Thursday, July 20, 2017

कविता - आओ एक और पारी खेलें

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

क्या हुआ जो उम्र चालीस की हो गयी
क्या हुआ जो बालो की रंगत सफ़ेद हो गयी
क्या हुआ जो जेठ की दोपहर हो गयी
क्या हुआ जो सुरमई खाव्बों पे एक परत चढ़ गयी

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

अपने सीने में दबे चिंगारी को थोड़ी हवा दे दो
अपने सोये अरमानो को जगने की वजह दे दो
बचपन के छूटे खाव्बों को थोड़ी पनाह दे दो
अपने टूटे स्वप्नों को एक मुक्कम्मल जहाँ दे दो

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

जिम्मेदारियों के खोल में खुद को छिपाया न करो
इस हसीन जिंदगी को यूँ जाया न करो
निकालो अपने लिए तन्हाइयों में कुछ समय
कर लो पुरे ख्याब जो अब तक रहे अधूरे

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें 




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