Saturday, December 9, 2017

हास्य-व्यंग --- चार लोग क्या कहेंगे।

ज सुबह जैसे ही लुंगी पहन कर बाहर निकलने को हुआ, श्रीमती जी ने कहा पैंट-शर्ट पहन लो नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। धर्मपत्नी की बात मान पैंट-शर्ट पहन ली और पुरा शहर घूम आया परन्तु वो चार लोग नहीं मिले। पत्नी से भोलेपन से बोला वो चार लोग तो नहीं मिले। पत्नी झल्लाकर बोली, भेजा मत खाओ बच्चो के लिए नाश्ता तैयार करना है। मैं परेशान, फिर बचपन से एक-एक बात याद आने लगी। छोटा था तो क्लास में फर्स्ट आओ नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। अगर क्लास में 30 बच्चे हैं तो सभी तो फर्स्ट नहीं आ सकते लेकिन सभी बच्चो के पापा उन चार लोगो से परेशान रहते। क्लास में टीचर के डंडे बरसते, पढ़ लिख कर कुछ बन जा नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। यहाँ फिर चार लोग, कौन हैं वो चार लोग जिसके कारण अपनी जिंदगी बर्बाद है। इन चार लोगो ने हमारी पूरी जिंदगी नियंत्रित कर रखी है। हर मोड़ पर वो चार लोगो का खौफ जीना दुश्वार कर दिया है।

जब थोड़ा बड़ा हुआ तो मुहल्ले में मिश्रा जी की बेटी और श्रीवास्तव जी के बेटे का लव देखा। लव भी ऐसा की लैला-मजनू फेल हो जाये। लेकिन फिर वही चार लोग। श्रीवास्तव जी का बेटा इंजीनियरिंग पढ़ने इलाहाबाद गया, उधर मिश्रा जी ने उसकी लिखी प्रेम चिठ्ठी बिटिया के किताब से जब्त किया। मिश्रा जी पूजा-पाठ कराने वाले पुरोहित, पड़ोस के एक गाँव के पंडित से बिटिया की शादी कर दी। समस्या वही, चार लोग क्या कहेंगे। ब्राह्मण की बेटी कायस्थ के घर की बहु बनेगी। राम राम, चार लोग क्या कहेंगे। वैसे मिश्रा जी की बिटिया काफी सुखी है। पंडित जी अक्सर भोजन यजमान के यहाँ कर लेते हैं तो उनका खाना नहीं बनाना परता और चढ़ावे के सामान से घर भरा रहता। हाँ जब चढ़ाबे की साड़ी से पंडित जी अपनी पत्नी का श्रृंगार करते तो वह मन ही मन कुढ़ती की काश चार लोगों के चक्कर में न रहती तो आज बालम कोई और होता।
ऐसे ही नौकरी के समय फलां का बेटा ये है, चीलां का बेटा वो है, ये कर लो, वो कर लो नहीं तो चार लोग क्या कहेंगे। इस जिंदगी का नियंत्रण पूरी तरह क्या उन चार लोगो के हाथ में है। ऐसे ही ऑफिस में जब अपने मित्र को बॉस के घर सब्जी पहुंचाते देखा तो पूछ बैठा, भाई ये क्या कर रहे चार लोग क्या कहेंगे। उसने पलटकर कहा, चार लोगो के चक्कर में पूरी जिंदगी बर्बाद की अब ये गलती नहीं करूंगा। उसे तरक्की पाते देखा तो बोला बेटा तुम सही जा रहे हो, चार लोगो के दिखावे में रहते तो आगे नहीं बढ़ पाते। बस फार्मूला मिल गया था, बॉस के मैडम की चाकरी कर धराधर प्रमोशन पाता जा रहा हूँ।
छोड़ो चार लोगो को, जी लो जिंदगी अपनी मर्जी की। चार लोगो का ध्यान जरूर रखें पर अपनी जिंदगी उनकी उँगलियों पर ना नचायें। वैसे जिंदगी की अंतिम यात्रा में वो चार लोग मिलते जरूर हैं। बाकि जिंदगी बेपरवाह बितायें बिना चार लोगो की परवाह किये।

         लेखक - अभय सुमन दर्पण , हेल्थकेअर प्रोफेशनल
                  -  रेड क्रॉस सोसाइटी(लाइफ टाइम मेंबर),
                       -   लखनऊ मैनेजमेंट एसोसिएशन (लाइफ टाइम मेंबर)
                       -  सोशल मीडिया एक्सपर्ट एंड एडवाइजर
                      -   सोलर एनर्जी (डिज़ाइन एंड इंस्टालेशन )
                      -   एक्टर, राइटर ,पोएट, ब्लॉगर  





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नोट - दिए गए पात्र का किसी घटनाक्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है।









Tuesday, December 5, 2017

पद्मावती का जौहर । Padmavati Ka Jauhar

अग्नि की धधकती ज्वाला में सोलह हज़ार रानियों संग खुद को आहुति देती महारानी पद्मावती और द्वार पर खड़ा एक वहशी कामुक दरिंदा जो उन सबों को नोचने, खसोटने अपने हरम का सामान बनाने बढ़ा आ रहा है। वीर राजपूत महाराजा रतन सिंह अपने योद्धाओ के संग वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। अपने मान, सम्मान, लाज को बचाने और उस दुष्ट से चीर हरण को बचने का कोई यत्न न पा महारानी पद्मावती ने सोलह हज़ार रानियों संग जौहर का निर्णय किया। क्या इतना आसान था जौहर। जब अग्नि की एक लौ शरीर पर गहरे दाग दे जाती है, वहां अपना शरीर अग्नि को होम कर देना। कितना बड़ा निर्णय, कितना कठिन डगर।
 
ये वक्त तेरहवीं शताव्दी का था, जब अलाउद्दीन खिलजी का आतंक हिंदुस्तान के जर्रे जर्रे में मौजूद था। खिलजी की सेना जिस गावं से गुजरती वहाँ या तो लाशों का सैलाब दिखता या इंसानो का चीत्कार। नारियाँ तो खिलजी के भोग्या की बस्तु थी और उनके सूबेदारों द्वारा उन्हें प्रस्तुत करना अपनी तरक्की की सीढ़ी। इसी समय चित्तौड़ राज्य में राजा रतन सिंह अपने वीरता और सुशासन के लिए जाने जाते थे और उनकी पत्नी रानी पद्मावती अपने अप्रितम सौंदर्य के लिए। रानी पद्मावती जिसे उन्होंने सिंघला प्रदेश (श्रीलंका ) से स्वयंवर में जीता था, अपने खूबसूरती के लिए पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध थीं। राजा रतन सिंह की वीरता एवं पद्मावती की सुंदरता के चर्चे जहाँ आम थे वहीँ उनकी मुहब्बत किसी की भी ईर्ष्या का कारण था। उन दोनों की खूबसूरत जिंदगी लम्हा-लम्हा पंख लगा कर उड़ रहा था और समय के पन्ने पर अपनी यादें अंकित कर रहा था। लेकिन उस खूबसूरत संसार को शायद किसी की नजर लग गयी और नजर भी ऐसी की लाखो लोगो की मौत भी कम पर गयी।

चित्तौर राज्य का एक व्यक्ति राघव सिंह अपने कुछ गलत कृत्यों के कारण दरबार मे हाजिर हुआ और दरवार से दोषारोपित होकर राजा रतन सिंह से सजा पाया। राजाज्ञा से उसे सजा के तौर पर देश निकाला दे दिया गया। राघव सिंह इसमें अपना अपमान जान बदले की तलाश में रहने लगा। उसे ये मालूम हुआ की खिलजी ने भारत के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्ज़ा कर रखा है पर चित्तौर के वीर राजपूतो को हरा नहीं सका  है। हमेशा की तरह भारत भूमि का एक गद्दार फिर से भारतवर्ष को कलंकित करने निकल पड़ा। उसने अलाउद्दीन खिलजी से  मुलाकात की और चित्तौर, राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती के बारे में बताया। उसे मालूम था की खिलजी के हरम में हजारों औरते रहा करती है और युद्ध के बाद यही उसकी पसंद है। उसने खिलजी को पद्मावती की सुंदरता के बारे में बताया और अपनी रानी बनाने के लिए उकसाया। खिलजी ने पद्मावती को देखने और पाने की इच्छा से चित्तौर पर आक्रमण कर दिया। उधर रतन सिंह और पद्मावती इन सबो से बेखबर अपने सुन्दर संसार में प्यार और मनुहार के कोमल पलों के साथ अपनी जिंदगी के खूबसूरत क्षण बिता रहे थे। तभी संदेशा आया की खिलजी ने चित्तौर पर आक्रमण कर दिया है। एक राजपूत अपनी आन, बाण और शान के लिए अपना सब कुछ लुटा सकता है पर अपने मान-मर्यादा पर आंच नहीं आने देता। कुछ ऐसा ही मंजर था और इधर से चितौड़ की सेना भगवा साफा पहन कर युद्ध की रणभेरी बजा दी। खिलजी आया तो जरूर पर उसे राजपूतों के शौर्य और पराक्रम का अंदाजा था। चितौड़ किले के बाहर से उसने खबर भिजवाई की वह राजा रतन सिंह से दोस्ती करना चाहता है और रानी पद्मावती को बहन मानता है। यह भी खबर भिजवाई की रानी पद्मावती के बारे में काफी सुना है और एक भाई की हैसियत से उनसे मिलना चाहता है। एक राजपूत रानी जहाँ कभी किसी पराये पुरुष के सामने बिना परदे के ना जाती हो वहां उनसे मिलना, ये कतई सम्भब न था।
राजा रतन सिंह को खिलजी की क्रूरता का अंदाजा था और मालूम था की युद्ध लाखो लोगो की बलि ले लेगा। इसिलिए  सभी से विचार कर ये फैसला हुआ की एक आईने में खिलजी, रानी पद्मावती के प्रतिबिंब को देख सकता है। खिलजी अपने कुछ विश्वासपात्र के साथ चित्तौर के किले में दाखिल हुआ पर उसके दिमाग में कुछ और चल रहा था। उसने आईने में रानी पद्मावती को देखा और रानी को देखकर वह मदहोश सा हो गया और किले के बाहर शिष्टाचार बस छोड़ने आये रतन सिंह को बंदी बना लिया। उसने घोषणा की कि अगर कल रानी पद्मावती नहीं आती है तो राजा रतन सिंह का सर चित्तौर के किले पर टंगा मिलेगा। किले में हाहाकार मच जाता है, और एक करूण स्थिति पैदा हो जाती है। शायद नजर लगाने वाले को भी अंदाजा नहीं रहा होगा की दो मुहब्बत करने वाले दिल जीवन के इस मोड़ पर खरे हो जायेंगे।

चित्तौर के सेना नायक गोरा और बादल एक योजना बनाते हैं और घोषणा करते हैं की कल रानी पद्मावती अपने 150 सखियों के साथ खिलजी के पास जाएँगी। इधर 150 पालकियां तैयार की गयी और हर पालकी में चार सैनिक कहार बन कर अपने जीवन की अंतिम युद्ध की तैयारी में जुट गए। हर पालकी में सशस्त्र राजपूत योद्धा, रानी पद्मावती के सखी के भेष में अपनी आन,बान और शान की रक्षा में जुट गए। खिलजी को खबर मिली की रानी पद्मावती अपने 150 सखियों के साथ उसके पास आ रही और अंतिम बार राजा रतन सिंह से मिलना चाहती है। खिलजी इजाजत देता है और रतन सिंह को आज़ाद करता है। जैसे ही रतन सिंह पालकी के पास आते हैं, गोरा और बादल उन्हें घोड़े में बिठाकर किले की ओर दौर पड़ते हैं। सारे सैनिक खिलजी की सेना से युद्ध करते हैं और उसे रोकते हैं। इसी लड़ाई में गोरा मारा जाता है परन्तु बादल राजा रतन सिंह को सकुशल किले में ले आता है। उधर गुस्से में आगबबूला खिलजी किले की घेराबंदी करता है और युद्ध की घोषणा करता है। रतन सिंह की सेना युद्ध करती है और उस युद्ध में रतन सिंह मारे जाते हैं। अब खिलजी किले की दरवाजे की ओर किले में प्रवेश करने के लिए बढ़ता है। किले के अंदर हजारो नारियाँ चीत्कार कर रही की अब हमारा शरीर इन वहशी दरिंदो द्वारा नोचा जायेगा और इनके हरम की वो बस्तुएें बन जाएँगी। तब रानी पद्मावती ने निर्णय लिया की कुछ भी हो जाये पर इन दरिंदो का साया भी अपने शरीर पर नहीं परने देंगे। सभी राजपूत योद्धा को साफा के लिए तैयार किया गया और सोलह हजार रानियों संग खुद को जौहर के लिए। क्या इतना आसान था जौहर। किले के आँगन में चिता सजाई गयी और रानी पद्मावती सोलह हजार रानियों संग उस चिता पर बैठ गयी। उधर बचे हुए योद्धा खिलजी की सेना से युद्ध कर बीरगति को प्राप्त हो रहे थे इधर जौहर की आग की लपटे धीरे धीरे तेज हो रही थी। आग की लपटे शोलों में बदलने लगी और पद्मावती का शरीर भस्म होता गया। खिलजी जब किले के अंदर बढ़ा तो आग की तपिश उसे बेचैन कर गई और जब चिता के पास गया तो सिर्फ राख और हड्डियों का ढ़ेर। । युद्ध कर, लाखो लोगो के मौत का कारण बनने के बाद भी वो पद्मावती को पा न सका। वो युद्ध जरूर जीता परन्तु वास्तव में वो हार चूका था और रानी पद्मावती हार कर भी जीत चुकी थी। अपने मान-मर्यादा के लिए रानी पद्मावती द्वारा किया त्याग सदियों के लिए अमर हो गया। राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती के एक खूबसूरत मुहब्बत भरी जिंदगी का दुखद अंत हो गया।

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नोट : लेखक किसी भी तरह के ऐतिहासिक सत्यता का दावा नहीं करता। अगर आलेख पसंद आये तो FOLLOW अवश्य करें।  धन्यवाद










Tuesday, October 10, 2017

लेख - जन्मदिन मुबारक अमिताभ बच्चन जी

अमिताभ बच्चन 11 अक्टूबर 2017 को 75 वां जन्मदिन मना रहे  हैं। उम्र का ऐसा पड़ाव जहाँ बहुतों के कदम बोझिल हो जातेे हैं, वहां ये बिंदास शख्स एक तरफ जीने की नई प्रेरणा दे रहे, वहीँ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर रहे है। जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव को झेलते हुए, हर चुनौतियों को पराजित करते हुए, हर दिन नई बुलंदियों को छूते जा रहे हैं। उम्र तो मानो बस एक नंबर बन कर रह गयी है। हर दिन एक नया इतिहास लिखना आदत सी हो गयी है।  
वह 'दीवार' ,'जंजीर' के समय का एंग्री यंग मैन हो या 'ब्लैक' के शिक्षक या 'बागवान' का पिता, हरेक दौर में हर रोल में बेजोड़। 'कौन बनेगा करोड़पति' क्या आप बिना अमिताभ के कल्पना कर सकते हैं या 'अग्निपथ' से विजय दीनानाथ चौहान को अलग किया जा सकता है और होली तो बिना 'रंग बरसे' गाने के अधूरी है। वो वाकया जब 'कुली' की  शूटिंग में उन्हें चोट लगी थी और अस्पताल में भर्ती थे। पूरा देश रो रहा था और ऊपर वाले से उनके लिए दुआ मांग रहा था। क्या आज तक कभी ऐसा हुआ है। सैकड़ो बाते हैं जो उनके बारे में लिखी कही जा चुकी है लेकिन बार-बार सुनने पढ़ने का दिल चाहता है। अकेले शख्स जो तीन पीढ़ी को प्रभाबित करते आ रहे और रोल मॉडल बने हुऐ है। 
इस उम्र और इस बुलंदी पर होकर अपने पिता के लिए इतना सम्मान हमारे आपके समाज में कितने लोग दे पाते हैं या परिवार को साथ ले कर चलने का गुण। ये उच्च संस्कार हैं जिससे हम सभी कुछ न कुछ प्रेरणा ले सकते हैं। 
मुझे उनसे एक बार रूबरू होने का सौभाग्य मिला था, जितनी उम्दा शख्शियत उतना ही व्यवहार कुशल। 
आज जब बॉक्स ऑफिस तीन दिनों का बन गया है और उससे हिट या फ्लॉप देखा जाने लगा है, क्या आज की पीढ़ी विश्वास करेगी की उनकी कई फिल्मे सौ हफ्ते थिएटर में चली है, पचास और पचीस हफ्ते वाली फिल्मे तो ढेरों हैं। जब उनका प्रवेश फिल्मों में हुआ तो वो दौर चिकने चुपरे हीरो का था। एक पतले,दुबले,लम्बे और भारी आवाज वाले लड़के को अपनाने में फिल्म इंडस्ट्री ने काफी जद्दोजहद की लेकिन जब अपनाया तो उसी का होकर रह गया।      
सन 2000 का वो दौर जब  उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा और काफी बुरे दौर से गुजरना पड़ा, उस समय भी उनके धौर्य, साहस और हिम्मत ने उस कठिन समय से पार लगाया।
दोस्त के कारण राजनीति भी की, दिल आया तो मोहब्बत भी की लेकिन जो किया बेपरवाह,बेइंतहा,बेमिसाल। 
आप हर दिन नई ऊंचाइयों को छुएँ। आपकी उम्र कभी कम ना हों। आप हम सबों को प्रेरणा देते रहें। आप अपनी क्षमता और ऊर्जा से सभी को प्रकाशवान करते रहें। 
आपको जन्मदिन की बहुत बहुत बधाइयाँ एवं ढेरो शुभकामनाएं।


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Thursday, August 31, 2017

कविता - मम्मी पापा का

जी करता मम्मी पापा का
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ
हाथ से उनके रोटी खाऊं
गोद में रख सर सो जाऊँ
जीवन के सारे उलझन को
रो रो कर उनको बतलाऊँ
कोई मुझको आँख दिखाए
पापा के पीछे छुप जाऊँ
जीवन के सारी मुश्किल को
खोल पोटरिया उन्हें बताऊँ
लम्बी लम्बी गाड़ी को भूल
साईकल की घंटी बजाऊँ
माँ की मीठी लोरी में खोकर
खोई हुई नींद-चैन ले आऊं
बारिश में भींगू और नाचू
फिर मम्मी की डाँट भी खाऊं 
जो थी जीवन की राजदार
उससे ना कोई राज छुपाऊं
जी करता मम्मी पापा का
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ

                             -   अभय सुमन "दर्पण"


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Monday, July 24, 2017

कविता - हौले हौले धीरे धीरे ठुमक ठुमक के चलत दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ

साजन मोरा पल्लू ना छोरे
ननदी मोरा पीछा ना छोरे
जान की आफत
आ  परी रे
क्या करे तू
अब रे दुल्हनियाँ

साजन करते जोरा - जोरी
देवर देखे आँखिया मींचे
हाय मुसीबत
आ गयी रे
कँहा फंसी है
तू रे दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ 

साजन बोले मीठी बतिया
ससुरा ताना धीरे से मारे
कैसी उलझन
आन परी है
समझ न आये
हाय दुल्हनियाँ

साजन मोरा फ़िल्म दिखाये
सासु मोरा साथ में जाये
शरम के मारे
कुछ ना बोले
कौन बचाये
तुझको दुल्हनियाँ

साजन मोरा कोठ्ठे पे बुलाये
भैंसुर मोरा दरबज्जे से न जाये
कैसे जाऊँ
साजन से मिलने
कोई जतन तू
लगा दुल्हनियाँ

हौले हौले धीरे धीरे
ठुमक ठुमक के
चलत दुल्हनियाँ




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Thursday, July 20, 2017

कविता - आओ एक और पारी खेलें

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

क्या हुआ जो उम्र चालीस की हो गयी
क्या हुआ जो बालो की रंगत सफ़ेद हो गयी
क्या हुआ जो जेठ की दोपहर हो गयी
क्या हुआ जो सुरमई खाव्बों पे एक परत चढ़ गयी

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

अपने सीने में दबे चिंगारी को थोड़ी हवा दे दो
अपने सोये अरमानो को जगने की वजह दे दो
बचपन के छूटे खाव्बों को थोड़ी पनाह दे दो
अपने टूटे स्वप्नों को एक मुक्कम्मल जहाँ दे दो

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें

जिम्मेदारियों के खोल में खुद को छिपाया न करो
इस हसीन जिंदगी को यूँ जाया न करो
निकालो अपने लिए तन्हाइयों में कुछ समय
कर लो पुरे ख्याब जो अब तक रहे अधूरे

आओ एक और पारी खेलें
आओ एक और पारी खेलें 




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Wednesday, July 19, 2017

कविता - कुछ बात हमारे साथ की

ट्रैन में एक सैनिक से बातचीत पर आधारित कविता

कुछ बात हमारे साथ की,
कुछ बात हमारे मुलाकात की 
सफर है एक मंजिल दो हैं 
राहे हैं एक पर अंजाम जुदा हैं 

मैंने पूछा कैसे हो दोस्त 
उसने कहा हमारा हाल न पूछो 

रेगिस्तान की  झुलसती ताप में 
हिमालय की बर्फीली बरसात में 
समंदर की लरजती अट्टहास में
आसमानो की मँडराती निर्वात में 
माँ भारती के अटल  विश्वास में 
सीमाओं सरहदों के आगोश में 
बस मचलना चाहता हूँ 
सिर्फ अपनी हुंकार से 
दुश्मनो को कुचलना चाहता हूँ 

मैंने पूछा परिवार कैसा है
उसने कहा

तुम्हारा परिवार तुम्हारे साथ
मेरा परिवार दिल में रहता है
जब बिटिया की याद आती है
तो जी भर के रो लेता हूँ
देख पिता का गरूर जब तब
दर्द का जज्बात अंदर समेटे हुए
और माँ की आंसू और ममत्व
भारत माँ की सेवा की सीख देते हुए
उधर पत्नी लाज का घूंघट ओढ़े हुए
जिया नहीं  सिर्फ महसूस किया  पति को
छोड़ो दोस्त कहाँ उलझे हो
हमारा सफर है एक पर मंजिल दो है

मैंने कहा फिर मिलेंगे
उसने कहा भरोसा नहीं

सीमा पर घुसपैठ बहुत है
नेताओ का जोर बहुत है
छाती पर गोली, पीठ पर बोली
हमारी मौत पर करते जोरा-जोरि
है जिगर तो आकर देख
एक गोली खाकर देख
स्वाद इसका ले कर देख
ये दर्द नहीं आसां मेरे दोस्त
जिन्दा रहे तो जरूर मिलेंगे

हमारा सफर एक मंजिल दो है
राहे हैं एक पर अंजाम जुदा है





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Tuesday, July 18, 2017

कविता - मेरी मधुशाला

ना जानू मैं मंदिर - मस्जिद
ना मैं जानू गुरुद्वारा
तुम प्रियतम हो मेरे अपने
इस जीवन की मधुशाला

भोर गुलाबी, शाम शराबी,
पीकर नैनो का तेरे हाला
मदमस्त मचलती निशा हो तुम
तू ही जीने की अभिलाषा

सुर्ख लबों की रंगत तेरी
जाम छलकती जैसी प्याला
भीनी भीनी स्नेह की खुशबू
संपूर्ण हुआ ये मतवाला

तुम न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण
मैं धरती का, एक तारा,
तुम मेरी ब्रह्माण्ड सुंदरी,
मैं तेरा गरबरझाला,

तुम प्रियतम हो मेरे अपने
इस जीवन की मधुशाला।




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कविता- बचपन के दिन

याद आते हैं वो बचपन के दिन,
भटके जब मेरा युवा मन,
क्या उमंग के दिन थे वो,
अल्हड़,चंचल,निश्छल ,निर्दोष
सतरंगी कल्पना में खोये हुए,
लड़ते झगड़ते रूठते मानते हुए,
मम्मी की वो मोहक मधुर बातें,
कर देती पापा का गुस्सा कम,
सोती रातों में नानी दादी संग,
सुनना उनसे कहानी था एक राजा-रंक,
क्या परी क्या शहजादी,
लगती सब अपनी  सारी,
हाँ बचपन का भोला मन,
देखा जिंदगी का दर्पण,
क्या भूलू क्या याद करूँ,
क्या वह दिन वापस आएगा,
मुझे बचपन में ले जायेगा,
याद आते हैं वो बचपन के दिन,
भटके जब मेरा युवा मन।



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कविता - लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ

लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ, 
ज़न्नत की आस में बना जहन्नुम, मैं पाकिस्तान हूँ।

नफरत के बीज अब पुरे पक चुके हैं,
फसलें कट रही हैं, नई फ़सल का  इंतजार है,
जिन्ना से ज्यादा, गाँधी, जरूरत जिस देश को
वहां दाऊद और हाफिज हमारे ठेकेदार हैं.
 
लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ
ज़न्नत की आस में बना जहन्नुम मैं पाकिस्तान हूँ।

मलाला पढ़ नहीं सकती अभिस्प्त हैं यहाँ,
पर इंसानियत के गुनहगार, सरे राह बाजार हैं,
खून और बारूद के फल सरेआम मिलती हैं,
अबला और मासूमों की मैयत यहाँ जिहाद हैं।

लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ
ज़न्नत की आस में बना जहन्नुम मैं पाकिस्तान हूँ।

तन से उतरते कपड़े, हवाईअड्डे, हर देश, सरे-आम 
पासपोर्ट भी हमारे, शर्मिंदगी का गजब एहसास है
पनपती है आतंकवाद की हर नस्ल, गली-मोहल्ले
बच्चों की मासूमियत का कत्ल, करती सरकार है।

लाखो लाशों से बना मैं पाकिस्तान हूँ
ज़न्नत की आस में बना जहन्नुम मैं पाकिस्तान हूँ।










 





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Saturday, July 1, 2017

नमस्कार,
 आप सबों का अभिनंदन।