दोस्तों, हम आप पाकिस्तान को जिस कारण से जानते हैं, पाकिस्तान वैसा नहीं था। ये पाकिस्तान कोई 1947 में बना देश नहीं है बल्कि ये 5000 साल पुरानी सभ्यता, संस्कृति वाला देश है। इसका अपना एक इतिहास है, अपनी धरोहर है। इसी धरती पर तक्षशिला है, कटासराज मंदिर है, शारदा पीठ है तो हिंगलाज मंदिर है। ये चाणक्य की धरती है और भगवान राम के पुत्र लव जिसके नाम पर बसा शहर लाहौर है उनकी धरती है। आज इस देश का जो भी स्वरुप हो, इस देश के बारे में जो भी धारणा हो, जो भी सोच हो, पर ये हमेशा ऐसा नहीं था। यहाँ कभी बेदो की ऋचाये गूंजा करती थी तो कहीं अध्यात्म और योग हुआ करते थे। मैं आपको यहाँ के एक ऐसे ऐतिहासिक स्थल की जानकारी दे रहा जिसका अस्तित्व हजारों सालो से है।
आज मैं आपसे बात कर रहा हूँ शारदा पीठ के बारे में जो कभी शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। आज के पाक नियंत्रित कश्मीर में एक जगह है मुज़फ़्फ़राबाद। उसी मुज़फ़्फ़राबाद जिले की सीमा के किनारे से पवित्र कृष्ण-गंगा नदी बहती है। ये वही नदी है जिसमे समुद्र मंथन के पश्चात शेष बचे अमृत को असुरो से छिपकर रखा गया था। इसके बाद ब्रह्मा जी ने इस नदी के किनारे माँ शारदा का मंदिर बनाकर उन्हें वहां स्थापित किया था। तब से सारा कश्मीर माँ शारदा की आराधना करते हुए कहता है "नमस्ते शारदादेवी कश्मीरपुरवासिनी / त्वामहंप्रार्थये नित्यमविदादानम च देहि में"। किसी समय चिकित्सा, खगोल शास्त्र, ज्योतिष, दर्शन, विधि, न्याय शास्त्र, पाककला, चित्रकला और भवन शिल्प कलाओ का भी प्रसिद्ध केंद्र था कश्मीर। माँ शारदा के आशीर्वाद के कारण यह जगह कभी विद्वता और बहुत बड़े विद्यापीठ के लिए जाना जाता था। यह एक शक्ति पीठ भी है जो हिन्दुओं के पूज्य अठारह शक्ति पीठों में से एक है। इसकी अपनी एक लिपि हुआ करती थी और यहां पर विश्व की सबसे बड़ी लाइब्रेरी हुआ करती थी।
श्रीनगर से लगभग सवा सौ किलोमीटर की दुरी पर बसा यह शारदापीठ, जहाँ कभी विशाल मंदिर हुआ करते थे आज जीर्ण शीर्ण अवस्था में खँडहर के रूप में मौजूद है। यहीं पर चरक-संहिता लिखी गई, यहीं पर शिव-पुराण, कल्हण की राजतरंगिणी, सारंगदेव की संगीत रत्नाकर लिखी गयी। शैव-दार्शनिको की लम्बी परंपरा यहीं से शुरू हुई। ह्वेनसांग ने लिखा है की शारदापीठ में उसने ऐसे-ऐसे विद्वान देखे हैं जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। यहीं पर एक बहुत बड़ा विद्यापीठ भी था,जहाँ सारी दुनिया भर से विद्यार्थी ज्ञानार्जन करने आते थे। इसकी ख्याति तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय की तरह ही थी। कहा तो ये जाता है की इस स्थल पर एक भव्य मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक ने 287 BC में किया था और माँ शारदे जिसे हम विद्या की देवी सरस्वती भी कहते हैं, उसे समर्पित किया था। शारदा पीठ कश्मीरी वास्तुकला की शैली में बना मंदिर है जो लाल बलुआ पत्थर से बना है। यह एक पहाड़ी पर है और पत्थर की सीढियों के द्वारा वहां जाया जाता है। अभी यह खंडहर के रूप में है लेकिन देखने से मालूम होता है किसी समय यहाँ पर एक विशाल संरचना मौजूद थी।
आज भले यह जगह खण्डहर हो चूका है, इसकी सुधी लेने वाला कोई नहीं, पर किसी समय सारी दुनिया से लोग शारदापीठ के दर्शन करने जाते थे। श्रीनगर से पैदल जा कर दर्शन करने की परंपरा थी। आज हिन्दुओ के हरेक जाति में शांडिल्य गोत्र पाए जाते है। दरअसल कश्मीर में एक निम्न जाती के घर एक बालक शांडिल का जन्म हुआ था। वो बड़े प्रतिभावान थे। उन्होंने माँ शारदे की आराधना की तो माँ शारदे ने उन्हें दर्शन दिया और नाम दिया ऋषि शांडिल्य। आगे चलकर वो बहुत बड़े ज्ञानी बने और कई ग्रंथो की रचना की। भारत के कई हिस्सों में यज्ञोपवीत संस्कार के समय बटु को कहा जाता है की तू शारदा पीठ जा कर ज्ञानार्जन कर। वो सांकेतिक रूप से शारदापीठ की दिशा में सात कदम जाता है और सात कदम पीछे आता है। इसका मतलब ये है की वो शारदा पीठ जा कर विद्या ले चूका है।
इस जगह का दुर्भाग्य कहें की कभी जहाँ पर बच्चे पठन पाठन किया करते थे, ज्ञान अर्जित कर देश दुनिया को नयी दिशा देते थे। आज वहां के बच्चे बंदूके उठाकर लोगों को मरने मारने की कसमे खाते हैं। वैसे यहाँ के स्थानीय लोग इसे शारदा माई की मंदिर ही कहते है और चाहते हैं की ये पुनः आबाद हो। भारत और पाकिस्तान के सरकारो से निवेदन है की दोनों देशो की इस साझी विरासत को फिर से पुनर्जीवित करें और गंगा जमुनी तहजीब की नई मिसाल पेश करें।
- अभय सुमन दर्पण


भाई पाकिस्तान का नामकरण तो आज़ादी के समय हुए बंटवारे के समय ही हुआ l पहले तो यह सब आर्यावर्त ही था और धीरे धीरे हम सबकी बेवकूफियों और नज़र अंदाज़ रवैये के कारण भारत का विभाजन होता गया l भारत को विश्व गुरु की संज्ञा मिलने के पीछे येही सच्चाईयां हैं जिनमें एक का ज़िक्र आपकी पोस्ट में किया गया है l इस महत्वपूर्ण जानकारी को अपने ब्लाग के माध्यम से ज़न ज़न तक पहुंचाने की आपकी कोशिश सराहनीय है l
ReplyDeleteधन्यवाद और सही बात।
DeleteThanks to send the nice message
ReplyDeleteGyan badhane ka shukriya.. Accha lekh hai..
ReplyDeleteइतिहास के बारे में सही परिप्रेक्ष्य में जानकारी देने की बहुत बढ़िया पहल । ज्ञान का यह क्रम निरंतर चलता रहे।
ReplyDeleteBahut acha...... keep it up......
ReplyDeleteअप्रतिम...
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