Monday, October 1, 2018

"रेप" एक स्याह सच - कहानी

"मम्मी-मम्मी उसने मेरी पीठ में चिकोटी काटी", शिखा ने लगभग चीखते हुए कहा।
"किसने-कौन", आरती ने पलट कर पूछा।
"वो मम्मी, ब्लू शर्ट वाला " शिखा ने जोर से कहा
"अरे रुक " सोनिया उसकी तरफ दौड़ी।
लेकिन तबतक वो भीड़ का फायदा उठा कर भीड़ में गुम हो गया था। आज 15 अगस्त की छुट्टी की वजह से मॉल में भीड़ भी बहुत ज्यादा थी। काफी दिनों के बाद आरती अपने चौदह साल की बेटी के साथ एक बड़े से मॉल में उसके लिए ड्रेस खरीदने आयी थी। दो साल हो गए शिखा के पापा को गुजरे तब से दोनों में माँ बेटी से ज्यादा दोस्त का रिश्ता बन गया था। बेटी के चेहरे पर एक शिकन बर्दास्त नहीं थी आरती को। पति क्लास टू आफिसर थे, इसीलिए अच्छी खासी पेंशन और पैसा छोड़ गए थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। पर बड़ी होती बेटी की चिंता हमेशा सताती रहती थी, खासकर आज कल के माहौल में। अभी शिखा सिर्फ चौदह साल की थी, लेकिन लोगो की भेदती निगाह आरती अच्छे से पकड़ लेती थी। उसे हमेशा डर सताता की उसकी बेटी, कम उम्र में ही बड़ी न हो जाये। अभी जो शिखा की चीख सुनी तो उसका डर सच में बदलने लगा। अभी तो उसके शरीर में बस थोड़ा सा बदलाव हुआ है और उसकी मानसिक यंत्रणा शुरू। किसी तरह आरती ने शिखा को समझाया और मॉल मैनेजमेंट से शिकायत दर्ज की। 
घर पहुँच कर दोनों ने डिनर किया और दोनों शांत बैठे रहे। दोनों के मन में कुछ उधेरबुन चल रही थी।
तभी शिखा ने तन्द्रा भंग कर आरती से पूछा, "मम्मी उसने मुझे चिकोटी क्यों काटी।"
"कुछ नहीं बेटा, कुछ लोगो के मम्मी पापा उसे अच्छी शिक्षा नहीं देते, इसीलिए वो लोग ऐसा करते हैं " आरती ने कहा।
"नहीं मम्मा, कुछ और बात है ", शिखा ने कहा।
आरती का दिल धड़क उठा, पूछ उठी, "क्या "
" वो मेरा रेप करना चाह रहा था " , शिखा ने कहा।
"नहीं बेटा, ऐसा नहीं बोलते। हम जहाँ रहते हैं ,वहां कुछ अच्छे लोग होते हैं और कुछ बुरे", आरती ने कहा।
"नहीं मम्मा, मैंने TV के न्यूज़ में देखा था, एक बच्ची के साथ रेप हुआ था। मैं भी तो बच्ची हूँ " शिखा ने कहा। 
"हां बेटा, तू मेरी बच्ची नहीं मेरी जान है ,मेरा सब कुछ है" कहकर आरती ने शिखा को बाहों में समेत लिया। मन में एक डर और कई सवाल आरती के दिमाग में घूम रहे थे। सबसे बड़ा डर की कबतक और कहाँ तक मैं साथ रहूंगी। अभी चौदह की है ,कल सोलह फिर बीस......। कहाँ तक मैं साथ चलूंगी। हर दिन कुछ न कुछ सुनने को मिलता है। कल ही तो अख़बार में आया था की किसी बच्ची का अपहरण हो गया। कुछ साल पहले के दिल्ली के निर्भया कांड को कोई भुला नहीं अब तक। क्या हो गया है पुरुष के पुरुषत्व को। कहाँ चले गए द्रौपदी के लाज बचाने वाले श्री कृष्ण।
अगले दिन शिखा को स्कूल भेज आरती थोड़ा आराम करने लगी। आज उसकी तबियत भी कुछ अच्छी नहीं लग रही थी और कुछ बुखार सा लग रहा था। शाम में दोनों ने अपने दिन भर की दिनचर्या पर बाते की और सब कुछ सामान्य सा हो चला था। 
आज दो दिन हो गए थे आरती को बीमार पड़े। खाना बनानेवाली और कामवाली काम कर के चली जाती थी। लेकिन शिखा को स्कूल भेजना, टिफिन देना, फिर घर में भी कई काम और खुद बीमार इन सबो ने आरती को परेशान  कर रखा था। खुद से दवा ली थी लेकिन बुखार जाने का नाम नहीं ले रहा था। आज शाम में आरती ने डॉक्टर को दिखाने का सोच रखा था। दिन के एक बजे थे, तभी घंटी बजी। शायद शिखा स्कूल से आ गयी ये सोच कर आरती दरवाजे की तरफ बढ़ी, लेकिन शिखा तो तीन बजे आती है। अभी कौन आ गया, सोचते हुए आरती ने दरवाजा खोला तो एक लगभग पैतींस-छत्तिस साल का आदमी दरवाजे पर खड़ा था। 
"आप शिखा की मम्मी हैं", उसने पूछा। 
"हाँ, क्या हुआ शिखा को,कहाँ है वो ", आरती ने घबराते हुए पुछा। 
"घबराने की कोई बात नहीं, वो ठीक है। बस आपको मेरे साथ अस्पताल चलना पड़ेगा", उसने शांत भाव से कहा। 
"अस्पताल? क्या हुआ मेरी बेटी को, वो तो स्कूल गयी थी", आरती ने रोते हुए पूछा। 
"अरे आप चिंता ना करे, बस मेरे साथ चलिए" उस आदमी ने कहा। 
आरती तुरंत उस आदमी के साथ चल दी। अस्पताल पहुँच कर देखा तो शिखा एक बिस्तर पर लेती थी और उसके सर पर पट्टी बंधी थी। आरती दौर कर उससे लिपट गयी और रोने लगी। 
"ये कैसे हुआ शिखा", आरती ने रोते हुए पुछा "तुम तो स्कूल गयी थी"। 
आरती का मन घबरा रहा था, तरह तरह के बुरे ख्याल आने लगे। 
"कुछ नहीं मम्मा, बस थोड़ी सी चोट लग गयी है", शिखा बोली और धीमे से मुस्कुराई।
"लेकिन कैसे लग गयी और यहाँ " आरती ने सर छूते हुए कहा। 
"बस मम्मा, सुबह स्कूल जाने निकली तो सिर्फ तुम याद आ रहे थे और तुम्हारी तबियत", शिखा ने गहरी सांस लेते हुए कहा "मैं स्कूल के भीतर ना जाकर पास में डॉक्टर के क्लिनिक पर चली गयी ताकि तुम्हारी तबीयत उसे बता सकूँ। डॉक्टर के आने में एक घंटे की देर थी, मैं वहीँ बैठ गयी। वहां एक आदमी साफ़ सफाई कर रहा था। दस मिनट के बाद एक आदमी आया जो डॉक्टर का असिस्टेंट था। मेरे बारे में उसने सफाई वाले से पूछा फिर अंदर डॉक्टर वाले कमरे में मुझे बुलाया। मैं अंदर गयी और तुम्हारे बारे में सब बाते उसे बता दी। फिर उसने पूछा क्या मम्मी को सरदर्द भी कर रहा और ये कहकर मेरे सर को छूने लगा। मैं डर गयी और दरवाजे की तरफ जाने को हुई, तो वो मेरे हाथ पकड़ कर खींचने लगा। मैं तेजी से दरवाजे की ओर दौड़ी और टेबल से टकराकर गिर गई जिससे सर में चोट लग गयी। मैं काफी जोर से चिल्लाई, मेरी आवाज सुन कर वो सफाईवाला दरवाजा खोल कर अंदर आ गया। तभी उस सफाईवाले ने सब कुछ समझते हुए उस आदमी की पिटाई शुरू कर दी। तब तक कुछ लोग और आ गए थे और उसे पकड़ के पुलिस के हवाले कर दिए। बस मम्मा मुझे उस वक़्त सिर्फ तुम याद आ रहे थे" कहकर शिखा फूट फूट कर रोने लगी। 
"मेरे बच्चे इतना सब कुछ सह लिया तूने सिर्फ मेरी चिंता में, मुझे क्या हो जाता मामूली सा बुखार ही तो आया था। आज शाम में चली जाती डॉक्टर के पास, आगे से कभी ऐसा मत करना" आरती ने कहा। 
हाँ मम्मी, जिस सफाई वाले ने मेरी मदद की थी ये वही व्यक्ति हैं" कहकर शिखा ने उस व्यक्ति को देखा जिसने आरती को घर से बुलाया था। 
" मैं आपको कैसे धन्यवाद करूँ भैया", आरती ने उस आदमी से कहा,"आपका ये अहसान मुझ पर पूरी जिंदगी रहेगा "
"नहीं दीदी ऐसा मत कहो, मुझे मालूम है एक नारी का सम्मान और इज़्ज़त क्या होता है। अगर वो किसी की बहन-बेटी है तो क्या वो हम सब की बहन-बेटी नहीं। अगर सब ये सोचे तो क्या समाज का यह पाप नहीं मिट जायेगा", उसने कहा। 
तभी शिखा ने कहा, " माँ, मुझे रेप का थोड़ा मतलब तो मालूम हो गया है, पर हर पुरुष रेप नहीं करता। जिनके घर के दिए संस्कार अच्छे नहीं होते वही रेप करते हैं, वही बुरी नजर रखते हैं। घर से बाहर निकला हर पुरुष, किसी स्त्री को बुरी नजर से देखते वक़्त ये सोच ले कि उसकी बहन को भी कोई बुरी नजर से देख रहा होगा तो शायद उसकी सोच में बदलाव हो जाये और ये सीख सिर्फ उसके मम्मी-पापा ही दे सकते हैं"।
"तू बहुत बड़ी हो गयी है बेटा", ये कहकर आरती ने शिखा को बाँहों में भींच लिया। 

                                                                                                - अभय सुमन "दर्पण"


  कृप्या कमेंट दें। 

Friday, September 7, 2018

अख़बार की छुट्टी - कहानी

सुबह के आठ बज चुके थे। शर्मा जी कुछ बुदबुदाते हुये अपने बॉलकनी में चहलकदमी कर रहे थे। सुबह से तीन कप चाय हो चुकी थी और तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा था। मिसेज शर्मा उनकी परेशानी देखकर तीन बार टोक चुकी थी। तभी सामने से निगम साहेब गुजरे, उन्होंने भी शर्मा जी को परेशानी से टहलते देखा और पूछ बैठे, " क्यों शर्मा साहब, सब ठीक तो है कुछ परेशान दिख रहे"। 
शर्मा जी बस उबल परे, "अब बताइये निगम साहेब, ये भी भला कोई बात हुई। कल ही कर्णाटक में सरकार गिरी है, सलमान के नए लव अफेयर शुरू हुए हैं। सब्जियां महंगी हुई है। भारत के क्रिकेट टीम की घोषणा हुई है। और... और देखिये आज की अख़बार नहीं आयी है। हर दिन तो सुबह छः बजे दे जाता था, लेकिन आज पता नहीं क्यों अब तक नहीं आया। 
निगम साहब ठठाकर हंस परे और बोले, "अच्छा तो ये कारण है आपके परेशानी का, अरे साहेब आजकल तो मोबाइल पर भी अख़बार आते हैं वहां देख लीजिये पर बी.पी. मत बढ़ाइये"। शर्मा जी झुंझला बैठे और कहा, "अरे कहाँ ? छप्पन की उम्र में मोबाइल ज्यादा समझ नहीं आता"। फिर मुस्कुराते हुए बोले, "भाई निगम साहेब, सुबह-सुबह अख़बार को छूना, उसकी सोंधी-सोंधी खुश्बू, पन्ने पलटना, साथ में चाय की चुश्की, भला इन सबों का मुकाबला क्या मोबाइल करेगा"। निगम साहब निरुत्तर हो गए और चलते बने। 
तभी मिसेज शर्मा ने आवाज दी "क्योँ जी, आज ऑफिस नहीं जाना। नहीं आयी अख़बार तो रास्ते में खरीद लेना। तुमने आज बी.पी. की गोली भी नहीं खायी। अब जल्दी तैयार हो जाओ।"
शर्मा जी ने गुस्से में कहा, "तुम्हे तो मालूम नहीं अख़बार की कीमत, दिन भर सास-बहु सीरियल में पड़ी रहती हो। जब से नेहा विदेश गयी है, अपना भी ख्याल नहीं रखते। हाँ, मुझे बी.पी. का पेशेंट जरूर बना दिए। आज तो लगता है पूरा दिन ख़राब हो गया। 
शर्मा जी जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल गए। आधे रास्ते में स्कूटर बंद हो गयी, देखा तो पेट्रोल ख़तम हो गयी थी। तब उन्हें याद आया की पेट्रोल तो दो दिन पहले रिज़र्व में आया था, उन्हें लगने लगा की शायद उनकी यादाश्त भी अब कम हो गयी है। आधे किलोमीटर पर पेट्रोल पंप थी, वहां तक इतनी तेज गर्मी में स्कूटर को ले जाना भी एक बड़े मिशन का काम था। खैर किसी तरह ऑफिस पहुंचे, बस थोड़ा लेट। 
बैठा ही था कि सिंह साहेब ने पूछा, " क्यों शर्मा जी, आज कहाँ लेट हो गए।
शर्मा जी ने कहा, "वो थोड़ी स्कूटर में दिक्कत थी, इसिलिए थोड़ा लेट हो गए। 
तभी किरण मैडम ने चुटकी ली, "स्कूटर ख़राब थी या गर्ल्स कॉलेज के चक्कर लगाते आ रहे।"
बस शर्मा जी बिफर पड़े, "बस यही एक काम बाकी रह गया है, ठीक है कल से वो भी कर लूँगा। आपकी भी कोई दोस्त वहां प्रोफेसर हो तो बता दीजियेगा मिल भी आऊंगा। 
उन्हें गुस्से में देख सब शांत हो गए, धीरे-धीरे सब अपने काम में लग गए। आज ऑफिस में भी उनका मूड सही नहीं था। 
शाम में घर पहुंचे तो पत्नी से पुछा, "अख़बार आया की नहीं ?"  
पत्नी ने कहा, "आज तो दिया नहीं"। 
बस उनका बड़बड़ाना शुरू हो गया। थोड़ी बहुत सही मूड थी, वो भी ख़राब हो गयी। पत्नी ने सोचा, आज तो रात का खाना भी ख़राब हो गया। मालूम होता तो बाहर से एक अख़बार खरीद कर ले आती। किसी तरह रात बीती। शर्मा जी सुबह जल्दी जग गए और पांच बजे से ही बालकनी में बैठ गए, बस छः बजने का इंतजार कर रहे थे। मिसेज शर्मा ने एक कप चाय बना कर दी। बड़े अनमने ढंग से शर्मा जी ने चाय पी, लेकिन उनकी निगाहे हर अख़बार वाले पर और कान साईकल की घंटी पर। सुबह के सात बज चुके थे, लेकिन अभी तक आज की अख़बार नहीं आयी। मिसेज शर्मा तीन कप चाय दे चुकी थी। तभी  7.30 बजे एक बारह साल का लड़का गेट पर घंटी बजाया। 
"कौन है ?"   शर्मा जी ने पूछा। 
"साहब, आज की अख़बार है।"  एक मासूम सी आवाज आयी। 
तभी मिसेज शर्मा भी बालकनी में आ चुकी थी। देखी एक भोला सा सांवले रंग का लड़का गेट के दरवाजे पर खड़ा है। 
" इतनी देर से क्यों आये और सूरज कहाँ है जो अख़बार देता है और कल की अख़बार कहाँ है" शर्मा जी की तेज आवाज एक सांस में गूंजी।
" साहेब, बाबूजी का परसो रात एक्सीडेंट हो गया था। उस समय से सिविल अस्पताल में भर्ती हैं, अभी भी बाबूजी  अस्पताल में ही हैं, कल इसिलिये नहीं आया। अब अख़बार नहीं बाटूंगा तो खाऊंगा क्या।" उसने भोलेपन से कहा। 
तभी मिसेज शर्मा ने कहा, "कोई बात नहीं बेटा, कुछ चाहिए तो बता देना। अपने बाबूजी का ख्याल रखना। अख़बार की चिंता मत करना।" ये कहकर उसने शर्मा जी की तरफ देखा। 
शर्मा जी अख़बार पाकर कुछ शकुन में दिखे। 
मिसेज शर्मा ने उनसे पूछा "आज बी.पी. की दवा खानी है की नहीं।" 
शर्मा जी धीरे से मुस्कुरा दिए और कहा "ऑफिस से आने के बाद सिविल अस्पताल चलेंगे सूरज को देखने।"
मिसेज शर्मा के चेहरे पर भी शकुन नजर आ रहा था क्योंकि अख़बार की छुट्टी ख़तम हो गयी थी।                                                              
                                   - अभय सुमन "दर्पण"                           

Sunday, August 12, 2018

कविता - पर्यावरण और स्वास्थ्य

हर कहीं धुआं , हर कहीं है धुंध,
कटते विशाल बृक्ष,और रेत हैं अनंत,
खांसते-कांपते युवाओं का है शोर,
ओढ़ी साखें बृक्ष की, धूल की परत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

प्रकृति का चित्र भी हो रहा विचित्र,
रुग्ण हुए गाँव, सिमट रहे हैं छांव
दुहता मनुष्य , वसुंधरा का वक्ष
चीत्कार रही धरती, सब का यही मत
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

भविष्य के नौनिहाल भी, कर रही पुकार
मत दो शौक से , मौत का ये हार
स्वस्थ हो  धरा, स्वस्थ रहे हम
करते हम प्रतिज्ञा, लेते हम शपथ
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

मनुष्य हो पशु हो ,पहाड़ या समुद्र,
निगलता समेटता, प्रदूषण का दंश,
पेट्रोल-डीजल कर रहे,इस जहाँ का अंत,
आओ रोशन हम करें,सोलर से जगत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

                      ---  अभय कुमार सुमन 

Sunday, July 22, 2018

देखो, इश्क की सुबह हो गयी - कविता

सूरज के पहले स्पंदन से,
भँवरों ने ली अंगराई है,
फूल कमल खिल आयी है,
लाज का घूंघट बिखर-सिमट गयी,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

              अलसाई उन नजरो में,
              ख्वाब सुनहरी मद्यम थी,
              मेरी आँखों के बंदन से,
              परिचय नयनों की हो गयी,
              देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

 तेरे आने में राज भी था,
 तेरे जाने में भेद भी है,
 चुपके से झलक को पाते ही,
 ख्वाब को पंख लग गई,
 देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               कदमो की आहट थी संभली,
               पायल भी थी थोड़ी खनकी,
               आतुर थी तोड़ने को हर बंधन
               प्रेम - अगन जग गयी
               देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

मिलन को व्याकुल अधरो में,
थरथराते अल्फाज़ भी थे,
खिली तबस्सुम चेहरे पर,
जब लवों की रंगत बदल गई,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               -  अभय सुमन "दर्पण"








Friday, July 13, 2018

ट्रैन की नीचे वाली सीट - कहानी

शुक्ला जी की ट्रैन की टिकट कन्फर्म हो गयी थी। काफी मुश्किल से तत्काल में कल टिकट बनवायी थी वो भी वेटिंग में। लखनऊ से भोपाल जाना था तीन बच्चे और पत्नी के साथ, किसी रिश्तेदार की शादी में। पहले तो ना-ना होती रही, लेकिन अन्त समय में प्लान बन ही गया। यहाँ भी तो छोड  कर जाया नहीं जा सकता था। अमीनाबाद में इतने बड़े किराने की दुकान किसके भरोसे छोड़ कर जाता। खैर अब तो निकल चुके थे। ए.सी. में टिकट नहीं मिल पाया तो स्लीपर में लेना पड़ा, सोचा चलो रात भर की यात्रा है किसी तरह काट लेंगे।
रात के दस बज चुके थे, सभी अपने बिस्तर लगा कर सोने की तैैैयारी में लगे थे। शुक्ला जी को पांच सीट में सिर्फ एक सीट नीचे की मिली थी और बाकी सभी मिडिल और ऊपर की थी। नीचे वाली सीट पर अभी बच्चो ने कब्ज़ा कर रखा था।  अपनी बड़ी सी तोंद लेकर उनका ऊपर जाने का कोई इरादा नहीं था। बच्चे अपनी मस्ती में खिड़की के पास बैठकर बाहर का मज़ा ले रहे थे। तभी एक सज्जन उनके सीट पर कोने में बैठ गए।  शुक्ला जी ने थोड़ी सी घुरकी दी "भाईसाहब अपनी सीट पर बैठ जाइये"। उसने कहा "भैया वेटिंग है, किसी तरह रात काट लूँ"। शुक्ला जी के बैठे बैठे पेट में गैस बन रही थी, उन्होंने गुस्से में जोर से कहा "भाईसाहब नीचे वाली सीट को मैं छूने नहीं दूंगा।आप अपनी तशरीफ कहीं और ले जाएँ।  वो सज्जन उठकर कहीं और चले गए। शुक्ला जी ने बच्चों को डांट लगाई, "जाओ सब सो जाओ"। बच्चो को काफी मजा आ रहा था, काफी दिनों बाद कहीं घूमने जा रहे थे। पापा की डांट सुन कर सब खामोश हो गए। सभी ने अपनी अपनी बिस्तर लगाई और सोने चले गये। शुक्ला जी ने नीचे की बिस्तर लगायी और अपने तोंद सँभालते हुए सो गए। एक घंटे बीते होंगे की उन्होंने अपने पैर के पास कुछ सरसराहट महसूस किया। आँखे खोल कर देखा तो एक चौबीस-पचीस साल का युवक उनकी सीट के कोने में जगह बना रहा था। उन्होंने आव देखा न ताव, अपने पैर से उसे एक धक्का दे दिया। वो बेचारा नीचे फर्श पर गिर पड़ा।  उठते ही शुक्ला जी पर चढ़ बैठा "क्यूँ ताऊ, आपने धक्का क्यों दिया"। शुक्ला जी बौराये बैठे थे कहा "तुम मेरी सीट पर बैठे क्यों"। उसने पलट कर कहा "बैठा था तो कौन सा आपकी सीट लिए जा रहा था, एक तो गन्दी गैस छोर रहे, उस पर खर्राटे की आवाज, कोई शौक नहीं आपके पास बैठने की अगर मजबूरी नहीं होता तो"। बस शुक्ला जी उठ कर बैठ गए, लगे उससे बहस करने। इसी हो-हल्ले में काफी लोग जग गए और तमाशा देखने लगे। शुक्ला जी की पत्नी ऊपर वाली सीट से सारा तमाशा देख रही थी और कुछ बुदबुदा रही थी। तभी कुछ लोग उस युवक के पक्ष में आ गए और शुक्ला जी को भला बुरा कहने लगे। अब बात शुक्ला जी के बर्दाश्त से बाहर हो गया था, वो उठ कर बैठ गए और सारी लाइटें जला दी। शुक्ला जी अब पुरे मूड में आ चुके थे और बात अब हाथा-पाई तक आ चुकी थी। शुक्ला जी की पत्नी और तीनो बच्चे आँखे मलते अपने पिताजी को देख रहे थे। तभी किसी ने टिकट कलेक्टर को बुला लिया। अब टीटी साहेब, शुक्ला जी और उस युवक के झगड़े को निपटने में लग गए। उस युवक ने बताया की किसी इंटरव्यू के सिलसिले में भोपाल जा रहा था, परसो ही मालूम चला और एकाएक जाना पड़ा। उसने टीटी से काफी अनुरोध किया कि एक सीट मिल जाये तो आराम से कल इंटरव्यू दे दूँ। वैसे ही आधा मूड ख़राब हो चूका था। उधर शुक्ला जी अलग भन्नाये बैठे थे। भीड़ काफी होने के कारण रास्ते में और दोनों सीट के बीच में नीचे काफी लोग लेते हुए थे। टीटी ने पहले सीट की असमर्थता व्यक्त की, फिर उस युवक को एक तरफ बुलाकर कहा कि, "बस पांच सौ रूपये दे दो तो मैं कुछ इंतजाम करूँ"। उस युवक ने कहा "लेकिन अंकल मैं इंटरव्यू के लिए जा रहा हूँ, गरीब परिवार से हूँ और गिनती के पैसे हैं। यह मुझ से सम्भब नहीं है"। सामने वाली खिड़की के साथ वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला लेटी थी। वो सारा हंगामा देख रही थी और टीटी की बातें सुन रही थी। उसने उस युवक से कहा, " कोई नहीं बेटा, तू मेरी वाली सीट पर बैठ जा मुझे मुंबई तक जाना है कल दिन में मैं सो लुंगी, लेकिन तेरा इंटरव्यू ख़राब नहीं जाना चाहिये। सभी लोग उस बुजुर्ग महिला की बात सुन कर काफी शर्मिंदा हुए। तभी टीटी ने कहा, "ठीक है मैं तुम्हे एक सीट दे रहा हूँ लेकिन कल इंटरव्यू में पास जरूर होना"। इधर शुक्ला जी के तेवर भी ढीले हो चुके थे, उन्हें भी लग रहा था की कुछ गलत कर दिया। उन्होंने भी कहा, "ठीक है बेटा बैठ जा मेरी थोड़ी सी जगह पर। वो युवक मुस्कुरा कर कहा, " नहीं अंकल आप आराम से सोयें, बस थोड़ा कम खायें। शुक्ला जी अपनी तोंद संभाले धीरे से मुस्कुराने लगे।

                                                                                              
                                                                                                      - अभय सुमन "दर्पण"

Friday, June 22, 2018

"नई बहु,नया दिन" - कहानी

"ठक ! ठक ! ठक !  भाभी दरवाजा खोलो"  रागिनी की हल्की धीमी आवाज ने नेहा को जगा दिया। 
फिर से आवाज आयी "भाभी दरवाजा खोलो, सब लोग आँगन में बैठे हैं, देर हो जाएगी"। 
नेहा ने बिस्तर पर उबासी ली, अपने अस्त व्यस्त कपड़ो को ठीक किया और दरवाजे को थोड़ा सा खोला। सामने छोटी ननद मुस्कुराते हुए धीरे से बोली "भाभी आठ बज चुके हैं, जल्दी से आ जाओ।  सब लोग इंतजार कर रहे, दिल्ली वाली मामी की ट्रेन का समय हो गया है, मिलना चाहती है"।
"बस रागिनी, पांच मिनट में आयी, तुम जाओ" नेहा ने कहा। फिर धीरे से दरवाजा बंद करके बिस्तर के पास आयी। देखा निखिल एक गहरी नींद लिए बिस्तर पर सो रहे थे। नेहा ने उसे एक प्यार भरी नजरो से देखा और उसके घुंघराले बालो में हलकी सी उंगली की फिर धीरे से उसे जगाया और बोली " मामी के ट्रेन का समय हो गया है ,मिल लो उनसे"।
निखिल ने आंखे खोल अलसाई नजरो से नेहा को देखा और उसे अपनी ओर खींच लिया। तभी दरवाजे पर फिर ठक ठक की आवाज आयी, "भाभी दरवाजा खोलो"। 
नेहा हड़बड़ाकर उठ बैठी और दरवाजे को धीरे से खोल बोली "अभी आयी बस थोड़ी देर"। 
तभी रागिनी दरवाजे के अंदर धड़धराते घुस आयी और बोली "भाभी, प्लीज जल्दी करो ना। अब दरवाजा बंद हुआ तो पता नहीं कितना समय लगे। इसीलिए मैं यही बैठती हूँ"।
फिर भैया को देखकर बोली "भैया तुम तो जानते हो मामाजी का गुस्सा"। 
"अच्छा बाबा चलो मैं चलता हूँ, नेहा तुम भी तैयार हो जाओ"  निखिल ने उठते हुए कहा ।
नेहा और निखिल की दो दिन पहले ही शादी हुई थी। दोनों पहली बार पंद्रह दिन पहले मिले थे, अपने इंगेजमेंट में। निखिल आर्मी में ऑफिसर था, काफी मुश्किल से बीस दिनों की छुट्टी लेकर आया था। गोरखपुर में अपना बड़ा पुश्तैनी मकान, बड़ा सा संयुक्त परिवार सब मिल-जुल कर रहते थे। नेहा लखनऊ की रहने वाली एक बड़े घर से ताल्लुक रखती थी। एकलौती संतान, पिता सरकारी अधिकारी, लखनऊ में आलीशान कोठी और ढेरों शानो-शौकत और अपने पापा के आँखों का तारा। जब छः साल की थी तभी माँ का देहांत हो गया। पिता ने दूसरी शादी नहीं की शायद ये सोच कर की नई माँ उसे प्यार दे पाए की नहीं। घर पर तो सुबह दस बजे के बाद ही नेहा की आँख खुलती थी। पापा कहते सो लेने दो मेरी बेटी को ,शादी के बाद पता नहीं कितने बजे जागना पड़े। 
एक हफ्ते से शादी की रस्मो रिवाज निभाते निभाते नेहा का बदन टूट रहा था। कल नेहा और निखिल की सुहागरात थी, रात पार्टी खत्म होते एक बज गए और जब दोनों कमरे में गए तो थक कर चूर। फिर बाते करते सुबह के पांच बजे जाकर सोना हुआ। दो तीन घंटे की नींद भी पूरी नहीं हुई थी की दरवाजे पर ठक ठक की आवाज ने जगा दिया। 
नेहा तैयार होकर कमरे से बाहर निकली, देखा आँगन मेहमानो से भरा हुआ था। तभी सासु माँ आकर बोली "बहु सभी बड़ो को प्रणाम कर के आशीर्वाद ले लो"। नेहा ने एक हलकी नजर डाली और गिनती की शायद तीस-बत्तीस लोग तो होंगे ही। निखिल पास आकर बोला, माँ मैं नेहा के साथ उसकी मदद करा देता हूँ। शायद यह बात पटना वाली मौसी ने सुन ली और बोली "निखिल तू रहने दे, देखूं तो सही बहु को कितना खिलाया पिलाया गया है"  फिर जोर से हंस दी। तभी छोटी बुआ ने कहा " सुना है बहु अपने घर दोपहर में जगती थी, अब तो भाभी को ही बहु के लिए खाना तैयार करना पड़ेगा"। नेहा इन सबों की अभयस्त नहीं थी। नया घर, नए लोग, नयी जिम्मेदारियाँ ये सोचकर वो चुप रही। निखिल ने सब सुन धीरे से नेहा की उंगली दबा दी, शायद एक भरोसे का इशारा था की मैं हूँ तुम्हारे साथ। किसी तरह दो घंटे नेहा ने वहां अपने समय को बिताया।  आँखों की नींद और थकान उसे वहां बैठने की इजाजत नहीं दे रही थी। निखिल ने यह बात समझ ली और उसे बहाने से कमरे में ले आया। आते ही नेहा निढाल हो बिस्तर पर सो गयी। निखिल को मैरिज रजिस्ट्रेशन ऑफिस जाना था कुछ फॉर्म भरने, वो चला गया।
दोपहर के डेढ़ बज चुके थे और नयी बहु का खाने पर इंतजार हो रहा था। नेहा को बुलाया गया, आयी तो देखा घर के सारे लोग बड़ी सी मेज के दोनों तरफ बैठे हैं शायद बीस-बाइस लोग होंगे। नेहा को थोड़ी असमंजस हुई शायद अकेले रहने के आदत के कारन।  उसके पापा ने शायद इसी लिए ऐसे घर में शादी की थी की उसे वो सब कुछ मिले जो वह दे नहीं पाए थे। वह बैठी ही थी की एक आवाज आयी "बहु सर के पल्लू पूरी तरह रखो यहाँ घर के कई बड़े बैठे हैं"। उसने देखा सबसे बड़ी चाची की निगाह उस पर ही थी, तभी छोटी चाची ने कहा "जाने दो दीदी घर में कोई बताने वाला नहीं होगा"। नेहा धड़कते दिल से सब सुन रही थी, तभी बड़ी चाची ने कहा "बहु सभी को सब्जी परोस दो"। तभी रागिनी ने कहा "रहने दो भाभी मैं कर देती हूँ"। वो उठी ही थी की बड़ी चाची ने कहा "घर के नियम मत तोड़ो रागिनी"। बड़ी चाची और बड़े चाचा का कहा घर में कोई नहीं काटता था। नेहा ने उठ कर सभी को सब्जी परोसना शुरू किया शायद पहली बार, तभी बड़े चाचा को देते समय उसके हाथ से सब्जी की हांड़ी गिर गई और वो भी बड़े चाचा के सिल्क के नए कुर्ते पर। उसे घबराहट में कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसने हांड़ी वहीँ टेबल पर रखी और तेज कदमो से अपने कमरे में चली गयी। उसे इस वक़्त सिर्फ अपने पापा की याद आ रही थी और आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। उसने तकिये में सर दबा लिया और अपने आंसुओ को बहने के लिए छोर दिया। थोड़ी देर हुआ होगा की उसने अपने कंधे पर किसी का हाथ पाया। उसने पलट कर देखा तो पीछे निखिल खरा था, अपना हाथ उसके कंधे पर रखे। नेहा की सूजी आँखे बहुत कुछ कह रही थी, बाकि उसे सब कुछ मालूम चल चूका था। उसने धीरे से नेहा को उठाया और कहा "मैं जानता हूँ तुम्हे तकलीफ पहुंची है, मैं ये भी जानता हूँ की तुम्हे इन सबो की आदत नहीं। ये भी सच है की तुम अपने घर में बड़े लाड़ प्यार से पली हो और अभी शायद तुम्हे अपने पापा की सबसे ज्यादा याद आ रही हो, लेकिन आज से ये घर भी तुम्हारा है। कई लोग हैं कई तरह की बाते हैं, उन सबो के बीच में तुम्हे अपनी जगह बनानी है। सबसे बड़ी बात ये कि तुम्हारे साथ हमेशा मैं खड़ा मिलूंगा एक भरोसे के साथ, एक विश्वास के साथ। तुम्हारे हर सुख-दुःख में खड़ा तुम्हारी हर उम्मीद और आशा के साथ"।
नेहा ने सारी बाते सुनी और अपने आंसुओ को पोछा, अपने पापा के बाद उसे किसी पर एक भरोसे का एहसास हो रहा था । उसने मन ही मन सोचा शायद नई बहु का नया दिन ऐसा ही होता होगा। उसने निखिल की आँखों में देखा और खुद को उसकी बाहों में सिमटा लिया एक नयी सोच के साथ।
                                     
                                                                                                        - अभय सुमन "दर्पण"

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Saturday, June 2, 2018

कविता - "दिल को रखो ताखे पर"

दिल को रखो ताखे पर
मनवा रखो बताशे पर
गोल गोल ये दुनिया है
झोल झोल ये लफड़े हैं
सोच समझकर बातें कर
तोल-मोल कर नाते कर
किसिम किसिम के लोग यहाँ
बड़े बड़े सब ढोल यहाँ
सूट-बूट में दंगल है
बहार हैं कुछ अंदर है
बनते सभी सयाने हैं
पहने फटे पजामे हैं
पूछ जरा सा उनका हाल
सूरत बेहाल,दिल है कंगाल
सोच न भाई ज्यादा कुछ
जीवन एक, मिली छुक-छुक
झूम ले, कर ले, मन की बात
नाच-कूद,कर रिमझिम बरसात
आएंगे भाई अच्छे दिन ,
रात है तो क्या सुबह नहीं
तो,दिल को रखो ताखे पर
मनवा रखो बताशे पर।



                           -      अभय सुमन "दर्पण"