निकल रहा तुम्हारे शहर से, ओ बेखबर,
छोड़कर कुछ यादें और दबी हसरते,
कुछ तन्हाईयाँ और थोड़ी सी रुसवाइयाँ ,
तम्मनाओं के शहर में ढूंढता फिरता अकेला,
हर खामोश लवो में तलाशता खुद का वजूद,
सितमगर भी न मिला सितम करने को ,
हर मौंजू परेशानियां भी कम करने को ,
संभले ना तपिश दरख़्त की छावं से भी
न दरिया के साहिल पनाह से भी
जुस्तजू बस इतनी जरा सी तो थी
एक खलिश जो छिपी फंसी थी कहीं
दिल तलक ताख पर रख छोरा,
कोई रहबर न दिखा संभाल कर रखने को ,
निकल रहा तुम्हारे शहर से ...
छोड़कर कुछ यादें और दबी हसरते,
कुछ तन्हाईयाँ और थोड़ी सी रुसवाइयाँ ,
तम्मनाओं के शहर में ढूंढता फिरता अकेला,
हर खामोश लवो में तलाशता खुद का वजूद,
सितमगर भी न मिला सितम करने को ,
हर मौंजू परेशानियां भी कम करने को ,
संभले ना तपिश दरख़्त की छावं से भी
न दरिया के साहिल पनाह से भी
जुस्तजू बस इतनी जरा सी तो थी
एक खलिश जो छिपी फंसी थी कहीं
दिल तलक ताख पर रख छोरा,
कोई रहबर न दिखा संभाल कर रखने को ,
निकल रहा तुम्हारे शहर से ...
जुस्तजू - खोज, तलाश।
ख़लिश - चुभन, कसक।
No comments:
Post a Comment