हर कहीं धुआं , हर कहीं है धुंध,
कटते विशाल बृक्ष,और रेत हैं अनंत,
खांसते-कांपते युवाओं का है शोर,
ओढ़ी साखें बृक्ष की, धूल की परत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।
प्रकृति का चित्र भी हो रहा विचित्र,
रुग्ण हुए गाँव, सिमट रहे हैं छांव
दुहता मनुष्य , वसुंधरा का वक्ष
चीत्कार रही धरती, सब का यही मत
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।
भविष्य के नौनिहाल भी, कर रही पुकार
मत दो शौक से , मौत का ये हार
स्वस्थ हो धरा, स्वस्थ रहे हम
करते हम प्रतिज्ञा, लेते हम शपथ
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।
मनुष्य हो पशु हो ,पहाड़ या समुद्र,
निगलता समेटता, प्रदूषण का दंश,
पेट्रोल-डीजल कर रहे,इस जहाँ का अंत,
आओ रोशन हम करें,सोलर से जगत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।
--- अभय कुमार सुमन
कटते विशाल बृक्ष,और रेत हैं अनंत,
खांसते-कांपते युवाओं का है शोर,
ओढ़ी साखें बृक्ष की, धूल की परत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।
प्रकृति का चित्र भी हो रहा विचित्र,
रुग्ण हुए गाँव, सिमट रहे हैं छांव
दुहता मनुष्य , वसुंधरा का वक्ष
चीत्कार रही धरती, सब का यही मत
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।
भविष्य के नौनिहाल भी, कर रही पुकार
मत दो शौक से , मौत का ये हार
स्वस्थ हो धरा, स्वस्थ रहे हम
करते हम प्रतिज्ञा, लेते हम शपथ
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।
मनुष्य हो पशु हो ,पहाड़ या समुद्र,
निगलता समेटता, प्रदूषण का दंश,
पेट्रोल-डीजल कर रहे,इस जहाँ का अंत,
आओ रोशन हम करें,सोलर से जगत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।
--- अभय कुमार सुमन
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