कम मैं पूरा चाय तो पी लेती, अभी तो ये चाय भी करेले का जूस लग रहा। मेरी तो मति मारी गयी थी जो उसके सामने बात की। तभी मोबाइल की घंटी बजी। मिसेज चंद्रा सोचने लगी कौन सुबह सुबह परेशान कर रहा। मोबाइल देखा तो लल्लो का फोन था। गुस्से में फोन उठा एक बार में मिसेज चंद्रा बोल उठी " क्या है, तेरी तबियत को आज ही क्या हो गया"। 
उधर से आवाज आयी , "मैडम जी आज वो मेरी........"
मिसेज चंद्रा ने उसकी बात काटते हुए कहा " क्या हो गया, तेरी तबियत को, चार दिन बाद ख़राब नहीं हो सकती थी। तुम्हारी हर बार की एक ही आदत है, मेरा तो कोई ख्याल नहीं तुम सारे लोग ऐसे ही हो"।
तभी लल्लो ने कहा, "मैडम मेरी बात तो सुनो"। 
मिसेज चंद्रा ने कहा, "क्या सुनूं तुम्हारी बात, हमेशा मेरे साथ ऐसा ही करती हो"। 
"मैडम सुनो तो"  लल्लो ने जोर से कहा  "मैडम मेरी तबियत सचमुच ख़राब है कल रात से बीमार हूँ। मुझे मालूम है आज आपके भैया-भाभी आने वाले हैं, इसीलिए मैं अपनी छोटी बहन को आपके घर भेज रही हूँ यही बताना था। मुझे मालूम है आपके पास काफी काम होगा और आपको मदद की जरूरत है। बस  15 मिनट में वो आपके पास पहुँच जाएगी"।
"क्या सच " मिसेज चंद्रा ने आश्चर्य से कहा। उसे विस्वास नहीं हो रहा था। 
" हाँ मैडम, हम सब एक दूसरे का ख्याल नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा। आप भी तो हमारा इतना ख्याल रखती हैं"। लल्लो ने कहा 
मिसेज चंद्रा ने मीठी सी मुस्कान के साथ कहा "तुम कितनी अच्छी हो लल्लो, भगवान करे हर मैडम को तुम्हारे जैसी कामवाली मिले। अपना ख्याल रखना और जल्दी तबियत सही कर के आना। चलो मैं उसके आने का इंतजार कर रही"। 
बात ख़तम करके मिसेज चंद्रा ने अपनी ठंडी चाय की दूसरी घूँट ली, उस ठंडी चाय में भी आज उसे अलग आनंद की अनुभूति हो रही थी।










Tuesday, February 27, 2018

एक थी श्रीदेवी

वक़्त भी अजीब होता है। उसे सिर्फ अपनी फिक़र होती है, इंसानी जज्बात शायद उसके रूह तक दखल नहीं रखता। तभी तो एक अदाकारा जो करोड़ों लोगों की खुशी का कारण थी, अपनी खुशी और अपनों के खुशी के पल में हमेशा के लिए छोड़ कर उस वक़्त की तरफदारी करने चली गई। कई बातें श्रीदेवी की मौत के बारे में कही गई या कही जाती रहेंगी पर क्या उनका व्यक्तित्व इतने में ही सिमट कर रह जाएगा । कहा जाता है कि उन्होंने पांच साल में अभिनय की शुरुआत की थी, और चौबन साल की उम्र में भी फिल्में कर रही थी। यानी लगभग आधी शताब्दी तक उन्होंने इस फिल्मी दुनिया को जिया है।  कितने हैं ऐसे, शायद अँगुलियों पर गिनती के ही होंगे। 

तमिलनाडु के शिवकाशी में 13 अगस्त 1963 को श्रीदेवी का जन्म  'अयय्पन ' और 'राजेश्वरी ' की पुत्री के रुप में हुआ था। श्रीदेवी का पूरा नाम 'श्री अम्मा यंगर अयप्पन ' था पर यह नाम पर्दे पर शायद काफी भारी था और पुकारने में भी जुबान पर नहीं आता था, इसीलिए एक छोटा सा नाम 'श्रीदेवी' का जन्म हुआ जो अपने नाम के अनुरूप परदे पर देवी साबित हुई। हिंदी फिल्मो के अलावा तमिल, तेलगु , कन्नड़ , मलयालम की भी वो सुपरस्टार रह चुकी थी। संभवतः पहली लेडी सुपरस्टार थी जो अपने फिल्म के हीरो से ज्यादा पैसे लेती थी। फिल्मफेयर के दस से ज्यादा अवार्ड और भारत सरकार द्वारा 2013 में पदमश्री से नवाजी गयी। उनकी फिल्मे सफलता की गारंटी थी और उन्हें ध्यान में रखकर फिल्मे लिखी जाती थी। हर कलाकार उनके साथ काम कर के अपने कैरियर को आगे बढ़ाना चाहता था।  हिंदी फिल्मे मसलन  मिस्टर इंडिया, चालबाज़, चांदनी, सदमा, खुदा गवाह, नगीना इत्यादि वो फिल्मे थी जो श्रीदेवी के बिना कल्पना भी नहीं की  सकती। 


शुरुआत में उनकी हिंदी भाषा पर पकड नहीं थी और उनकी आवाज़ किसी और के द्वारा डब की जाती थी। पहली बार चांदनी (1989) में उनकी आवाज़ सुनने को मिली। आखरी रास्ता (1986) में रेखा ने उनकी आवाज़ डब की थी। शायद अनगिनत बाते हैं उनकी कही-अनकही।

उनकी लव लाइफ काफी उतार चढाव वाली रही। एक समय मिथुन चक्रवर्ती से उनका रिश्ता काफी प्रगाढ़ रहा जो बोनी कपूर के दूसरी पत्नी बनने पर खत्म हुआ। ग्लैमर की चकाचौंध में, सच्चे प्यार को ढूँढ़ते ढूढ़ते इंसान को जो भा जाये वो उसी का हो जाता है। ये अलग बात है की वो प्यार में तृप्त है या अतृप्त। शायद इसीलिए इसे मायानगरी कहा जाता है।

उनकी मृत्यु 24 फरबरी 2018 को दुबई में हुई, जब वो एक पारिवारिक समारोह में गयी थी। मृत्यु भी अजीब परिस्थियों में और एक अनचाहा विवाद खरा कर गयी। वैसे सिर्फ चौबन (54) साल में जाना एक अजीब सी खामोशी दे गया और सीख भी की अपनी ख्वाहिशों को कल पर मत टाले और जी ले हर अरमान।
क्या पता कल हो न हो।





Thursday, February 8, 2018

कविता - चलो आज थोड़ा लड़ते हैं

चलो आज थोड़ा लड़ते हैं,
कुछ अपनी फिक्र कहते हैं,
कुछ तुम्हारी जिक्र सुनते हैं,
बस थोड़ा तेज ना बोलना,
दिलो के सारे गांठ खोलना,
बार बार ही सही,
सौ दफा ही सही,
गमों के सारे राज खोलना,
कह ना सको अगर कुछ,
पलकों के रास्ते ही बरस्ता,
आंसुओं की न राह रोकना,
गिले शिकवे विराने हो चले,
प्यार मनुहार पुराने हो चले,
आज तो बैठ कर लड़ेंगे,
हर हद पार कर लड़ेंगे,
पर इतना देखो याद रखना,
मेरे हमसफर ये ख्याल रखना,
आज होगी अंतिम लड़ाई,
हर कही-अनकही होगी पराई,
जीवन की इस कश्मकश में,
थोड़ी पुरवाई बहने दो,
कुछ अपनी और तुम्हारी सुनते हैं
चलो आज थोड़ा लड़ते हैं।