आज अविनाश बाबू ऑफिस से जैसे ही घर के अंदर दाखिल हुए तो पत्नी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "जी आज दिन कैसा बीता"। अविनाश बाबू ने कुछ धड़कते दिल से पूछा - "क्यूँ क्या हुआ, वैसे ही जैसे हर दिन बीतता है। फिर पत्नी ने पूछा , क्या लोगे ठंडा या गरम। अविनाश बाबू कुछ सोचकर बोले , अच्छा चाय ले आओ। फिर सोचने लगे की आज उलटी गंगा कैसे बह रही। अभी तीन दिन पहले ही तो ऑफिस से आने के बाद और दो चक्कर बाज़ार का लगाने के बाद चाय पीना दूभर हो गया था। खैर, कपड़े बदलने के बाद बैठा ही था की सामने गरमा गरम पकौड़े और चाय हाज़िर। पत्नी मुस्कुराते हुए पूछी, और कुछ चाहिए। अविनाश बाबू ना में सर हिलाते हुए TV देखने लगे। फिर कुछ याद आया और कोट की जेब से इस महीने की तनख्वाह निकाल कर पत्नी को दे दिया। पत्नी ने भोलेपन से कहा तुम सब कुछ भूल सकते हो लेकिन पहली तारीख को तनख्वाह देना नहीं भूलते, कितने अच्छे हो तुम। अविनाश बाबू मंद मंद मुस्कुराते हुए कुछ बुदबुदाने लगे, काश यह वसंती मुस्कान महीने के आखिरी हफ्ते में भी बरक़रार रहे।

एक हफ्ता बीता, दूसरे हफ्ते की शुरूआत थी। अविनाश बाबू अपनी पत्नी के साथ कोई नई मूवी देख कर आ रहे थे तभी रास्ते में उनकी स्कूटर पंचर हो गयी। अविनाश बाबू ने पंचर बनबाई और प्यार से पत्नी को देखा की पंचर के पैसे दे देगी। पत्नी ने कुछ समझकर थोड़ा लहजे में पूछा कुछ चाहिए। अविनाश बाबू सकपका कर बोले, नहीं नहीं, वो पंचर के पैसे चलो कोई बात नहीं मैं दे देता हूँ वैसे मूवी कैसी लगी। पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा, अच्छी थी लेकिन थोड़ी डरावनी थी। अविनाश बाबू ने लाढ से कहा "घर चलो तुम्हारा डर दूर कर देता हूँ।
दूसरे हफ्ते के चार दिन बीत चुके थे। ऑफिस से आया तो पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा उनके मायके से दीदी-जीजा और उनके दो बच्चे कल आ रहे हैं। जीजाजी का ऑफिस टूर इसी शहर में है तो वो सोचे सभी चलते हैं। अविनाश बाबू ने कुछ सोचकर कहा, अभी पिछले महीने ही तो तुम्हारे भैया-भाभी पुरे परिवार के साथ एक हफ्ते के लिए आये थे। अभी इस महीने इंस्युरेन्स का प्रीमियम, होम लोन की तिमाही क़िस्त और दोनों बच्चों के एक्स्ट्रा क्लासेज के फीस भी जमा करनी है, दीदी को बोल दो अगले महीने आ जाये। शायद इतना कहना ज्यादा हो गया था और पत्नी का बसंती चेहरा जून के दोपहर जैसा लाल हो गया। खैर किसी तरह व्यवस्था बना कर चार-पांच दिन कटे और दूसरे हफ्ते में गर्मी की तपती दोपहरी का मजा लिया।
महीने का तीसरा हफ्ता शुरू हो चूका था और अपने पुरे ताप पर था। जब तपिश कुछ ज्यादा बढ़ रही थी तभी महीने की 18 तारीख को अविनाश बाबू के स्कूटर का ऑफिस से लौटते वक्त एक्सीडेंट हो गया। एक्सीडेंट कुछ ज्यादा बड़ा तो नहीं था पर घुटने में बड़ा सा जख्म हो गया था, डॉक्टर ने चार पांच दिन आराम को बोला था। इधर अविनाश बाबू की पत्नी का रो रो कर बुरा हाल और कह रही थी "कितनी बार बोला आराम से स्कूटर चलाया करो, घर से जल्दी निकला करो, तुम्हे कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता " आदि। खैर अविनाश बाबू पांच दिनों बाद फिर ऑफिस गए लेकिन डॉक्टर दबा वगैरह में घर का बजट थोड़ा ऊपर चला गया था। किसी तरह बजट के उतर चढ़ाव और पत्नी के आंसुओ की बारिश के बीच महीने का तीसरा हफ्ता भी बीत गया।
यूँ तो कहने को चार हफ्ते का महीना होता है पर एक सैलरी वाला ही जानता है की दूसरे हफ्ते से अगली सैलरी का कितना इंतजार रहता है। इसी कश्मकश में महीने की 28 तारीख आ गयी। कल अविनाश बाबू की शादी की सालगिरह है। रात में सोते वक्त अविनाश बाबू बस ये सोच रहे थे कल कैसे कटेगा और पत्नी को क्या गिफ्ट दूंगा अभी तनख्वाह मिलने में भी दो दिन है। गुस्सा पिताजी पर आ रहा था की शादी महीने के पहले हफ्ते में क्यों नहीं कराया,महीने के आखिरी हफ्ते में क्यों। अगली सुबह चुपचाप तैयार होकर अविनाश बाबू ऑफिस चले गए, बिना पत्नी से ज्यादा कुछ बाते किये। ऑफिस पहुंचकर राहत की सांस ली की शायद पत्नी को याद नहीं, वैसे भी चौदह साल हो गए शादी को,सोचा किसी तरह शाम भी कट जाये। शाम में ऑफिस में थोड़ी देर हो गयी और आज घर जाने की भी जल्दी में भी वो नहीं थे। महीने के आखिरी हफ्ते ने पूरी रंगत बिगड़ दी थी। रात 9 बजे घर पहुंचे तो घर में काफी मेहमानो को देखा और पत्नी सुर्ख लाल साड़ी में नई नवेली दुल्हन सी लग रही थी। आश्चर्यचकित हो पत्नी से आँखों आँखों में पूछा, कुछ जवाब नहीं मिला तो कमरे में ले जाकर पूछा ये क्या है। पत्नी मानो बरस पड़ी, "कितनी देर से हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे, तुमने सुबह भी विश नहीं किया, तुमने क्या सोचा मुझे याद नहीं, अरे पुरे साल पैसे जमा किये है आज के लिए।अविनाश बाबू हतप्रभ रह गए और बोले लेकिन मैं तो तुम्हारे लिए कोई उपहार भी नहीं लाया। तभी अबिनाश बाबू की बिटिया और बेटे कमरे में दाखिल हुए और बोले पापा उसकी चिंता आप बिलकुल ना करो, हम भाई बहन ने आप दोनों के लिए गिफ्ट ले रखा है, अब बाहर चलिए मेहमान इंतजार कर रहे हैं।अविनाश बाबू मन ही मन सोच रहे थे महीने का आखरी हफ्ता कैसे कैसे मौसम दिखा रहा है। खैर कोई बात नहीं, दो दिन बाद नई सैलरी बांहे पसार इंतजार कर रही है।
यूँ तो कहने को चार हफ्ते का महीना होता है पर एक सैलरी वाला ही जानता है की दूसरे हफ्ते से अगली सैलरी का कितना इंतजार रहता है। इसी कश्मकश में महीने की 28 तारीख आ गयी। कल अविनाश बाबू की शादी की सालगिरह है। रात में सोते वक्त अविनाश बाबू बस ये सोच रहे थे कल कैसे कटेगा और पत्नी को क्या गिफ्ट दूंगा अभी तनख्वाह मिलने में भी दो दिन है। गुस्सा पिताजी पर आ रहा था की शादी महीने के पहले हफ्ते में क्यों नहीं कराया,महीने के आखिरी हफ्ते में क्यों। अगली सुबह चुपचाप तैयार होकर अविनाश बाबू ऑफिस चले गए, बिना पत्नी से ज्यादा कुछ बाते किये। ऑफिस पहुंचकर राहत की सांस ली की शायद पत्नी को याद नहीं, वैसे भी चौदह साल हो गए शादी को,सोचा किसी तरह शाम भी कट जाये। शाम में ऑफिस में थोड़ी देर हो गयी और आज घर जाने की भी जल्दी में भी वो नहीं थे। महीने के आखिरी हफ्ते ने पूरी रंगत बिगड़ दी थी। रात 9 बजे घर पहुंचे तो घर में काफी मेहमानो को देखा और पत्नी सुर्ख लाल साड़ी में नई नवेली दुल्हन सी लग रही थी। आश्चर्यचकित हो पत्नी से आँखों आँखों में पूछा, कुछ जवाब नहीं मिला तो कमरे में ले जाकर पूछा ये क्या है। पत्नी मानो बरस पड़ी, "कितनी देर से हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे, तुमने सुबह भी विश नहीं किया, तुमने क्या सोचा मुझे याद नहीं, अरे पुरे साल पैसे जमा किये है आज के लिए।अविनाश बाबू हतप्रभ रह गए और बोले लेकिन मैं तो तुम्हारे लिए कोई उपहार भी नहीं लाया। तभी अबिनाश बाबू की बिटिया और बेटे कमरे में दाखिल हुए और बोले पापा उसकी चिंता आप बिलकुल ना करो, हम भाई बहन ने आप दोनों के लिए गिफ्ट ले रखा है, अब बाहर चलिए मेहमान इंतजार कर रहे हैं।अविनाश बाबू मन ही मन सोच रहे थे महीने का आखरी हफ्ता कैसे कैसे मौसम दिखा रहा है। खैर कोई बात नहीं, दो दिन बाद नई सैलरी बांहे पसार इंतजार कर रही है।
- अभय सुमन "दर्पण"
