Tuesday, October 10, 2017

लेख - जन्मदिन मुबारक अमिताभ बच्चन जी

अमिताभ बच्चन 11 अक्टूबर 2017 को 75 वां जन्मदिन मना रहे  हैं। उम्र का ऐसा पड़ाव जहाँ बहुतों के कदम बोझिल हो जातेे हैं, वहां ये बिंदास शख्स एक तरफ जीने की नई प्रेरणा दे रहे, वहीँ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर रहे है। जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव को झेलते हुए, हर चुनौतियों को पराजित करते हुए, हर दिन नई बुलंदियों को छूते जा रहे हैं। उम्र तो मानो बस एक नंबर बन कर रह गयी है। हर दिन एक नया इतिहास लिखना आदत सी हो गयी है।  
वह 'दीवार' ,'जंजीर' के समय का एंग्री यंग मैन हो या 'ब्लैक' के शिक्षक या 'बागवान' का पिता, हरेक दौर में हर रोल में बेजोड़। 'कौन बनेगा करोड़पति' क्या आप बिना अमिताभ के कल्पना कर सकते हैं या 'अग्निपथ' से विजय दीनानाथ चौहान को अलग किया जा सकता है और होली तो बिना 'रंग बरसे' गाने के अधूरी है। वो वाकया जब 'कुली' की  शूटिंग में उन्हें चोट लगी थी और अस्पताल में भर्ती थे। पूरा देश रो रहा था और ऊपर वाले से उनके लिए दुआ मांग रहा था। क्या आज तक कभी ऐसा हुआ है। सैकड़ो बाते हैं जो उनके बारे में लिखी कही जा चुकी है लेकिन बार-बार सुनने पढ़ने का दिल चाहता है। अकेले शख्स जो तीन पीढ़ी को प्रभाबित करते आ रहे और रोल मॉडल बने हुऐ है। 
इस उम्र और इस बुलंदी पर होकर अपने पिता के लिए इतना सम्मान हमारे आपके समाज में कितने लोग दे पाते हैं या परिवार को साथ ले कर चलने का गुण। ये उच्च संस्कार हैं जिससे हम सभी कुछ न कुछ प्रेरणा ले सकते हैं। 
मुझे उनसे एक बार रूबरू होने का सौभाग्य मिला था, जितनी उम्दा शख्शियत उतना ही व्यवहार कुशल। 
आज जब बॉक्स ऑफिस तीन दिनों का बन गया है और उससे हिट या फ्लॉप देखा जाने लगा है, क्या आज की पीढ़ी विश्वास करेगी की उनकी कई फिल्मे सौ हफ्ते थिएटर में चली है, पचास और पचीस हफ्ते वाली फिल्मे तो ढेरों हैं। जब उनका प्रवेश फिल्मों में हुआ तो वो दौर चिकने चुपरे हीरो का था। एक पतले,दुबले,लम्बे और भारी आवाज वाले लड़के को अपनाने में फिल्म इंडस्ट्री ने काफी जद्दोजहद की लेकिन जब अपनाया तो उसी का होकर रह गया।      
सन 2000 का वो दौर जब  उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा और काफी बुरे दौर से गुजरना पड़ा, उस समय भी उनके धौर्य, साहस और हिम्मत ने उस कठिन समय से पार लगाया।
दोस्त के कारण राजनीति भी की, दिल आया तो मोहब्बत भी की लेकिन जो किया बेपरवाह,बेइंतहा,बेमिसाल। 
आप हर दिन नई ऊंचाइयों को छुएँ। आपकी उम्र कभी कम ना हों। आप हम सबों को प्रेरणा देते रहें। आप अपनी क्षमता और ऊर्जा से सभी को प्रकाशवान करते रहें। 
आपको जन्मदिन की बहुत बहुत बधाइयाँ एवं ढेरो शुभकामनाएं।


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Thursday, August 31, 2017

कविता - मम्मी पापा का

जी करता मम्मी पापा का
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ
हाथ से उनके रोटी खाऊं
गोद में रख सर सो जाऊँ
जीवन के सारे उलझन को
रो रो कर उनको बतलाऊँ
कोई मुझको आँख दिखाए
पापा के पीछे छुप जाऊँ
जीवन के सारी मुश्किल को
खोल पोटरिया उन्हें बताऊँ
लम्बी लम्बी गाड़ी को भूल
साईकल की घंटी बजाऊँ
माँ की मीठी लोरी में खोकर
खोई हुई नींद-चैन ले आऊं
बारिश में भींगू और नाचू
फिर मम्मी की डाँट भी खाऊं 
जो थी जीवन की राजदार
उससे ना कोई राज छुपाऊं
जी करता मम्मी पापा का
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ

                             -   अभय सुमन "दर्पण"


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Monday, July 24, 2017

कविता - हौले हौले धीरे धीरे ठुमक ठुमक के चलत दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ

साजन मोरा पल्लू ना छोरे
ननदी मोरा पीछा ना छोरे
जान की आफत
आ  परी रे
क्या करे तू
अब रे दुल्हनियाँ

साजन करते जोरा - जोरी
देवर देखे आँखिया मींचे
हाय मुसीबत
आ गयी रे
कँहा फंसी है
तू रे दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ 

साजन बोले मीठी बतिया
ससुरा ताना धीरे से मारे
कैसी उलझन
आन परी है
समझ न आये
हाय दुल्हनियाँ

साजन मोरा फ़िल्म दिखाये
सासु मोरा साथ में जाये
शरम के मारे
कुछ ना बोले
कौन बचाये
तुझको दुल्हनियाँ

साजन मोरा कोठ्ठे पे बुलाये
भैंसुर मोरा दरबज्जे से न जाये
कैसे जाऊँ
साजन से मिलने
कोई जतन तू
लगा दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ




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Thursday, July 20, 2017

कविता - आओ एक और पारी खेलें

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

क्या हुआ जो उम्र चालीस की हो गयी
क्या हुआ जो बालो की रंगत सफ़ेद हो गयी
क्या हुआ जो जेठ की दोपहर हो गयी
क्या हुआ जो सुरमई खाव्बों पे एक परत चढ़ गयी

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

अपने सीने में दबे चिंगारी को थोड़ी हवा दे दो
अपने सोये अरमानो को जगने की वजह दे दो
बचपन के छूटे खाव्बों को थोड़ी पनाह दे दो
अपने टूटे स्वप्नों को एक मुक्कम्मल जहाँ दे दो

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

जिम्मेदारियों के खोल में खुद को छिपाया न करो
इस हसीन जिंदगी को यूँ जाया न करो
निकालो अपने लिए तन्हाइयों में कुछ समय
कर लो पुरे ख्याब जो अब तक रहे अधूरे

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें 




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Wednesday, July 19, 2017

कविता - कुछ बात हमारे साथ की

ट्रैन में एक सैनिक से बातचीत पर आधारित कविता

कुछ बात हमारे साथ की,
कुछ बात हमारे मुलाकात की 
सफर है एक मंजिल दो हैं 
राहे हैं एक पर अंजाम जुदा हैं 

मैंने पूछा कैसे हो दोस्त 
उसने कहा हमारा हाल न पूछो 

रेगिस्तान की  झुलसती ताप में 
हिमालय की बर्फीली बरसात में 
समंदर की लरजती अट्टहास में
आसमानो की मँडराती निर्वात में 
माँ भारती के अटल  विश्वास में 
सीमाओं सरहदों के आगोश में 
बस मचलना चाहता हूँ 
सिर्फ अपनी हुंकार से 
दुश्मनो को कुचलना चाहता हूँ 

मैंने पूछा परिवार कैसा है
उसने कहा

तुम्हारा परिवार तुम्हारे साथ
मेरा परिवार दिल में रहता है
जब बिटिया की याद आती है
तो जी भर के रो लेता हूँ
देख पिता का गरूर जब तब
दर्द का जज्बात अंदर समेटे हुए
और माँ की आंसू और ममत्व
भारत माँ की सेवा की सीख देते हुए
उधर पत्नी लाज का घूंघट ओढ़े हुए
जिया नहीं  सिर्फ महसूस किया  पति को
छोड़ो दोस्त कहाँ उलझे हो
हमारा सफर है एक पर मंजिल दो है

मैंने कहा फिर मिलेंगे
उसने कहा भरोसा नहीं

सीमा पर घुसपैठ बहुत है
नेताओ का जोर बहुत है
छाती पर गोली, पीठ पर बोली
हमारी मौत पर करते जोरा-जोरि
है जिगर तो आकर देख
एक गोली खाकर देख
स्वाद इसका ले कर देख
ये दर्द नहीं आसां मेरे दोस्त
जिन्दा रहे तो जरूर मिलेंगे

हमारा सफर एक मंजिल दो है
राहे हैं एक पर अंजाम जुदा है





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Tuesday, July 18, 2017

कविता - मेरी मधुशाला

ना जानू मैं मंदिर - मस्जिद
ना मैं जानू गुरुद्वारा
तुम प्रियतम हो मेरे अपने
इस जीवन की मधुशाला

भोर गुलाबी, शाम शराबी,
पीकर नैनो का तेरे हाला
मदमस्त मचलती निशा हो तुम
तू ही जीने की अभिलाषा

सुर्ख लबों की रंगत तेरी
जाम छलकती जैसी प्याला
भीनी भीनी स्नेह की खुशबू
संपूर्ण हुआ ये मतवाला

तुम न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण
मैं धरती का, एक तारा,
तुम मेरी ब्रह्माण्ड सुंदरी,
मैं तेरा गरबरझाला,

तुम प्रियतम हो मेरे अपने
इस जीवन की मधुशाला।




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कविता- बचपन के दिन

याद आते हैं वो बचपन के दिन,
भटके जब मेरा युवा मन,
क्या उमंग के दिन थे वो,
अल्हड़,चंचल,निश्छल ,निर्दोष
सतरंगी कल्पना में खोये हुए,
लड़ते झगड़ते रूठते मानते हुए,
मम्मी की वो मोहक मधुर बातें,
कर देती पापा का गुस्सा कम,
सोती रातों में नानी दादी संग,
सुनना उनसे कहानी था एक राजा-रंक,
क्या परी क्या शहजादी,
लगती सब अपनी  सारी,
हाँ बचपन का भोला मन,
देखा जिंदगी का दर्पण,
क्या भूलू क्या याद करूँ,
क्या वह दिन वापस आएगा,
मुझे बचपन में ले जायेगा,
याद आते हैं वो बचपन के दिन,
भटके जब मेरा युवा मन।



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