Wednesday, January 31, 2018

हास्य-व्यंग - वेतन का पहला हफ्ता


आज अविनाश बाबू ऑफिस से जैसे ही घर के अंदर दाखिल हुए तो पत्नी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "जी आज दिन कैसा बीता"।  अविनाश बाबू ने कुछ धड़कते दिल से पूछा - "क्यूँ  क्या हुआ, वैसे ही जैसे हर दिन बीतता है। फिर पत्नी ने पूछा , क्या लोगे ठंडा या गरम।  अविनाश बाबू कुछ सोचकर बोले , अच्छा चाय ले आओ।  फिर सोचने लगे की आज उलटी गंगा कैसे बह रही। अभी तीन दिन पहले ही तो ऑफिस से आने के बाद और दो चक्कर बाज़ार का लगाने के बाद चाय पीना दूभर हो गया था। खैर, कपड़े बदलने के बाद बैठा ही था की सामने गरमा गरम पकौड़े और चाय हाज़िर। पत्नी मुस्कुराते हुए पूछी, और कुछ चाहिए। अविनाश बाबू ना में सर हिलाते हुए TV देखने लगे। फिर कुछ याद आया और कोट की जेब से इस महीने की तनख्वाह निकाल कर पत्नी को दे दिया। पत्नी ने भोलेपन से कहा तुम सब कुछ भूल सकते हो लेकिन पहली तारीख को तनख्वाह देना नहीं भूलते, कितने अच्छे हो तुम। अविनाश बाबू मंद मंद मुस्कुराते हुए कुछ बुदबुदाने लगे, काश यह वसंती मुस्कान महीने के आखिरी हफ्ते में भी बरक़रार रहे।

एक हफ्ता बीता, दूसरे हफ्ते की शुरूआत थी। अविनाश बाबू अपनी पत्नी के साथ कोई नई मूवी देख कर आ रहे थे तभी रास्ते में उनकी स्कूटर पंचर हो गयी। अविनाश बाबू ने पंचर बनबाई और प्यार से पत्नी को देखा की पंचर के पैसे दे देगी। पत्नी ने कुछ समझकर थोड़ा लहजे में पूछा कुछ चाहिए। अविनाश बाबू सकपका कर बोले, नहीं नहीं, वो पंचर के पैसे चलो कोई बात नहीं मैं दे देता हूँ वैसे मूवी कैसी लगी। पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा, अच्छी थी लेकिन थोड़ी डरावनी थी। अविनाश बाबू ने लाढ से कहा "घर चलो तुम्हारा डर दूर कर देता हूँ। 
दूसरे हफ्ते के चार दिन बीत चुके थे। ऑफिस से आया तो पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा उनके मायके से दीदी-जीजा और उनके दो बच्चे कल आ रहे हैं। जीजाजी का ऑफिस टूर इसी शहर में है तो वो सोचे सभी चलते हैं। अविनाश बाबू ने कुछ सोचकर कहा, अभी पिछले महीने ही तो तुम्हारे भैया-भाभी पुरे परिवार के साथ एक हफ्ते के लिए आये थे। अभी इस महीने इंस्युरेन्स का प्रीमियम, होम लोन की तिमाही क़िस्त और दोनों बच्चों के एक्स्ट्रा क्लासेज के फीस भी जमा करनी है, दीदी को बोल दो अगले महीने आ जाये। शायद इतना कहना ज्यादा हो गया था और पत्नी का बसंती चेहरा जून के दोपहर जैसा लाल हो गया। खैर किसी तरह व्यवस्था बना कर चार-पांच दिन कटे और दूसरे हफ्ते में गर्मी की तपती दोपहरी का मजा लिया।
महीने का तीसरा हफ्ता शुरू हो चूका था और अपने पुरे ताप पर था। जब तपिश कुछ ज्यादा बढ़ रही थी तभी महीने की 18 तारीख को अविनाश बाबू के स्कूटर का ऑफिस से लौटते वक्त एक्सीडेंट हो गया। एक्सीडेंट कुछ ज्यादा बड़ा तो नहीं था पर घुटने में बड़ा सा जख्म हो गया था, डॉक्टर ने चार पांच दिन आराम को बोला था। इधर अविनाश बाबू की पत्नी का रो रो कर बुरा हाल और कह रही थी "कितनी बार बोला आराम से स्कूटर चलाया करो, घर से जल्दी निकला करो, तुम्हे कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता " आदि। खैर अविनाश बाबू पांच दिनों बाद फिर ऑफिस गए लेकिन डॉक्टर दबा वगैरह में घर का बजट थोड़ा ऊपर चला गया था। किसी तरह बजट के उतर चढ़ाव और पत्नी के आंसुओ की बारिश के बीच महीने का तीसरा हफ्ता भी बीत गया।
यूँ तो कहने को चार हफ्ते का महीना होता है पर एक सैलरी वाला ही जानता है की दूसरे हफ्ते से अगली सैलरी का कितना इंतजार रहता है। इसी कश्मकश में महीने की 28 तारीख आ गयी। कल अविनाश बाबू की शादी की सालगिरह है। रात में सोते वक्त अविनाश बाबू बस ये सोच रहे थे कल कैसे कटेगा और पत्नी को क्या गिफ्ट दूंगा अभी तनख्वाह मिलने में भी दो दिन है। गुस्सा पिताजी पर आ रहा था की शादी महीने के पहले हफ्ते में क्यों नहीं कराया,महीने के आखिरी हफ्ते में क्यों। अगली सुबह चुपचाप तैयार होकर अविनाश बाबू ऑफिस चले गए, बिना पत्नी से ज्यादा कुछ बाते किये। ऑफिस पहुंचकर राहत की सांस ली की शायद पत्नी को याद नहीं, वैसे भी चौदह साल हो गए शादी को,सोचा किसी तरह शाम भी कट जाये। शाम में ऑफिस में थोड़ी देर हो गयी और आज घर जाने की भी जल्दी में भी वो नहीं थे। महीने के आखिरी हफ्ते ने पूरी रंगत बिगड़ दी थी। रात 9 बजे घर पहुंचे तो घर में काफी मेहमानो को देखा और पत्नी सुर्ख लाल साड़ी में नई  नवेली दुल्हन सी लग रही थी। आश्चर्यचकित हो पत्नी से आँखों आँखों में पूछा, कुछ जवाब नहीं मिला तो कमरे में ले जाकर पूछा ये क्या है। पत्नी मानो बरस पड़ी, "कितनी देर से हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे, तुमने सुबह भी विश नहीं किया, तुमने क्या सोचा मुझे याद नहीं, अरे पुरे साल पैसे जमा किये है आज के लिए।अविनाश बाबू हतप्रभ रह गए और बोले लेकिन मैं तो तुम्हारे  लिए कोई उपहार भी नहीं लाया। तभी अबिनाश बाबू की बिटिया और बेटे कमरे में दाखिल हुए और बोले पापा उसकी चिंता आप बिलकुल ना करो, हम भाई बहन ने आप दोनों के लिए गिफ्ट ले रखा है, अब बाहर चलिए मेहमान इंतजार कर रहे हैं।अविनाश बाबू मन ही मन सोच रहे थे महीने का आखरी हफ्ता कैसे कैसे मौसम दिखा रहा है। खैर कोई बात नहीं, दो दिन बाद नई सैलरी बांहे पसार इंतजार कर रही है।

                              
                                                                                                          - अभय सुमन "दर्पण"















Wednesday, January 24, 2018

कविता - एक प्याली चाय और हम-तुम

एक प्याली चाय और खोये हम तुम
बैठे खामोश कुछ अनमने उधेरबुन में
ख़याले बुन रही थी अपना भॅवर जाल
कुछ बीते कल,कुछ आने वाले पल की
उसने पूछी, चीनी कितनी लोगे तुम
कुछ तन्द्रा भंग हुई और बोला सोचकर
बंद किये चीनी, कई साल बीत गए शायद
हर सुबह बतलाता, पर याद नहीं रहता तुम्हे
कुछ बादाम खाया करो, और हाँ अखरोट भी

पहली बार चीनी पूछी थी,जब मैं आया था,
तुम्हारे घर किताबे लेने, जो दी थी तुम्हे
तुम्हारे पापा के घूरती निगाहों से बचता
तुम्हारे भाभी के शरारती आँखों से निपटता
उस दिन जो डाली थी तुमने चाय में चीनी
था माँगा एक,पर उस दिन भी थी तुम भूली
पांच चम्मच डाला था, मेरे कहने पर रुकी
एहसास याद है अब तक, और मिठास उसकी


कई साल बीत चुके, बैठें हैं, हम-तुम  गुम  
एक प्याली चाय, हम दोनों से पूछ रही संग
मेरा क्या कसूर,आज भी उबालते खौलाते हो
ठंड होने से पहले पी जाते, कलेजा जलाते हो 
कुछ ख्याल रखो अपने दिल और जुबान का
थोड़ी देखभाल करो अपना और सेहत का

वो चाय का प्याला भी, होगा याद तुम्हे शायद
जब बारिश की बूंदो और बनते इंद्रधनुष में,
कॉलेज के बाहर पी थी चाय, छोटे से ढ़ाबे पर
तुम्हारी लटों में लिपटी, बिखरी बूंदो की चांदनी
और मेरे गाल के गड्डे में फंसी खनकती हंसी
उस प्याले में लजाती, इठलाती अदरक की चाय
तड़पती, बेताब लबों को,चूमने को मचलती चाय

सोचा न था ये चाय एक दिन इतनी करवी लगेगी
चाय में एक दाना चीनी भी जहर लगेगी

कैसे भूलूँ , की वो नौ महीने काटे किस तरह थी
मेरे बनाये चाय से तुम्हारी सुबह और शाम थी
अस्पताल के बाहर, चाय, बेचैनी और बेताबियाँ
अधूरी चाय छोड़ दौड़ा, जान बेटे की किलकारियां
समझ नहीं आता वो कौन सी चाय थी, और ये कौन

ऑफिस से आकर तुम्हारे हाथो बनी वो मीठी चाय
और मीठी लगती,जब होता शिकवों शिकायतों का साथ
शिकवे हुई कम और धीरे से, बढ़ती गयी शिकायतें
इतनी बढ़ गयी शायद, की तवरिखों में दर्ज़ होती गयी
आज चाय भी गुमसुम है अपनी मासूमियत खो कर
दर्द से परे, उबलना खौलना अपनी नियति समझकर
आज भी एक प्याली चाय है हमारे तुम्हारे दरम्यान
लबों का साथ पाने को, बस ठंड होने के इंतजार में।


                ----   अभय सुमन "दर्पण"

Wednesday, January 17, 2018

कविता - तेरे इन पैसो पर सबका हक़ है

तेरे इन पैसो पर सबका हक़ है
तेरा हक़ है, मेरा हक़ है

जिस माटी में यौवन चमका
उस शहर,उस गांव का हक है

जिस माँ ने आँचल में पाला
थोड़ा सा तो उनका हक़ है

संगी साथी,  ताल तलैय्या
समझो मानो,उनका भी हक़ है

ऊँगली पकड़ी, कलम थमाई
उस गुरु, गुरूज्ञान का हक़ है

कंधे पर जिनके है झूला
उस पिता, उस बाप का हक़ है

जिस बहना संग माटी गुंथे
उस राखी,उस क़र्ज़ का हक़ है

प्रेम में जिनके, भुला सबकुछ
उस प्रीत, उस गीत का हक़ है

जिन रिश्तों से आशीष पाया
उन  भाई, नातो का हक़ हैं 

राह किनारे, हाथ पसारे
कुछ ना कुछ तो उनका हक़ है

तेरा हक़ है, मेरा हक़ है
तेरे इन पैसो पर सबका हक़ है














Thursday, January 11, 2018

हास्य-व्यंग - प्यार का नाम या पुकार का नाम

हमारी पहचान अक्सर दो नामो से होती है, एक ऑफिसियल और दूसरा पुकार का नाम। ऑफिसियल नाम जैसा भी हो, पुकार का नाम बड़ा प्यारा होता है, जैसे ईंटु,चिंटू,पिंटू,गपलू,ढपलू,पप्लू इत्यादि। पुकार का नाम वैसे सरकारी तो नहीं होता परन्तु इसका असर बहुत जोरदार होता है। आजकल पति-पत्नी में पुकार कहे या प्यार के नाम का बड़ा फैशन है जैसे बेबी,सोना,हनी,जानु,चम्पू,बाबू  इत्यादि और ये नाम तभी तक कामयाब रहता है जबतक मोहब्बत बनी रहती है, नहीं तो सोना कब मिट्टी बन जाये कहा नहीं जा सकता। पहले ऐजी , ओजी, सुनोजी चलता था और वो भी घूंघट की आर में, सोना भले पीतल हो जाये लेकिन मिट्टी नहीं होती थी।
और तो और इंसान का क्या है देश तक के नाम पुकार वाले बन जाते हैं, जैसे अपने देश भारत के दसियों नाम हैं पर कोई विदेशी आकर पुकार का नाम इंडिया कह गया और हमारे लिए ये प्यार का नाम बन गया। बड़े लोगो के तो और भी कारनामे हैं। नमो, पप्पू, दिग्गी, चीची, लोलो, चिंटू इत्यादि तमाम सेलिब्रटी के प्यार के नाम हैं। पप्पू नाम से लोगो ने इतना प्यार किया की 2017 गुजरात इलेक्शन में कोर्ट ने इस नाम को बैन कर दिया। किसी का कोई पुकार का नाम हो, एक माँ अपने बेटे के लिए सिर्फ एक ही नाम होता है वो है 'आँख का तारा' । दोस्तों में तो प्यार का नाम पूछिए मत, शायद ही कोई जानवर बचता हो। लड़कियां तो खास सहेलियों को एक नया नाम दे देती है। कइयों के ऑफिसियल नाम इतने खूबसूरत होते हैं लेकिन प्यार का नाम राम-राम, लगता है नाक में सर्दी जमा हो। बहुत सारे शहर-
गांव अपने पुकार के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हैं, खोजिये मिल जायेंगे।
वैसे आपका प्यार का नाम क्या है ?











Tuesday, January 2, 2018

कविता - मैं बीस का तुम उन्नीस की हो जाए

काश एक ऐसा कोई
हसीन मौसम आ जाए।

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

मेरी हर अधूरी उम्मीद और
मेरा इंतजार खत्म हो जाये।
वो लम्हा जो काटा तन्हाइयों में
कतरा-कतरा मोम बन पिघल जाये

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

सोशल मीडिया के फ़साने में
जींस और टॉप के ज़माने में
सलवार सूट में कभी आओ
खत कोई पुराने लिखे जाएँ

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

अब उम्र लम्बी बीत चुकी
सांसे भी मद्धम हो  चली
ख्वाहिशें अब भी पूछ रही
फिर से मासूम बना जाए

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

 तेरे इंकार का वो क्षण
मेरे इंतजार का वो पल
मिटा कर उस पल और क्षण को
कोई नई इबारत लिखी जाये

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

कुछ लम्हे मुझे दे दो
कुछ कदम साथ चल दो
जरा तुम भी ठहर जाओ
जरा हम भी ठहर जायें

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ 

तेरा छोड़ कर चले जाना 
एहसास मेरे समझ पाना 
वो दर्द जब भी समझ पाओ 
एक बार मिलने चले आओ 

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ 

           -  अभय सुमन दर्पण




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Saturday, December 9, 2017

हास्य-व्यंग --- चार लोग क्या कहेंगे।

ज सुबह जैसे ही लुंगी पहन कर बाहर निकलने को हुआ, श्रीमती जी ने कहा पैंट-शर्ट पहन लो नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। धर्मपत्नी की बात मान पैंट-शर्ट पहन ली और पुरा शहर घूम आया परन्तु वो चार लोग नहीं मिले। पत्नी से भोलेपन से बोला वो चार लोग तो नहीं मिले। पत्नी झल्लाकर बोली, भेजा मत खाओ बच्चो के लिए नाश्ता तैयार करना है। मैं परेशान, फिर बचपन से एक-एक बात याद आने लगी। छोटा था तो क्लास में फर्स्ट आओ नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। अगर क्लास में 30 बच्चे हैं तो सभी तो फर्स्ट नहीं आ सकते लेकिन सभी बच्चो के पापा उन चार लोगो से परेशान रहते। क्लास में टीचर के डंडे बरसते, पढ़ लिख कर कुछ बन जा नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। यहाँ फिर चार लोग, कौन हैं वो चार लोग जिसके कारण अपनी जिंदगी बर्बाद है। इन चार लोगो ने हमारी पूरी जिंदगी नियंत्रित कर रखी है। हर मोड़ पर वो चार लोगो का खौफ जीना दुश्वार कर दिया है।

जब थोड़ा बड़ा हुआ तो मुहल्ले में मिश्रा जी की बेटी और श्रीवास्तव जी के बेटे का लव देखा। लव भी ऐसा की लैला-मजनू फेल हो जाये। लेकिन फिर वही चार लोग। श्रीवास्तव जी का बेटा इंजीनियरिंग पढ़ने इलाहाबाद गया, उधर मिश्रा जी ने उसकी लिखी प्रेम चिठ्ठी बिटिया के किताब से जब्त किया। मिश्रा जी पूजा-पाठ कराने वाले पुरोहित, पड़ोस के एक गाँव के पंडित से बिटिया की शादी कर दी। समस्या वही, चार लोग क्या कहेंगे। ब्राह्मण की बेटी कायस्थ के घर की बहु बनेगी। राम राम, चार लोग क्या कहेंगे। वैसे मिश्रा जी की बिटिया काफी सुखी है। पंडित जी अक्सर भोजन यजमान के यहाँ कर लेते हैं तो उनका खाना नहीं बनाना परता और चढ़ावे के सामान से घर भरा रहता। हाँ जब चढ़ाबे की साड़ी से पंडित जी अपनी पत्नी का श्रृंगार करते तो वह मन ही मन कुढ़ती की काश चार लोगों के चक्कर में न रहती तो आज बालम कोई और होता।
ऐसे ही नौकरी के समय फलां का बेटा ये है, चीलां का बेटा वो है, ये कर लो, वो कर लो नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। इस जिंदगी का नियंत्रण पूरी तरह क्या उन चार लोगो के हाथ में है। ऐसे ही ऑफिस में जब अपने मित्र को बॉस के घर सब्जी पहुंचाते देखा तो पूछ बैठा, भाई ये क्या कर रहे चार लोग क्या कहेंगे। उसने पलटकर कहा, चार लोगो के चक्कर में पूरी जिंदगी बर्बाद की अब ये गलती नहीं करूंगा। उसे तरक्की पाते देखा तो बोला बेटा तुम सही जा रहे हो, चार लोगो के दिखावे में रहते तो आगे नहीं बढ़ पाते। बस फार्मूला मिल गया था, बॉस के मैडम की चाकरी कर धराधर प्रमोशन पाता जा रहा हूँ।
छोड़ो चार लोगो को, जी लो जिंदगी अपनी मर्जी की। चार लोगो का ध्यान जरूर रखें पर अपनी जिंदगी उनकी उँगलियों पर ना नचायें। वैसे जिंदगी की अंतिम यात्रा में वो चार लोग मिलते जरूर हैं। बाकि जिंदगी बेपरवाह बितायें बिना चार लोगो की परवाह किये।

         लेखक - अभय सुमन दर्पण , हेल्थकेअर प्रोफेशनल
                  -  रेड क्रॉस सोसाइटी(लाइफ टाइम मेंबर),
                       -   लखनऊ मैनेजमेंट एसोसिएशन (लाइफ टाइम मेंबर)
                       -  सोशल मीडिया एक्सपर्ट एंड एडवाइजर
                      -   सोलर एनर्जी (डिज़ाइन एंड इंस्टालेशन )
                      -   एक्टर, राइटर ,पोएट, ब्लॉगर  





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Link on National TV -

http://hindi.nationaltvindia.com/chaar-log-dekhenge-to-kya-kahenge/


नोट - दिए गए पात्र का किसी घटनाक्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है।









Tuesday, December 5, 2017

पद्मावती का जौहर । Padmavati Ka Jauhar

अग्नि की धधकती ज्वाला में सोलह हज़ार रानियों संग खुद को आहुति देती महारानी पद्मावती और द्वार पर खड़ा एक वहशी कामुक दरिंदा जो उन सबों को नोचने, खसोटने अपने हरम का सामान बनाने बढ़ा आ रहा है। वीर राजपूत महाराजा रतन सिंह अपने योद्धाओ के संग वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। अपने मान, सम्मान, लाज को बचाने और उस दुष्ट से चीर हरण को बचने का कोई यत्न न पा महारानी पद्मावती ने सोलह हज़ार रानियों संग जौहर का निर्णय किया। क्या इतना आसान था जौहर। जब अग्नि की एक लौ शरीर पर गहरे दाग दे जाती है, वहां अपना शरीर अग्नि को होम कर देना। कितना बड़ा निर्णय, कितना कठिन डगर।
 
ये वक्त तेरहवीं शताव्दी का था, जब अलाउद्दीन खिलजी का आतंक हिंदुस्तान के जर्रे जर्रे में मौजूद था। खिलजी की सेना जिस गावं से गुजरती वहाँ या तो लाशों का सैलाब दिखता या इंसानो का चीत्कार। नारियाँ तो खिलजी के भोग्या की बस्तु थी और उनके सूबेदारों द्वारा उन्हें प्रस्तुत करना अपनी तरक्की की सीढ़ी। इसी समय चित्तौड़ राज्य में राजा रतन सिंह अपने वीरता और सुशासन के लिए जाने जाते थे और उनकी पत्नी रानी पद्मावती अपने अप्रितम सौंदर्य के लिए। रानी पद्मावती जिसे उन्होंने सिंघला प्रदेश (श्रीलंका ) से स्वयंवर में जीता था, अपने खूबसूरती के लिए पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध थीं। राजा रतन सिंह की वीरता एवं पद्मावती की सुंदरता के चर्चे जहाँ आम थे वहीँ उनकी मुहब्बत किसी की भी ईर्ष्या का कारण था। उन दोनों की खूबसूरत जिंदगी लम्हा-लम्हा पंख लगा कर उड़ रहा था और समय के पन्ने पर अपनी यादें अंकित कर रहा था। लेकिन उस खूबसूरत संसार को शायद किसी की नजर लग गयी और नजर भी ऐसी की लाखो लोगो की मौत भी कम पर गयी।

चित्तौर राज्य का एक व्यक्ति राघव सिंह अपने कुछ गलत कृत्यों के कारण दरबार मे हाजिर हुआ और दरवार से दोषारोपित होकर राजा रतन सिंह से सजा पाया। राजाज्ञा से उसे सजा के तौर पर देश निकाला दे दिया गया। राघव सिंह इसमें अपना अपमान जान बदले की तलाश में रहने लगा। उसे ये मालूम हुआ की खिलजी ने भारत के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्ज़ा कर रखा है पर चित्तौर के वीर राजपूतो को हरा नहीं सका  है। हमेशा की तरह भारत भूमि का एक गद्दार फिर से भारतवर्ष को कलंकित करने निकल पड़ा। उसने अलाउद्दीन खिलजी से  मुलाकात की और चित्तौर, राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती के बारे में बताया। उसे मालूम था की खिलजी के हरम में हजारों औरते रहा करती है और युद्ध के बाद यही उसकी पसंद है। उसने खिलजी को पद्मावती की सुंदरता के बारे में बताया और अपनी रानी बनाने के लिए उकसाया। खिलजी ने पद्मावती को देखने और पाने की इच्छा से चित्तौर पर आक्रमण कर दिया। उधर रतन सिंह और पद्मावती इन सबो से बेखबर अपने सुन्दर संसार में प्यार और मनुहार के कोमल पलों के साथ अपनी जिंदगी के खूबसूरत क्षण बिता रहे थे। तभी संदेशा आया की खिलजी ने चित्तौर पर आक्रमण कर दिया है। एक राजपूत अपनी आन, बाण और शान के लिए अपना सब कुछ लुटा सकता है पर अपने मान-मर्यादा पर आंच नहीं आने देता। कुछ ऐसा ही मंजर था और इधर से चितौड़ की सेना भगवा साफा पहन कर युद्ध की रणभेरी बजा दी। खिलजी आया तो जरूर पर उसे राजपूतों के शौर्य और पराक्रम का अंदाजा था। चितौड़ किले के बाहर से उसने खबर भिजवाई की वह राजा रतन सिंह से दोस्ती करना चाहता है और रानी पद्मावती को बहन मानता है। यह भी खबर भिजवाई की रानी पद्मावती के बारे में काफी सुना है और एक भाई की हैसियत से उनसे मिलना चाहता है। एक राजपूत रानी जहाँ कभी किसी पराये पुरुष के सामने बिना परदे के ना जाती हो वहां उनसे मिलना, ये कतई सम्भब न था।
राजा रतन सिंह को खिलजी की क्रूरता का अंदाजा था और मालूम था की युद्ध लाखो लोगो की बलि ले लेगा। इसिलिए  सभी से विचार कर ये फैसला हुआ की एक आईने में खिलजी, रानी पद्मावती के प्रतिबिंब को देख सकता है। खिलजी अपने कुछ विश्वासपात्र के साथ चित्तौर के किले में दाखिल हुआ पर उसके दिमाग में कुछ और चल रहा था। उसने आईने में रानी पद्मावती को देखा और रानी को देखकर वह मदहोश सा हो गया और किले के बाहर शिष्टाचार बस छोड़ने आये रतन सिंह को बंदी बना लिया। उसने घोषणा की कि अगर कल रानी पद्मावती नहीं आती है तो राजा रतन सिंह का सर चित्तौर के किले पर टंगा मिलेगा। किले में हाहाकार मच जाता है, और एक करूण स्थिति पैदा हो जाती है। शायद नजर लगाने वाले को भी अंदाजा नहीं रहा होगा की दो मुहब्बत करने वाले दिल जीवन के इस मोड़ पर खरे हो जायेंगे।

चित्तौर के सेना नायक गोरा और बादल एक योजना बनाते हैं और घोषणा करते हैं की कल रानी पद्मावती अपने 150 सखियों के साथ खिलजी के पास जाएँगी। इधर 150 पालकियां तैयार की गयी और हर पालकी में चार सैनिक कहार बन कर अपने जीवन की अंतिम युद्ध की तैयारी में जुट गए। हर पालकी में सशस्त्र राजपूत योद्धा, रानी पद्मावती के सखी के भेष में अपनी आन,बान और शान की रक्षा में जुट गए। खिलजी को खबर मिली की रानी पद्मावती अपने 150 सखियों के साथ उसके पास आ रही और अंतिम बार राजा रतन सिंह से मिलना चाहती है। खिलजी इजाजत देता है और रतन सिंह को आज़ाद करता है। जैसे ही रतन सिंह पालकी के पास आते हैं, गोरा और बादल उन्हें घोड़े में बिठाकर किले की ओर दौर पड़ते हैं। सारे सैनिक खिलजी की सेना से युद्ध करते हैं और उसे रोकते हैं। इसी लड़ाई में गोरा मारा जाता है परन्तु बादल राजा रतन सिंह को सकुशल किले में ले आता है। उधर गुस्से में आगबबूला खिलजी किले की घेराबंदी करता है और युद्ध की घोषणा करता है। रतन सिंह की सेना युद्ध करती है और उस युद्ध में रतन सिंह मारे जाते हैं। अब खिलजी किले की दरवाजे की ओर किले में प्रवेश करने के लिए बढ़ता है। किले के अंदर हजारो नारियाँ चीत्कार कर रही की अब हमारा शरीर इन वहशी दरिंदो द्वारा नोचा जायेगा और इनके हरम की वो बस्तुएें बन जाएँगी। तब रानी पद्मावती ने निर्णय लिया की कुछ भी हो जाये पर इन दरिंदो का साया भी अपने शरीर पर नहीं परने देंगे। सभी राजपूत योद्धा को साफा के लिए तैयार किया गया और सोलह हजार रानियों संग खुद को जौहर के लिए। क्या इतना आसान था जौहर। किले के आँगन में चिता सजाई गयी और रानी पद्मावती सोलह हजार रानियों संग उस चिता पर बैठ गयी। उधर बचे हुए योद्धा खिलजी की सेना से युद्ध कर बीरगति को प्राप्त हो रहे थे इधर जौहर की आग की लपटे धीरे धीरे तेज हो रही थी। आग की लपटे शोलों में बदलने लगी और पद्मावती का शरीर भस्म होता गया। खिलजी जब किले के अंदर बढ़ा तो आग की तपिश उसे बेचैन कर गई और जब चिता के पास गया तो सिर्फ राख और हड्डियों का ढ़ेर। । युद्ध कर, लाखो लोगो के मौत का कारण बनने के बाद भी वो पद्मावती को पा न सका। वो युद्ध जरूर जीता परन्तु वास्तव में वो हार चूका था और रानी पद्मावती हार कर भी जीत चुकी थी। अपने मान-मर्यादा के लिए रानी पद्मावती द्वारा किया त्याग सदियों के लिए अमर हो गया। राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती के एक खूबसूरत मुहब्बत भरी जिंदगी का दुखद अंत हो गया।

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नोट : लेखक किसी भी तरह के ऐतिहासिक सत्यता का दावा नहीं करता। अगर आलेख पसंद आये तो FOLLOW अवश्य करें।  धन्यवाद