ठक ! ठक ! ठक !
"बस मम्मा दो मिनट" अंदर से सुभि की आवाज आयी।
"जल्दी कर बेटा, तेरी सभी सहेलियां ड्राइंग रूम में तेरा इंतजार कर रही", कविता ने बाहर से कहा और किचन में चली गयी। जाते-जाते फिर सुभि को जल्दी तैयार होने की हिदायत देना नहीं भूली । आकर वो किचन में सभी के लिए चाय निकालने लगी। तभी ड्राइंग रूम से सुभि की दोस्त नेहा की जोर की आवाज सुनाई दी,"आंटी सुभि को कितना समय लगेगा, देर हो रही।"
"बस तैयार हो कर आ रही बेटा, तब तक प्याज के पकौड़े और चाय पियो।", ड्राइंग रूम में आते हुए कविता ने कहा और टेबल पर ट्रे रख दी। सभी लड़कियों की खिलखिलाहट उसे काफी अच्छी लग रही थी। सभी ने साडी पहन रखी थी और सब काफी सुन्दर लग रहे थे। लगे भी क्यों ना, सत्रह की उम्र ही ऐसी है, नयी जोश नयी ऊर्जा और आज तो कॉलेज का फेयरवेल भी है। अब बड़े कॉलेज में जाने के सपने, उचाईयों को छूने का ख्वाब, इस उम्र का गुमान और किसी से तारीफ पाने का हसरते। सब मिल कर इन सभी को शबनमी बना रहा था।
कविता को अपनी बाते याद आने लगी जब वो सत्रह साल की थी, वो भी तो ऐसी ही थी। उसने भी कॉलेज के फेयरवेल के लिए पहली बार साडी पहनी थी। माँ के सभी साडी उसने आलमीरा से निकाल कर बिखेर दिए थे और उसे कोई पसंद नहीं आ रहा था। जब पापा से नहीं देखा गया तो मुस्कुराते हुए उसे स्कूटर पर बिठाकर एक बड़े से साडी की दुकान में ले गए और उसकी पसंद की एक साडी खरीद दी। माँ थोड़ी नाराज भी हुई थी लेकिन वो लाड़ली थी पापा की, लाखो में एक। एक-एक चीज का पापा ख्याल रखते थे, हलकी सी शिकन बर्दास्त नहीं थी उसके चेहरे पर। फिर तो वो नयी साडी पाकर आसमान में उड़ने लगी, मानो पंख लग गया हो। जब तैयार हो कर वो कॉलेज गयी तो सभी की निगाह उसी पर थी। शायद उसकी भी जो अक्सर उसे देखा करता था। शर्मीला सा, अपनी धुन में रहने वाला, किताबो से दोस्ती और बहुत ज्यादा किसी से मतलब नहीं रखने वाला। कविता को मालूम था की वो छिप छिप कर उसे क्लास में देखा करता है लेकिन उससे कभी कुछ कहा नहीं। लेकिन आज वो उससे बात करने की कोशिश में लगा था। वो जमाना आज की तरह नहीं था, एक तो छोटा शहर, कई लोगो की निगाहें और बात का बतंगड़ बनने का डर। तभी वो नजदीक आया और कुछ कहना चाहा, लेकिन कुछ कह नहीं पाया। फिर एक पत्र उसने कविता को दिया, जिसे उसने ले लिया और चुप-चाप पर्स में रख ली। फिर वो अपने कॉलेज के फंक्शन में व्यस्त हो गयी और अपने सहेलियों के साथ मौज मस्ती में गुम हो गयी। उसे तो अपनी नयी साडी में इठलाने में कुछ ज्यादा आनंद आ रहा था। रात को जब सोने जा रही थी तो उसे वो पत्र की याद आयी, जिसे निकालकर वो पढ़ने लगी। पढ़ने के बाद उसे लगा ही नहीं की एक शर्मीला सा दिखने वाला लड़का इतना जज्बाती हो सकता है, लगा की जैसे उसने इस पत्र पर अपना दिल निकाल कर रख दिया हो । लेकिन कविता के तो ख्वाब काफी ऊँचे थे, और उसे अभी कई मंजिलो को छूना था। काफी सोच विचार कर उसने उस पत्र के टुकड़े कर के बालकनी के बाहर फेंक दिया। कॉलेज में अगले दिन कविता उससे कन्नी काटने लगी और कभी नजर मिल जाती तो लगता उसकी सुनी आँखे उससे कुछ कह रही है। कविता को एक हफ्ता ऐसा लगा की जैसे उसकी आँखे कुछ सवाल पूछ रही है और वो जवाब देने से बच रही। बस,एक महीने बाद फाइनल एग्जाम और सभी एक दूसरे से दूर। लेकिन उसे आज भी उन आँखों का सूनापन और पूछते सवाल याद है। बहुत सालो बाद मालूम हुआ की वो किसी दूर शहर में अपने परिवार के साथ एक अच्छी नौकरी में व्यस्त है। उसकी बस एक ही इच्छा थी कि कभी आमने सामने एक बार उससे बात कर पाती। उसे अपनी पहली साडी और पहला खत आज भी एक भीना सा एहसास दे रहा था।
"मम्मी कैसी लग रही", सुभि की आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग की। अपने आँखों को पोछती जैसे ही उसने पलटा तो बस सुभि को एकटक देखती रह गयी। पहली बार उसने सुभि को साडी पहने देखा था, ऐसा लगा जैसे उसकी प्रतिमूर्ति साक्षात् सामने खडी हो।
"क्या बताऊँ बेटा, लग रहा जैसे मैं खुद को देख रही।उस खुशबू को महसूस कर रही जब मैंने पहली बार साडी पहनी थी। मेरी छोटी सी बेटी तो एकदम से बड़ी हो गयी", यह कहकर उसने सुभि को बाँहों में समेत लिया।
"नहीं माँ, मैं कैसे बड़ी हो सकती। मैं तो हमेशा तुम्हारी छोटी सी बेटी ही बनी रहना चाहूँगी।",सुभि ने कहा।
"हां बेटा, तू हमेशा मेरी छोटी सी बेटी ही रहेगी, लेकिन आज तुझे देख कर तेरी माँ बड़ी हो गयी है, हाँ बेटा तेरी माँ बड़ी हो गयी है।" कविता ने अपने नम आँखों को पोछते हुए कहा और जोर से खुद में उसे समेत लिया।
--- अभय सुमन "दर्पण"
"बस मम्मा दो मिनट" अंदर से सुभि की आवाज आयी।
"जल्दी कर बेटा, तेरी सभी सहेलियां ड्राइंग रूम में तेरा इंतजार कर रही", कविता ने बाहर से कहा और किचन में चली गयी। जाते-जाते फिर सुभि को जल्दी तैयार होने की हिदायत देना नहीं भूली । आकर वो किचन में सभी के लिए चाय निकालने लगी। तभी ड्राइंग रूम से सुभि की दोस्त नेहा की जोर की आवाज सुनाई दी,"आंटी सुभि को कितना समय लगेगा, देर हो रही।"
"बस तैयार हो कर आ रही बेटा, तब तक प्याज के पकौड़े और चाय पियो।", ड्राइंग रूम में आते हुए कविता ने कहा और टेबल पर ट्रे रख दी। सभी लड़कियों की खिलखिलाहट उसे काफी अच्छी लग रही थी। सभी ने साडी पहन रखी थी और सब काफी सुन्दर लग रहे थे। लगे भी क्यों ना, सत्रह की उम्र ही ऐसी है, नयी जोश नयी ऊर्जा और आज तो कॉलेज का फेयरवेल भी है। अब बड़े कॉलेज में जाने के सपने, उचाईयों को छूने का ख्वाब, इस उम्र का गुमान और किसी से तारीफ पाने का हसरते। सब मिल कर इन सभी को शबनमी बना रहा था।
कविता को अपनी बाते याद आने लगी जब वो सत्रह साल की थी, वो भी तो ऐसी ही थी। उसने भी कॉलेज के फेयरवेल के लिए पहली बार साडी पहनी थी। माँ के सभी साडी उसने आलमीरा से निकाल कर बिखेर दिए थे और उसे कोई पसंद नहीं आ रहा था। जब पापा से नहीं देखा गया तो मुस्कुराते हुए उसे स्कूटर पर बिठाकर एक बड़े से साडी की दुकान में ले गए और उसकी पसंद की एक साडी खरीद दी। माँ थोड़ी नाराज भी हुई थी लेकिन वो लाड़ली थी पापा की, लाखो में एक। एक-एक चीज का पापा ख्याल रखते थे, हलकी सी शिकन बर्दास्त नहीं थी उसके चेहरे पर। फिर तो वो नयी साडी पाकर आसमान में उड़ने लगी, मानो पंख लग गया हो। जब तैयार हो कर वो कॉलेज गयी तो सभी की निगाह उसी पर थी। शायद उसकी भी जो अक्सर उसे देखा करता था। शर्मीला सा, अपनी धुन में रहने वाला, किताबो से दोस्ती और बहुत ज्यादा किसी से मतलब नहीं रखने वाला। कविता को मालूम था की वो छिप छिप कर उसे क्लास में देखा करता है लेकिन उससे कभी कुछ कहा नहीं। लेकिन आज वो उससे बात करने की कोशिश में लगा था। वो जमाना आज की तरह नहीं था, एक तो छोटा शहर, कई लोगो की निगाहें और बात का बतंगड़ बनने का डर। तभी वो नजदीक आया और कुछ कहना चाहा, लेकिन कुछ कह नहीं पाया। फिर एक पत्र उसने कविता को दिया, जिसे उसने ले लिया और चुप-चाप पर्स में रख ली। फिर वो अपने कॉलेज के फंक्शन में व्यस्त हो गयी और अपने सहेलियों के साथ मौज मस्ती में गुम हो गयी। उसे तो अपनी नयी साडी में इठलाने में कुछ ज्यादा आनंद आ रहा था। रात को जब सोने जा रही थी तो उसे वो पत्र की याद आयी, जिसे निकालकर वो पढ़ने लगी। पढ़ने के बाद उसे लगा ही नहीं की एक शर्मीला सा दिखने वाला लड़का इतना जज्बाती हो सकता है, लगा की जैसे उसने इस पत्र पर अपना दिल निकाल कर रख दिया हो । लेकिन कविता के तो ख्वाब काफी ऊँचे थे, और उसे अभी कई मंजिलो को छूना था। काफी सोच विचार कर उसने उस पत्र के टुकड़े कर के बालकनी के बाहर फेंक दिया। कॉलेज में अगले दिन कविता उससे कन्नी काटने लगी और कभी नजर मिल जाती तो लगता उसकी सुनी आँखे उससे कुछ कह रही है। कविता को एक हफ्ता ऐसा लगा की जैसे उसकी आँखे कुछ सवाल पूछ रही है और वो जवाब देने से बच रही। बस,एक महीने बाद फाइनल एग्जाम और सभी एक दूसरे से दूर। लेकिन उसे आज भी उन आँखों का सूनापन और पूछते सवाल याद है। बहुत सालो बाद मालूम हुआ की वो किसी दूर शहर में अपने परिवार के साथ एक अच्छी नौकरी में व्यस्त है। उसकी बस एक ही इच्छा थी कि कभी आमने सामने एक बार उससे बात कर पाती। उसे अपनी पहली साडी और पहला खत आज भी एक भीना सा एहसास दे रहा था। "मम्मी कैसी लग रही", सुभि की आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग की। अपने आँखों को पोछती जैसे ही उसने पलटा तो बस सुभि को एकटक देखती रह गयी। पहली बार उसने सुभि को साडी पहने देखा था, ऐसा लगा जैसे उसकी प्रतिमूर्ति साक्षात् सामने खडी हो।
"क्या बताऊँ बेटा, लग रहा जैसे मैं खुद को देख रही।उस खुशबू को महसूस कर रही जब मैंने पहली बार साडी पहनी थी। मेरी छोटी सी बेटी तो एकदम से बड़ी हो गयी", यह कहकर उसने सुभि को बाँहों में समेत लिया।
"नहीं माँ, मैं कैसे बड़ी हो सकती। मैं तो हमेशा तुम्हारी छोटी सी बेटी ही बनी रहना चाहूँगी।",सुभि ने कहा।
"हां बेटा, तू हमेशा मेरी छोटी सी बेटी ही रहेगी, लेकिन आज तुझे देख कर तेरी माँ बड़ी हो गयी है, हाँ बेटा तेरी माँ बड़ी हो गयी है।" कविता ने अपने नम आँखों को पोछते हुए कहा और जोर से खुद में उसे समेत लिया।
--- अभय सुमन "दर्पण"
Superbly written....most of us can relate to it
ReplyDeleteExcellent story. Hat's off to writer.
ReplyDeleteAwsm Sir ..
ReplyDeleteवाह.. सच अभय भाई आपकी एक छोटी सी कहानी में एक माँ ने अपनी बड़ी होती बेटी में अपना बड़प्पन ढूंढ लिया l बहुत सार्थक लेखन l इसको फिल्माना ज़रूरी है l मंचन भी कीजिए इसका l बहुत बड़ा सामाजिक मैसेज है महिलाओं के त्याग, सम्मान और समर्पण में l
ReplyDeleteधन्यवाद आपका,इस हौसलाआफजाई के लिए। आप जैसे मित्र प्रेरणा देते हैं कुछ लिखने के लिए। बस जो दिल मे आता है कोशिस करता हूं उतार दूं। पुनः धन्यवाद आपका।
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