Monday, July 24, 2017

कविता - हौले हौले धीरे धीरे ठुमक ठुमक के चलत दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ

साजन मोरा पल्लू ना छोरे
ननदी मोरा पीछा ना छोरे
जान की आफत
आ  परी रे
क्या करे तू
अब रे दुल्हनियाँ

साजन करते जोरा - जोरी
देवर देखे आँखिया मींचे
हाय मुसीबत
आ गयी रे
कँहा फंसी है
तू रे दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ 

साजन बोले मीठी बतिया
ससुरा ताना धीरे से मारे
कैसी उलझन
आन परी है
समझ न आये
हाय दुल्हनियाँ

साजन मोरा फ़िल्म दिखाये
सासु मोरा साथ में जाये
शरम के मारे
कुछ ना बोले
कौन बचाये
तुझको दुल्हनियाँ

साजन मोरा कोठ्ठे पे बुलाये
भैंसुर मोरा दरबज्जे से न जाये
कैसे जाऊँ
साजन से मिलने
कोई जतन तू
लगा दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ




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Thursday, July 20, 2017

कविता - आओ एक और पारी खेलें

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

क्या हुआ जो उम्र चालीस की हो गयी
क्या हुआ जो बालो की रंगत सफ़ेद हो गयी
क्या हुआ जो जेठ की दोपहर हो गयी
क्या हुआ जो सुरमई खाव्बों पे एक परत चढ़ गयी

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

अपने सीने में दबे चिंगारी को थोड़ी हवा दे दो
अपने सोये अरमानो को जगने की वजह दे दो
बचपन के छूटे खाव्बों को थोड़ी पनाह दे दो
अपने टूटे स्वप्नों को एक मुक्कम्मल जहाँ दे दो

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

जिम्मेदारियों के खोल में खुद को छिपाया न करो
इस हसीन जिंदगी को यूँ जाया न करो
निकालो अपने लिए तन्हाइयों में कुछ समय
कर लो पुरे ख्याब जो अब तक रहे अधूरे

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें 




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Wednesday, July 19, 2017

कविता - कुछ बात हमारे साथ की

ट्रैन में एक सैनिक से बातचीत पर आधारित कविता

कुछ बात हमारे साथ की,
कुछ बात हमारे मुलाकात की 
सफर है एक मंजिल दो हैं 
राहे हैं एक पर अंजाम जुदा हैं 

मैंने पूछा कैसे हो दोस्त 
उसने कहा हमारा हाल न पूछो 

रेगिस्तान की  झुलसती ताप में 
हिमालय की बर्फीली बरसात में 
समंदर की लरजती अट्टहास में
आसमानो की मँडराती निर्वात में 
माँ भारती के अटल  विश्वास में 
सीमाओं सरहदों के आगोश में 
बस मचलना चाहता हूँ 
सिर्फ अपनी हुंकार से 
दुश्मनो को कुचलना चाहता हूँ 

मैंने पूछा परिवार कैसा है
उसने कहा

तुम्हारा परिवार तुम्हारे साथ
मेरा परिवार दिल में रहता है
जब बिटिया की याद आती है
तो जी भर के रो लेता हूँ
देख पिता का गरूर जब तब
दर्द का जज्बात अंदर समेटे हुए
और माँ की आंसू और ममत्व
भारत माँ की सेवा की सीख देते हुए
उधर पत्नी लाज का घूंघट ओढ़े हुए
जिया नहीं  सिर्फ महसूस किया  पति को
छोड़ो दोस्त कहाँ उलझे हो
हमारा सफर है एक पर मंजिल दो है

मैंने कहा फिर मिलेंगे
उसने कहा भरोसा नहीं

सीमा पर घुसपैठ बहुत है
नेताओ का जोर बहुत है
छाती पर गोली, पीठ पर बोली
हमारी मौत पर करते जोरा-जोरि
है जिगर तो आकर देख
एक गोली खाकर देख
स्वाद इसका ले कर देख
ये दर्द नहीं आसां मेरे दोस्त
जिन्दा रहे तो जरूर मिलेंगे

हमारा सफर एक मंजिल दो है
राहे हैं एक पर अंजाम जुदा है





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Tuesday, July 18, 2017

कविता - मेरी मधुशाला

ना जानू मैं मंदिर - मस्जिद
ना मैं जानू गुरुद्वारा
तुम प्रियतम हो मेरे अपने
इस जीवन की मधुशाला

भोर गुलाबी, शाम शराबी,
पीकर नैनो का तेरे हाला
मदमस्त मचलती निशा हो तुम
तू ही जीने की अभिलाषा

सुर्ख लबों की रंगत तेरी
जाम छलकती जैसी प्याला
भीनी भीनी स्नेह की खुशबू
संपूर्ण हुआ ये मतवाला

तुम न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण
मैं धरती का, एक तारा,
तुम मेरी ब्रह्माण्ड सुंदरी,
मैं तेरा गरबरझाला,

तुम प्रियतम हो मेरे अपने
इस जीवन की मधुशाला।




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कविता- बचपन के दिन

याद आते हैं वो बचपन के दिन,
भटके जब मेरा युवा मन,
क्या उमंग के दिन थे वो,
अल्हड़,चंचल,निश्छल ,निर्दोष
सतरंगी कल्पना में खोये हुए,
लड़ते झगड़ते रूठते मानते हुए,
मम्मी की वो मोहक मधुर बातें,
कर देती पापा का गुस्सा कम,
सोती रातों में नानी दादी संग,
सुनना उनसे कहानी था एक राजा-रंक,
क्या परी क्या शहजादी,
लगती सब अपनी  सारी,
हाँ बचपन का भोला मन,
देखा जिंदगी का दर्पण,
क्या भूलू क्या याद करूँ,
क्या वह दिन वापस आएगा,
मुझे बचपन में ले जायेगा,
याद आते हैं वो बचपन के दिन,
भटके जब मेरा युवा मन।



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कविता - लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ

लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ, 
ज़न्नत की आस में बना जहन्नुम, मैं पाकिस्तान हूँ।

नफरत के बीज अब पुरे पक चुके हैं,
फसलें कट रही हैं, नई फ़सल का  इंतजार है,
जिन्ना से ज्यादा, गाँधी, जरूरत जिस देश को
वहां दाऊद और हाफिज हमारे ठेकेदार हैं.
 
लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ
ज़न्नत की आस में बना जहन्नुम मैं पाकिस्तान हूँ।

मलाला पढ़ नहीं सकती अभिस्प्त हैं यहाँ,
पर इंसानियत के गुनहगार, सरे राह बाजार हैं,
खून और बारूद के फल सरेआम मिलती हैं,
अबला और मासूमों की मैयत यहाँ जिहाद हैं।

लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ
ज़न्नत की आस में बना जहन्नुम मैं पाकिस्तान हूँ।

तन से उतरते कपड़े, हवाईअड्डे, हर देश, सरे-आम 
पासपोर्ट भी हमारे, शर्मिंदगी का गजब एहसास है
पनपती है आतंकवाद की हर नस्ल, गली-मोहल्ले
बच्चों की मासूमियत का कत्ल, करती सरकार है।

लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ
ज़न्नत की आस में बना जहन्नुम मैं पाकिस्तान हूँ।










 





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Saturday, July 1, 2017

नमस्कार,
 आप सबों का अभिनंदन।