रिटायर्ड प्रोफेसर बी. एन. शर्मा,
308, मयूर विहार , शिमला
घर के बहार लगे इस नाम को देखकर सौरभ ने घंटी दबा दी।
टिंग - टाँग।
दरवाजे की घंटी तीन बार बज चुकी , लेकिन कोई आया नहीं। सौरभ वापस जाने की सोच ही रहा था की दरवाजा खुलता है। एक अधेड़ व्यक्ति दरवाजे से बाहर आकर पूछता है "कौन".
"सर मैं सौरभ सिंह " उसने कहा
"कौन सौरभ मैंने पहचाना नहीं" उस अधेड़ व्यक्ति ने कहा।
" सर आपका student , Back Bencher ." सौरभ ने मुस्कुराते हुए कहा
कुछ सोचते हुए उसने कहा "अच्छा बैक बेंचर सौरभ ? How are you my son.
"Good Sir " सौरभ ने कहा
"कालेज के सिर्फ तुम्ही दोनों मुझे याद हो, एक बैक बेंचर सौरभ और एक फ्रंट बेंचर राहुल " उसने कहा " आओ अंदर आओ" दरवाजे से हटते हुए प्रोफेसर ने कहा।
सौरभ घर के अंदर आकर सोफे पर बैठता है और पुरे घर को देखता है.
"क्या लोगे, चाय,काफी या विह्स्की " प्रोफेसर ने पूछा
"सर कुछ नहीं! बस आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी। काफी खोजने के बाद आपका पता कालेज के पीयून सर सियाराम जी से मालूम हुआ और ढूंढते ढूंढते मैं यहाँ आ गया। " अजय ने कहा
"हाँ कॉलेज से रिटायर्ड होने के बाद यहाँ आ कर बस गया " प्रोफेसर ने कहा
तभी सौरभ की निगाह एक फैमिली फोटो पर गयी।
"मैम और बच्चे कहाँ हैं " अजय ने कहा
"सुनीता को गुजरे पांच साल हो गए और एक बेटा है वो अमेरिका में सेटल हो गया" फिर धीमी हंसी से कहा " वो भी फ्रंट बेंचर था। माँ के गुजरने के बाद कभी नहीं आया , कभी कभी फ़ोन कर लेता है। हाँ तुम्हारे साथ का फ्रंट बेंचर राहुल वो भी तो अमेरिका में है, किसी से सुना था।" प्रोफेसर ने गर्व से कहा।
"और तुम क्या कर रहे, कहीं जॉब मिली या नहीं " प्रोफेसर ने पूछा
"सर, आप तो जानते हैं , मैं बैक बेंचर था, और आप कहा करते थे " my dear student, एक बैक बेंचर और फ्रंट बेंचर कभी दोस्त नहीं होते।" सौरभ ने स्टाइल से कहा
"हाँ कहता था मैं, और ये समाज की सच्चाई है , प्रोफेसर ने कहा।
"सर, जब मेरी एक गलती पर आपने मुझे कॉलेज से सस्पेंड कर दिया तो मैं बिलकुल टूट चूका था। मैं अपने जीवन का अंत करने का सोच रहा था. फिर आपकी सिखाई एक बात ने मुझे हिम्मत दी कि " जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है।" मेरे पापा की छोटी सी बिज़नेस थी, मैंने वहां बैठ कर काम सीखा और फिर धीरे धीरे काम को बढ़ाया। आज पंद्रह देशों में एक्सपोर्ट का बिज़नेस है। करोड़ो का टर्न ओवर है। उसने शांत भाव से कहा।
"और कॉलेज की पढाई " प्रोफेसर ने आश्चर्य से पूछा
" कहाँ पूरी कर पाया सर, पूरी तरह टूट चूका था मैं, लेकिन आपकी सिखाई अच्छी बातो को धरोहर बना कर रखा हूँ आज तक।" सौरभ ने कहा
"लेकिन मैंने तो काफी बुरा किया था तुम्हारे साथ " प्रोफेसर ने कहा
" नहीं सर, वो मेरे जिंदगी का एक सबक था। आज जिंदगी का कोई भी रिजेक्शन (rejection) मुझे तोड़ नहीं सकता। क्लास में बैक बेंचर था तो क्या हुआ , जिंदगी के रेस में कभी बैक बेंचर नहीं रहा।" सौरभ ने कहा
" अच्छा लगा तुम्हारा confidence देखकर। जिंदगी सभी को बराबर मौका देती है। सैकड़ो उदहारण हैं जहाँ बैक बेंचर ने इतिहास रचा है " प्रोफेसर कुछ सोचते हुए "sorry my son, मेरी एक गलती ने तुम्हे काफी दुःख दिया"
"No सर, मुझे कोई गिला नहीं, जीवन के उस मोड़ ने मुझमे काफी बदलाव लाया और मैं बैक बेंचर से फ्रंट रनर बना। " सौरभ ने कहा
"देखो my son , मैं गलत था , कोई फ्रंट बेंचर या बैक बेंचर नहीं होता , सबकी अपनी खासियत और अहमियत होती है। हर इंसान अपनी खूबी लेकर जन्म लेता है , बस उसे पहचानना होता है। " प्रोफेसर ने कहा
"ठीक है मैं चलता हूँ, हाँ ये एक छोटा सा गिफ्ट है आपके लिए, ना मत कीजियेगा" अजय ने एक पैकेट दिया
Happy Teachers Day , आज teachers day है सर। " अजय ने कहा
हा हा हा, अच्छा तो तुम्हे याद था। खुशी हुई। आजकल तो कोई टीचर को याद भी नही करता।God bless you सौरभ ," प्रोफेसर ने कहा
सौरभ घरसे बाहर आता है और मन में सोचता है "जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है".
- अभय सुमन "दर्पण"
308, मयूर विहार , शिमला
घर के बहार लगे इस नाम को देखकर सौरभ ने घंटी दबा दी।
टिंग - टाँग।
दरवाजे की घंटी तीन बार बज चुकी , लेकिन कोई आया नहीं। सौरभ वापस जाने की सोच ही रहा था की दरवाजा खुलता है। एक अधेड़ व्यक्ति दरवाजे से बाहर आकर पूछता है "कौन".
"सर मैं सौरभ सिंह " उसने कहा
"कौन सौरभ मैंने पहचाना नहीं" उस अधेड़ व्यक्ति ने कहा।
" सर आपका student , Back Bencher ." सौरभ ने मुस्कुराते हुए कहा
कुछ सोचते हुए उसने कहा "अच्छा बैक बेंचर सौरभ ? How are you my son.
"Good Sir " सौरभ ने कहा
"कालेज के सिर्फ तुम्ही दोनों मुझे याद हो, एक बैक बेंचर सौरभ और एक फ्रंट बेंचर राहुल " उसने कहा " आओ अंदर आओ" दरवाजे से हटते हुए प्रोफेसर ने कहा।
सौरभ घर के अंदर आकर सोफे पर बैठता है और पुरे घर को देखता है.
"क्या लोगे, चाय,काफी या विह्स्की " प्रोफेसर ने पूछा
"सर कुछ नहीं! बस आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी। काफी खोजने के बाद आपका पता कालेज के पीयून सर सियाराम जी से मालूम हुआ और ढूंढते ढूंढते मैं यहाँ आ गया। " अजय ने कहा
"हाँ कॉलेज से रिटायर्ड होने के बाद यहाँ आ कर बस गया " प्रोफेसर ने कहा
तभी सौरभ की निगाह एक फैमिली फोटो पर गयी।
"मैम और बच्चे कहाँ हैं " अजय ने कहा
"सुनीता को गुजरे पांच साल हो गए और एक बेटा है वो अमेरिका में सेटल हो गया" फिर धीमी हंसी से कहा " वो भी फ्रंट बेंचर था। माँ के गुजरने के बाद कभी नहीं आया , कभी कभी फ़ोन कर लेता है। हाँ तुम्हारे साथ का फ्रंट बेंचर राहुल वो भी तो अमेरिका में है, किसी से सुना था।" प्रोफेसर ने गर्व से कहा।
"और तुम क्या कर रहे, कहीं जॉब मिली या नहीं " प्रोफेसर ने पूछा
"सर, आप तो जानते हैं , मैं बैक बेंचर था, और आप कहा करते थे " my dear student, एक बैक बेंचर और फ्रंट बेंचर कभी दोस्त नहीं होते।" सौरभ ने स्टाइल से कहा
"हाँ कहता था मैं, और ये समाज की सच्चाई है , प्रोफेसर ने कहा।
"सर, जब मेरी एक गलती पर आपने मुझे कॉलेज से सस्पेंड कर दिया तो मैं बिलकुल टूट चूका था। मैं अपने जीवन का अंत करने का सोच रहा था. फिर आपकी सिखाई एक बात ने मुझे हिम्मत दी कि " जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है।" मेरे पापा की छोटी सी बिज़नेस थी, मैंने वहां बैठ कर काम सीखा और फिर धीरे धीरे काम को बढ़ाया। आज पंद्रह देशों में एक्सपोर्ट का बिज़नेस है। करोड़ो का टर्न ओवर है। उसने शांत भाव से कहा।
"और कॉलेज की पढाई " प्रोफेसर ने आश्चर्य से पूछा
" कहाँ पूरी कर पाया सर, पूरी तरह टूट चूका था मैं, लेकिन आपकी सिखाई अच्छी बातो को धरोहर बना कर रखा हूँ आज तक।" सौरभ ने कहा
"लेकिन मैंने तो काफी बुरा किया था तुम्हारे साथ " प्रोफेसर ने कहा
" नहीं सर, वो मेरे जिंदगी का एक सबक था। आज जिंदगी का कोई भी रिजेक्शन (rejection) मुझे तोड़ नहीं सकता। क्लास में बैक बेंचर था तो क्या हुआ , जिंदगी के रेस में कभी बैक बेंचर नहीं रहा।" सौरभ ने कहा
" अच्छा लगा तुम्हारा confidence देखकर। जिंदगी सभी को बराबर मौका देती है। सैकड़ो उदहारण हैं जहाँ बैक बेंचर ने इतिहास रचा है " प्रोफेसर कुछ सोचते हुए "sorry my son, मेरी एक गलती ने तुम्हे काफी दुःख दिया"
"No सर, मुझे कोई गिला नहीं, जीवन के उस मोड़ ने मुझमे काफी बदलाव लाया और मैं बैक बेंचर से फ्रंट रनर बना। " सौरभ ने कहा
"देखो my son , मैं गलत था , कोई फ्रंट बेंचर या बैक बेंचर नहीं होता , सबकी अपनी खासियत और अहमियत होती है। हर इंसान अपनी खूबी लेकर जन्म लेता है , बस उसे पहचानना होता है। " प्रोफेसर ने कहा
"ठीक है मैं चलता हूँ, हाँ ये एक छोटा सा गिफ्ट है आपके लिए, ना मत कीजियेगा" अजय ने एक पैकेट दिया
Happy Teachers Day , आज teachers day है सर। " अजय ने कहा
हा हा हा, अच्छा तो तुम्हे याद था। खुशी हुई। आजकल तो कोई टीचर को याद भी नही करता।God bless you सौरभ ," प्रोफेसर ने कहा
सौरभ घरसे बाहर आता है और मन में सोचता है "जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है".
- अभय सुमन "दर्पण"
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