Sunday, December 30, 2018

इश्क - कविता

कोई इश्क़, सिर्फ इश्क़ के लिए इश्क़ करता है।
कोई जीतने पाने की हसरत लिए इश्क़ करता है।
ख्वाहिशे के समंदर तो होती है दोनों में बराबर।
कोई फ़ना तो कोई खता-ए-वफ़ा कर जाता है।

कोई इश्क़ नदिया बन सागर में मिल जाता है।
कोई इश्क़ बर्फ् बन रिस-रिस पिघल जाता है।
हर इश्क़ में होती है गांठ और गिरह मुकद्दर् की।
कोई उलझा तो कोई ख़ामोशी से निकल जाता है।

हर दीये की फितरत है खुद को जला मिटा लेना
जब कोई तव्वसूम चेहरा दिल मे घर बना लेता है।
हर इश्क़ को नहीं मिलता बाहों का बेताज समंदर
कहां शर्तो तकरीरों पर सदा इश्क़ हुआ करता है।
                                         -- अभय सुमन "दर्पण" 









Tuesday, December 18, 2018

कविता - स्वेटर


ऊन की उलझी-सुलझी ये गोले
गिरती,संभलती,इठलाती कभी
नए जाल और रिश्तों को रचती
रंग-बिरंगी अनमोल ये स्वेटर

काँटों संग खेलती-टकराती कांटे
बनती दरो-दिवार और इमारते 
नये नये डिजाइन के संग
सुर्ख पैगाम,दिलो-जान है स्वेटर


माँ के हाथों से गुंथी,  बुनी
नाप पर नाप लेती धुनी
उन नर्म मखमली एह्सासो का
कोमल,सुखद अहसास है स्वेटर

कहाँ दिखती उन काँटों की मोहब्बत
सुलझती-बिगड़ती नयेपन की चाहत
पैसों की खनकती हंसी में दबी
अब बड़े मॉल में तैयार है स्वेटर

                ---   अभय सुमन दर्पण

Saturday, November 10, 2018

मैं औरत हूँ - कविता

मैं औरत हूँ , मैं औरत हूँ ,
मैं औरत हूँ , मैं औरत हूँ ,


मैं ताक़त हूँ, मैं हिम्मत हूँ
मैं कोमल हूँ, मैं शिखचंडी
मैं शीतल हूँ, मैं तापपूर्ण
मैं खिली हँसी, मैं आँचल हूँ
मैं मातृ छांव. मैं धरती हूँ
मैं जननी हूँ, मैं चंचला हूँ
मैं दुर्गा हूँ, मैं विद्या हूँ
मैं धनवर्षा, मैं संतोषी
मैं राधा हूँ, मैं मीरा हूँ
मैं सीता और सावित्री हूँ
मैं मेनका और ऊर्वशी हूँ
मैं माँ भी हूँ, मैं बहु भी हूँ
मैं बेटी हूँ , मैं बहना हूँ
मैं मम्मी की, मैं पापा की
मैं घर-आँगन फुलवारी की
मैं माटी हूँ, मैं गहना हूँ
मैं रजिया सुल्ताना
मैं वीरा हूँ, मैं झाँसी हूँ,
मैं वीर पद्मिनी, जौहर हूँ
मैं इंदिरा हूँ, मैं सानिया हूँ
मैं सोच हूँ एक, मैं भोर हूँ एक
मैं प्रीतम की, मैं साजन की
मैं यौवन हूँ , मैं लज्जा हूँ
मैं सौंदर्य बोध, मैं श्रृंगार में हूँ
मैं कला में हूँ, मैं रास-रंग
मैं भ्रमर गीत, मैं जीवन संगीत
मैं सुर में हूँ, मैं ताल मे हूँ
मैं माता हूँ, मैं दाता हूँ
मैं जज्वा हूँ , मैं ममता हूँ
मैं कल्पना में, मैं हकीकत हूँ
मैं फिक्र भी हूँ, मैं जिक्र भी हूँ
मैं पूजा में, मैं बाटी में
मैं यत्र तत्र ,मैं चहुँ ओर
मैं बहती नदियां और धारा हूँ
मैं गंगा हूँ, मैं यमुना हूँ
मैं बृद्धा और जवानी हूँ
मैं इश्क विश्क, मैं अहले वफ़ा
मैं रूह फ़ना, मैं कायनात
मैं आज भी हूँ, मैं कल भी थी
मैं आने वाले, पल में भी
मैं सखी रूप, मैं सहयोगी
मैं प्रेम गीत, मैं प्रीत-मीत
मैं तेज धुप, मैं छौंव भी हूँ ,
मैं पत्नी रूप ,मैं प्रियतमा
मैं सोलह श्रृंगार, मैं विध्वंस रूप
मैं सिमटी सिमटी, मैं लाज रूप
मैं दिल में हूँ, मैं धड़कन में
मैं अर्धांगिनी, मैं मृगनयनी
मैं फूलों में, मैं कलियों में
मैं भंवरो के स्पंदन में
मैं प्रेम में हूँ, मैं विरह में भी
मैं बलखाती, मैं मदमाती
मैं माया हूँ ,मैं छाया हूँ
मैं सोते बच्चो के आँखों में
मैं ख्वाब भी हूँ, मैं नींद भी हूँ
मैं थपकी में , मैं लोरी में
मैं आंसू में, मैं क्रंदन में
मैं पायल में, मैं बिंदी में
मैं दहकते जिस्म के शोलों में
मैं भीड़ में भी, मैं तन्हा भी
मैं देह भी हूँ, मैं रूह भी हूँ
मैं औरत हूँ , मैं औरत हूँ ,
मैं औरत हूँ ,मैं औरत हूँ ।
                          --- अभय सुमन "दर्पण"

Monday, October 1, 2018

"रेप" एक स्याह सच - कहानी

"मम्मी-मम्मी उसने मेरी पीठ में चिकोटी काटी", शिखा ने लगभग चीखते हुए कहा।
"किसने-कौन", आरती ने पलट कर पूछा।
"वो मम्मी, ब्लू शर्ट वाला " शिखा ने जोर से कहा
"अरे रुक " सोनिया उसकी तरफ दौड़ी।
लेकिन तबतक वो भीड़ का फायदा उठा कर भीड़ में गुम हो गया था। आज 15 अगस्त की छुट्टी की वजह से मॉल में भीड़ भी बहुत ज्यादा थी। काफी दिनों के बाद आरती अपने चौदह साल की बेटी के साथ एक बड़े से मॉल में उसके लिए ड्रेस खरीदने आयी थी। दो साल हो गए शिखा के पापा को गुजरे तब से दोनों में माँ बेटी से ज्यादा दोस्त का रिश्ता बन गया था। बेटी के चेहरे पर एक शिकन बर्दास्त नहीं थी आरती को। पति क्लास टू आफिसर थे, इसीलिए अच्छी खासी पेंशन और पैसा छोड़ गए थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। पर बड़ी होती बेटी की चिंता हमेशा सताती रहती थी, खासकर आज कल के माहौल में। अभी शिखा सिर्फ चौदह साल की थी, लेकिन लोगो की भेदती निगाह आरती अच्छे से पकड़ लेती थी। उसे हमेशा डर सताता की उसकी बेटी, कम उम्र में ही बड़ी न हो जाये। अभी जो शिखा की चीख सुनी तो उसका डर सच में बदलने लगा। अभी तो उसके शरीर में बस थोड़ा सा बदलाव हुआ है और उसकी मानसिक यंत्रणा शुरू। किसी तरह आरती ने शिखा को समझाया और मॉल मैनेजमेंट से शिकायत दर्ज की। 
घर पहुँच कर दोनों ने डिनर किया और दोनों शांत बैठे रहे। दोनों के मन में कुछ उधेरबुन चल रही थी।
तभी शिखा ने तन्द्रा भंग कर आरती से पूछा, "मम्मी उसने मुझे चिकोटी क्यों काटी।"
"कुछ नहीं बेटा, कुछ लोगो के मम्मी पापा उसे अच्छी शिक्षा नहीं देते, इसीलिए वो लोग ऐसा करते हैं " आरती ने कहा।
"नहीं मम्मा, कुछ और बात है ", शिखा ने कहा।
आरती का दिल धड़क उठा, पूछ उठी, "क्या "
" वो मेरा रेप करना चाह रहा था " , शिखा ने कहा।
"नहीं बेटा, ऐसा नहीं बोलते। हम जहाँ रहते हैं ,वहां कुछ अच्छे लोग होते हैं और कुछ बुरे", आरती ने कहा।
"नहीं मम्मा, मैंने TV के न्यूज़ में देखा था, एक बच्ची के साथ रेप हुआ था। मैं भी तो बच्ची हूँ " शिखा ने कहा। 
"हां बेटा, तू मेरी बच्ची नहीं मेरी जान है ,मेरा सब कुछ है" कहकर आरती ने शिखा को बाहों में समेत लिया। मन में एक डर और कई सवाल आरती के दिमाग में घूम रहे थे। सबसे बड़ा डर की कबतक और कहाँ तक मैं साथ रहूंगी। अभी चौदह की है ,कल सोलह फिर बीस......। कहाँ तक मैं साथ चलूंगी। हर दिन कुछ न कुछ सुनने को मिलता है। कल ही तो अख़बार में आया था की किसी बच्ची का अपहरण हो गया। कुछ साल पहले के दिल्ली के निर्भया कांड को कोई भुला नहीं अब तक। क्या हो गया है पुरुष के पुरुषत्व को। कहाँ चले गए द्रौपदी के लाज बचाने वाले श्री कृष्ण।
अगले दिन शिखा को स्कूल भेज आरती थोड़ा आराम करने लगी। आज उसकी तबियत भी कुछ अच्छी नहीं लग रही थी और कुछ बुखार सा लग रहा था। शाम में दोनों ने अपने दिन भर की दिनचर्या पर बाते की और सब कुछ सामान्य सा हो चला था। 
आज दो दिन हो गए थे आरती को बीमार पड़े। खाना बनानेवाली और कामवाली काम कर के चली जाती थी। लेकिन शिखा को स्कूल भेजना, टिफिन देना, फिर घर में भी कई काम और खुद बीमार इन सबो ने आरती को परेशान  कर रखा था। खुद से दवा ली थी लेकिन बुखार जाने का नाम नहीं ले रहा था। आज शाम में आरती ने डॉक्टर को दिखाने का सोच रखा था। दिन के एक बजे थे, तभी घंटी बजी। शायद शिखा स्कूल से आ गयी ये सोच कर आरती दरवाजे की तरफ बढ़ी, लेकिन शिखा तो तीन बजे आती है। अभी कौन आ गया, सोचते हुए आरती ने दरवाजा खोला तो एक लगभग पैतींस-छत्तिस साल का आदमी दरवाजे पर खड़ा था। 
"आप शिखा की मम्मी हैं", उसने पूछा। 
"हाँ, क्या हुआ शिखा को,कहाँ है वो ", आरती ने घबराते हुए पुछा। 
"घबराने की कोई बात नहीं, वो ठीक है। बस आपको मेरे साथ अस्पताल चलना पड़ेगा", उसने शांत भाव से कहा। 
"अस्पताल? क्या हुआ मेरी बेटी को, वो तो स्कूल गयी थी", आरती ने रोते हुए पूछा। 
"अरे आप चिंता ना करे, बस मेरे साथ चलिए" उस आदमी ने कहा। 
आरती तुरंत उस आदमी के साथ चल दी। अस्पताल पहुँच कर देखा तो शिखा एक बिस्तर पर लेती थी और उसके सर पर पट्टी बंधी थी। आरती दौर कर उससे लिपट गयी और रोने लगी। 
"ये कैसे हुआ शिखा", आरती ने रोते हुए पुछा "तुम तो स्कूल गयी थी"। 
आरती का मन घबरा रहा था, तरह तरह के बुरे ख्याल आने लगे। 
"कुछ नहीं मम्मा, बस थोड़ी सी चोट लग गयी है", शिखा बोली और धीमे से मुस्कुराई।
"लेकिन कैसे लग गयी और यहाँ " आरती ने सर छूते हुए कहा। 
"बस मम्मा, सुबह स्कूल जाने निकली तो सिर्फ तुम याद आ रहे थे और तुम्हारी तबियत", शिखा ने गहरी सांस लेते हुए कहा "मैं स्कूल के भीतर ना जाकर पास में डॉक्टर के क्लिनिक पर चली गयी ताकि तुम्हारी तबीयत उसे बता सकूँ। डॉक्टर के आने में एक घंटे की देर थी, मैं वहीँ बैठ गयी। वहां एक आदमी साफ़ सफाई कर रहा था। दस मिनट के बाद एक आदमी आया जो डॉक्टर का असिस्टेंट था। मेरे बारे में उसने सफाई वाले से पूछा फिर अंदर डॉक्टर वाले कमरे में मुझे बुलाया। मैं अंदर गयी और तुम्हारे बारे में सब बाते उसे बता दी। फिर उसने पूछा क्या मम्मी को सरदर्द भी कर रहा और ये कहकर मेरे सर को छूने लगा। मैं डर गयी और दरवाजे की तरफ जाने को हुई, तो वो मेरे हाथ पकड़ कर खींचने लगा। मैं तेजी से दरवाजे की ओर दौड़ी और टेबल से टकराकर गिर गई जिससे सर में चोट लग गयी। मैं काफी जोर से चिल्लाई, मेरी आवाज सुन कर वो सफाईवाला दरवाजा खोल कर अंदर आ गया। तभी उस सफाईवाले ने सब कुछ समझते हुए उस आदमी की पिटाई शुरू कर दी। तब तक कुछ लोग और आ गए थे और उसे पकड़ के पुलिस के हवाले कर दिए। बस मम्मा मुझे उस वक़्त सिर्फ तुम याद आ रहे थे" कहकर शिखा फूट फूट कर रोने लगी। 
"मेरे बच्चे इतना सब कुछ सह लिया तूने सिर्फ मेरी चिंता में, मुझे क्या हो जाता मामूली सा बुखार ही तो आया था। आज शाम में चली जाती डॉक्टर के पास, आगे से कभी ऐसा मत करना" आरती ने कहा। 
हाँ मम्मी, जिस सफाई वाले ने मेरी मदद की थी ये वही व्यक्ति हैं" कहकर शिखा ने उस व्यक्ति को देखा जिसने आरती को घर से बुलाया था। 
" मैं आपको कैसे धन्यवाद करूँ भैया", आरती ने उस आदमी से कहा,"आपका ये अहसान मुझ पर पूरी जिंदगी रहेगा "
"नहीं दीदी ऐसा मत कहो, मुझे मालूम है एक नारी का सम्मान और इज़्ज़त क्या होता है। अगर वो किसी की बहन-बेटी है तो क्या वो हम सब की बहन-बेटी नहीं। अगर सब ये सोचे तो क्या समाज का यह पाप नहीं मिट जायेगा", उसने कहा। 
तभी शिखा ने कहा, " माँ, मुझे रेप का थोड़ा मतलब तो मालूम हो गया है, पर हर पुरुष रेप नहीं करता। जिनके घर के दिए संस्कार अच्छे नहीं होते वही रेप करते हैं, वही बुरी नजर रखते हैं। घर से बाहर निकला हर पुरुष, किसी स्त्री को बुरी नजर से देखते वक़्त ये सोच ले कि उसकी बहन को भी कोई बुरी नजर से देख रहा होगा तो शायद उसकी सोच में बदलाव हो जाये और ये सीख सिर्फ उसके मम्मी-पापा ही दे सकते हैं"।
"तू बहुत बड़ी हो गयी है बेटा", ये कहकर आरती ने शिखा को बाँहों में भींच लिया। 

                                                                                                - अभय सुमन "दर्पण"


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Friday, September 7, 2018

अख़बार की छुट्टी - कहानी

सुबह के आठ बज चुके थे। शर्मा जी कुछ बुदबुदाते हुये अपने बॉलकनी में चहलकदमी कर रहे थे। सुबह से तीन कप चाय हो चुकी थी और तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा था। मिसेज शर्मा उनकी परेशानी देखकर तीन बार टोक चुकी थी। तभी सामने से निगम साहेब गुजरे, उन्होंने भी शर्मा जी को परेशानी से टहलते देखा और पूछ बैठे, " क्यों शर्मा साहब, सब ठीक तो है कुछ परेशान दिख रहे"। 
शर्मा जी बस उबल परे, "अब बताइये निगम साहेब, ये भी भला कोई बात हुई। कल ही कर्णाटक में सरकार गिरी है, सलमान के नए लव अफेयर शुरू हुए हैं। सब्जियां महंगी हुई है। भारत के क्रिकेट टीम की घोषणा हुई है। और... और देखिये आज की अख़बार नहीं आयी है। हर दिन तो सुबह छः बजे दे जाता था, लेकिन आज पता नहीं क्यों अब तक नहीं आया। 
निगम साहब ठठाकर हंस परे और बोले, "अच्छा तो ये कारण है आपके परेशानी का, अरे साहेब आजकल तो मोबाइल पर भी अख़बार आते हैं वहां देख लीजिये पर बी.पी. मत बढ़ाइये"। शर्मा जी झुंझला बैठे और कहा, "अरे कहाँ ? छप्पन की उम्र में मोबाइल ज्यादा समझ नहीं आता"। फिर मुस्कुराते हुए बोले, "भाई निगम साहेब, सुबह-सुबह अख़बार को छूना, उसकी सोंधी-सोंधी खुश्बू, पन्ने पलटना, साथ में चाय की चुश्की, भला इन सबों का मुकाबला क्या मोबाइल करेगा"। निगम साहब निरुत्तर हो गए और चलते बने। 
तभी मिसेज शर्मा ने आवाज दी "क्योँ जी, आज ऑफिस नहीं जाना। नहीं आयी अख़बार तो रास्ते में खरीद लेना। तुमने आज बी.पी. की गोली भी नहीं खायी। अब जल्दी तैयार हो जाओ।"
शर्मा जी ने गुस्से में कहा, "तुम्हे तो मालूम नहीं अख़बार की कीमत, दिन भर सास-बहु सीरियल में पड़ी रहती हो। जब से नेहा विदेश गयी है, अपना भी ख्याल नहीं रखते। हाँ, मुझे बी.पी. का पेशेंट जरूर बना दिए। आज तो लगता है पूरा दिन ख़राब हो गया। 
शर्मा जी जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल गए। आधे रास्ते में स्कूटर बंद हो गयी, देखा तो पेट्रोल ख़तम हो गयी थी। तब उन्हें याद आया की पेट्रोल तो दो दिन पहले रिज़र्व में आया था, उन्हें लगने लगा की शायद उनकी यादाश्त भी अब कम हो गयी है। आधे किलोमीटर पर पेट्रोल पंप थी, वहां तक इतनी तेज गर्मी में स्कूटर को ले जाना भी एक बड़े मिशन का काम था। खैर किसी तरह ऑफिस पहुंचे, बस थोड़ा लेट। 
बैठा ही था कि सिंह साहेब ने पूछा, " क्यों शर्मा जी, आज कहाँ लेट हो गए।
शर्मा जी ने कहा, "वो थोड़ी स्कूटर में दिक्कत थी, इसिलिए थोड़ा लेट हो गए। 
तभी किरण मैडम ने चुटकी ली, "स्कूटर ख़राब थी या गर्ल्स कॉलेज के चक्कर लगाते आ रहे।"
बस शर्मा जी बिफर पड़े, "बस यही एक काम बाकी रह गया है, ठीक है कल से वो भी कर लूँगा। आपकी भी कोई दोस्त वहां प्रोफेसर हो तो बता दीजियेगा मिल भी आऊंगा। 
उन्हें गुस्से में देख सब शांत हो गए, धीरे-धीरे सब अपने काम में लग गए। आज ऑफिस में भी उनका मूड सही नहीं था। 
शाम में घर पहुंचे तो पत्नी से पुछा, "अख़बार आया की नहीं ?"  
पत्नी ने कहा, "आज तो दिया नहीं"। 
बस उनका बड़बड़ाना शुरू हो गया। थोड़ी बहुत सही मूड थी, वो भी ख़राब हो गयी। पत्नी ने सोचा, आज तो रात का खाना भी ख़राब हो गया। मालूम होता तो बाहर से एक अख़बार खरीद कर ले आती। किसी तरह रात बीती। शर्मा जी सुबह जल्दी जग गए और पांच बजे से ही बालकनी में बैठ गए, बस छः बजने का इंतजार कर रहे थे। मिसेज शर्मा ने एक कप चाय बना कर दी। बड़े अनमने ढंग से शर्मा जी ने चाय पी, लेकिन उनकी निगाहे हर अख़बार वाले पर और कान साईकल की घंटी पर। सुबह के सात बज चुके थे, लेकिन अभी तक आज की अख़बार नहीं आयी। मिसेज शर्मा तीन कप चाय दे चुकी थी। तभी  7.30 बजे एक बारह साल का लड़का गेट पर घंटी बजाया। 
"कौन है ?"   शर्मा जी ने पूछा। 
"साहब, आज की अख़बार है।"  एक मासूम सी आवाज आयी। 
तभी मिसेज शर्मा भी बालकनी में आ चुकी थी। देखी एक भोला सा सांवले रंग का लड़का गेट के दरवाजे पर खड़ा है। 
" इतनी देर से क्यों आये और सूरज कहाँ है जो अख़बार देता है और कल की अख़बार कहाँ है" शर्मा जी की तेज आवाज एक सांस में गूंजी।
" साहेब, बाबूजी का परसो रात एक्सीडेंट हो गया था। उस समय से सिविल अस्पताल में भर्ती हैं, अभी भी बाबूजी  अस्पताल में ही हैं, कल इसिलिये नहीं आया। अब अख़बार नहीं बाटूंगा तो खाऊंगा क्या।" उसने भोलेपन से कहा। 
तभी मिसेज शर्मा ने कहा, "कोई बात नहीं बेटा, कुछ चाहिए तो बता देना। अपने बाबूजी का ख्याल रखना। अख़बार की चिंता मत करना।" ये कहकर उसने शर्मा जी की तरफ देखा। 
शर्मा जी अख़बार पाकर कुछ शकुन में दिखे। 
मिसेज शर्मा ने उनसे पूछा "आज बी.पी. की दवा खानी है की नहीं।" 
शर्मा जी धीरे से मुस्कुरा दिए और कहा "ऑफिस से आने के बाद सिविल अस्पताल चलेंगे सूरज को देखने।"
मिसेज शर्मा के चेहरे पर भी शकुन नजर आ रहा था क्योंकि अख़बार की छुट्टी ख़तम हो गयी थी।                                                              
                                   - अभय सुमन "दर्पण"                           

Sunday, August 12, 2018

कविता - पर्यावरण और स्वास्थ्य

हर कहीं धुआं , हर कहीं है धुंध,
कटते विशाल बृक्ष,और रेत हैं अनंत,
खांसते-कांपते युवाओं का है शोर,
ओढ़ी साखें बृक्ष की, धूल की परत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

प्रकृति का चित्र भी हो रहा विचित्र,
रुग्ण हुए गाँव, सिमट रहे हैं छांव
दुहता मनुष्य , वसुंधरा का वक्ष
चीत्कार रही धरती, सब का यही मत
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

भविष्य के नौनिहाल भी, कर रही पुकार
मत दो शौक से , मौत का ये हार
स्वस्थ हो  धरा, स्वस्थ रहे हम
करते हम प्रतिज्ञा, लेते हम शपथ
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

मनुष्य हो पशु हो ,पहाड़ या समुद्र,
निगलता समेटता, प्रदूषण का दंश,
पेट्रोल-डीजल कर रहे,इस जहाँ का अंत,
आओ रोशन हम करें,सोलर से जगत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

                      ---  अभय कुमार सुमन 

Sunday, July 22, 2018

देखो, इश्क की सुबह हो गयी - कविता

सूरज के पहले स्पंदन से,
भँवरों ने ली अंगराई है,
फूल कमल खिल आयी है,
लाज का घूंघट बिखर-सिमट गयी,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

              अलसाई उन नजरो में,
              ख्वाब सुनहरी मद्यम थी,
              मेरी आँखों के बंदन से,
              परिचय नयनों की हो गयी,
              देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

 तेरे आने में राज भी था,
 तेरे जाने में भेद भी है,
 चुपके से झलक को पाते ही,
 ख्वाब को पंख लग गई,
 देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               कदमो की आहट थी संभली,
               पायल भी थी थोड़ी खनकी,
               आतुर थी तोड़ने को हर बंधन
               प्रेम - अगन जग गयी
               देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

मिलन को व्याकुल अधरो में,
थरथराते अल्फाज़ भी थे,
खिली तबस्सुम चेहरे पर,
जब लवों की रंगत बदल गई,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               -  अभय सुमन "दर्पण"