Wednesday, May 15, 2019

माँ - बेटा (तिरुआ ) - कहानी

तड़ाक .. तड़ाक .. दो थप्पड़ ने तिरुआ के दिमाग को हिलाकर रख दिया। अपनी जगह से दस फर्लांग दूर जाकर गिरा था वो और मुँह से एक ही आवाज निकली "माँ"।  किसी तरह वह खड़ा हुआ तो सामने मालिक की घूरती निगाहें उसे देख रही थी। वह वहां से निकलना चाहा तो मालिक ने नजदीक आकर कॉलर पकर लिया और डांटना शुरू कर दिया। 
"इस प्लेट की कीमत कौन देगा, तेरा बाप" उसने चिल्लाते हुए कहा।
"नहीं साहब, मैं ज्यादा काम करूंगा , रात को भी नहीं सोऊंगा लेकिन मुझे मारो मत।  मैं कैसे भी करके इसकी कीमत लौटा दूंगा। " तिरुआ ने कहा।
"ठीक है अगली बार अगर प्लेट तोड़ी तो खाना-पीना बंद कर दूंगा। " फिर एक थप्पड़ जड़ते हुए वो अपने गल्ले पर जाकर बैठ गया।
तिरुआ के आँखों से आंसू नहीं रुक रहे थे। वह चुपचाप जाकर टूटी प्लेटे समेटने लगा।  उसकी तो गलती भी नहीं थी। बस खाने की प्लेट टेबल पर लगाने जा रहा था, तभी किसी ग्राहक की मोबाइल नीचे गिर गयी, एकाएक वो मोबाइल लेने नीचे झुका तो उसका सर प्लेट से टकरा गया और प्लेट गिर गयी। काफी कोशिश करने के बाद भी वह उसे गिरने से नहीं रोक पाया।इसी बात पर वो अपने मालिक से थप्पड़ खा गया।
नाम तो वैसे उसका त्रिभुवन था पर अब सब उसे तिरुआ कहते थे। माँ ने यह सोच कर नाम रखा था की तीनो लोक का स्वामी बनेगा और बड़ा नाम करेगा, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। 
छः साल हुए उसे माँ से अलग हुए लेकिन शायद ही कोई रात या कोई पल ऐसा न रहा होगा जब उसे माँ की याद नहीं आयी होगी। जितना माँ का प्यार पाता था उतना पिता की मार। था भी तो माँ की आँख का तारा, एक मिनट भी खुद से अलग नहीं करती थी। लेकिन उस दिन पता नहीं कैसे मति मर गई थी। उसके पिता के दारू पीने की आदत ने घर को गरीबी के जंजाल में जकड़ रखा था। माँ लोगो के घर में काम करके घर के खर्च पुरे करती और पिता अपनी कमाई दारू में उड़ा  देता।
शाम का वक़्त था, त्रिभुवन के पिताजी किसी को अपने साथ लाये थे। देखने में पैसे वाला लग रहा था।
त्रिभुवन के पिताजी ने उसकी माँ को अंदर कमरे में ले जाकर धीरे से कहा।
"देखो कौन आये हैं , अपने त्रिभुवन की जिंदगी बनाने वाले सेठ"  पिताजी ने लाढ से कहा।
मैं समझी नहीं, कैसी जिंदगी "  माँ ने कहा।
"देखो ये सेठ अपने त्रिभुवन को अपने साथ ले जाना चाहते हैं, अपने घर पर रखेंगे। अच्छी पढाई कराएँगे, बड़ा आदमी बनाएंगे, हमारे साथ रहकर तो ये भी आवारा  बन जायेगा बिना किसी काम का"  पिताजी ने कहा
"नहीं अपने बेटे को मैं खुद से अलग नहीं करुँगी " उसने झपट कर त्रिभुवन को खुद में चिपटा लिया।
"एक बार तो मेरी बात मन लो, देखो इसकी जिंदगी बदल जाएगी। तुम नहीं चाहते ये भी बड़ा आदमी बने खूब पैसे वाला, काफी मुश्किल से सेठ जी तैयार हुए हैं।"   पिताजी ने कहा।
"नहीं मेरा बेटा मुझसे दूर नहीं जायेगा, उन्हें जो देना है यहीं दे।"  माँ ने कहा
"अरे कैसी बात कर रहे, पागल तो नहीं हो गए ! क्या यहाँ वो अच्छी पढाई कर पायेगा, तुम तो अपने बेटे के दुश्मन बनी जाती हो, मैं तो उसके भले की सोच रहा " पिताजी ने कहा
 काफी समझाने बुझाने के बाद आखिरकार माँ ने अपने कलेजे के टुकड़े को जाने की इजाजत दे दी। अभी उम्र ही क्या थी त्रिभुवन की, सिर्फ सात साल। सोची बड़े लोगो की संगत में उसके बेटे की जिंदगी संवर जाएगी।
रात थोड़ी घिर आयी थी। पिताजी, त्रिभुवन और सेठ तीनो घर से निकल चुके थे। त्रिभुवन अपने पिताजी पर विश्वास किये उसका हाथ पकड़े था।  सेठ जी की गाड़ी लगभग एक घंटे बाद रुकी।  गाड़ी से उतरकर त्रिभुवन ने अपने को एक अनजान घर के सामने पाया। उसे थोड़ा डर लगा और उसने जोर से अपने पिताजी की हाथ पकड़ ली। तीनो उस घर में दाखिल हुए , त्रिभुवन और उसके पिताजी को एक कमरे में ठहराया गया। खाना खा कर दोनों सो गए। सुबह त्रिभुवन की आँख खुली तो देखा सामने एक बदसूरत सा आदमी उसे जगा रहा था।
"मेरे पिताजी कहाँ हैं " त्रिभुवन ने कहा
"पिताजी"  उस आदमी ने जोर से हँसते हुए कहा  "अरे वो तो रात में ही निकल गया, तुम भी उठ जाओ और तैयार हो कर काम पर चलो"
त्रिभुवन का दिल धड़क गया और जोर से चिल्लाया  "माँ "
वो आदमी ठठा कर हंस दिया और बोला " चल उठ जा, तेरा बाप तेरा सौदा कर के चला गया "
उस सेठ के कई सारे ढाबे चलते थे, उसी में एक ढाबे पर वो काम पर लग गया। वहां के हर छोटे बड़े काम और धीरे धीरे वहीँ बड़ा होने लगा। हर महीने उसके पिताजी सेठ जी से कुछ रूपये ले जाता था।  उसने उसकी माँ को बता रखा था की त्रिभुवन उस रात बीच रास्ते कहीं भाग गया था।
ऐसे ही कर के कई साल बित गए और वो पंद्रह साल का हो चूका था। उसे कंही से मालूम हुआ की उसके पिताजी हर महीने आकर पैसे ले जाते हैं। उसने सेठ जी के घर पर एक नौकर से बात की और कहा की जब मेरे पिताजी आये तो सुचना दे देना। उसे अपने पिताजी से बेइंतहा नफरत थी जो उम्र बढ़ने के साथ और बढ़ती जा रही थी बस माँ का धुंधला चेहरा उसे याद था। अगली बार जब उसके पिताजी आये तो वो बहाने से एक साइकिल उठाकर वो ढाबे से निकल गया। जब वो सेठ जी के घर पहुँचा तो अपने पिताजी को उस घर से निकलते देखा। उसके पिताजी साइकिल से घर के लिए निकले थे, बस वो भी उसके पीछे छुपते छुपाते निकल गया। लगभग 11 -12  किलोमीटर जाने के बाद उसे सड़के कुछ जानी पहचानी सी लगी। वो अपने पिताजी का पीछा कर रहा था , उसके पिताजी ने एक घर के दरवाजे पर खुंडी खटखटाई। उसे याद आ गया की यही तो है मेरा घर। वो उस समय वापस लौट गया।
अगले दिन बाजार जाने के बहाने फिर वो निकला और अपने घर पहुँचा। दरवाजा अधखुला था, वो दरवाजे पर खड़ा होकर देखा की उसकी माँ रसोई में बर्तन धूल रही है।
उसने धीरे से कहा "माँ"
पता नहीं उसकी माँ को क्या सुनाई दी।
उसने वहीं  से कहा  "कौन है, क्या चाहिए, अभी जाओ बाद में आना।"
उसने अब थोड़ी तेज आवाज में कहा "माँ"
उसकी माँ ने जोर से कहा " क्या माँ- माँ लगा रखा है, मेरा कोई बेटा नहीं। तुम सबो की आदत मैं जानती हूँ , चोरी करने के इरादे से आते हो और माँ कहते हो "
अब त्रिभुवन से रहा नहीं गया और थोड़ी जोर से कहा
"माँ मैं तेरा त्रिभुवन, तेरा बेटा "
माँ के तो जैसे खून जम गए, अपलक उसे देखने लगी और दौड़ती आयी, कुछ छण देखने के बाद जैसे ही उसे लग गया की वो त्रिभुवन ही है, उसे जोर से अपनी बाँहों में समेट ली। दोनों के आंसू एक दूसरे को भिगो रहे थे और पल जैसे थम सा गया था।
                                                                                                   -  अभय सुमन "दर्पण"

Monday, May 6, 2019

अधजला इश्क - कविता

 "अधजला इश्क"

क्या करूं ले इश्क तेरा 
इस उम्र में ऐ प्रियवर
इश्क अब किस्से कहानी
जिंदगी के इस मोड़ पर

अब न चाहत पहले जैसी
अब न हिम्मत सोचने की
ख्वाहिशें कब खो चुकी हैं
सपने भी सब सो चुकी हैं
बरस चुकी हैं बादलें भी
धूल चूका सावन सोलंहवा

पूछा, जाना और माना था तब
साथ चलने का इरादा था तब
पर तुम्हारे सोच में न हम
मेरे इश्क में जायका था कम
तब तुम्हारे सुर सुरीले
मुझमे थे हर रंग फीके

अब कहाँ वो गीत प्यारे
टूटे हैं अल्फ़ाज़ सारे

जिंदगी के जद्दोजहद में 
दब चुके जज्बात हमदम
ढल चुकी तरुणाई सारी
मिट चुकी तन्हाई सारी

साथ ना अब चल सकेंगे
गीत न हम गा सकेंगे
मिल न पाऊँ ऐसा शायद
तुझको तेरा मीत मुबारक
दर्दे गम अब दोस्त मेरे
अधजला इश्क मेरे हिस्से


क्या करूंगा इश्क लेकर
इस उम्र में ऐ प्रियवर
इश्क अब किस्से कहानी
जिंदगी के इस मोड़ पर

                   - अभय सुमन "दर्पण"











Wednesday, March 27, 2019

ग़ज़ल - निकल रहा तुम्हारे शहर से

निकल रहा तुम्हारे शहर से, ओ बेखबर,
छोड़कर कुछ यादें और दबी हसरते,
कुछ तन्हाईयाँ और थोड़ी सी रुसवाइयाँ ,
तम्मनाओं के शहर में ढूंढता फिरता अकेला,
हर खामोश लवो में तलाशता खुद का वजूद,
सितमगर भी न मिला सितम करने को ,
हर मौंजू परेशानियां भी कम करने को ,
संभले ना तपिश दरख़्त की छावं से भी
न दरिया के साहिल पनाह से भी
जुस्तजू बस इतनी जरा सी तो थी
एक खलिश जो छिपी फंसी थी कहीं

दिल तलक ताख पर रख छोरा, 
कोई रहबर न दिखा संभाल कर रखने को ,

निकल रहा तुम्हारे शहर से ...




जुस्तजूखोज, तलाश।


ख़लिशचुभन, कसक।

Monday, March 4, 2019

कहानी - माँ बड़ी हो गयी

ठक ! ठक ! ठक !
"बस मम्मा दो मिनट" अंदर से सुभि की आवाज आयी।
"जल्दी कर बेटा, तेरी सभी सहेलियां ड्राइंग रूम में तेरा इंतजार कर रही", कविता ने बाहर से कहा और किचन में चली गयी। जाते-जाते फिर सुभि को जल्दी तैयार होने की हिदायत देना नहीं भूली । आकर वो किचन में सभी के लिए चाय निकालने लगी। तभी ड्राइंग रूम से सुभि की दोस्त नेहा की जोर की आवाज सुनाई दी,"आंटी सुभि को कितना समय लगेगा, देर हो रही।"
"बस तैयार हो कर आ रही बेटा, तब तक प्याज के पकौड़े और चाय पियो।", ड्राइंग रूम में आते हुए कविता ने कहा और टेबल पर ट्रे रख दी। सभी लड़कियों की खिलखिलाहट उसे काफी अच्छी लग रही थी। सभी ने साडी पहन रखी थी और सब काफी सुन्दर लग रहे थे। लगे भी क्यों ना, सत्रह की उम्र ही ऐसी है, नयी जोश नयी ऊर्जा और आज तो कॉलेज का फेयरवेल भी है। अब बड़े कॉलेज में जाने के सपने, उचाईयों को छूने का ख्वाब, इस उम्र का गुमान और किसी से तारीफ पाने का हसरते। सब मिल कर इन सभी को शबनमी बना रहा था।
कविता को अपनी बाते याद आने लगी जब वो सत्रह साल की थी, वो भी तो ऐसी ही थी। उसने भी कॉलेज के फेयरवेल के लिए पहली बार साडी पहनी थी। माँ के सभी साडी उसने आलमीरा से निकाल कर बिखेर दिए थे और उसे कोई पसंद नहीं आ रहा था। जब पापा से नहीं देखा गया तो मुस्कुराते हुए उसे स्कूटर पर बिठाकर एक बड़े से साडी की दुकान में ले गए और उसकी पसंद की एक साडी खरीद दी। माँ थोड़ी नाराज भी हुई थी लेकिन वो लाड़ली थी पापा की, लाखो में एक।  एक-एक चीज का पापा ख्याल रखते थे, हलकी सी शिकन बर्दास्त नहीं थी उसके चेहरे पर। फिर तो वो नयी साडी पाकर आसमान में उड़ने लगी, मानो पंख लग गया हो। जब तैयार हो कर वो कॉलेज गयी तो सभी की निगाह उसी पर थी। शायद उसकी भी जो अक्सर उसे देखा करता था। शर्मीला सा, अपनी धुन में रहने वाला, किताबो से दोस्ती और बहुत ज्यादा किसी से मतलब नहीं रखने वाला। कविता को मालूम था की वो छिप छिप कर उसे क्लास में देखा करता है लेकिन उससे कभी कुछ कहा नहीं। लेकिन आज वो उससे बात करने की कोशिश में लगा था। वो जमाना आज की तरह नहीं था, एक तो छोटा शहर, कई लोगो की निगाहें और बात का बतंगड़ बनने का डर। तभी वो नजदीक आया और कुछ कहना चाहा, लेकिन कुछ कह नहीं पाया। फिर एक पत्र उसने कविता को दिया, जिसे उसने ले लिया और चुप-चाप पर्स में रख ली। फिर वो अपने कॉलेज के फंक्शन में व्यस्त हो गयी और अपने सहेलियों के साथ मौज मस्ती में गुम हो गयी। उसे तो अपनी नयी साडी में इठलाने में कुछ ज्यादा आनंद आ रहा था। रात को जब सोने जा रही थी तो उसे वो पत्र की याद आयी, जिसे निकालकर वो पढ़ने लगी। पढ़ने के बाद उसे लगा ही नहीं की एक शर्मीला सा दिखने वाला लड़का इतना जज्बाती हो सकता है, लगा की जैसे उसने इस पत्र पर अपना दिल निकाल कर रख दिया हो । लेकिन कविता के तो ख्वाब काफी ऊँचे थे, और उसे अभी कई मंजिलो को छूना था। काफी सोच विचार कर उसने उस पत्र के टुकड़े कर के बालकनी के बाहर फेंक दिया। कॉलेज में अगले दिन कविता उससे कन्नी काटने लगी और कभी नजर मिल जाती तो लगता उसकी सुनी आँखे उससे कुछ कह रही है। कविता को एक हफ्ता ऐसा लगा की जैसे उसकी आँखे कुछ सवाल पूछ रही है और वो जवाब देने से बच रही। बस,एक महीने बाद फाइनल एग्जाम और सभी एक दूसरे से दूर। लेकिन उसे आज भी उन आँखों का सूनापन और पूछते सवाल याद है। बहुत सालो बाद मालूम हुआ की वो किसी दूर शहर में अपने परिवार के साथ एक अच्छी नौकरी में व्यस्त है। उसकी बस एक ही इच्छा थी कि कभी  आमने सामने एक बार उससे बात कर पाती। उसे अपनी पहली साडी और पहला खत आज भी एक भीना सा एहसास दे रहा था।
"मम्मी कैसी लग रही", सुभि की आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग की। अपने आँखों को पोछती जैसे ही उसने पलटा तो बस सुभि को एकटक देखती रह गयी। पहली बार उसने सुभि को साडी पहने देखा था, ऐसा लगा जैसे उसकी प्रतिमूर्ति साक्षात् सामने खडी हो।
"क्या बताऊँ बेटा, लग रहा जैसे मैं खुद को देख रही।उस खुशबू को महसूस कर रही जब मैंने पहली बार साडी पहनी थी। मेरी छोटी सी बेटी तो एकदम से बड़ी हो गयी", यह कहकर उसने सुभि को बाँहों में समेत लिया।
"नहीं माँ, मैं कैसे बड़ी हो सकती। मैं तो हमेशा तुम्हारी छोटी सी बेटी ही बनी रहना चाहूँगी।",सुभि ने कहा।
"हां बेटा, तू हमेशा मेरी छोटी सी बेटी ही रहेगी, लेकिन आज तुझे देख कर तेरी माँ बड़ी हो गयी है, हाँ बेटा तेरी माँ बड़ी हो गयी है।" कविता ने अपने नम आँखों को पोछते हुए कहा और जोर से खुद में उसे समेत लिया।

                           --- अभय सुमन "दर्पण"

हास्य-व्यंग - 26 -27 फ़रबरी 2019, भारत पाकिस्तान में जंग

26 -27  फ़रबरी 2019, भारत पाकिस्तान में हुई जंग पर आधारित   

बहुत हुई जंग भारत पाकिस्तान में।  बहुत सारे लोग हर मुहब्बत में भी जंग ढूंढ़ते रहते हैं। अभी अभी भारत पाकिस्तान में एक मुहब्बत भरी कहानी हुई लेकिन उसमे भी लोग जंग देख रहे। अरे वही, एक सोलह साल की मोहतरमा (F16 ) अपने इक्कीस साल के महबूब (M 21) से मिलने भारत आ गयी वो भी छिपते छिपाते, जान की बाज़ी लगा कर। महबूब ने भी जान की बाज़ी लगा दी उनसे मिलने के लिए। लेकिन कौन समझे, किसे समझाया जाय, सभी को इसमें जंग दिखती है। एक बुरकानशी, पाकिस्तान से हवा में उड़कर अपने भारतीय महबूब से मिलने आती है। एक सोलह साल (F16 ) की आधुनिक ज़माने की कमसिन, नए नए नाजो नखरे से लकदक, हर अदाओ में माहिर, नए नए रंगो रोगन से सजी, इठलाती बलखाती अपने महबूब से मिलने की तड़प में भारत की सीमा में चली आती है  
दूसरी तरफ हमारा इक्कीस साल (M 21) का गबरू जवान जो गठीला, शर्मीला, दिल से हारा, सीधा साधा बैठा अपने महबूबा को याद कर रहा था, प्यार के तराने गा रहा था। देखता है की उसकी महबूबा आसमान में उड़ते हुए उससे मिलने को चली आ रही है। अपने गबरू से यह देखा नहीं गया और वो भी उससे मिलने आसमान में उड़ गया। आज दोनों के बीच सरहद की दिवार ख़त्म हो गयी थी, भला आसमान में कौन सरहद, उड़ते पंछियों का कौन सरहद। सरहद तो जमीन पर बनती है, आसमान में उड़ते मुहब्बत के परवाने कहाँ ये मानने वाले। बस अपना इक्कीस साल का जवान, सोलह साल की नटखट हसीना से आसमान में लुका छिपी खेलने लगा। कभी सरहद के इस तरफ तो कभी सरहद के उस तरफ। जब नाजनीना ने बहुत बेचैन कर दिया तो अपने देसी जवान ने दिल में जलती फुलझरी उनकी तरफ उछाल दी। वो बेचारी इस जवान की शरारत समझ ना सकी और अपने चुन्नट में आग लगा बैठी और अपने वतन लौट गयी। अपना जवान कुछ समझ पाता, कुछ समझा पाता तब तक देर हो चुकी थी। इससे पहले की वो वापस लौटे, खुद को महबूबा की धरती पर पाया वो भी सैकड़ो लोगो से घिरा। अब बात दो देश की हो चुकी थी , मुहब्बत पीछे छूट चूकी थी, राजनीती शुरू हो चुकी थी। इन सब के बीच सोलह और इक्कीस की मुहब्बत की कहानी मीडिया में छाने लगी। पाकिस्तान ने कहना शुरू किया कि हमारी नए ज़माने की आधुनिक बाला को भारत के पुराने ज़माने के देसी छोड़े ने छेरने की जुर्रत कैसे की, बस अब मामला सियासी बन चूका था। उधर सोलह अपने चुन्नट में लगी आग से बुरी तरह जल चुकी थी और अस्पताल में आखिरी सांसे गिन रही थी, उसने अपनी भाभी को पैगाम भिजवाया  कि मेरे महबूब को वतन वापसी करवा दो और कसम दिलवाई की उसे छोरने तुम ही सरहद की सीमा तक जाना। भाभी लग गयी अपने ननद के मुहब्बत को बचाने में, पूरा जोर लगा दी दोनों प्रधान मंत्री को मिलाने में। अंत में मुहब्बत जीती और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को संसद में घोषणा करनी पड़ी की इस गबरू जवान को तुरंत छोरा जाय। तब तक सालियों को सबकुछ पता लग चूका था, बस उसने इस गबरू के जूते चुरा लिए। अपना छोरा भी सब कुछ समझ कर मंद मंद मुस्काने लगा और भाभी को देखने लगा। भाभी ने धीरे से समझाया कि जहाँ इतनी देर , वहीं कुछ घंटे और सही फिर नए जुते की व्यबस्था की और सरहद की सीमा तक छोरने खुद आयी।
जब अपना जवान वापस आया तो मालूम हुआ की जिस फुलझरी से महबूबा के चुन्नट में आग लगी थी, उससे वह पूरी तरह जल चुकी थी और सुपुर्दे ख़ाक हो चुकी है। गबरू के आँखों में आंसू आ गए और मन ही मन सोचा की मैं दिल में महबूबा की यादो को लिए, अपने महबूबा की जमीं को आसमान से देखने फिर जरूर जाऊंगा।
अब इतनी मुहब्बत भरी दास्ताँ को जंग का नाम कैसे दे दिया जाये।








Sunday, December 30, 2018

इश्क - कविता

कोई इश्क़, सिर्फ इश्क़ के लिए इश्क़ करता है।
कोई जीतने पाने की हसरत लिए इश्क़ करता है।
ख्वाहिशे के समंदर तो होती है दोनों में बराबर।
कोई फ़ना तो कोई खता-ए-वफ़ा कर जाता है।

कोई इश्क़ नदिया बन सागर में मिल जाता है।
कोई इश्क़ बर्फ् बन रिस-रिस पिघल जाता है।
हर इश्क़ में होती है गांठ और गिरह मुकद्दर् की।
कोई उलझा तो कोई ख़ामोशी से निकल जाता है।

हर दीये की फितरत है खुद को जला मिटा लेना
जब कोई तव्वसूम चेहरा दिल मे घर बना लेता है।
हर इश्क़ को नहीं मिलता बाहों का बेताज समंदर
कहां शर्तो तकरीरों पर सदा इश्क़ हुआ करता है।
                                         -- अभय सुमन "दर्पण" 









Tuesday, December 18, 2018

कविता - स्वेटर


ऊन की उलझी-सुलझी ये गोले
गिरती,संभलती,इठलाती कभी
नए जाल और रिश्तों को रचती
रंग-बिरंगी अनमोल ये स्वेटर

काँटों संग खेलती-टकराती कांटे
बनती दरो-दिवार और इमारते 
नये नये डिजाइन के संग
सुर्ख पैगाम,दिलो-जान है स्वेटर


माँ के हाथों से गुंथी,  बुनी
नाप पर नाप लेती धुनी
उन नर्म मखमली एह्सासो का
कोमल,सुखद अहसास है स्वेटर

कहाँ दिखती उन काँटों की मोहब्बत
सुलझती-बिगड़ती नयेपन की चाहत
पैसों की खनकती हंसी में दबी
अब बड़े मॉल में तैयार है स्वेटर

                ---   अभय सुमन दर्पण