Wednesday, March 27, 2019

ग़ज़ल - निकल रहा तुम्हारे शहर से

निकल रहा तुम्हारे शहर से, ओ बेखबर,
छोड़कर कुछ यादें और दबी हसरते,
कुछ तन्हाईयाँ और थोड़ी सी रुसवाइयाँ ,
तम्मनाओं के शहर में ढूंढता फिरता अकेला,
हर खामोश लवो में तलाशता खुद का वजूद,
सितमगर भी न मिला सितम करने को ,
हर मौंजू परेशानियां भी कम करने को ,
संभले ना तपिश दरख़्त की छावं से भी
न दरिया के साहिल पनाह से भी
जुस्तजू बस इतनी जरा सी तो थी
एक खलिश जो छिपी फंसी थी कहीं

दिल तलक ताख पर रख छोरा, 
कोई रहबर न दिखा संभाल कर रखने को ,

निकल रहा तुम्हारे शहर से ...




जुस्तजूखोज, तलाश।


ख़लिशचुभन, कसक।

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