Monday, June 24, 2019

Rape - A discussion

चार दोस्त एक ऑफिस में बैठे हैं।  एक मोबाइल देख रहा था , एक कागज पर ड्राइंग बना रहा था , एक लड़की ऊँगली से खेल रही थी। चौथा सोफे पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था। 


मोबाइल ( राजेश) - अरे यार, अभी ब्रेकिंग न्यूज़ आयी है।  फिर एक चार साल की लड़की का रेप हो गया।  पता नहीं ये रेप होना कब बंद होगा।
ऊँगली (पूजा ) - अब तो ये रोज की बात हो गयी।  हर दिन कहीं न कहीं सुनने को मिलता है।  बहुत दुःख की बात है।
ड्राइंग (मनोज) - चलो यार , शाम में चौराहे पर कैंडल जलाते हैं।  अख़बार में और चैनल पर दिख जायेंगे और फेसबुक भी अपडेट कर देंगे।  पिछली बार जब दिल्ली में रेप हुआ था तो मैंने कैंडल मार्च किया था और फेसबुक पर डाला था।  हजारो में लाइक चला गया था।
राजेश - हाँ यार , गूगल में इवेंट क्रिएट कर देते हैं , कई सारे लोग इकठ्ठा हो जायेंगे। और इसे देखो ( आखबार पड़ने वाले को देखकर ) इसे तो कोई फर्क नहीं परता , अख़बार पढने में ब्यस्त है।  हा  हा  हा ।
मनोज - अरे बोलो भाई , तू भी चलेगा न कैंडल मार्च में।
अख़बार (अनूप ) -  (सर उठा कर) जरूर चलूँगा, पर उस चार साल की लड़की के लिए  नहीं, उस चार साल की बच्ची के लिए।
पूजा - क्या फर्क पड़ता है, लड़की थी या बच्ची।
अनूप (गुस्से से) - फ़र्क़ ? मुर्दे हो तुम सब।
मनोज - अरे यार , तू तो इमोशनल हो गया।  रेप ही तो हुआ है।  कोई पहाड़ तो नहीं टुटा।  हर दिन कहीं न कहीं रेप होता है।  चल यार चिल मार।
अनूप - हाँ रेप ही तो हुआ है।  सच कहा तुमने।  कहीं दो साल की बच्ची के साथ , तो कहीं चार साल, तो कहीं आठ साल।  हाँ रेप ही तो हुआ है।  और हां एक बार तो छह महीने की बच्ची का भी सुना था।  (pause )
जब तुम्हारी छोटी सी बेटी की तबियत ख़राब होती है तो तुम पागलो सा डॉक्टर के चक्कर लगाते हो।  जब उसे कहीं चोट लगती है और खून निकल आता है तो सोचते हो की काश वो चोट तुम्हे लगी होती। और कह रहे की रेप ही तो हुआ है। मुर्दे हो सभी, तुम और ये समाज।
पूजा - पर हम क्या कर सकते , शाम में तो कर रहे कैंडल मार्च।
अनूप - हाँ , क्या कर सकते।  वो बच्ची भी क्या कर सकती थी। (भावुक होकर) , सिर्फ चार साल उम्र थी उसकी और ! और उसके ऊपर एक बिभत्स्य सा आदमी चढ़ा हुआ।  कितना तड़प रही होगी, कितना कराह रही होगी।  उस चीत्कार को एक कैंडल जला कर बुझा देना चाहते हो।  मुर्दे हो तुम सब ( लगभग चिल्लाते हुए) , सोचो जब उस फूल सी बच्ची पर वो हैवान चढ़ा होगा तो उस बच्ची की पीड़ा क्या रही होगी।  जब उसके शरीर को नोचा जा रहा होगा तो उसकी रुदन कैसी रही होगी।  (कहकर रोने लगता है)  (pause) बस सिर्फ उसे याद कर रही होगी।

पूजा - हाँ, ईश्वर को याद कर रही होगी।

अनूप - ईश्वर ? हाँ अपने ईश्वर मम्मी पापा को याद कर रही होगी। कहती होगी, कहाँ हो मम्मी , कहाँ हो पापा।           मुझे बचा लो।  मैं मर रही।  मैं यह दर्द बर्दास्त नहीं कर पा रही।  कुछ तो करो पापा , कुछ तो करो मम्मी।           मुर्दा है ये समाज, ये मुर्दो की बस्ती है।  बस कैंडल मार्च करो और फेसबुक अपडेट करो।

राजेश चल कर आता है और अनूप के कंधे पर हाथ रखती है।

राजेश - कह तो तुम ठीक रहे , लेकिन हम क्या करे। जब रेप करने वाले की मालूम है की अदालत में दसियो साल लग जायेंगे ये साबित करने में की उसने रेप किया भी या नहीं। जज साहेब सबूत पर सबूत मांगेंगे।  तब तक उस बच्ची का , उस लड़की का पता नहीं कितनी बार मानसिक रेप हो चूका होगा।  रेप करने में दस मिनट और साबित करने में दसियों साल। उसने सिर्फ एक बार रेप किया लेकिन अदालत, न्यायपालिका  न जाने कितनी बार रेप करता है।  सच कहा तुमने मुर्दे हैं सब।

पूजा - सिर्फ न्यायपालिका ही क्यों , ये पुलिस तंत्र भी तो लोगो पर सिर्फ हंटर चलना जानती है।  नेताओ और पहुंचवालो की चमचागिरी , वसूली , भ्रस्टाचार से फुर्सत मिले तो आम जनता की सुध ले।  FIR तक दर्ज नहीं होती। कौन था , किस जात का था , किस धर्म का था, हुआ भी था या नहीं।  फिर किसी नेता का केस कमजोर करने का दबाब।  तब तक तो कितनी बार रेप हो चूका होता है।

मनोज - हाँ थोड़ा मीडिया वाले केस हाईलाइट न करे तो लोगो को मालूम ही न चले।

अनूप - हा हा  हा  , मीडिया , वही मीडिया न जो TRP  के चक्कर में दिन रात लगी रहती है। गाला काट COMPETITION  ने इतना अँधा बना दिया है की बस चैनल पर कुछ लोगो को बिठाकर , बहस करा कर , बार बार भुक्तभोगी का रेप करते रहते हैं।  और नेताओ का क्या है , कोई कहता है , " बच्चे हैं गलतियां हो जाती है", तो कोई और कहता है "ये तो छोटी मोटी  बात है"। और हम सब गर्व करते हैं की हम सभ्य समाज में रह रहे।  ये है  तुम्हारा - हमारा सभ्य समाज।  लेकिन मैं कैंडल नहीं जलाऊंगा , मैं मार्च नहीं करूँगा। मैं किसी से शिकायत नहीं करूँगा।  मैंने आज एक फैसला लिया है।

सभी - वो क्या

अनूप - अब मैं... , अब मैं.....

                       
                           ......... To  Be  Continue .


                                                                 (अभय सुमन दर्पण )



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