Wednesday, March 27, 2019

ग़ज़ल - निकल रहा तुम्हारे शहर से

निकल रहा तुम्हारे शहर से, ओ बेखबर,
छोड़कर कुछ यादें और दबी हसरते,
कुछ तन्हाईयाँ और थोड़ी सी रुसवाइयाँ ,
तम्मनाओं के शहर में ढूंढता फिरता अकेला,
हर खामोश लवो में तलाशता खुद का वजूद,
सितमगर भी न मिला सितम करने को ,
हर मौंजू परेशानियां भी कम करने को ,
संभले ना तपिश दरख़्त की छावं से भी
न दरिया के साहिल पनाह से भी
जुस्तजू बस इतनी जरा सी तो थी
एक खलिश जो छिपी फंसी थी कहीं

दिल तलक ताख पर रख छोरा, 
कोई रहबर न दिखा संभाल कर रखने को ,

निकल रहा तुम्हारे शहर से ...




जुस्तजूखोज, तलाश।


ख़लिशचुभन, कसक।

Monday, March 4, 2019

कहानी - माँ बड़ी हो गयी

ठक ! ठक ! ठक !
"बस मम्मा दो मिनट" अंदर से सुभि की आवाज आयी।
"जल्दी कर बेटा, तेरी सभी सहेलियां ड्राइंग रूम में तेरा इंतजार कर रही", कविता ने बाहर से कहा और किचन में चली गयी। जाते-जाते फिर सुभि को जल्दी तैयार होने की हिदायत देना नहीं भूली । आकर वो किचन में सभी के लिए चाय निकालने लगी। तभी ड्राइंग रूम से सुभि की दोस्त नेहा की जोर की आवाज सुनाई दी,"आंटी सुभि को कितना समय लगेगा, देर हो रही।"
"बस तैयार हो कर आ रही बेटा, तब तक प्याज के पकौड़े और चाय पियो।", ड्राइंग रूम में आते हुए कविता ने कहा और टेबल पर ट्रे रख दी। सभी लड़कियों की खिलखिलाहट उसे काफी अच्छी लग रही थी। सभी ने साडी पहन रखी थी और सब काफी सुन्दर लग रहे थे। लगे भी क्यों ना, सत्रह की उम्र ही ऐसी है, नयी जोश नयी ऊर्जा और आज तो कॉलेज का फेयरवेल भी है। अब बड़े कॉलेज में जाने के सपने, उचाईयों को छूने का ख्वाब, इस उम्र का गुमान और किसी से तारीफ पाने का हसरते। सब मिल कर इन सभी को शबनमी बना रहा था।
कविता को अपनी बाते याद आने लगी जब वो सत्रह साल की थी, वो भी तो ऐसी ही थी। उसने भी कॉलेज के फेयरवेल के लिए पहली बार साडी पहनी थी। माँ के सभी साडी उसने आलमीरा से निकाल कर बिखेर दिए थे और उसे कोई पसंद नहीं आ रहा था। जब पापा से नहीं देखा गया तो मुस्कुराते हुए उसे स्कूटर पर बिठाकर एक बड़े से साडी की दुकान में ले गए और उसकी पसंद की एक साडी खरीद दी। माँ थोड़ी नाराज भी हुई थी लेकिन वो लाड़ली थी पापा की, लाखो में एक।  एक-एक चीज का पापा ख्याल रखते थे, हलकी सी शिकन बर्दास्त नहीं थी उसके चेहरे पर। फिर तो वो नयी साडी पाकर आसमान में उड़ने लगी, मानो पंख लग गया हो। जब तैयार हो कर वो कॉलेज गयी तो सभी की निगाह उसी पर थी। शायद उसकी भी जो अक्सर उसे देखा करता था। शर्मीला सा, अपनी धुन में रहने वाला, किताबो से दोस्ती और बहुत ज्यादा किसी से मतलब नहीं रखने वाला। कविता को मालूम था की वो छिप छिप कर उसे क्लास में देखा करता है लेकिन उससे कभी कुछ कहा नहीं। लेकिन आज वो उससे बात करने की कोशिश में लगा था। वो जमाना आज की तरह नहीं था, एक तो छोटा शहर, कई लोगो की निगाहें और बात का बतंगड़ बनने का डर। तभी वो नजदीक आया और कुछ कहना चाहा, लेकिन कुछ कह नहीं पाया। फिर एक पत्र उसने कविता को दिया, जिसे उसने ले लिया और चुप-चाप पर्स में रख ली। फिर वो अपने कॉलेज के फंक्शन में व्यस्त हो गयी और अपने सहेलियों के साथ मौज मस्ती में गुम हो गयी। उसे तो अपनी नयी साडी में इठलाने में कुछ ज्यादा आनंद आ रहा था। रात को जब सोने जा रही थी तो उसे वो पत्र की याद आयी, जिसे निकालकर वो पढ़ने लगी। पढ़ने के बाद उसे लगा ही नहीं की एक शर्मीला सा दिखने वाला लड़का इतना जज्बाती हो सकता है, लगा की जैसे उसने इस पत्र पर अपना दिल निकाल कर रख दिया हो । लेकिन कविता के तो ख्वाब काफी ऊँचे थे, और उसे अभी कई मंजिलो को छूना था। काफी सोच विचार कर उसने उस पत्र के टुकड़े कर के बालकनी के बाहर फेंक दिया। कॉलेज में अगले दिन कविता उससे कन्नी काटने लगी और कभी नजर मिल जाती तो लगता उसकी सुनी आँखे उससे कुछ कह रही है। कविता को एक हफ्ता ऐसा लगा की जैसे उसकी आँखे कुछ सवाल पूछ रही है और वो जवाब देने से बच रही। बस,एक महीने बाद फाइनल एग्जाम और सभी एक दूसरे से दूर। लेकिन उसे आज भी उन आँखों का सूनापन और पूछते सवाल याद है। बहुत सालो बाद मालूम हुआ की वो किसी दूर शहर में अपने परिवार के साथ एक अच्छी नौकरी में व्यस्त है। उसकी बस एक ही इच्छा थी कि कभी  आमने सामने एक बार उससे बात कर पाती। उसे अपनी पहली साडी और पहला खत आज भी एक भीना सा एहसास दे रहा था।
"मम्मी कैसी लग रही", सुभि की आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग की। अपने आँखों को पोछती जैसे ही उसने पलटा तो बस सुभि को एकटक देखती रह गयी। पहली बार उसने सुभि को साडी पहने देखा था, ऐसा लगा जैसे उसकी प्रतिमूर्ति साक्षात् सामने खडी हो।
"क्या बताऊँ बेटा, लग रहा जैसे मैं खुद को देख रही।उस खुशबू को महसूस कर रही जब मैंने पहली बार साडी पहनी थी। मेरी छोटी सी बेटी तो एकदम से बड़ी हो गयी", यह कहकर उसने सुभि को बाँहों में समेत लिया।
"नहीं माँ, मैं कैसे बड़ी हो सकती। मैं तो हमेशा तुम्हारी छोटी सी बेटी ही बनी रहना चाहूँगी।",सुभि ने कहा।
"हां बेटा, तू हमेशा मेरी छोटी सी बेटी ही रहेगी, लेकिन आज तुझे देख कर तेरी माँ बड़ी हो गयी है, हाँ बेटा तेरी माँ बड़ी हो गयी है।" कविता ने अपने नम आँखों को पोछते हुए कहा और जोर से खुद में उसे समेत लिया।

                           --- अभय सुमन "दर्पण"

हास्य-व्यंग - 26 -27 फ़रबरी 2019, भारत पाकिस्तान में जंग

26 -27  फ़रबरी 2019, भारत पाकिस्तान में हुई जंग पर आधारित   

बहुत हुई जंग भारत पाकिस्तान में।  बहुत सारे लोग हर मुहब्बत में भी जंग ढूंढ़ते रहते हैं। अभी अभी भारत पाकिस्तान में एक मुहब्बत भरी कहानी हुई लेकिन उसमे भी लोग जंग देख रहे। अरे वही, एक सोलह साल की मोहतरमा (F16 ) अपने इक्कीस साल के महबूब (M 21) से मिलने भारत आ गयी वो भी छिपते छिपाते, जान की बाज़ी लगा कर। महबूब ने भी जान की बाज़ी लगा दी उनसे मिलने के लिए। लेकिन कौन समझे, किसे समझाया जाय, सभी को इसमें जंग दिखती है। एक बुरकानशी, पाकिस्तान से हवा में उड़कर अपने भारतीय महबूब से मिलने आती है। एक सोलह साल (F16 ) की आधुनिक ज़माने की कमसिन, नए नए नाजो नखरे से लकदक, हर अदाओ में माहिर, नए नए रंगो रोगन से सजी, इठलाती बलखाती अपने महबूब से मिलने की तड़प में भारत की सीमा में चली आती है  
दूसरी तरफ हमारा इक्कीस साल (M 21) का गबरू जवान जो गठीला, शर्मीला, दिल से हारा, सीधा साधा बैठा अपने महबूबा को याद कर रहा था, प्यार के तराने गा रहा था। देखता है की उसकी महबूबा आसमान में उड़ते हुए उससे मिलने को चली आ रही है। अपने गबरू से यह देखा नहीं गया और वो भी उससे मिलने आसमान में उड़ गया। आज दोनों के बीच सरहद की दिवार ख़त्म हो गयी थी, भला आसमान में कौन सरहद, उड़ते पंछियों का कौन सरहद। सरहद तो जमीन पर बनती है, आसमान में उड़ते मुहब्बत के परवाने कहाँ ये मानने वाले। बस अपना इक्कीस साल का जवान, सोलह साल की नटखट हसीना से आसमान में लुका छिपी खेलने लगा। कभी सरहद के इस तरफ तो कभी सरहद के उस तरफ। जब नाजनीना ने बहुत बेचैन कर दिया तो अपने देसी जवान ने दिल में जलती फुलझरी उनकी तरफ उछाल दी। वो बेचारी इस जवान की शरारत समझ ना सकी और अपने चुन्नट में आग लगा बैठी और अपने वतन लौट गयी। अपना जवान कुछ समझ पाता, कुछ समझा पाता तब तक देर हो चुकी थी। इससे पहले की वो वापस लौटे, खुद को महबूबा की धरती पर पाया वो भी सैकड़ो लोगो से घिरा। अब बात दो देश की हो चुकी थी , मुहब्बत पीछे छूट चूकी थी, राजनीती शुरू हो चुकी थी। इन सब के बीच सोलह और इक्कीस की मुहब्बत की कहानी मीडिया में छाने लगी। पाकिस्तान ने कहना शुरू किया कि हमारी नए ज़माने की आधुनिक बाला को भारत के पुराने ज़माने के देसी छोड़े ने छेरने की जुर्रत कैसे की, बस अब मामला सियासी बन चूका था। उधर सोलह अपने चुन्नट में लगी आग से बुरी तरह जल चुकी थी और अस्पताल में आखिरी सांसे गिन रही थी, उसने अपनी भाभी को पैगाम भिजवाया  कि मेरे महबूब को वतन वापसी करवा दो और कसम दिलवाई की उसे छोरने तुम ही सरहद की सीमा तक जाना। भाभी लग गयी अपने ननद के मुहब्बत को बचाने में, पूरा जोर लगा दी दोनों प्रधान मंत्री को मिलाने में। अंत में मुहब्बत जीती और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को संसद में घोषणा करनी पड़ी की इस गबरू जवान को तुरंत छोरा जाय। तब तक सालियों को सबकुछ पता लग चूका था, बस उसने इस गबरू के जूते चुरा लिए। अपना छोरा भी सब कुछ समझ कर मंद मंद मुस्काने लगा और भाभी को देखने लगा। भाभी ने धीरे से समझाया कि जहाँ इतनी देर , वहीं कुछ घंटे और सही फिर नए जुते की व्यबस्था की और सरहद की सीमा तक छोरने खुद आयी।
जब अपना जवान वापस आया तो मालूम हुआ की जिस फुलझरी से महबूबा के चुन्नट में आग लगी थी, उससे वह पूरी तरह जल चुकी थी और सुपुर्दे ख़ाक हो चुकी है। गबरू के आँखों में आंसू आ गए और मन ही मन सोचा की मैं दिल में महबूबा की यादो को लिए, अपने महबूबा की जमीं को आसमान से देखने फिर जरूर जाऊंगा।
अब इतनी मुहब्बत भरी दास्ताँ को जंग का नाम कैसे दे दिया जाये।