Wednesday, July 19, 2017

कविता - कुछ बात हमारे साथ की

ट्रैन में एक सैनिक से बातचीत पर आधारित कविता

कुछ बात हमारे साथ की,
कुछ बात हमारे मुलाकात की 
सफर है एक मंजिल दो हैं 
राहे हैं एक पर अंजाम जुदा हैं 

मैंने पूछा कैसे हो दोस्त 
उसने कहा हमारा हाल न पूछो 

रेगिस्तान की  झुलसती ताप में 
हिमालय की बर्फीली बरसात में 
समंदर की लरजती अट्टहास में
आसमानो की मँडराती निर्वात में 
माँ भारती के अटल  विश्वास में 
सीमाओं सरहदों के आगोश में 
बस मचलना चाहता हूँ 
सिर्फ अपनी हुंकार से 
दुश्मनो को कुचलना चाहता हूँ 

मैंने पूछा परिवार कैसा है
उसने कहा

तुम्हारा परिवार तुम्हारे साथ
मेरा परिवार दिल में रहता है
जब बिटिया की याद आती है
तो जी भर के रो लेता हूँ
देख पिता का गरूर जब तब
दर्द का जज्बात अंदर समेटे हुए
और माँ की आंसू और ममत्व
भारत माँ की सेवा की सीख देते हुए
उधर पत्नी लाज का घूंघट ओढ़े हुए
जिया नहीं  सिर्फ महसूस किया  पति को
छोड़ो दोस्त कहाँ उलझे हो
हमारा सफर है एक पर मंजिल दो है

मैंने कहा फिर मिलेंगे
उसने कहा भरोसा नहीं

सीमा पर घुसपैठ बहुत है
नेताओ का जोर बहुत है
छाती पर गोली, पीठ पर बोली
हमारी मौत पर करते जोरा-जोरि
है जिगर तो आकर देख
एक गोली खाकर देख
स्वाद इसका ले कर देख
ये दर्द नहीं आसां मेरे दोस्त
जिन्दा रहे तो जरूर मिलेंगे

हमारा सफर एक मंजिल दो है
राहे हैं एक पर अंजाम जुदा है





  (अगर अच्छी लगे तो follow करें एवं कमेंट लिखें। धन्यवाद )















No comments:

Post a Comment