आज सुबह जैसे ही लुंगी पहन कर बाहर निकलने को हुआ, श्रीमती जी ने कहा पैंट-शर्ट पहन लो नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। धर्मपत्नी की बात मान पैंट-शर्ट पहन ली और पुरा शहर घूम आया परन्तु वो चार लोग नहीं मिले। पत्नी से भोलेपन से बोला वो चार लोग तो नहीं मिले। पत्नी झल्लाकर बोली, भेजा मत खाओ बच्चो के लिए नाश्ता तैयार करना है। मैं परेशान, फिर बचपन से एक-एक बात याद आने लगी। छोटा था तो क्लास में फर्स्ट आओ नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। अगर क्लास में 30 बच्चे हैं तो सभी तो फर्स्ट नहीं आ सकते लेकिन सभी बच्चो के पापा उन चार लोगो से परेशान रहते। क्लास में टीचर के डंडे बरसते, पढ़ लिख कर कुछ बन जा नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। यहाँ फिर चार लोग, कौन हैं वो चार लोग जिसके कारण अपनी जिंदगी बर्बाद है। इन चार लोगो ने हमारी पूरी जिंदगी नियंत्रित कर रखी है। हर मोड़ पर वो चार लोगो का खौफ जीना दुश्वार कर दिया है।
जब थोड़ा बड़ा हुआ तो मुहल्ले में मिश्रा जी की बेटी और श्रीवास्तव जी के बेटे का लव देखा। लव भी ऐसा की लैला-मजनू फेल हो जाये। लेकिन फिर वही चार लोग। श्रीवास्तव जी का बेटा इंजीनियरिंग पढ़ने इलाहाबाद गया, उधर मिश्रा जी ने उसकी लिखी प्रेम चिठ्ठी बिटिया के किताब से जब्त किया। मिश्रा जी पूजा-पाठ कराने वाले पुरोहित, पड़ोस के एक गाँव के पंडित से बिटिया की शादी कर दी। समस्या वही, चार लोग क्या कहेंगे। ब्राह्मण की बेटी कायस्थ के घर की बहु बनेगी। राम राम, चार लोग क्या कहेंगे। वैसे मिश्रा जी की बिटिया काफी सुखी है। पंडित जी अक्सर भोजन यजमान के यहाँ कर लेते हैं तो उनका खाना नहीं बनाना परता और चढ़ावे के सामान से घर भरा रहता। हाँ जब चढ़ाबे की साड़ी से पंडित जी अपनी पत्नी का श्रृंगार करते तो वह मन ही मन कुढ़ती की काश चार लोगों के चक्कर में न रहती तो आज बालम कोई और होता।
ऐसे ही नौकरी के समय फलां का बेटा ये है, चीलां का बेटा वो है, ये कर लो, वो कर लो नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। इस जिंदगी का नियंत्रण पूरी तरह क्या उन चार लोगो के हाथ में है। ऐसे ही ऑफिस में जब अपने मित्र को बॉस के घर सब्जी पहुंचाते देखा तो पूछ बैठा, भाई ये क्या कर रहे चार लोग क्या कहेंगे। उसने पलटकर कहा, चार लोगो के चक्कर में पूरी जिंदगी बर्बाद की अब ये गलती नहीं करूंगा। उसे तरक्की पाते देखा तो बोला बेटा तुम सही जा रहे हो, चार लोगो के दिखावे में रहते तो आगे नहीं बढ़ पाते। बस फार्मूला मिल गया था, बॉस के मैडम की चाकरी कर धराधर प्रमोशन पाता जा रहा हूँ।
छोड़ो चार लोगो को, जी लो जिंदगी अपनी मर्जी की। चार लोगो का ध्यान जरूर रखें पर अपनी जिंदगी उनकी उँगलियों पर ना नचायें। वैसे जिंदगी की अंतिम यात्रा में वो चार लोग मिलते जरूर हैं। बाकि जिंदगी बेपरवाह बितायें बिना चार लोगो की परवाह किये।
लेखक - अभय सुमन दर्पण , हेल्थकेअर प्रोफेशनल
- रेड क्रॉस सोसाइटी(लाइफ टाइम मेंबर),
- लखनऊ मैनेजमेंट एसोसिएशन (लाइफ टाइम मेंबर)
- सोशल मीडिया एक्सपर्ट एंड एडवाइजर
- सोलर एनर्जी (डिज़ाइन एंड इंस्टालेशन )
- एक्टर, राइटर ,पोएट, ब्लॉगर
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http://hindi.nationaltvindia.com/chaar-log-dekhenge-to-kya-kahenge/
नोट - दिए गए पात्र का किसी घटनाक्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है।
जब थोड़ा बड़ा हुआ तो मुहल्ले में मिश्रा जी की बेटी और श्रीवास्तव जी के बेटे का लव देखा। लव भी ऐसा की लैला-मजनू फेल हो जाये। लेकिन फिर वही चार लोग। श्रीवास्तव जी का बेटा इंजीनियरिंग पढ़ने इलाहाबाद गया, उधर मिश्रा जी ने उसकी लिखी प्रेम चिठ्ठी बिटिया के किताब से जब्त किया। मिश्रा जी पूजा-पाठ कराने वाले पुरोहित, पड़ोस के एक गाँव के पंडित से बिटिया की शादी कर दी। समस्या वही, चार लोग क्या कहेंगे। ब्राह्मण की बेटी कायस्थ के घर की बहु बनेगी। राम राम, चार लोग क्या कहेंगे। वैसे मिश्रा जी की बिटिया काफी सुखी है। पंडित जी अक्सर भोजन यजमान के यहाँ कर लेते हैं तो उनका खाना नहीं बनाना परता और चढ़ावे के सामान से घर भरा रहता। हाँ जब चढ़ाबे की साड़ी से पंडित जी अपनी पत्नी का श्रृंगार करते तो वह मन ही मन कुढ़ती की काश चार लोगों के चक्कर में न रहती तो आज बालम कोई और होता।
ऐसे ही नौकरी के समय फलां का बेटा ये है, चीलां का बेटा वो है, ये कर लो, वो कर लो नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। इस जिंदगी का नियंत्रण पूरी तरह क्या उन चार लोगो के हाथ में है। ऐसे ही ऑफिस में जब अपने मित्र को बॉस के घर सब्जी पहुंचाते देखा तो पूछ बैठा, भाई ये क्या कर रहे चार लोग क्या कहेंगे। उसने पलटकर कहा, चार लोगो के चक्कर में पूरी जिंदगी बर्बाद की अब ये गलती नहीं करूंगा। उसे तरक्की पाते देखा तो बोला बेटा तुम सही जा रहे हो, चार लोगो के दिखावे में रहते तो आगे नहीं बढ़ पाते। बस फार्मूला मिल गया था, बॉस के मैडम की चाकरी कर धराधर प्रमोशन पाता जा रहा हूँ।
छोड़ो चार लोगो को, जी लो जिंदगी अपनी मर्जी की। चार लोगो का ध्यान जरूर रखें पर अपनी जिंदगी उनकी उँगलियों पर ना नचायें। वैसे जिंदगी की अंतिम यात्रा में वो चार लोग मिलते जरूर हैं। बाकि जिंदगी बेपरवाह बितायें बिना चार लोगो की परवाह किये।
लेखक - अभय सुमन दर्पण , हेल्थकेअर प्रोफेशनल
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