एक प्याली चाय और खोये हम तुम
बैठे खामोश कुछ अनमने उधेरबुन में
ख़याले बुन रही थी अपना भॅवर जाल
कुछ बीते कल,कुछ आने वाले पल की
उसने पूछी, चीनी कितनी लोगे तुम
कुछ तन्द्रा भंग हुई और बोला सोचकर
बंद किये चीनी, कई साल बीत गए शायद
हर सुबह बतलाता, पर याद नहीं रहता तुम्हे
कुछ बादाम खाया करो, और हाँ अखरोट भी
पहली बार चीनी पूछी थी,जब मैं आया था,
तुम्हारे घर किताबे लेने, जो दी थी तुम्हे
तुम्हारे पापा के घूरती निगाहों से बचता
तुम्हारे भाभी के शरारती आँखों से निपटता
उस दिन जो डाली थी तुमने चाय में चीनी
था माँगा एक,पर उस दिन भी थी तुम भूली
पांच चम्मच डाला था, मेरे कहने पर रुकी
एहसास याद है अब तक, और मिठास उसकी
कई साल बीत चुके, बैठें हैं, हम-तुम गुम
एक प्याली चाय, हम दोनों से पूछ रही संग
मेरा क्या कसूर,आज भी उबालते खौलाते हो
ठंड होने से पहले पी जाते, कलेजा जलाते हो
कुछ ख्याल रखो अपने दिल और जुबान का
थोड़ी देखभाल करो अपना और सेहत का
वो चाय का प्याला भी, होगा याद तुम्हे शायद
जब बारिश की बूंदो और बनते इंद्रधनुष में,
कॉलेज के बाहर पी थी चाय, छोटे से ढ़ाबे पर
तुम्हारी लटों में लिपटी, बिखरी बूंदो की चांदनी
और मेरे गाल के गड्डे में फंसी खनकती हंसी
उस प्याले में लजाती, इठलाती अदरक की चाय
तड़पती, बेताब लबों को,चूमने को मचलती चाय
सोचा न था ये चाय एक दिन इतनी करवी लगेगी
चाय में एक दाना चीनी भी जहर लगेगी
कैसे भूलूँ , की वो नौ महीने काटे किस तरह थी
मेरे बनाये चाय से तुम्हारी सुबह और शाम थी
अस्पताल के बाहर, चाय, बेचैनी और बेताबियाँ
अधूरी चाय छोड़ दौड़ा, जान बेटे की किलकारियां
समझ नहीं आता वो कौन सी चाय थी, और ये कौन
ऑफिस से आकर तुम्हारे हाथो बनी वो मीठी चाय
और मीठी लगती,जब होता शिकवों शिकायतों का साथ
शिकवे हुई कम और धीरे से, बढ़ती गयी शिकायतें
इतनी बढ़ गयी शायद, की तवरिखों में दर्ज़ होती गयी
आज चाय भी गुमसुम है अपनी मासूमियत खो कर
दर्द से परे, उबलना खौलना अपनी नियति समझकर
आज भी एक प्याली चाय है हमारे तुम्हारे दरम्यान
लबों का साथ पाने को, बस ठंड होने के इंतजार में।
---- अभय सुमन "दर्पण"
बैठे खामोश कुछ अनमने उधेरबुन में
ख़याले बुन रही थी अपना भॅवर जाल
कुछ बीते कल,कुछ आने वाले पल की
उसने पूछी, चीनी कितनी लोगे तुम
कुछ तन्द्रा भंग हुई और बोला सोचकर
बंद किये चीनी, कई साल बीत गए शायद
हर सुबह बतलाता, पर याद नहीं रहता तुम्हे
कुछ बादाम खाया करो, और हाँ अखरोट भी
पहली बार चीनी पूछी थी,जब मैं आया था,
तुम्हारे घर किताबे लेने, जो दी थी तुम्हे
तुम्हारे पापा के घूरती निगाहों से बचता
तुम्हारे भाभी के शरारती आँखों से निपटता
उस दिन जो डाली थी तुमने चाय में चीनी
था माँगा एक,पर उस दिन भी थी तुम भूली
पांच चम्मच डाला था, मेरे कहने पर रुकी
एहसास याद है अब तक, और मिठास उसकी
कई साल बीत चुके, बैठें हैं, हम-तुम गुम
एक प्याली चाय, हम दोनों से पूछ रही संग
मेरा क्या कसूर,आज भी उबालते खौलाते हो
ठंड होने से पहले पी जाते, कलेजा जलाते हो
कुछ ख्याल रखो अपने दिल और जुबान का
थोड़ी देखभाल करो अपना और सेहत का
वो चाय का प्याला भी, होगा याद तुम्हे शायद
जब बारिश की बूंदो और बनते इंद्रधनुष में,
कॉलेज के बाहर पी थी चाय, छोटे से ढ़ाबे पर
तुम्हारी लटों में लिपटी, बिखरी बूंदो की चांदनी
और मेरे गाल के गड्डे में फंसी खनकती हंसी
उस प्याले में लजाती, इठलाती अदरक की चाय
तड़पती, बेताब लबों को,चूमने को मचलती चाय
सोचा न था ये चाय एक दिन इतनी करवी लगेगी
चाय में एक दाना चीनी भी जहर लगेगी
कैसे भूलूँ , की वो नौ महीने काटे किस तरह थी
मेरे बनाये चाय से तुम्हारी सुबह और शाम थी
अस्पताल के बाहर, चाय, बेचैनी और बेताबियाँ
अधूरी चाय छोड़ दौड़ा, जान बेटे की किलकारियां
समझ नहीं आता वो कौन सी चाय थी, और ये कौन
ऑफिस से आकर तुम्हारे हाथो बनी वो मीठी चाय
और मीठी लगती,जब होता शिकवों शिकायतों का साथ
शिकवे हुई कम और धीरे से, बढ़ती गयी शिकायतें
इतनी बढ़ गयी शायद, की तवरिखों में दर्ज़ होती गयी
आज चाय भी गुमसुम है अपनी मासूमियत खो कर
दर्द से परे, उबलना खौलना अपनी नियति समझकर
आज भी एक प्याली चाय है हमारे तुम्हारे दरम्यान
लबों का साथ पाने को, बस ठंड होने के इंतजार में।
---- अभय सुमन "दर्पण"
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