Friday, September 13, 2019

कहानी - दो भाई

बड़े भाई बाहर बैठ कर कान में ऊँगली कर रहा था। तभी छोटा भाई आता है।
छोटा - भैया मुझे 2000  रूपये की जरूरत है।
बड़ा - अभी पिछले हफ्ते ही तो हजार रूपये दिए थे।
छोटा - वो तो ख़त्म हो गए।
बड़ा - (गुस्से में ) - ख़त्म हो गए , ऐसे कैसे ख़त्म हो गए।
छोटा - अरे।  हो गए तो हो गए।  मुझे तो चाहिए 2000 रूपये।
बड़ा - नहीं है मेरे पास जा।
छोटा - कोई बात नहीं , भाभी से ले लूँगा।
बड़ा - उसके पास भी नहीं है।
छोटा - (नाराजगी में ) - पापा के गुजरने के बाद तुम मेरा बिलकुल ध्यान नहीं रखते।
बड़ा - अरे, अरे।  ऐसा नहीं बोलते , तू तो मेरी जान है।
छोटा - नहीं नहीं , तुम बदल गए हो।  भाभी के लिए तो हर महीने साडी लाते हो और मेरे लिए कुछ नहीं।
बड़ा -  मुझे तेरी बकवास नहीं सुननी।  तुझे जो सोचना है सोच, मैं चला ऑफिस।
                           (उठकर चला जाता है )

शाम में बड़ा भाई ऑफिस से आता है। अंदर से लेडिज की आवाज आती है।

लेडीज - कपड़े बदलने के पहले भाई को बुला लाओ।  पार्क में बैठा है सुबह से , बिना कुछ खाये पिए।
बड़ा - तो तुमने बुलाया क्यों नहीं।
लेडीज- एक बार कहा था, लेकिन मेरी सुनता कहाँ है।
बड़ा - एक बार (बुदबुदाते हुए ). अच्छा अगर तुम्हारी बहन बिना कुछ खाये पिए दिन भर रहती तो क्या तुम ऐसे ही छोर देते।
लेडीज -देखो जी।  अब इन मामलो में मेरे मायके को मत घसीटो।  लाखो में एक है मेरी बहन।
बड़ा - ठीक है, मैं ही जाता हूँ।

पार्क में छोटा बैठा है।  बड़ा आता है और कंधे पर हाथ रखता है। छोटा हाथ हटा देता है।

बड़ा - सुना है तुमने पुरे दिन कुछ खाया - पिया नहीं।
छोटा - तुम्हे इससे क्या मतलब
बड़ा - अच्छा।  मुझे कोई मतलब नहीं।  मैं कोई नहीं।
छोटा - नहीं, कोई नहीं है मेरा।
बड़ा - अभी दूंगा एक लपारा।  ऐसे कोई करता है क्या। मैं तो तेरे अच्छे के लिए कहता हूँ, तू कुछ बन जायेगा तो सबसे ज्यादा खुश मैं ही होऊंगा।
छोटा - तुम क्यों खुस होंगे, बंधे रहो भाभी के पल्लू से।
बड़ा - (मुस्कुराते हुए) तो ये बात है , देख छोटे जिम्मेदारियां बढ़ने से तेरे प्रति प्यार थोड़े न काम हो जायेगा। तू तो आज भी मेरा वही छोटा सा टुल्लू है।  और तूने पुरे दिन कुछ खाया क्यों नहीं।
छोटा - बस भैया, खुद को काफी अकेला महसूस कर रहा था।  लग रहा था जिंदगी में कुछ बन नहीं पाउँगा और मेरा कोई नहीं।
बड़े - बस इतनी सी बात।  अरे , हरेक के जीवन में ऐसा मोड़ आता है।  बस घबराना मत।  और मैं तो हूँ तेरे साथ।
छोटा - आज मुझे मम्मी पापा की बहुत याद आ रही थी।
बड़ा - और मैं
छोटा - तुम पर गुस्सा
बड़ा - कोई बात नहीं , हक़ है तेरा।  लेकिन मुझे तुम पर प्यार आ रहा। याद है, स्कूल में टीचर के पिटाई के डर से कैसे तू भाग कर मेरे क्लास में आकर मेरे पीछे छिप गया था।  भरोसा कर के ही ना। और पूजा, जब वो छोड़ कर तुझे चली गयी थी, कितना रोया था मुझसे लिपट कर।
छोटा - देखो अब पूजा की याद मत दिलाओ
बड़ा - हा, हा , हा , देख छोटे , कल को मेरी फैमिली बढ़ेगी, फिर तेरी फॅमिली बढ़ेगी , तो क्या हम दोनों का प्यार कम हो जायेगा। होने भी मत देना।  है ना।
छोटा - नहीं भैया , हम दोनों का प्यार कभी कम नहीं होगा।
                      (दोनों गले लग जाते हैं)

                                                                                -    अभय सुमन " दर्पण"



Tuesday, August 27, 2019

कहानी - क्लास टीचर

रिटायर्ड  प्रोफेसर  बी. एन. शर्मा,
308, मयूर विहार , शिमला

घर के बहार लगे इस नाम को देखकर सौरभ ने घंटी दबा दी।

टिंग - टाँग।
दरवाजे की घंटी तीन बार बज चुकी , लेकिन कोई आया नहीं। सौरभ वापस जाने की सोच ही रहा था की दरवाजा खुलता है। एक अधेड़ व्यक्ति दरवाजे से बाहर आकर  पूछता है   "कौन".
"सर मैं सौरभ सिंह " उसने कहा
"कौन सौरभ मैंने पहचाना नहीं" उस अधेड़ व्यक्ति ने कहा।
" सर आपका student , Back Bencher ." सौरभ ने मुस्कुराते हुए कहा
कुछ सोचते हुए उसने कहा   "अच्छा बैक बेंचर सौरभ ? How are you my son.
"Good Sir " सौरभ ने कहा
"कालेज के सिर्फ तुम्ही दोनों मुझे याद हो, एक बैक बेंचर सौरभ और एक फ्रंट बेंचर राहुल " उसने कहा " आओ अंदर आओ" दरवाजे से हटते हुए प्रोफेसर ने कहा।
सौरभ घर के अंदर आकर सोफे पर बैठता है और पुरे घर को देखता है.
"क्या लोगे, चाय,काफी या विह्स्की " प्रोफेसर ने पूछा
"सर कुछ नहीं! बस आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी। काफी खोजने के बाद आपका पता कालेज के पीयून सर सियाराम जी से मालूम हुआ और ढूंढते ढूंढते मैं यहाँ आ गया। " अजय ने कहा
"हाँ कॉलेज से रिटायर्ड होने के बाद यहाँ आ कर बस गया "  प्रोफेसर ने कहा
तभी सौरभ की निगाह एक फैमिली फोटो पर गयी।
"मैम और बच्चे कहाँ हैं " अजय ने कहा
"सुनीता को गुजरे पांच साल हो गए और एक बेटा है वो अमेरिका में सेटल हो गया" फिर धीमी हंसी से कहा " वो भी फ्रंट बेंचर था। माँ के गुजरने के बाद कभी नहीं आया , कभी कभी फ़ोन कर लेता है। हाँ तुम्हारे साथ का फ्रंट बेंचर राहुल वो भी तो अमेरिका में है, किसी से सुना था।"  प्रोफेसर ने गर्व से कहा।
"और तुम क्या कर रहे, कहीं जॉब मिली या नहीं " प्रोफेसर ने पूछा
"सर, आप तो जानते हैं , मैं बैक बेंचर था, और आप कहा करते थे " my dear student, एक बैक बेंचर और फ्रंट बेंचर कभी दोस्त नहीं होते।" सौरभ ने स्टाइल से कहा
"हाँ कहता था मैं, और ये समाज की सच्चाई है , प्रोफेसर ने कहा।
"सर, जब मेरी एक गलती पर आपने मुझे कॉलेज से सस्पेंड कर दिया तो मैं बिलकुल टूट चूका था।  मैं अपने जीवन का अंत करने का सोच रहा था. फिर आपकी सिखाई एक बात ने मुझे हिम्मत दी कि " जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है।"  मेरे पापा की छोटी सी बिज़नेस थी, मैंने वहां बैठ कर काम सीखा और फिर धीरे धीरे काम को बढ़ाया।  आज पंद्रह देशों में एक्सपोर्ट का बिज़नेस है। करोड़ो का टर्न ओवर है।  उसने शांत भाव से कहा।
"और कॉलेज की पढाई " प्रोफेसर ने आश्चर्य से पूछा
" कहाँ पूरी कर पाया सर, पूरी तरह टूट चूका था मैं, लेकिन आपकी सिखाई अच्छी बातो को धरोहर बना कर रखा हूँ आज तक।" सौरभ ने कहा
"लेकिन मैंने तो काफी बुरा किया था तुम्हारे साथ " प्रोफेसर ने कहा
" नहीं सर, वो मेरे जिंदगी का एक सबक था। आज जिंदगी का कोई भी रिजेक्शन (rejection) मुझे तोड़ नहीं सकता। क्लास में बैक बेंचर था तो क्या हुआ , जिंदगी के रेस में कभी बैक बेंचर नहीं रहा।" सौरभ ने कहा
" अच्छा लगा तुम्हारा confidence देखकर।  जिंदगी सभी को बराबर मौका देती है।  सैकड़ो उदहारण हैं जहाँ बैक बेंचर ने इतिहास रचा है "  प्रोफेसर कुछ सोचते हुए  "sorry  my son, मेरी एक गलती ने तुम्हे काफी दुःख दिया"
 "No सर, मुझे कोई गिला नहीं, जीवन के उस मोड़ ने मुझमे काफी बदलाव लाया और मैं बैक बेंचर से फ्रंट रनर बना। " सौरभ ने कहा
"देखो my son , मैं गलत था , कोई फ्रंट बेंचर या बैक बेंचर नहीं होता , सबकी अपनी खासियत और अहमियत होती है। हर इंसान अपनी खूबी लेकर जन्म लेता है , बस उसे पहचानना होता है। " प्रोफेसर ने कहा
"ठीक है मैं चलता हूँ, हाँ ये एक छोटा सा गिफ्ट है आपके लिए, ना मत कीजियेगा" अजय ने एक पैकेट दिया
Happy Teachers Day , आज teachers day है सर। " अजय ने कहा
हा हा हा, अच्छा तो तुम्हे याद था। खुशी हुई। आजकल तो कोई टीचर को याद भी नही करता।God bless you  सौरभ ," प्रोफेसर ने कहा
सौरभ घरसे बाहर आता है और मन में सोचता है "जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है".

                                                                                   -  अभय सुमन "दर्पण"

Monday, June 24, 2019

Rape - A discussion

चार दोस्त एक ऑफिस में बैठे हैं।  एक मोबाइल देख रहा था , एक कागज पर ड्राइंग बना रहा था , एक लड़की ऊँगली से खेल रही थी। चौथा सोफे पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था। 


मोबाइल ( राजेश) - अरे यार, अभी ब्रेकिंग न्यूज़ आयी है।  फिर एक चार साल की लड़की का रेप हो गया।  पता नहीं ये रेप होना कब बंद होगा।
ऊँगली (पूजा ) - अब तो ये रोज की बात हो गयी।  हर दिन कहीं न कहीं सुनने को मिलता है।  बहुत दुःख की बात है।
ड्राइंग (मनोज) - चलो यार , शाम में चौराहे पर कैंडल जलाते हैं।  अख़बार में और चैनल पर दिख जायेंगे और फेसबुक भी अपडेट कर देंगे।  पिछली बार जब दिल्ली में रेप हुआ था तो मैंने कैंडल मार्च किया था और फेसबुक पर डाला था।  हजारो में लाइक चला गया था।
राजेश - हाँ यार , गूगल में इवेंट क्रिएट कर देते हैं , कई सारे लोग इकठ्ठा हो जायेंगे। और इसे देखो ( आखबार पड़ने वाले को देखकर ) इसे तो कोई फर्क नहीं परता , अख़बार पढने में ब्यस्त है।  हा  हा  हा ।
मनोज - अरे बोलो भाई , तू भी चलेगा न कैंडल मार्च में।
अख़बार (अनूप ) -  (सर उठा कर) जरूर चलूँगा, पर उस चार साल की लड़की के लिए  नहीं, उस चार साल की बच्ची के लिए।
पूजा - क्या फर्क पड़ता है, लड़की थी या बच्ची।
अनूप (गुस्से से) - फ़र्क़ ? मुर्दे हो तुम सब।
मनोज - अरे यार , तू तो इमोशनल हो गया।  रेप ही तो हुआ है।  कोई पहाड़ तो नहीं टुटा।  हर दिन कहीं न कहीं रेप होता है।  चल यार चिल मार।
अनूप - हाँ रेप ही तो हुआ है।  सच कहा तुमने।  कहीं दो साल की बच्ची के साथ , तो कहीं चार साल, तो कहीं आठ साल।  हाँ रेप ही तो हुआ है।  और हां एक बार तो छह महीने की बच्ची का भी सुना था।  (pause )
जब तुम्हारी छोटी सी बेटी की तबियत ख़राब होती है तो तुम पागलो सा डॉक्टर के चक्कर लगाते हो।  जब उसे कहीं चोट लगती है और खून निकल आता है तो सोचते हो की काश वो चोट तुम्हे लगी होती। और कह रहे की रेप ही तो हुआ है। मुर्दे हो सभी, तुम और ये समाज।
पूजा - पर हम क्या कर सकते , शाम में तो कर रहे कैंडल मार्च।
अनूप - हाँ , क्या कर सकते।  वो बच्ची भी क्या कर सकती थी। (भावुक होकर) , सिर्फ चार साल उम्र थी उसकी और ! और उसके ऊपर एक बिभत्स्य सा आदमी चढ़ा हुआ।  कितना तड़प रही होगी, कितना कराह रही होगी।  उस चीत्कार को एक कैंडल जला कर बुझा देना चाहते हो।  मुर्दे हो तुम सब ( लगभग चिल्लाते हुए) , सोचो जब उस फूल सी बच्ची पर वो हैवान चढ़ा होगा तो उस बच्ची की पीड़ा क्या रही होगी।  जब उसके शरीर को नोचा जा रहा होगा तो उसकी रुदन कैसी रही होगी।  (कहकर रोने लगता है)  (pause) बस सिर्फ उसे याद कर रही होगी।

पूजा - हाँ, ईश्वर को याद कर रही होगी।

अनूप - ईश्वर ? हाँ अपने ईश्वर मम्मी पापा को याद कर रही होगी। कहती होगी, कहाँ हो मम्मी , कहाँ हो पापा।           मुझे बचा लो।  मैं मर रही।  मैं यह दर्द बर्दास्त नहीं कर पा रही।  कुछ तो करो पापा , कुछ तो करो मम्मी।           मुर्दा है ये समाज, ये मुर्दो की बस्ती है।  बस कैंडल मार्च करो और फेसबुक अपडेट करो।

राजेश चल कर आता है और अनूप के कंधे पर हाथ रखती है।

राजेश - कह तो तुम ठीक रहे , लेकिन हम क्या करे। जब रेप करने वाले की मालूम है की अदालत में दसियो साल लग जायेंगे ये साबित करने में की उसने रेप किया भी या नहीं। जज साहेब सबूत पर सबूत मांगेंगे।  तब तक उस बच्ची का , उस लड़की का पता नहीं कितनी बार मानसिक रेप हो चूका होगा।  रेप करने में दस मिनट और साबित करने में दसियों साल। उसने सिर्फ एक बार रेप किया लेकिन अदालत, न्यायपालिका  न जाने कितनी बार रेप करता है।  सच कहा तुमने मुर्दे हैं सब।

पूजा - सिर्फ न्यायपालिका ही क्यों , ये पुलिस तंत्र भी तो लोगो पर सिर्फ हंटर चलना जानती है।  नेताओ और पहुंचवालो की चमचागिरी , वसूली , भ्रस्टाचार से फुर्सत मिले तो आम जनता की सुध ले।  FIR तक दर्ज नहीं होती। कौन था , किस जात का था , किस धर्म का था, हुआ भी था या नहीं।  फिर किसी नेता का केस कमजोर करने का दबाब।  तब तक तो कितनी बार रेप हो चूका होता है।

मनोज - हाँ थोड़ा मीडिया वाले केस हाईलाइट न करे तो लोगो को मालूम ही न चले।

अनूप - हा हा  हा  , मीडिया , वही मीडिया न जो TRP  के चक्कर में दिन रात लगी रहती है। गाला काट COMPETITION  ने इतना अँधा बना दिया है की बस चैनल पर कुछ लोगो को बिठाकर , बहस करा कर , बार बार भुक्तभोगी का रेप करते रहते हैं।  और नेताओ का क्या है , कोई कहता है , " बच्चे हैं गलतियां हो जाती है", तो कोई और कहता है "ये तो छोटी मोटी  बात है"। और हम सब गर्व करते हैं की हम सभ्य समाज में रह रहे।  ये है  तुम्हारा - हमारा सभ्य समाज।  लेकिन मैं कैंडल नहीं जलाऊंगा , मैं मार्च नहीं करूँगा। मैं किसी से शिकायत नहीं करूँगा।  मैंने आज एक फैसला लिया है।

सभी - वो क्या

अनूप - अब मैं... , अब मैं.....

                       
                           ......... To  Be  Continue .


                                                                 (अभय सुमन दर्पण )



Wednesday, June 19, 2019

love and love - EPISODE 2 (CLKK)

                                    सीन -१  (२  मिनट )

पार्क का सीन 

एक लड़का और एक लड़की पार्क के बेंच पर बैठे है 
लड़का - पूजा।      I  MISS YOU  
लड़की - हाँ  sonu। I  ALSO MISS YOU 
लड़का - बस आज का दिन और हम कल जुड़ा हो जायेंगे। 
लड़की - लेकिन मैं आउंगी , तुमसे मिलने, अपने प्यार से मिलने। 
लड़का - हाँ , बस कुछ सालो की बात है।  मैं इंजीनियरिंग पढ़ने बंगलोर जा रहा लेकिन आऊंगा और तुम्हे अपना बनाऊंगा।  मेरा इंतजार करना, करोगी ना ? 
लड़की -  मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ , वो समय भी आएगा जब मैं सिर्फ तुम्हारी बनूँगी , सदा सदा के लिए  . लव यू sonu।  ये मेरा वादा है
लड़का - लव यू टू ।

दोनों अपना हाथ एक दूसरे के उपर रखते हैं 

                               सींन  - २      (३ मिनट)

एक कमरे में पंडित जी कुछ ढूंढ रहे हैं तभी एक किताब गिर जाती है , उसमे एक फोटो होती  हैं।  पंडित जी देखते जाते हैं और गुस्से में चेहरा लाल होता जाता है।  फिर चिल्लाते हैं 
पंडित जी - पूजा...
दूसरे कमरे से लड़की आती है  -  जी बाबू जी। 
पंडित जी - ये क्या है (फोटो  दिखाते हैं ), तुम सोनू से मुहब्बत करती हो ?
पूजा (शर्माते हुए) - जी बाबूजी (आँचल मुँह मे दबा कर)
पंडित जी - तुम्हे मालूम है न वो कायस्थ है।  एक पंडित की बेटी कायस्थ के घर की बहु  बनेगी।  चार लोग क्या कहेंगे। 
पूजा - बाबूजी , मैं उन चार लोगो को देखुंं या अपनी खुशी। 
पंडित जी - जुबान लड़ाती है, जल्द ही तेरी शादी किसी पंडित के बेटे से करता हूँ , अगर नहीं मानी तो मेरा मरा मुँह देखेगी। 
पूजा - (रोते हुए ) - बाबूजी

  background में किसी शादी की धूंधली विडिओ चल रही है और शहनाई की आवाज आ रही। 
                                                 
                                                                 
                              सीन - ३      (३ मिनट)

 सुहागरात का सीन

एक बेड सजी है और दुल्हन बैठी है , एक पंडित टाइप का लड़का बेड के चारो तरफ घूम रहा और मंत्र पढ़ रहा और भुनभुना रहा , लड़की सोच रही , " ये कब आ कर मेरा घूँघट हटाएगा , एक घंटे से पता नहीं क्या पढ़ रहा।
तभी पंडित बोलता है , " हो गयी सिद्धि , अब मुझे जरूर पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।  लेकिन मुहूर्त तो सुबह ३ बजे  का निकला है , तब तक नीचे बैठ कर इंतज़ार करता हूँ।"
लाइट डिम हो जाती है. फिर घडी तीन बजती है।  वो उठ कर बेड पर जाता है तो देखता है दुल्हन सो चुकी है।  वो उसे जगाता है लेकिन वो सोइ रहती है।  वो सर पकड़ कर बैठ जाता है और बोलता है , अरे सुबह मुहूर्त निकलती जा रही, अब क्या होगा।  (रुआंसा हो जाता है )

                   सीन  ४    (२ मिनट)

 पंडित पति   - अरी  ओ  पंडिताइन , दरवाजा खोलो। 
                 (पूजा दरवाजा खोलती है )
पंडित जी - देखो तो पंडिताइन , आज कितना चढ़ावा मिला है। चावल, दाल , दक्षिणा और ये साडी , हाँ तीन चार सौ की तो होगी ही। 
             (पूजा मुँह बनाते हुए अंदर आती है ) पंडित जी साडी लेकर उसके सर पर रखते है और कहते हैं , आज इसी साडी से तुम्हारा श्रृंगार  करूंगा। 
पूजा सोचने लग जाती है - ( इन चार लोगो के चक्कर में बाबूजी ने कहाँ मेरी शादी करा दी।  अगर इन चार अनदेखे लोगो का ख्याल नहीं करते तो मेरा पति कोई और होता और मैं अपने पिया की सजनी होती )
  मुँह बनाती है - हूँह  

                सीन  - ४    (२ मिनट)

टिंग - टोंग, दरवाजा खुलता है 
पंडित जी (पिता जी ) आते हैं और पूछते हैं।  कैसी हो 
पूजा  -   ठीक हूँ , आप ही का दिया प्रसाद खा रही हूँ। 
पंडित जी - मेरा दिया प्रसाद , क्या मतलब 
पूजा -छोड़िये  जाने दीजिये , मैं चाय बनती हूँ (उठ कर जाती है )
फिर कमरे में आते हुए। ...  एक ट्रे में चाय और चार लड्डू हैं , चारो लड्डू अलग अलग तरह के हैं। 
पंडित जी - ये चारो लड्डू अलग -अलग तरह के , लगता है पतिदेव काफी ख्याल रखते हैं। 
पूजा - किस बात का ख्याल , ये चारो लड्डू चार यजमान के घर के हैं।  पूजा पाठ  कर के चढ़ावे वाले।  आपने चार लोगो के चक्कर में कंहा मुझे फंसा दिया।  मेरे  मुताबिक शादी हुई होती तो मैं भी खुश रहती। 
पंडित जी - हाँ बेटा , गलती हो गयी।  ये चार लोग क्या कहेंगे के विषय में न सोचा होता तो कम से कम एक ही तरह के लड्डू खा रहा होता।  लड़का दूसरी जाति का था तो क्या हुआ, तू तो खुश रहती। 
पूजा - हाँ बाबूजी (कहकर गले लग जाती है )


Wednesday, May 15, 2019

माँ - बेटा (तिरुआ ) - कहानी

तड़ाक .. तड़ाक .. दो थप्पड़ ने तिरुआ के दिमाग को हिलाकर रख दिया। अपनी जगह से दस फर्लांग दूर जाकर गिरा था वो और मुँह से एक ही आवाज निकली "माँ"।  किसी तरह वह खड़ा हुआ तो सामने मालिक की घूरती निगाहें उसे देख रही थी। वह वहां से निकलना चाहा तो मालिक ने नजदीक आकर कॉलर पकर लिया और डांटना शुरू कर दिया। 
"इस प्लेट की कीमत कौन देगा, तेरा बाप" उसने चिल्लाते हुए कहा।
"नहीं साहब, मैं ज्यादा काम करूंगा , रात को भी नहीं सोऊंगा लेकिन मुझे मारो मत।  मैं कैसे भी करके इसकी कीमत लौटा दूंगा। " तिरुआ ने कहा।
"ठीक है अगली बार अगर प्लेट तोड़ी तो खाना-पीना बंद कर दूंगा। " फिर एक थप्पड़ जड़ते हुए वो अपने गल्ले पर जाकर बैठ गया।
तिरुआ के आँखों से आंसू नहीं रुक रहे थे। वह चुपचाप जाकर टूटी प्लेटे समेटने लगा।  उसकी तो गलती भी नहीं थी। बस खाने की प्लेट टेबल पर लगाने जा रहा था, तभी किसी ग्राहक की मोबाइल नीचे गिर गयी, एकाएक वो मोबाइल लेने नीचे झुका तो उसका सर प्लेट से टकरा गया और प्लेट गिर गयी। काफी कोशिश करने के बाद भी वह उसे गिरने से नहीं रोक पाया।इसी बात पर वो अपने मालिक से थप्पड़ खा गया।
नाम तो वैसे उसका त्रिभुवन था पर अब सब उसे तिरुआ कहते थे। माँ ने यह सोच कर नाम रखा था की तीनो लोक का स्वामी बनेगा और बड़ा नाम करेगा, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। 
छः साल हुए उसे माँ से अलग हुए लेकिन शायद ही कोई रात या कोई पल ऐसा न रहा होगा जब उसे माँ की याद नहीं आयी होगी। जितना माँ का प्यार पाता था उतना पिता की मार। था भी तो माँ की आँख का तारा, एक मिनट भी खुद से अलग नहीं करती थी। लेकिन उस दिन पता नहीं कैसे मति मर गई थी। उसके पिता के दारू पीने की आदत ने घर को गरीबी के जंजाल में जकड़ रखा था। माँ लोगो के घर में काम करके घर के खर्च पुरे करती और पिता अपनी कमाई दारू में उड़ा  देता।
शाम का वक़्त था, त्रिभुवन के पिताजी किसी को अपने साथ लाये थे। देखने में पैसे वाला लग रहा था।
त्रिभुवन के पिताजी ने उसकी माँ को अंदर कमरे में ले जाकर धीरे से कहा।
"देखो कौन आये हैं , अपने त्रिभुवन की जिंदगी बनाने वाले सेठ"  पिताजी ने लाढ से कहा।
मैं समझी नहीं, कैसी जिंदगी "  माँ ने कहा।
"देखो ये सेठ अपने त्रिभुवन को अपने साथ ले जाना चाहते हैं, अपने घर पर रखेंगे। अच्छी पढाई कराएँगे, बड़ा आदमी बनाएंगे, हमारे साथ रहकर तो ये भी आवारा  बन जायेगा बिना किसी काम का"  पिताजी ने कहा
"नहीं अपने बेटे को मैं खुद से अलग नहीं करुँगी " उसने झपट कर त्रिभुवन को खुद में चिपटा लिया।
"एक बार तो मेरी बात मन लो, देखो इसकी जिंदगी बदल जाएगी। तुम नहीं चाहते ये भी बड़ा आदमी बने खूब पैसे वाला, काफी मुश्किल से सेठ जी तैयार हुए हैं।"   पिताजी ने कहा।
"नहीं मेरा बेटा मुझसे दूर नहीं जायेगा, उन्हें जो देना है यहीं दे।"  माँ ने कहा
"अरे कैसी बात कर रहे, पागल तो नहीं हो गए ! क्या यहाँ वो अच्छी पढाई कर पायेगा, तुम तो अपने बेटे के दुश्मन बनी जाती हो, मैं तो उसके भले की सोच रहा " पिताजी ने कहा
 काफी समझाने बुझाने के बाद आखिरकार माँ ने अपने कलेजे के टुकड़े को जाने की इजाजत दे दी। अभी उम्र ही क्या थी त्रिभुवन की, सिर्फ सात साल। सोची बड़े लोगो की संगत में उसके बेटे की जिंदगी संवर जाएगी।
रात थोड़ी घिर आयी थी। पिताजी, त्रिभुवन और सेठ तीनो घर से निकल चुके थे। त्रिभुवन अपने पिताजी पर विश्वास किये उसका हाथ पकड़े था।  सेठ जी की गाड़ी लगभग एक घंटे बाद रुकी।  गाड़ी से उतरकर त्रिभुवन ने अपने को एक अनजान घर के सामने पाया। उसे थोड़ा डर लगा और उसने जोर से अपने पिताजी की हाथ पकड़ ली। तीनो उस घर में दाखिल हुए , त्रिभुवन और उसके पिताजी को एक कमरे में ठहराया गया। खाना खा कर दोनों सो गए। सुबह त्रिभुवन की आँख खुली तो देखा सामने एक बदसूरत सा आदमी उसे जगा रहा था।
"मेरे पिताजी कहाँ हैं " त्रिभुवन ने कहा
"पिताजी"  उस आदमी ने जोर से हँसते हुए कहा  "अरे वो तो रात में ही निकल गया, तुम भी उठ जाओ और तैयार हो कर काम पर चलो"
त्रिभुवन का दिल धड़क गया और जोर से चिल्लाया  "माँ "
वो आदमी ठठा कर हंस दिया और बोला " चल उठ जा, तेरा बाप तेरा सौदा कर के चला गया "
उस सेठ के कई सारे ढाबे चलते थे, उसी में एक ढाबे पर वो काम पर लग गया। वहां के हर छोटे बड़े काम और धीरे धीरे वहीँ बड़ा होने लगा। हर महीने उसके पिताजी सेठ जी से कुछ रूपये ले जाता था।  उसने उसकी माँ को बता रखा था की त्रिभुवन उस रात बीच रास्ते कहीं भाग गया था।
ऐसे ही कर के कई साल बित गए और वो पंद्रह साल का हो चूका था। उसे कंही से मालूम हुआ की उसके पिताजी हर महीने आकर पैसे ले जाते हैं। उसने सेठ जी के घर पर एक नौकर से बात की और कहा की जब मेरे पिताजी आये तो सुचना दे देना। उसे अपने पिताजी से बेइंतहा नफरत थी जो उम्र बढ़ने के साथ और बढ़ती जा रही थी बस माँ का धुंधला चेहरा उसे याद था। अगली बार जब उसके पिताजी आये तो वो बहाने से एक साइकिल उठाकर वो ढाबे से निकल गया। जब वो सेठ जी के घर पहुँचा तो अपने पिताजी को उस घर से निकलते देखा। उसके पिताजी साइकिल से घर के लिए निकले थे, बस वो भी उसके पीछे छुपते छुपाते निकल गया। लगभग 11 -12  किलोमीटर जाने के बाद उसे सड़के कुछ जानी पहचानी सी लगी। वो अपने पिताजी का पीछा कर रहा था , उसके पिताजी ने एक घर के दरवाजे पर खुंडी खटखटाई। उसे याद आ गया की यही तो है मेरा घर। वो उस समय वापस लौट गया।
अगले दिन बाजार जाने के बहाने फिर वो निकला और अपने घर पहुँचा। दरवाजा अधखुला था, वो दरवाजे पर खड़ा होकर देखा की उसकी माँ रसोई में बर्तन धूल रही है।
उसने धीरे से कहा "माँ"
पता नहीं उसकी माँ को क्या सुनाई दी।
उसने वहीं  से कहा  "कौन है, क्या चाहिए, अभी जाओ बाद में आना।"
उसने अब थोड़ी तेज आवाज में कहा "माँ"
उसकी माँ ने जोर से कहा " क्या माँ- माँ लगा रखा है, मेरा कोई बेटा नहीं। तुम सबो की आदत मैं जानती हूँ , चोरी करने के इरादे से आते हो और माँ कहते हो "
अब त्रिभुवन से रहा नहीं गया और थोड़ी जोर से कहा
"माँ मैं तेरा त्रिभुवन, तेरा बेटा "
माँ के तो जैसे खून जम गए, अपलक उसे देखने लगी और दौड़ती आयी, कुछ छण देखने के बाद जैसे ही उसे लग गया की वो त्रिभुवन ही है, उसे जोर से अपनी बाँहों में समेट ली। दोनों के आंसू एक दूसरे को भिगो रहे थे और पल जैसे थम सा गया था।
                                                                                                   -  अभय सुमन "दर्पण"

Monday, May 6, 2019

अधजला इश्क - कविता

 "अधजला इश्क"

क्या करूं ले इश्क तेरा 
इस उम्र में ऐ प्रियवर
इश्क अब किस्से कहानी
जिंदगी के इस मोड़ पर

अब न चाहत पहले जैसी
अब न हिम्मत सोचने की
ख्वाहिशें कब खो चुकी हैं
सपने भी सब सो चुकी हैं
बरस चुकी हैं बादलें भी
धूल चूका सावन सोलंहवा

पूछा, जाना और माना था तब
साथ चलने का इरादा था तब
पर तुम्हारे सोच में न हम
मेरे इश्क में जायका था कम
तब तुम्हारे सुर सुरीले
मुझमे थे हर रंग फीके

अब कहाँ वो गीत प्यारे
टूटे हैं अल्फ़ाज़ सारे

जिंदगी के जद्दोजहद में 
दब चुके जज्बात हमदम
ढल चुकी तरुणाई सारी
मिट चुकी तन्हाई सारी

साथ ना अब चल सकेंगे
गीत न हम गा सकेंगे
मिल न पाऊँ ऐसा शायद
तुझको तेरा मीत मुबारक
दर्दे गम अब दोस्त मेरे
अधजला इश्क मेरे हिस्से


क्या करूंगा इश्क लेकर
इस उम्र में ऐ प्रियवर
इश्क अब किस्से कहानी
जिंदगी के इस मोड़ पर

                   - अभय सुमन "दर्पण"











Wednesday, March 27, 2019

ग़ज़ल - निकल रहा तुम्हारे शहर से

निकल रहा तुम्हारे शहर से, ओ बेखबर,
छोड़कर कुछ यादें और दबी हसरते,
कुछ तन्हाईयाँ और थोड़ी सी रुसवाइयाँ ,
तम्मनाओं के शहर में ढूंढता फिरता अकेला,
हर खामोश लवो में तलाशता खुद का वजूद,
सितमगर भी न मिला सितम करने को ,
हर मौंजू परेशानियां भी कम करने को ,
संभले ना तपिश दरख़्त की छावं से भी
न दरिया के साहिल पनाह से भी
जुस्तजू बस इतनी जरा सी तो थी
एक खलिश जो छिपी फंसी थी कहीं

दिल तलक ताख पर रख छोरा, 
कोई रहबर न दिखा संभाल कर रखने को ,

निकल रहा तुम्हारे शहर से ...




जुस्तजू -  खोज, तलाश।


ख़लिश -  चुभन, कसक।