Sunday, January 5, 2020

बीस की जवानी
चालीस की रवानी
साठ का सियापा
अस्सी का बुढापा
सौ की गिनती
20-20 चढती
इस 2020 में
अपनी उम्र ढूंढें
कितना खोया-पाया
इस जीवन की बूंदे
मां-बाप की गोद या
भाई-बहन को मिस
लंगोटिया यार या
पहले प्यार की टीस
कालेज कैंपस मे
कट वाली चाय
कुछ गलियां,चौराहे
तो कुछ खोये ख्वाब
नववर्ष 2020 में
हैं जीवन के दो हिस्से
एक है अंधी दौर और
कुछ पुराने किस्से
कुछ 20 अगर इसे देना
तो कुछ 20 उसे देना
कुछ दुनियादारी कर लेना
कुछ मन की भी सुन लेना।


अभय सुमन "दर्पण"

Tuesday, December 10, 2019

कहानी - हेलमेट

आज फिर सिंह साहेब चौराहे पर खड़े  थे हाथो में 4 -5 हेलमेट लेकर। रोज की तरह वही उलझी बाल, थकी नजरे, पुराने से कपड़े पहने, अपनी उसी जगह पर चौराहे के नजदीक। तभी उन्हें एक 16 -17  साल का लड़का बाइक से आता दिखा बिना हेलमेट लगाए।  सिंह साहेब ने आवाज देकर उसे रोका और पूछा। 
"बेटा, बिना हेलमेट के जा रहे, ये लो हेलमेट मेरी तरफ से लगा लो", सिंह साहेब
"नहीं नहीं अंकल, मेरे पास है लेकिन घर पे है " लड़का ने कहा
"तो लगाया क्यों नहीं", सिंह साहेब
"बिना हेलमेट काफी मज़ा आता है, खुली हवा में बालो का लहराना, लड़कियों का देखना। अरे अंकल हेलमेट पहन कर वो बात कहाँ।", लड़के ने हँसते हुए कहा
"बात तो ठीक कह रहे, लेकिन जिंदगी भी तो उस सबसे ज्यादा जरूरी है।" सिंह साहेब ने सोचते हुए कहा
"अरे अंकल जाने दो देर हो रही, लेकिन एक बात बताओ ", लड़का
"क्या "
"आप ऐसे फ्री में हेलमेट क्यों बाँट रहे", लड़का
"क्योंकि मैं तुम जैसे लड़को से बहुत प्यार करता हूँ " सिंह साहेब
"क्यों मजाक कर रहे अंकल, मेरे मम्मी पापा मुझसे बहुत प्यार करते हैं ", लड़का
"बेटा अगर वो प्यार कर रहे होते तो बिना हेलमेट तुम्हे घर से निकलने नहीं देते" सिंह साहेब
"अरे अंकल कैसी बाते कर रहे, तुम शायद कोई पागल जान परते हो।"  कहकर लड़का बाइक आगे बढ़ा देता है 

पास में खडे दो लड़के बाते कर रहे थे।
"कौन है ये आदमी, अक्सर देखता हूँ यहाँ खडा रहता है और लोगो को हेलमेट बांटता रहता है ", पहले ने कहा
"पता नहीं कौन है, पर मुझे भी अक्सर दिखता है, होगा कोई पागल। कोई अपने पैसे इस तरह लुटाता है क्या " दूसरे ने कहा
पास में खड़ा एक आदमी उनकी बात सुन रहा था , वो पास आकर कहता है  "क्या तुम इन्हे नहीं जानते, ये मिस्टर दिनेश सिंह हैं, शहर के जाने माने रईस थे, अपनी आधी से ज्यादा सम्पति ईन्होंने दान कर दी, आज कल हर दिन शाम में किसी भी चौराहे पर खडे हो कर हेलमेट बांटते हैं, खासकर जो युवा बिना हेलमेट के जाते हैं उसे रोक कर।"
 "लेकिन ऐसा क्यों" , पहले ने पूछा
फिर वो कहानी सुनाने लगता है।
"ज्यादा नहीं बस एक साल पहले की बात है, एक दिन अपने घर पर वो बैठे थे......
साथ में उनका कोई जूनियर भी बैठा था, तभी उनका 16 -17 साल का लड़का कमरे से निकल रहा थ। 
"पापा मैं जरा दोस्तों के साथ नई बाइक से घूम कर आ रहा", बेटे ने कहा
"अरे, इतनी जल्दी भी क्या है, आओ मेरे पास बैठो।" सिंह साहेब
"नहीं पापा, सभी दोस्तों को पार्टी देनी है, आज तो बहुत मजा आने वाला है " बेटा
"जा बेटा, लेकिन ध्यान से।  पैसे की जरूरत हो तो एटीएम से निकल लेना, और हाँ हेलमेट लगा लेना" ,सिंह साहेब
"अरे पापा, हेलमेट तो बोझ लगती है सर पे, फिर कहाँ वो मस्ती हो पायेगी ", बेटा
"ठीक है जा, लेकिन संभाल के", सिंह साहेब
बेटा निकल जाता है। तभी उनका जूनियर कहता है।
"सर, इनकी उम्र क्या है," जूनियर
"अभी सोलह पूरा कर के सत्रह लगा है, हीरो है पुरे स्कूल का" सिंह साहेब ने गर्व से कहा

"पर सर, इतनी काम उम्र में बाइक दिलाना......., बिना हेलमेट बाइक चलना....... ", जूनियर ने हिचकते हुए कहा
हाँ तो क्या हुआ, खुली हवा में बाले लहरायेंगे, लड़किया देखेगी। हा  हा हा , अरे भाई यही तो उम्र है जिंदगी जीने का, तुम परेशांन मत हो।", सिंह साहेब
"पर सर, आजकल तो फाइन भी काफी बढ़ गयी है", जूनियर
"देखो मिश्रा कर दी न छोटी बात, सिंह साहेब का बेटा है, हजार क्या, लाखो में भी फाइन चला जाये तो दूंगा, आखिर कमाता किस लिए हूँ।", सिंह साहेब
"जी सर ", जूनियर ने कहा और शांत हो गया
सिंह साहेब ने चाय की एक कप उठाई ही थी कि तभी फ़ोन की घंटी बजी। उधर से आवाज आयी।
"हेलो, सिंह साहेब है", उधर से आवाज
"हाँ , बोल रहा हूँ " सिंह साहेब
"सर, आपके बेटे का एक्सीडेंट हो गया है, सर फ्रैक्चर हो गया है, हेलमेट नहीं लगा रखा था,ऑन द स्पॉट डेथ हो गयी है ," उधर से आवाज आयी
सिंह साहेब के हाथ से फोन गिर गया।
  
    फिर आगे बताने लगा
...... बस उसी दिन के बाद इनका जैसे सब ख़तम हो गया, इकलौता लड़का था, अगर हेलमेट लगायी होती तो शायद उसकी जिंदगी बच जाती।", उस आदमी ने अपनी बात पूरी की। (पीछे सिंह साहेब की धुंधली तस्वीर दिख रही, जिसमे वो लोगो को हेलमेट दे रहे होते हैं।)
वो दोनों लड़के सिंह साहेब के पास जाते हैं और उनके साथ लोगो को हेलमेट देने में मदद करते हैं।

कहानी - पापा बेटी

ट्रिंग - टिंग।
तीन बार फ़ोन बज चुकी थी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं।  प्रिया ने धड़कते दिल से फिर एक बार फ़ोन मिलाया।  इस बार फ़ोन उठ गयी।
"हैलो",  उधर से बलबीर सिंह की आवाज आयी।
प्रिया ने जब अपने पापा की आवाज सुनी तो एक सिहरन सी पुरे शरीर में फैल गई।  उसे जबाब देने की हिम्मत नही हो रही थी। वो स्तब्ध सी फ़ोन पर अपने पापा की आवाज सुन रही थी।
" हैलो, हैलो", कई बार बलबीर सिंह ने कहा , "पता नहीं कौन है जवाब ही नहीं दे रहा " फिर फ़ोन को रख दिया।
इस बार प्रिया ने फिर हिम्मत की और फोन मिलाई।  फिर फ़ोन उसके पापा ने उठाया, "हैलो ", लेकिन फिर उधर से कोई आवाज नहीं आयी।  फिर वो जोर से चिल्लाया "पता नहीं कौन है , बार बार फोन कर परेशान कर रहा।
"पापा मैं, प्रिया " , प्रिया बोल बैठी
"कौन प्रिया , मैं किसी प्रिया को नहीं जानता " बलबीर ने कहा
"पापा मैं आपकी बेटी, प्रिया ", प्रिया ने कहा
"कौन बेटी, मर चुकी मेरी बेटी, दुबारा फ़ोन मत करना", बलबीर ने कहा और फ़ोन रख दिया।
प्रिया ने फिर फ़ोन मिलाया, बलबीर ने सोचते हुए फ़ोन उठाया।
"पापा प्लीज फ़ोन मत रखना ", प्रिया ने कहा, "मुझे माफ़ कर दो पापा "
"माफ़ कर दूँ , पर किस लिए, जब तुम मेरी बेटी ही नहीं " बलबीर ने कहा
"नहीं पापा ऐसा मत कहो, काफी हिम्मत जुटा कर आपसे बात कर रही हूँ , मुझे माफ़ कर दो ", प्रिया ने कहा
"कैसे माफ़ कर दूँ , अच्छा बता कैसे माफ़ कर दूँ।  जीते जी तुमने मुझे मार दिया , तेरी माँ ने पिछले तीन सालो से मौन धारण कर रखा।  मैंने पुरे समाज से नाता तोड़ लिया ", बलबीर ने कहा
"सॉरी पापा " , प्रिया ने कहा
"ना ही तेरे से बात करनी और ना ही तेरी शक्ल देखनी", बलबीर ने कहा
"ठीक है पापा, मेरी शक्ल न देखो, लेकिन पीहू की तो देख लो, मेरी बेटी एक साल की होने वाली है", प्रिया ने कहा
" अच्छा एक साल की होने वाली है, कैसी दिखती है , तेरे जैसी ही ना ", बलबीर ने भावुक होकर कहा।
"हाँ पापा, बिलकुल मेरे जैसी", प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा
"उसके जन्म के समय बहुत मन किया था, तुमसे मिलने का, लेकिन ... ," बलबीर ने आंसू पोछे
"पापा बहुत मिस करती मैं आपको", प्रिया ने कहा
"तो तूने ही तो ऐसा काम किया। भाग कर शादी करने की क्या जरूरत थी ?", बलबीर ने कहा
"पापा उसे बहुत चाहती थी मैं ", प्रिया ने कहा
 "अच्छा कितने साल से तू उसे जानती थी ", बलबीर ने पूछा
"पापा, दो साल से " प्रिया ने कहा
"और... और मेरा क्या, जिसने चौबीस साल तुझे अपनी आँखों के सामने बड़ा होते देखा। मेरे प्यार का कोई मूल्य नहीं। इतनी सी थी तू , गोद में लेकर कितना खेलता था। मेरी हर मुस्कान की वजह तुम थी, एक झटके में सब तोड़ दिया।" बलबीर ने कहा
"पापा ऐसा मत बोलिये, बहुत प्यार करती हूँ आपसे।  लेकिन मजबूर थी मैं ", प्रिया ने कहा

" और मेरी मजबूरी कुछ नहीं, सोचा नहीं मेरा कुछ भी।  मेरा मान , सम्मान , बरसो की कमाई प्रतिष्ठा।  बस भाग गई घर छोड़ के। रातो रात।  अरे बताया तो होता एक बार। " बलबीर ने कहा
" I am sorry papa, माफ़ कर दो मुझे, मैं बहुत शर्मिंदा हूँ", प्रिया ने कहा,
"जाने दे बेटा,बस थोड़ा ख्याल रखी होती मेरा,कितने सपने सजाये थे तेरे ब्याह के, कितने अरमान थे मेरे, खैर।
बलबीर ने कहा।
"मैं आपकी अच्छी बेटी नहीं बन सकी पापा " , प्रिया ने कहा
"ना बेटा ना, ऐसा नहीं बोलते, तू तो मेरी सबसे अच्छी बेटी है। गलती मेरी ही थी, मेरी परवरिश में कुछ कमी रह गयी होगी। अपनी बेटी को संस्कार देने में कभी कमी न करना। ध्यान रखना की कभी वो तुझे बिना बताये घर न छोर दे। मैं नहीं चाहता की जो दुःख मैंने झेला, तुझे भी झेलनी पड़े। " बलबीर ने यह कह कर फ़ोन रख दिया।

                                                                              - अभय सुमन "दर्पण"


Friday, September 13, 2019

कहानी - दो भाई

बड़े भाई बाहर बैठ कर कान में ऊँगली कर रहा था। तभी छोटा भाई आता है।
छोटा - भैया मुझे 2000  रूपये की जरूरत है।
बड़ा - अभी पिछले हफ्ते ही तो हजार रूपये दिए थे।
छोटा - वो तो ख़त्म हो गए।
बड़ा - (गुस्से में ) - ख़त्म हो गए , ऐसे कैसे ख़त्म हो गए।
छोटा - अरे।  हो गए तो हो गए।  मुझे तो चाहिए 2000 रूपये।
बड़ा - नहीं है मेरे पास जा।
छोटा - कोई बात नहीं , भाभी से ले लूँगा।
बड़ा - उसके पास भी नहीं है।
छोटा - (नाराजगी में ) - पापा के गुजरने के बाद तुम मेरा बिलकुल ध्यान नहीं रखते।
बड़ा - अरे, अरे।  ऐसा नहीं बोलते , तू तो मेरी जान है।
छोटा - नहीं नहीं , तुम बदल गए हो।  भाभी के लिए तो हर महीने साडी लाते हो और मेरे लिए कुछ नहीं।
बड़ा -  मुझे तेरी बकवास नहीं सुननी।  तुझे जो सोचना है सोच, मैं चला ऑफिस।
                           (उठकर चला जाता है )

शाम में बड़ा भाई ऑफिस से आता है। अंदर से लेडिज की आवाज आती है।

लेडीज - कपड़े बदलने के पहले भाई को बुला लाओ।  पार्क में बैठा है सुबह से , बिना कुछ खाये पिए।
बड़ा - तो तुमने बुलाया क्यों नहीं।
लेडीज- एक बार कहा था, लेकिन मेरी सुनता कहाँ है।
बड़ा - एक बार (बुदबुदाते हुए ). अच्छा अगर तुम्हारी बहन बिना कुछ खाये पिए दिन भर रहती तो क्या तुम ऐसे ही छोर देते।
लेडीज -देखो जी।  अब इन मामलो में मेरे मायके को मत घसीटो।  लाखो में एक है मेरी बहन।
बड़ा - ठीक है, मैं ही जाता हूँ।

पार्क में छोटा बैठा है।  बड़ा आता है और कंधे पर हाथ रखता है। छोटा हाथ हटा देता है।

बड़ा - सुना है तुमने पुरे दिन कुछ खाया - पिया नहीं।
छोटा - तुम्हे इससे क्या मतलब
बड़ा - अच्छा।  मुझे कोई मतलब नहीं।  मैं कोई नहीं।
छोटा - नहीं, कोई नहीं है मेरा।
बड़ा - अभी दूंगा एक लपारा।  ऐसे कोई करता है क्या। मैं तो तेरे अच्छे के लिए कहता हूँ, तू कुछ बन जायेगा तो सबसे ज्यादा खुश मैं ही होऊंगा।
छोटा - तुम क्यों खुस होंगे, बंधे रहो भाभी के पल्लू से।
बड़ा - (मुस्कुराते हुए) तो ये बात है , देख छोटे जिम्मेदारियां बढ़ने से तेरे प्रति प्यार थोड़े न काम हो जायेगा। तू तो आज भी मेरा वही छोटा सा टुल्लू है।  और तूने पुरे दिन कुछ खाया क्यों नहीं।
छोटा - बस भैया, खुद को काफी अकेला महसूस कर रहा था।  लग रहा था जिंदगी में कुछ बन नहीं पाउँगा और मेरा कोई नहीं।
बड़े - बस इतनी सी बात।  अरे , हरेक के जीवन में ऐसा मोड़ आता है।  बस घबराना मत।  और मैं तो हूँ तेरे साथ।
छोटा - आज मुझे मम्मी पापा की बहुत याद आ रही थी।
बड़ा - और मैं
छोटा - तुम पर गुस्सा
बड़ा - कोई बात नहीं , हक़ है तेरा।  लेकिन मुझे तुम पर प्यार आ रहा। याद है, स्कूल में टीचर के पिटाई के डर से कैसे तू भाग कर मेरे क्लास में आकर मेरे पीछे छिप गया था।  भरोसा कर के ही ना। और पूजा, जब वो छोड़ कर तुझे चली गयी थी, कितना रोया था मुझसे लिपट कर।
छोटा - देखो अब पूजा की याद मत दिलाओ
बड़ा - हा, हा , हा , देख छोटे , कल को मेरी फैमिली बढ़ेगी, फिर तेरी फॅमिली बढ़ेगी , तो क्या हम दोनों का प्यार कम हो जायेगा। होने भी मत देना।  है ना।
छोटा - नहीं भैया , हम दोनों का प्यार कभी कम नहीं होगा।
                      (दोनों गले लग जाते हैं)

                                                                                -    अभय सुमन " दर्पण"



Tuesday, August 27, 2019

कहानी - क्लास टीचर

रिटायर्ड  प्रोफेसर  बी. एन. शर्मा,
308, मयूर विहार , शिमला

घर के बहार लगे इस नाम को देखकर सौरभ ने घंटी दबा दी।

टिंग - टाँग।
दरवाजे की घंटी तीन बार बज चुकी , लेकिन कोई आया नहीं। सौरभ वापस जाने की सोच ही रहा था की दरवाजा खुलता है। एक अधेड़ व्यक्ति दरवाजे से बाहर आकर  पूछता है   "कौन".
"सर मैं सौरभ सिंह " उसने कहा
"कौन सौरभ मैंने पहचाना नहीं" उस अधेड़ व्यक्ति ने कहा।
" सर आपका student , Back Bencher ." सौरभ ने मुस्कुराते हुए कहा
कुछ सोचते हुए उसने कहा   "अच्छा बैक बेंचर सौरभ ? How are you my son.
"Good Sir " सौरभ ने कहा
"कालेज के सिर्फ तुम्ही दोनों मुझे याद हो, एक बैक बेंचर सौरभ और एक फ्रंट बेंचर राहुल " उसने कहा " आओ अंदर आओ" दरवाजे से हटते हुए प्रोफेसर ने कहा।
सौरभ घर के अंदर आकर सोफे पर बैठता है और पुरे घर को देखता है.
"क्या लोगे, चाय,काफी या विह्स्की " प्रोफेसर ने पूछा
"सर कुछ नहीं! बस आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी। काफी खोजने के बाद आपका पता कालेज के पीयून सर सियाराम जी से मालूम हुआ और ढूंढते ढूंढते मैं यहाँ आ गया। " अजय ने कहा
"हाँ कॉलेज से रिटायर्ड होने के बाद यहाँ आ कर बस गया "  प्रोफेसर ने कहा
तभी सौरभ की निगाह एक फैमिली फोटो पर गयी।
"मैम और बच्चे कहाँ हैं " अजय ने कहा
"सुनीता को गुजरे पांच साल हो गए और एक बेटा है वो अमेरिका में सेटल हो गया" फिर धीमी हंसी से कहा " वो भी फ्रंट बेंचर था। माँ के गुजरने के बाद कभी नहीं आया , कभी कभी फ़ोन कर लेता है। हाँ तुम्हारे साथ का फ्रंट बेंचर राहुल वो भी तो अमेरिका में है, किसी से सुना था।"  प्रोफेसर ने गर्व से कहा।
"और तुम क्या कर रहे, कहीं जॉब मिली या नहीं " प्रोफेसर ने पूछा
"सर, आप तो जानते हैं , मैं बैक बेंचर था, और आप कहा करते थे " my dear student, एक बैक बेंचर और फ्रंट बेंचर कभी दोस्त नहीं होते।" सौरभ ने स्टाइल से कहा
"हाँ कहता था मैं, और ये समाज की सच्चाई है , प्रोफेसर ने कहा।
"सर, जब मेरी एक गलती पर आपने मुझे कॉलेज से सस्पेंड कर दिया तो मैं बिलकुल टूट चूका था।  मैं अपने जीवन का अंत करने का सोच रहा था. फिर आपकी सिखाई एक बात ने मुझे हिम्मत दी कि " जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है।"  मेरे पापा की छोटी सी बिज़नेस थी, मैंने वहां बैठ कर काम सीखा और फिर धीरे धीरे काम को बढ़ाया।  आज पंद्रह देशों में एक्सपोर्ट का बिज़नेस है। करोड़ो का टर्न ओवर है।  उसने शांत भाव से कहा।
"और कॉलेज की पढाई " प्रोफेसर ने आश्चर्य से पूछा
" कहाँ पूरी कर पाया सर, पूरी तरह टूट चूका था मैं, लेकिन आपकी सिखाई अच्छी बातो को धरोहर बना कर रखा हूँ आज तक।" सौरभ ने कहा
"लेकिन मैंने तो काफी बुरा किया था तुम्हारे साथ " प्रोफेसर ने कहा
" नहीं सर, वो मेरे जिंदगी का एक सबक था। आज जिंदगी का कोई भी रिजेक्शन (rejection) मुझे तोड़ नहीं सकता। क्लास में बैक बेंचर था तो क्या हुआ , जिंदगी के रेस में कभी बैक बेंचर नहीं रहा।" सौरभ ने कहा
" अच्छा लगा तुम्हारा confidence देखकर।  जिंदगी सभी को बराबर मौका देती है।  सैकड़ो उदहारण हैं जहाँ बैक बेंचर ने इतिहास रचा है "  प्रोफेसर कुछ सोचते हुए  "sorry  my son, मेरी एक गलती ने तुम्हे काफी दुःख दिया"
 "No सर, मुझे कोई गिला नहीं, जीवन के उस मोड़ ने मुझमे काफी बदलाव लाया और मैं बैक बेंचर से फ्रंट रनर बना। " सौरभ ने कहा
"देखो my son , मैं गलत था , कोई फ्रंट बेंचर या बैक बेंचर नहीं होता , सबकी अपनी खासियत और अहमियत होती है। हर इंसान अपनी खूबी लेकर जन्म लेता है , बस उसे पहचानना होता है। " प्रोफेसर ने कहा
"ठीक है मैं चलता हूँ, हाँ ये एक छोटा सा गिफ्ट है आपके लिए, ना मत कीजियेगा" अजय ने एक पैकेट दिया
Happy Teachers Day , आज teachers day है सर। " अजय ने कहा
हा हा हा, अच्छा तो तुम्हे याद था। खुशी हुई। आजकल तो कोई टीचर को याद भी नही करता।God bless you  सौरभ ," प्रोफेसर ने कहा
सौरभ घरसे बाहर आता है और मन में सोचता है "जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है".

                                                                                   -  अभय सुमन "दर्पण"

Monday, June 24, 2019

Rape - A discussion

चार दोस्त एक ऑफिस में बैठे हैं।  एक मोबाइल देख रहा था , एक कागज पर ड्राइंग बना रहा था , एक लड़की ऊँगली से खेल रही थी। चौथा सोफे पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था। 


मोबाइल ( राजेश) - अरे यार, अभी ब्रेकिंग न्यूज़ आयी है।  फिर एक चार साल की लड़की का रेप हो गया।  पता नहीं ये रेप होना कब बंद होगा।
ऊँगली (पूजा ) - अब तो ये रोज की बात हो गयी।  हर दिन कहीं न कहीं सुनने को मिलता है।  बहुत दुःख की बात है।
ड्राइंग (मनोज) - चलो यार , शाम में चौराहे पर कैंडल जलाते हैं।  अख़बार में और चैनल पर दिख जायेंगे और फेसबुक भी अपडेट कर देंगे।  पिछली बार जब दिल्ली में रेप हुआ था तो मैंने कैंडल मार्च किया था और फेसबुक पर डाला था।  हजारो में लाइक चला गया था।
राजेश - हाँ यार , गूगल में इवेंट क्रिएट कर देते हैं , कई सारे लोग इकठ्ठा हो जायेंगे। और इसे देखो ( आखबार पड़ने वाले को देखकर ) इसे तो कोई फर्क नहीं परता , अख़बार पढने में ब्यस्त है।  हा  हा  हा ।
मनोज - अरे बोलो भाई , तू भी चलेगा न कैंडल मार्च में।
अख़बार (अनूप ) -  (सर उठा कर) जरूर चलूँगा, पर उस चार साल की लड़की के लिए  नहीं, उस चार साल की बच्ची के लिए।
पूजा - क्या फर्क पड़ता है, लड़की थी या बच्ची।
अनूप (गुस्से से) - फ़र्क़ ? मुर्दे हो तुम सब।
मनोज - अरे यार , तू तो इमोशनल हो गया।  रेप ही तो हुआ है।  कोई पहाड़ तो नहीं टुटा।  हर दिन कहीं न कहीं रेप होता है।  चल यार चिल मार।
अनूप - हाँ रेप ही तो हुआ है।  सच कहा तुमने।  कहीं दो साल की बच्ची के साथ , तो कहीं चार साल, तो कहीं आठ साल।  हाँ रेप ही तो हुआ है।  और हां एक बार तो छह महीने की बच्ची का भी सुना था।  (pause )
जब तुम्हारी छोटी सी बेटी की तबियत ख़राब होती है तो तुम पागलो सा डॉक्टर के चक्कर लगाते हो।  जब उसे कहीं चोट लगती है और खून निकल आता है तो सोचते हो की काश वो चोट तुम्हे लगी होती। और कह रहे की रेप ही तो हुआ है। मुर्दे हो सभी, तुम और ये समाज।
पूजा - पर हम क्या कर सकते , शाम में तो कर रहे कैंडल मार्च।
अनूप - हाँ , क्या कर सकते।  वो बच्ची भी क्या कर सकती थी। (भावुक होकर) , सिर्फ चार साल उम्र थी उसकी और ! और उसके ऊपर एक बिभत्स्य सा आदमी चढ़ा हुआ।  कितना तड़प रही होगी, कितना कराह रही होगी।  उस चीत्कार को एक कैंडल जला कर बुझा देना चाहते हो।  मुर्दे हो तुम सब ( लगभग चिल्लाते हुए) , सोचो जब उस फूल सी बच्ची पर वो हैवान चढ़ा होगा तो उस बच्ची की पीड़ा क्या रही होगी।  जब उसके शरीर को नोचा जा रहा होगा तो उसकी रुदन कैसी रही होगी।  (कहकर रोने लगता है)  (pause) बस सिर्फ उसे याद कर रही होगी।

पूजा - हाँ, ईश्वर को याद कर रही होगी।

अनूप - ईश्वर ? हाँ अपने ईश्वर मम्मी पापा को याद कर रही होगी। कहती होगी, कहाँ हो मम्मी , कहाँ हो पापा।           मुझे बचा लो।  मैं मर रही।  मैं यह दर्द बर्दास्त नहीं कर पा रही।  कुछ तो करो पापा , कुछ तो करो मम्मी।           मुर्दा है ये समाज, ये मुर्दो की बस्ती है।  बस कैंडल मार्च करो और फेसबुक अपडेट करो।

राजेश चल कर आता है और अनूप के कंधे पर हाथ रखती है।

राजेश - कह तो तुम ठीक रहे , लेकिन हम क्या करे। जब रेप करने वाले की मालूम है की अदालत में दसियो साल लग जायेंगे ये साबित करने में की उसने रेप किया भी या नहीं। जज साहेब सबूत पर सबूत मांगेंगे।  तब तक उस बच्ची का , उस लड़की का पता नहीं कितनी बार मानसिक रेप हो चूका होगा।  रेप करने में दस मिनट और साबित करने में दसियों साल। उसने सिर्फ एक बार रेप किया लेकिन अदालत, न्यायपालिका  न जाने कितनी बार रेप करता है।  सच कहा तुमने मुर्दे हैं सब।

पूजा - सिर्फ न्यायपालिका ही क्यों , ये पुलिस तंत्र भी तो लोगो पर सिर्फ हंटर चलना जानती है।  नेताओ और पहुंचवालो की चमचागिरी , वसूली , भ्रस्टाचार से फुर्सत मिले तो आम जनता की सुध ले।  FIR तक दर्ज नहीं होती। कौन था , किस जात का था , किस धर्म का था, हुआ भी था या नहीं।  फिर किसी नेता का केस कमजोर करने का दबाब।  तब तक तो कितनी बार रेप हो चूका होता है।

मनोज - हाँ थोड़ा मीडिया वाले केस हाईलाइट न करे तो लोगो को मालूम ही न चले।

अनूप - हा हा  हा  , मीडिया , वही मीडिया न जो TRP  के चक्कर में दिन रात लगी रहती है। गाला काट COMPETITION  ने इतना अँधा बना दिया है की बस चैनल पर कुछ लोगो को बिठाकर , बहस करा कर , बार बार भुक्तभोगी का रेप करते रहते हैं।  और नेताओ का क्या है , कोई कहता है , " बच्चे हैं गलतियां हो जाती है", तो कोई और कहता है "ये तो छोटी मोटी  बात है"। और हम सब गर्व करते हैं की हम सभ्य समाज में रह रहे।  ये है  तुम्हारा - हमारा सभ्य समाज।  लेकिन मैं कैंडल नहीं जलाऊंगा , मैं मार्च नहीं करूँगा। मैं किसी से शिकायत नहीं करूँगा।  मैंने आज एक फैसला लिया है।

सभी - वो क्या

अनूप - अब मैं... , अब मैं.....

                       
                           ......... To  Be  Continue .


                                                                 (अभय सुमन दर्पण )



Wednesday, June 19, 2019

love and love - EPISODE 2 (CLKK)

                                    सीन -१  (२  मिनट )

पार्क का सीन 

एक लड़का और एक लड़की पार्क के बेंच पर बैठे है 
लड़का - पूजा।      I  MISS YOU  
लड़की - हाँ  sonu। I  ALSO MISS YOU 
लड़का - बस आज का दिन और हम कल जुड़ा हो जायेंगे। 
लड़की - लेकिन मैं आउंगी , तुमसे मिलने, अपने प्यार से मिलने। 
लड़का - हाँ , बस कुछ सालो की बात है।  मैं इंजीनियरिंग पढ़ने बंगलोर जा रहा लेकिन आऊंगा और तुम्हे अपना बनाऊंगा।  मेरा इंतजार करना, करोगी ना ? 
लड़की -  मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ , वो समय भी आएगा जब मैं सिर्फ तुम्हारी बनूँगी , सदा सदा के लिए  . लव यू sonu।  ये मेरा वादा है
लड़का - लव यू टू ।

दोनों अपना हाथ एक दूसरे के उपर रखते हैं 

                               सींन  - २      (३ मिनट)

एक कमरे में पंडित जी कुछ ढूंढ रहे हैं तभी एक किताब गिर जाती है , उसमे एक फोटो होती  हैं।  पंडित जी देखते जाते हैं और गुस्से में चेहरा लाल होता जाता है।  फिर चिल्लाते हैं 
पंडित जी - पूजा...
दूसरे कमरे से लड़की आती है  -  जी बाबू जी। 
पंडित जी - ये क्या है (फोटो  दिखाते हैं ), तुम सोनू से मुहब्बत करती हो ?
पूजा (शर्माते हुए) - जी बाबूजी (आँचल मुँह मे दबा कर)
पंडित जी - तुम्हे मालूम है न वो कायस्थ है।  एक पंडित की बेटी कायस्थ के घर की बहु  बनेगी।  चार लोग क्या कहेंगे। 
पूजा - बाबूजी , मैं उन चार लोगो को देखुंं या अपनी खुशी। 
पंडित जी - जुबान लड़ाती है, जल्द ही तेरी शादी किसी पंडित के बेटे से करता हूँ , अगर नहीं मानी तो मेरा मरा मुँह देखेगी। 
पूजा - (रोते हुए ) - बाबूजी

  background में किसी शादी की धूंधली विडिओ चल रही है और शहनाई की आवाज आ रही। 
                                                 
                                                                 
                              सीन - ३      (३ मिनट)

 सुहागरात का सीन

एक बेड सजी है और दुल्हन बैठी है , एक पंडित टाइप का लड़का बेड के चारो तरफ घूम रहा और मंत्र पढ़ रहा और भुनभुना रहा , लड़की सोच रही , " ये कब आ कर मेरा घूँघट हटाएगा , एक घंटे से पता नहीं क्या पढ़ रहा।
तभी पंडित बोलता है , " हो गयी सिद्धि , अब मुझे जरूर पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।  लेकिन मुहूर्त तो सुबह ३ बजे  का निकला है , तब तक नीचे बैठ कर इंतज़ार करता हूँ।"
लाइट डिम हो जाती है. फिर घडी तीन बजती है।  वो उठ कर बेड पर जाता है तो देखता है दुल्हन सो चुकी है।  वो उसे जगाता है लेकिन वो सोइ रहती है।  वो सर पकड़ कर बैठ जाता है और बोलता है , अरे सुबह मुहूर्त निकलती जा रही, अब क्या होगा।  (रुआंसा हो जाता है )

                   सीन  ४    (२ मिनट)

 पंडित पति   - अरी  ओ  पंडिताइन , दरवाजा खोलो। 
                 (पूजा दरवाजा खोलती है )
पंडित जी - देखो तो पंडिताइन , आज कितना चढ़ावा मिला है। चावल, दाल , दक्षिणा और ये साडी , हाँ तीन चार सौ की तो होगी ही। 
             (पूजा मुँह बनाते हुए अंदर आती है ) पंडित जी साडी लेकर उसके सर पर रखते है और कहते हैं , आज इसी साडी से तुम्हारा श्रृंगार  करूंगा। 
पूजा सोचने लग जाती है - ( इन चार लोगो के चक्कर में बाबूजी ने कहाँ मेरी शादी करा दी।  अगर इन चार अनदेखे लोगो का ख्याल नहीं करते तो मेरा पति कोई और होता और मैं अपने पिया की सजनी होती )
  मुँह बनाती है - हूँह  

                सीन  - ४    (२ मिनट)

टिंग - टोंग, दरवाजा खुलता है 
पंडित जी (पिता जी ) आते हैं और पूछते हैं।  कैसी हो 
पूजा  -   ठीक हूँ , आप ही का दिया प्रसाद खा रही हूँ। 
पंडित जी - मेरा दिया प्रसाद , क्या मतलब 
पूजा -छोड़िये  जाने दीजिये , मैं चाय बनती हूँ (उठ कर जाती है )
फिर कमरे में आते हुए। ...  एक ट्रे में चाय और चार लड्डू हैं , चारो लड्डू अलग अलग तरह के हैं। 
पंडित जी - ये चारो लड्डू अलग -अलग तरह के , लगता है पतिदेव काफी ख्याल रखते हैं। 
पूजा - किस बात का ख्याल , ये चारो लड्डू चार यजमान के घर के हैं।  पूजा पाठ  कर के चढ़ावे वाले।  आपने चार लोगो के चक्कर में कंहा मुझे फंसा दिया।  मेरे  मुताबिक शादी हुई होती तो मैं भी खुश रहती। 
पंडित जी - हाँ बेटा , गलती हो गयी।  ये चार लोग क्या कहेंगे के विषय में न सोचा होता तो कम से कम एक ही तरह के लड्डू खा रहा होता।  लड़का दूसरी जाति का था तो क्या हुआ, तू तो खुश रहती। 
पूजा - हाँ बाबूजी (कहकर गले लग जाती है )