काश एक ऐसा कोई
हसीन मौसम आ जाए।
मैं
फिर से बीस
का और
तुम
उन्नीस की हो
जाओ।
मेरी
हर अधूरी उम्मीद
और
मेरा
इंतजार खत्म हो
जाये।
वो
लम्हा जो काटा
तन्हाइयों में
कतरा-कतरा मोम
बन पिघल जाये
मैं
फिर से बीस
का और
तुम
उन्नीस की हो
जाओ।
सोशल
मीडिया के फ़साने
में
जींस
और टॉप के
ज़माने में
सलवार
सूट में कभी
आओ
खत
कोई पुराने लिखे
जाएँ
मैं
फिर से बीस
का और
तुम
उन्नीस की हो
जाओ।
अब
उम्र लम्बी बीत
चुकी
सांसे
भी मद्धम हो
चली
ख्वाहिशें
अब भी पूछ
रही
फिर
से मासूम बना
जाए
मैं
फिर से बीस
का और
तुम
उन्नीस की हो
जाओ।
तेरे
इंकार का वो
क्षण
मेरे
इंतजार का वो
पल
मिटा
कर उस पल
और क्षण को
कोई
नई इबारत लिखी
जाये
मैं
फिर से बीस
का और
तुम
उन्नीस की हो
जाओ।
कुछ
लम्हे मुझे दे
दो
कुछ
कदम साथ चल
दो
जरा
तुम भी ठहर
जाओ
जरा
हम भी ठहर
जायें
मैं
फिर से बीस
का और
तुम
उन्नीस की हो
जाओ
तेरा
छोड़ कर चले
जाना
एहसास
मेरे न समझ
पाना
वो
दर्द जब भी
समझ पाओ
एक
बार मिलने चले
आओ
मैं
फिर से बीस
का और
तुम
उन्नीस की हो
जाओ
- अभय सुमन
दर्पण
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