जब मन, एक मन की तालाश करता है
एकांत मे जब निज मन
खुद, खुद से बाते करता है
ढूंढता है फिर एक और मन
मन की व्यथा कहने, अनकही
समग्र एहसास समेटे अन्दर
अंर्तनाद सहेजे निज उर के भीतर
हृदय की चित्कार सुन बस
मन, मन की पुकार करता है
बहुत मुश्किल होता है वो पल,
जब मन, एक मन की तालाश करता है
खोल रख दे इस मन के राज
उलझी सुलझी इस मन की बात
एक मन जो दर्पण हो अपना
मिल जाए तो तृप्त हो रुह अपना
मुश्किल बहुत उस मन का मिलना
मन की बात समझता जो अपना
लाखो की भीड़ मे खड़ा तन्हा इंसान
ये मन, उस मन को ढूंढता फिरता है
बहुत मुश्किल होता है वो पल,
जब मन, एक मन की तालाश करता है
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