Sunday, December 30, 2018

इश्क - कविता

कोई इश्क़, सिर्फ इश्क़ के लिए इश्क़ करता है।
कोई जीतने पाने की हसरत लिए इश्क़ करता है।
ख्वाहिशे के समंदर तो होती है दोनों में बराबर।
कोई फ़ना तो कोई खता-ए-वफ़ा कर जाता है।

कोई इश्क़ नदिया बन सागर में मिल जाता है।
कोई इश्क़ बर्फ् बन रिस-रिस पिघल जाता है।
हर इश्क़ में होती है गांठ और गिरह मुकद्दर् की।
कोई उलझा तो कोई ख़ामोशी से निकल जाता है।

हर दीये की फितरत है खुद को जला मिटा लेना
जब कोई तव्वसूम चेहरा दिल मे घर बना लेता है।
हर इश्क़ को नहीं मिलता बाहों का बेताज समंदर
कहां शर्तो तकरीरों पर सदा इश्क़ हुआ करता है।
                                         -- अभय सुमन "दर्पण" 









Tuesday, December 18, 2018

कविता - स्वेटर


ऊन की उलझी-सुलझी ये गोले
गिरती,संभलती,इठलाती कभी
नए जाल और रिश्तों को रचती
रंग-बिरंगी अनमोल ये स्वेटर

काँटों संग खेलती-टकराती कांटे
बनती दरो-दिवार और इमारते 
नये नये डिजाइन के संग
सुर्ख पैगाम,दिलो-जान है स्वेटर


माँ के हाथों से गुंथी,  बुनी
नाप पर नाप लेती धुनी
उन नर्म मखमली एह्सासो का
कोमल,सुखद अहसास है स्वेटर

कहाँ दिखती उन काँटों की मोहब्बत
सुलझती-बिगड़ती नयेपन की चाहत
पैसों की खनकती हंसी में दबी
अब बड़े मॉल में तैयार है स्वेटर

                ---   अभय सुमन दर्पण

Saturday, November 10, 2018

मैं औरत हूँ - कविता

मैं औरत हूँ , मैं औरत हूँ ,
मैं औरत हूँ , मैं औरत हूँ ,


मैं ताक़त हूँ, मैं हिम्मत हूँ
मैं कोमल हूँ, मैं शिखचंडी
मैं शीतल हूँ, मैं तापपूर्ण
मैं खिली हँसी, मैं आँचल हूँ
मैं मातृ छांव. मैं धरती हूँ
मैं जननी हूँ, मैं चंचला हूँ
मैं दुर्गा हूँ, मैं विद्या हूँ
मैं धनवर्षा, मैं संतोषी
मैं राधा हूँ, मैं मीरा हूँ
मैं सीता और सावित्री हूँ
मैं मेनका और ऊर्वशी हूँ
मैं माँ भी हूँ, मैं बहु भी हूँ
मैं बेटी हूँ , मैं बहना हूँ
मैं मम्मी की, मैं पापा की
मैं घर-आँगन फुलवारी की
मैं माटी हूँ, मैं गहना हूँ
मैं रजिया सुल्ताना
मैं वीरा हूँ, मैं झाँसी हूँ,
मैं वीर पद्मिनी, जौहर हूँ
मैं इंदिरा हूँ, मैं सानिया हूँ
मैं सोच हूँ एक, मैं भोर हूँ एक
मैं प्रीतम की, मैं साजन की
मैं यौवन हूँ , मैं लज्जा हूँ
मैं सौंदर्य बोध, मैं श्रृंगार में हूँ
मैं कला में हूँ, मैं रास-रंग
मैं भ्रमर गीत, मैं जीवन संगीत
मैं सुर में हूँ, मैं ताल मे हूँ
मैं माता हूँ, मैं दाता हूँ
मैं जज्वा हूँ , मैं ममता हूँ
मैं कल्पना में, मैं हकीकत हूँ
मैं फिक्र भी हूँ, मैं जिक्र भी हूँ
मैं पूजा में, मैं बाटी में
मैं यत्र तत्र ,मैं चहुँ ओर
मैं बहती नदियां और धारा हूँ
मैं गंगा हूँ, मैं यमुना हूँ
मैं बृद्धा और जवानी हूँ
मैं इश्क विश्क, मैं अहले वफ़ा
मैं रूह फ़ना, मैं कायनात
मैं आज भी हूँ, मैं कल भी थी
मैं आने वाले, पल में भी
मैं सखी रूप, मैं सहयोगी
मैं प्रेम गीत, मैं प्रीत-मीत
मैं तेज धुप, मैं छौंव भी हूँ ,
मैं पत्नी रूप ,मैं प्रियतमा
मैं सोलह श्रृंगार, मैं विध्वंस रूप
मैं सिमटी सिमटी, मैं लाज रूप
मैं दिल में हूँ, मैं धड़कन में
मैं अर्धांगिनी, मैं मृगनयनी
मैं फूलों में, मैं कलियों में
मैं भंवरो के स्पंदन में
मैं प्रेम में हूँ, मैं विरह में भी
मैं बलखाती, मैं मदमाती
मैं माया हूँ ,मैं छाया हूँ
मैं सोते बच्चो के आँखों में
मैं ख्वाब भी हूँ, मैं नींद भी हूँ
मैं थपकी में , मैं लोरी में
मैं आंसू में, मैं क्रंदन में
मैं पायल में, मैं बिंदी में
मैं दहकते जिस्म के शोलों में
मैं भीड़ में भी, मैं तन्हा भी
मैं देह भी हूँ, मैं रूह भी हूँ
मैं औरत हूँ , मैं औरत हूँ ,
मैं औरत हूँ ,मैं औरत हूँ ।
                          --- अभय सुमन "दर्पण"

Monday, October 1, 2018

"रेप" एक स्याह सच - कहानी

"मम्मी-मम्मी उसने मेरी पीठ में चिकोटी काटी", शिखा ने लगभग चीखते हुए कहा।
"किसने-कौन", आरती ने पलट कर पूछा।
"वो मम्मी, ब्लू शर्ट वाला " शिखा ने जोर से कहा
"अरे रुक " सोनिया उसकी तरफ दौड़ी।
लेकिन तबतक वो भीड़ का फायदा उठा कर भीड़ में गुम हो गया था। आज 15 अगस्त की छुट्टी की वजह से मॉल में भीड़ भी बहुत ज्यादा थी। काफी दिनों के बाद आरती अपने चौदह साल की बेटी के साथ एक बड़े से मॉल में उसके लिए ड्रेस खरीदने आयी थी। दो साल हो गए शिखा के पापा को गुजरे तब से दोनों में माँ बेटी से ज्यादा दोस्त का रिश्ता बन गया था। बेटी के चेहरे पर एक शिकन बर्दास्त नहीं थी आरती को। पति क्लास टू आफिसर थे, इसीलिए अच्छी खासी पेंशन और पैसा छोड़ गए थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। पर बड़ी होती बेटी की चिंता हमेशा सताती रहती थी, खासकर आज कल के माहौल में। अभी शिखा सिर्फ चौदह साल की थी, लेकिन लोगो की भेदती निगाह आरती अच्छे से पकड़ लेती थी। उसे हमेशा डर सताता की उसकी बेटी, कम उम्र में ही बड़ी न हो जाये। अभी जो शिखा की चीख सुनी तो उसका डर सच में बदलने लगा। अभी तो उसके शरीर में बस थोड़ा सा बदलाव हुआ है और उसकी मानसिक यंत्रणा शुरू। किसी तरह आरती ने शिखा को समझाया और मॉल मैनेजमेंट से शिकायत दर्ज की। 
घर पहुँच कर दोनों ने डिनर किया और दोनों शांत बैठे रहे। दोनों के मन में कुछ उधेरबुन चल रही थी।
तभी शिखा ने तन्द्रा भंग कर आरती से पूछा, "मम्मी उसने मुझे चिकोटी क्यों काटी।"
"कुछ नहीं बेटा, कुछ लोगो के मम्मी पापा उसे अच्छी शिक्षा नहीं देते, इसीलिए वो लोग ऐसा करते हैं " आरती ने कहा।
"नहीं मम्मा, कुछ और बात है ", शिखा ने कहा।
आरती का दिल धड़क उठा, पूछ उठी, "क्या "
" वो मेरा रेप करना चाह रहा था " , शिखा ने कहा।
"नहीं बेटा, ऐसा नहीं बोलते। हम जहाँ रहते हैं ,वहां कुछ अच्छे लोग होते हैं और कुछ बुरे", आरती ने कहा।
"नहीं मम्मा, मैंने TV के न्यूज़ में देखा था, एक बच्ची के साथ रेप हुआ था। मैं भी तो बच्ची हूँ " शिखा ने कहा। 
"हां बेटा, तू मेरी बच्ची नहीं मेरी जान है ,मेरा सब कुछ है" कहकर आरती ने शिखा को बाहों में समेत लिया। मन में एक डर और कई सवाल आरती के दिमाग में घूम रहे थे। सबसे बड़ा डर की कबतक और कहाँ तक मैं साथ रहूंगी। अभी चौदह की है ,कल सोलह फिर बीस......। कहाँ तक मैं साथ चलूंगी। हर दिन कुछ न कुछ सुनने को मिलता है। कल ही तो अख़बार में आया था की किसी बच्ची का अपहरण हो गया। कुछ साल पहले के दिल्ली के निर्भया कांड को कोई भुला नहीं अब तक। क्या हो गया है पुरुष के पुरुषत्व को। कहाँ चले गए द्रौपदी के लाज बचाने वाले श्री कृष्ण।
अगले दिन शिखा को स्कूल भेज आरती थोड़ा आराम करने लगी। आज उसकी तबियत भी कुछ अच्छी नहीं लग रही थी और कुछ बुखार सा लग रहा था। शाम में दोनों ने अपने दिन भर की दिनचर्या पर बाते की और सब कुछ सामान्य सा हो चला था। 
आज दो दिन हो गए थे आरती को बीमार पड़े। खाना बनानेवाली और कामवाली काम कर के चली जाती थी। लेकिन शिखा को स्कूल भेजना, टिफिन देना, फिर घर में भी कई काम और खुद बीमार इन सबो ने आरती को परेशान  कर रखा था। खुद से दवा ली थी लेकिन बुखार जाने का नाम नहीं ले रहा था। आज शाम में आरती ने डॉक्टर को दिखाने का सोच रखा था। दिन के एक बजे थे, तभी घंटी बजी। शायद शिखा स्कूल से आ गयी ये सोच कर आरती दरवाजे की तरफ बढ़ी, लेकिन शिखा तो तीन बजे आती है। अभी कौन आ गया, सोचते हुए आरती ने दरवाजा खोला तो एक लगभग पैतींस-छत्तिस साल का आदमी दरवाजे पर खड़ा था। 
"आप शिखा की मम्मी हैं", उसने पूछा। 
"हाँ, क्या हुआ शिखा को,कहाँ है वो ", आरती ने घबराते हुए पुछा। 
"घबराने की कोई बात नहीं, वो ठीक है। बस आपको मेरे साथ अस्पताल चलना पड़ेगा", उसने शांत भाव से कहा। 
"अस्पताल? क्या हुआ मेरी बेटी को, वो तो स्कूल गयी थी", आरती ने रोते हुए पूछा। 
"अरे आप चिंता ना करे, बस मेरे साथ चलिए" उस आदमी ने कहा। 
आरती तुरंत उस आदमी के साथ चल दी। अस्पताल पहुँच कर देखा तो शिखा एक बिस्तर पर लेती थी और उसके सर पर पट्टी बंधी थी। आरती दौर कर उससे लिपट गयी और रोने लगी। 
"ये कैसे हुआ शिखा", आरती ने रोते हुए पुछा "तुम तो स्कूल गयी थी"। 
आरती का मन घबरा रहा था, तरह तरह के बुरे ख्याल आने लगे। 
"कुछ नहीं मम्मा, बस थोड़ी सी चोट लग गयी है", शिखा बोली और धीमे से मुस्कुराई।
"लेकिन कैसे लग गयी और यहाँ " आरती ने सर छूते हुए कहा। 
"बस मम्मा, सुबह स्कूल जाने निकली तो सिर्फ तुम याद आ रहे थे और तुम्हारी तबियत", शिखा ने गहरी सांस लेते हुए कहा "मैं स्कूल के भीतर ना जाकर पास में डॉक्टर के क्लिनिक पर चली गयी ताकि तुम्हारी तबीयत उसे बता सकूँ। डॉक्टर के आने में एक घंटे की देर थी, मैं वहीँ बैठ गयी। वहां एक आदमी साफ़ सफाई कर रहा था। दस मिनट के बाद एक आदमी आया जो डॉक्टर का असिस्टेंट था। मेरे बारे में उसने सफाई वाले से पूछा फिर अंदर डॉक्टर वाले कमरे में मुझे बुलाया। मैं अंदर गयी और तुम्हारे बारे में सब बाते उसे बता दी। फिर उसने पूछा क्या मम्मी को सरदर्द भी कर रहा और ये कहकर मेरे सर को छूने लगा। मैं डर गयी और दरवाजे की तरफ जाने को हुई, तो वो मेरे हाथ पकड़ कर खींचने लगा। मैं तेजी से दरवाजे की ओर दौड़ी और टेबल से टकराकर गिर गई जिससे सर में चोट लग गयी। मैं काफी जोर से चिल्लाई, मेरी आवाज सुन कर वो सफाईवाला दरवाजा खोल कर अंदर आ गया। तभी उस सफाईवाले ने सब कुछ समझते हुए उस आदमी की पिटाई शुरू कर दी। तब तक कुछ लोग और आ गए थे और उसे पकड़ के पुलिस के हवाले कर दिए। बस मम्मा मुझे उस वक़्त सिर्फ तुम याद आ रहे थे" कहकर शिखा फूट फूट कर रोने लगी। 
"मेरे बच्चे इतना सब कुछ सह लिया तूने सिर्फ मेरी चिंता में, मुझे क्या हो जाता मामूली सा बुखार ही तो आया था। आज शाम में चली जाती डॉक्टर के पास, आगे से कभी ऐसा मत करना" आरती ने कहा। 
हाँ मम्मी, जिस सफाई वाले ने मेरी मदद की थी ये वही व्यक्ति हैं" कहकर शिखा ने उस व्यक्ति को देखा जिसने आरती को घर से बुलाया था। 
" मैं आपको कैसे धन्यवाद करूँ भैया", आरती ने उस आदमी से कहा,"आपका ये अहसान मुझ पर पूरी जिंदगी रहेगा "
"नहीं दीदी ऐसा मत कहो, मुझे मालूम है एक नारी का सम्मान और इज़्ज़त क्या होता है। अगर वो किसी की बहन-बेटी है तो क्या वो हम सब की बहन-बेटी नहीं। अगर सब ये सोचे तो क्या समाज का यह पाप नहीं मिट जायेगा", उसने कहा। 
तभी शिखा ने कहा, " माँ, मुझे रेप का थोड़ा मतलब तो मालूम हो गया है, पर हर पुरुष रेप नहीं करता। जिनके घर के दिए संस्कार अच्छे नहीं होते वही रेप करते हैं, वही बुरी नजर रखते हैं। घर से बाहर निकला हर पुरुष, किसी स्त्री को बुरी नजर से देखते वक़्त ये सोच ले कि उसकी बहन को भी कोई बुरी नजर से देख रहा होगा तो शायद उसकी सोच में बदलाव हो जाये और ये सीख सिर्फ उसके मम्मी-पापा ही दे सकते हैं"।
"तू बहुत बड़ी हो गयी है बेटा", ये कहकर आरती ने शिखा को बाँहों में भींच लिया। 

                                                                                                - अभय सुमन "दर्पण"


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Friday, September 7, 2018

अख़बार की छुट्टी - कहानी

सुबह के आठ बज चुके थे। शर्मा जी कुछ बुदबुदाते हुये अपने बॉलकनी में चहलकदमी कर रहे थे। सुबह से तीन कप चाय हो चुकी थी और तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा था। मिसेज शर्मा उनकी परेशानी देखकर तीन बार टोक चुकी थी। तभी सामने से निगम साहेब गुजरे, उन्होंने भी शर्मा जी को परेशानी से टहलते देखा और पूछ बैठे, " क्यों शर्मा साहब, सब ठीक तो है कुछ परेशान दिख रहे"। 
शर्मा जी बस उबल परे, "अब बताइये निगम साहेब, ये भी भला कोई बात हुई। कल ही कर्णाटक में सरकार गिरी है, सलमान के नए लव अफेयर शुरू हुए हैं। सब्जियां महंगी हुई है। भारत के क्रिकेट टीम की घोषणा हुई है। और... और देखिये आज की अख़बार नहीं आयी है। हर दिन तो सुबह छः बजे दे जाता था, लेकिन आज पता नहीं क्यों अब तक नहीं आया। 
निगम साहब ठठाकर हंस परे और बोले, "अच्छा तो ये कारण है आपके परेशानी का, अरे साहेब आजकल तो मोबाइल पर भी अख़बार आते हैं वहां देख लीजिये पर बी.पी. मत बढ़ाइये"। शर्मा जी झुंझला बैठे और कहा, "अरे कहाँ ? छप्पन की उम्र में मोबाइल ज्यादा समझ नहीं आता"। फिर मुस्कुराते हुए बोले, "भाई निगम साहेब, सुबह-सुबह अख़बार को छूना, उसकी सोंधी-सोंधी खुश्बू, पन्ने पलटना, साथ में चाय की चुश्की, भला इन सबों का मुकाबला क्या मोबाइल करेगा"। निगम साहब निरुत्तर हो गए और चलते बने। 
तभी मिसेज शर्मा ने आवाज दी "क्योँ जी, आज ऑफिस नहीं जाना। नहीं आयी अख़बार तो रास्ते में खरीद लेना। तुमने आज बी.पी. की गोली भी नहीं खायी। अब जल्दी तैयार हो जाओ।"
शर्मा जी ने गुस्से में कहा, "तुम्हे तो मालूम नहीं अख़बार की कीमत, दिन भर सास-बहु सीरियल में पड़ी रहती हो। जब से नेहा विदेश गयी है, अपना भी ख्याल नहीं रखते। हाँ, मुझे बी.पी. का पेशेंट जरूर बना दिए। आज तो लगता है पूरा दिन ख़राब हो गया। 
शर्मा जी जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल गए। आधे रास्ते में स्कूटर बंद हो गयी, देखा तो पेट्रोल ख़तम हो गयी थी। तब उन्हें याद आया की पेट्रोल तो दो दिन पहले रिज़र्व में आया था, उन्हें लगने लगा की शायद उनकी यादाश्त भी अब कम हो गयी है। आधे किलोमीटर पर पेट्रोल पंप थी, वहां तक इतनी तेज गर्मी में स्कूटर को ले जाना भी एक बड़े मिशन का काम था। खैर किसी तरह ऑफिस पहुंचे, बस थोड़ा लेट। 
बैठा ही था कि सिंह साहेब ने पूछा, " क्यों शर्मा जी, आज कहाँ लेट हो गए।
शर्मा जी ने कहा, "वो थोड़ी स्कूटर में दिक्कत थी, इसिलिए थोड़ा लेट हो गए। 
तभी किरण मैडम ने चुटकी ली, "स्कूटर ख़राब थी या गर्ल्स कॉलेज के चक्कर लगाते आ रहे।"
बस शर्मा जी बिफर पड़े, "बस यही एक काम बाकी रह गया है, ठीक है कल से वो भी कर लूँगा। आपकी भी कोई दोस्त वहां प्रोफेसर हो तो बता दीजियेगा मिल भी आऊंगा। 
उन्हें गुस्से में देख सब शांत हो गए, धीरे-धीरे सब अपने काम में लग गए। आज ऑफिस में भी उनका मूड सही नहीं था। 
शाम में घर पहुंचे तो पत्नी से पुछा, "अख़बार आया की नहीं ?"  
पत्नी ने कहा, "आज तो दिया नहीं"। 
बस उनका बड़बड़ाना शुरू हो गया। थोड़ी बहुत सही मूड थी, वो भी ख़राब हो गयी। पत्नी ने सोचा, आज तो रात का खाना भी ख़राब हो गया। मालूम होता तो बाहर से एक अख़बार खरीद कर ले आती। किसी तरह रात बीती। शर्मा जी सुबह जल्दी जग गए और पांच बजे से ही बालकनी में बैठ गए, बस छः बजने का इंतजार कर रहे थे। मिसेज शर्मा ने एक कप चाय बना कर दी। बड़े अनमने ढंग से शर्मा जी ने चाय पी, लेकिन उनकी निगाहे हर अख़बार वाले पर और कान साईकल की घंटी पर। सुबह के सात बज चुके थे, लेकिन अभी तक आज की अख़बार नहीं आयी। मिसेज शर्मा तीन कप चाय दे चुकी थी। तभी  7.30 बजे एक बारह साल का लड़का गेट पर घंटी बजाया। 
"कौन है ?"   शर्मा जी ने पूछा। 
"साहब, आज की अख़बार है।"  एक मासूम सी आवाज आयी। 
तभी मिसेज शर्मा भी बालकनी में आ चुकी थी। देखी एक भोला सा सांवले रंग का लड़का गेट के दरवाजे पर खड़ा है। 
" इतनी देर से क्यों आये और सूरज कहाँ है जो अख़बार देता है और कल की अख़बार कहाँ है" शर्मा जी की तेज आवाज एक सांस में गूंजी।
" साहेब, बाबूजी का परसो रात एक्सीडेंट हो गया था। उस समय से सिविल अस्पताल में भर्ती हैं, अभी भी बाबूजी  अस्पताल में ही हैं, कल इसिलिये नहीं आया। अब अख़बार नहीं बाटूंगा तो खाऊंगा क्या।" उसने भोलेपन से कहा। 
तभी मिसेज शर्मा ने कहा, "कोई बात नहीं बेटा, कुछ चाहिए तो बता देना। अपने बाबूजी का ख्याल रखना। अख़बार की चिंता मत करना।" ये कहकर उसने शर्मा जी की तरफ देखा। 
शर्मा जी अख़बार पाकर कुछ शकुन में दिखे। 
मिसेज शर्मा ने उनसे पूछा "आज बी.पी. की दवा खानी है की नहीं।" 
शर्मा जी धीरे से मुस्कुरा दिए और कहा "ऑफिस से आने के बाद सिविल अस्पताल चलेंगे सूरज को देखने।"
मिसेज शर्मा के चेहरे पर भी शकुन नजर आ रहा था क्योंकि अख़बार की छुट्टी ख़तम हो गयी थी।                                                              
                                   - अभय सुमन "दर्पण"                           

Sunday, August 12, 2018

कविता - पर्यावरण और स्वास्थ्य

हर कहीं धुआं , हर कहीं है धुंध,
कटते विशाल बृक्ष,और रेत हैं अनंत,
खांसते-कांपते युवाओं का है शोर,
ओढ़ी साखें बृक्ष की, धूल की परत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

प्रकृति का चित्र भी हो रहा विचित्र,
रुग्ण हुए गाँव, सिमट रहे हैं छांव
दुहता मनुष्य , वसुंधरा का वक्ष
चीत्कार रही धरती, सब का यही मत
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

भविष्य के नौनिहाल भी, कर रही पुकार
मत दो शौक से , मौत का ये हार
स्वस्थ हो  धरा, स्वस्थ रहे हम
करते हम प्रतिज्ञा, लेते हम शपथ
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

मनुष्य हो पशु हो ,पहाड़ या समुद्र,
निगलता समेटता, प्रदूषण का दंश,
पेट्रोल-डीजल कर रहे,इस जहाँ का अंत,
आओ रोशन हम करें,सोलर से जगत,
कम करो खपत, अब करो तेल बचत।

                      ---  अभय कुमार सुमन 

Sunday, July 22, 2018

देखो, इश्क की सुबह हो गयी - कविता

सूरज के पहले स्पंदन से,
भँवरों ने ली अंगराई है,
फूल कमल खिल आयी है,
लाज का घूंघट बिखर-सिमट गयी,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

              अलसाई उन नजरो में,
              ख्वाब सुनहरी मद्यम थी,
              मेरी आँखों के बंदन से,
              परिचय नयनों की हो गयी,
              देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

 तेरे आने में राज भी था,
 तेरे जाने में भेद भी है,
 चुपके से झलक को पाते ही,
 ख्वाब को पंख लग गई,
 देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               कदमो की आहट थी संभली,
               पायल भी थी थोड़ी खनकी,
               आतुर थी तोड़ने को हर बंधन
               प्रेम - अगन जग गयी
               देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

मिलन को व्याकुल अधरो में,
थरथराते अल्फाज़ भी थे,
खिली तबस्सुम चेहरे पर,
जब लवों की रंगत बदल गई,
देखो,इश्क की सुबह हो गयी।

               -  अभय सुमन "दर्पण"








Friday, July 13, 2018

ट्रैन की नीचे वाली सीट - कहानी

शुक्ला जी की ट्रैन की टिकट कन्फर्म हो गयी थी। काफी मुश्किल से तत्काल में कल टिकट बनवायी थी वो भी वेटिंग में। लखनऊ से भोपाल जाना था तीन बच्चे और पत्नी के साथ, किसी रिश्तेदार की शादी में। पहले तो ना-ना होती रही, लेकिन अन्त समय में प्लान बन ही गया। यहाँ भी तो छोड  कर जाया नहीं जा सकता था। अमीनाबाद में इतने बड़े किराने की दुकान किसके भरोसे छोड़ कर जाता। खैर अब तो निकल चुके थे। ए.सी. में टिकट नहीं मिल पाया तो स्लीपर में लेना पड़ा, सोचा चलो रात भर की यात्रा है किसी तरह काट लेंगे।
रात के दस बज चुके थे, सभी अपने बिस्तर लगा कर सोने की तैैैयारी में लगे थे। शुक्ला जी को पांच सीट में सिर्फ एक सीट नीचे की मिली थी और बाकी सभी मिडिल और ऊपर की थी। नीचे वाली सीट पर अभी बच्चो ने कब्ज़ा कर रखा था।  अपनी बड़ी सी तोंद लेकर उनका ऊपर जाने का कोई इरादा नहीं था। बच्चे अपनी मस्ती में खिड़की के पास बैठकर बाहर का मज़ा ले रहे थे। तभी एक सज्जन उनके सीट पर कोने में बैठ गए।  शुक्ला जी ने थोड़ी सी घुरकी दी "भाईसाहब अपनी सीट पर बैठ जाइये"। उसने कहा "भैया वेटिंग है, किसी तरह रात काट लूँ"। शुक्ला जी के बैठे बैठे पेट में गैस बन रही थी, उन्होंने गुस्से में जोर से कहा "भाईसाहब नीचे वाली सीट को मैं छूने नहीं दूंगा।आप अपनी तशरीफ कहीं और ले जाएँ।  वो सज्जन उठकर कहीं और चले गए। शुक्ला जी ने बच्चों को डांट लगाई, "जाओ सब सो जाओ"। बच्चो को काफी मजा आ रहा था, काफी दिनों बाद कहीं घूमने जा रहे थे। पापा की डांट सुन कर सब खामोश हो गए। सभी ने अपनी अपनी बिस्तर लगाई और सोने चले गये। शुक्ला जी ने नीचे की बिस्तर लगायी और अपने तोंद सँभालते हुए सो गए। एक घंटे बीते होंगे की उन्होंने अपने पैर के पास कुछ सरसराहट महसूस किया। आँखे खोल कर देखा तो एक चौबीस-पचीस साल का युवक उनकी सीट के कोने में जगह बना रहा था। उन्होंने आव देखा न ताव, अपने पैर से उसे एक धक्का दे दिया। वो बेचारा नीचे फर्श पर गिर पड़ा।  उठते ही शुक्ला जी पर चढ़ बैठा "क्यूँ ताऊ, आपने धक्का क्यों दिया"। शुक्ला जी बौराये बैठे थे कहा "तुम मेरी सीट पर बैठे क्यों"। उसने पलट कर कहा "बैठा था तो कौन सा आपकी सीट लिए जा रहा था, एक तो गन्दी गैस छोर रहे, उस पर खर्राटे की आवाज, कोई शौक नहीं आपके पास बैठने की अगर मजबूरी नहीं होता तो"। बस शुक्ला जी उठ कर बैठ गए, लगे उससे बहस करने। इसी हो-हल्ले में काफी लोग जग गए और तमाशा देखने लगे। शुक्ला जी की पत्नी ऊपर वाली सीट से सारा तमाशा देख रही थी और कुछ बुदबुदा रही थी। तभी कुछ लोग उस युवक के पक्ष में आ गए और शुक्ला जी को भला बुरा कहने लगे। अब बात शुक्ला जी के बर्दाश्त से बाहर हो गया था, वो उठ कर बैठ गए और सारी लाइटें जला दी। शुक्ला जी अब पुरे मूड में आ चुके थे और बात अब हाथा-पाई तक आ चुकी थी। शुक्ला जी की पत्नी और तीनो बच्चे आँखे मलते अपने पिताजी को देख रहे थे। तभी किसी ने टिकट कलेक्टर को बुला लिया। अब टीटी साहेब, शुक्ला जी और उस युवक के झगड़े को निपटने में लग गए। उस युवक ने बताया की किसी इंटरव्यू के सिलसिले में भोपाल जा रहा था, परसो ही मालूम चला और एकाएक जाना पड़ा। उसने टीटी से काफी अनुरोध किया कि एक सीट मिल जाये तो आराम से कल इंटरव्यू दे दूँ। वैसे ही आधा मूड ख़राब हो चूका था। उधर शुक्ला जी अलग भन्नाये बैठे थे। भीड़ काफी होने के कारण रास्ते में और दोनों सीट के बीच में नीचे काफी लोग लेते हुए थे। टीटी ने पहले सीट की असमर्थता व्यक्त की, फिर उस युवक को एक तरफ बुलाकर कहा कि, "बस पांच सौ रूपये दे दो तो मैं कुछ इंतजाम करूँ"। उस युवक ने कहा "लेकिन अंकल मैं इंटरव्यू के लिए जा रहा हूँ, गरीब परिवार से हूँ और गिनती के पैसे हैं। यह मुझ से सम्भब नहीं है"। सामने वाली खिड़की के साथ वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला लेटी थी। वो सारा हंगामा देख रही थी और टीटी की बातें सुन रही थी। उसने उस युवक से कहा, " कोई नहीं बेटा, तू मेरी वाली सीट पर बैठ जा मुझे मुंबई तक जाना है कल दिन में मैं सो लुंगी, लेकिन तेरा इंटरव्यू ख़राब नहीं जाना चाहिये। सभी लोग उस बुजुर्ग महिला की बात सुन कर काफी शर्मिंदा हुए। तभी टीटी ने कहा, "ठीक है मैं तुम्हे एक सीट दे रहा हूँ लेकिन कल इंटरव्यू में पास जरूर होना"। इधर शुक्ला जी के तेवर भी ढीले हो चुके थे, उन्हें भी लग रहा था की कुछ गलत कर दिया। उन्होंने भी कहा, "ठीक है बेटा बैठ जा मेरी थोड़ी सी जगह पर। वो युवक मुस्कुरा कर कहा, " नहीं अंकल आप आराम से सोयें, बस थोड़ा कम खायें। शुक्ला जी अपनी तोंद संभाले धीरे से मुस्कुराने लगे।

                                                                                              
                                                                                                      - अभय सुमन "दर्पण"

Friday, June 22, 2018

"नई बहु,नया दिन" - कहानी

"ठक ! ठक ! ठक !  भाभी दरवाजा खोलो"  रागिनी की हल्की धीमी आवाज ने नेहा को जगा दिया। 
फिर से आवाज आयी "भाभी दरवाजा खोलो, सब लोग आँगन में बैठे हैं, देर हो जाएगी"। 
नेहा ने बिस्तर पर उबासी ली, अपने अस्त व्यस्त कपड़ो को ठीक किया और दरवाजे को थोड़ा सा खोला। सामने छोटी ननद मुस्कुराते हुए धीरे से बोली "भाभी आठ बज चुके हैं, जल्दी से आ जाओ।  सब लोग इंतजार कर रहे, दिल्ली वाली मामी की ट्रेन का समय हो गया है, मिलना चाहती है"।
"बस रागिनी, पांच मिनट में आयी, तुम जाओ" नेहा ने कहा। फिर धीरे से दरवाजा बंद करके बिस्तर के पास आयी। देखा निखिल एक गहरी नींद लिए बिस्तर पर सो रहे थे। नेहा ने उसे एक प्यार भरी नजरो से देखा और उसके घुंघराले बालो में हलकी सी उंगली की फिर धीरे से उसे जगाया और बोली " मामी के ट्रेन का समय हो गया है ,मिल लो उनसे"।
निखिल ने आंखे खोल अलसाई नजरो से नेहा को देखा और उसे अपनी ओर खींच लिया। तभी दरवाजे पर फिर ठक ठक की आवाज आयी, "भाभी दरवाजा खोलो"। 
नेहा हड़बड़ाकर उठ बैठी और दरवाजे को धीरे से खोल बोली "अभी आयी बस थोड़ी देर"। 
तभी रागिनी दरवाजे के अंदर धड़धराते घुस आयी और बोली "भाभी, प्लीज जल्दी करो ना। अब दरवाजा बंद हुआ तो पता नहीं कितना समय लगे। इसीलिए मैं यही बैठती हूँ"।
फिर भैया को देखकर बोली "भैया तुम तो जानते हो मामाजी का गुस्सा"। 
"अच्छा बाबा चलो मैं चलता हूँ, नेहा तुम भी तैयार हो जाओ"  निखिल ने उठते हुए कहा ।
नेहा और निखिल की दो दिन पहले ही शादी हुई थी। दोनों पहली बार पंद्रह दिन पहले मिले थे, अपने इंगेजमेंट में। निखिल आर्मी में ऑफिसर था, काफी मुश्किल से बीस दिनों की छुट्टी लेकर आया था। गोरखपुर में अपना बड़ा पुश्तैनी मकान, बड़ा सा संयुक्त परिवार सब मिल-जुल कर रहते थे। नेहा लखनऊ की रहने वाली एक बड़े घर से ताल्लुक रखती थी। एकलौती संतान, पिता सरकारी अधिकारी, लखनऊ में आलीशान कोठी और ढेरों शानो-शौकत और अपने पापा के आँखों का तारा। जब छः साल की थी तभी माँ का देहांत हो गया। पिता ने दूसरी शादी नहीं की शायद ये सोच कर की नई माँ उसे प्यार दे पाए की नहीं। घर पर तो सुबह दस बजे के बाद ही नेहा की आँख खुलती थी। पापा कहते सो लेने दो मेरी बेटी को ,शादी के बाद पता नहीं कितने बजे जागना पड़े। 
एक हफ्ते से शादी की रस्मो रिवाज निभाते निभाते नेहा का बदन टूट रहा था। कल नेहा और निखिल की सुहागरात थी, रात पार्टी खत्म होते एक बज गए और जब दोनों कमरे में गए तो थक कर चूर। फिर बाते करते सुबह के पांच बजे जाकर सोना हुआ। दो तीन घंटे की नींद भी पूरी नहीं हुई थी की दरवाजे पर ठक ठक की आवाज ने जगा दिया। 
नेहा तैयार होकर कमरे से बाहर निकली, देखा आँगन मेहमानो से भरा हुआ था। तभी सासु माँ आकर बोली "बहु सभी बड़ो को प्रणाम कर के आशीर्वाद ले लो"। नेहा ने एक हलकी नजर डाली और गिनती की शायद तीस-बत्तीस लोग तो होंगे ही। निखिल पास आकर बोला, माँ मैं नेहा के साथ उसकी मदद करा देता हूँ। शायद यह बात पटना वाली मौसी ने सुन ली और बोली "निखिल तू रहने दे, देखूं तो सही बहु को कितना खिलाया पिलाया गया है"  फिर जोर से हंस दी। तभी छोटी बुआ ने कहा " सुना है बहु अपने घर दोपहर में जगती थी, अब तो भाभी को ही बहु के लिए खाना तैयार करना पड़ेगा"। नेहा इन सबों की अभयस्त नहीं थी। नया घर, नए लोग, नयी जिम्मेदारियाँ ये सोचकर वो चुप रही। निखिल ने सब सुन धीरे से नेहा की उंगली दबा दी, शायद एक भरोसे का इशारा था की मैं हूँ तुम्हारे साथ। किसी तरह दो घंटे नेहा ने वहां अपने समय को बिताया।  आँखों की नींद और थकान उसे वहां बैठने की इजाजत नहीं दे रही थी। निखिल ने यह बात समझ ली और उसे बहाने से कमरे में ले आया। आते ही नेहा निढाल हो बिस्तर पर सो गयी। निखिल को मैरिज रजिस्ट्रेशन ऑफिस जाना था कुछ फॉर्म भरने, वो चला गया।
दोपहर के डेढ़ बज चुके थे और नयी बहु का खाने पर इंतजार हो रहा था। नेहा को बुलाया गया, आयी तो देखा घर के सारे लोग बड़ी सी मेज के दोनों तरफ बैठे हैं शायद बीस-बाइस लोग होंगे। नेहा को थोड़ी असमंजस हुई शायद अकेले रहने के आदत के कारन।  उसके पापा ने शायद इसी लिए ऐसे घर में शादी की थी की उसे वो सब कुछ मिले जो वह दे नहीं पाए थे। वह बैठी ही थी की एक आवाज आयी "बहु सर के पल्लू पूरी तरह रखो यहाँ घर के कई बड़े बैठे हैं"। उसने देखा सबसे बड़ी चाची की निगाह उस पर ही थी, तभी छोटी चाची ने कहा "जाने दो दीदी घर में कोई बताने वाला नहीं होगा"। नेहा धड़कते दिल से सब सुन रही थी, तभी बड़ी चाची ने कहा "बहु सभी को सब्जी परोस दो"। तभी रागिनी ने कहा "रहने दो भाभी मैं कर देती हूँ"। वो उठी ही थी की बड़ी चाची ने कहा "घर के नियम मत तोड़ो रागिनी"। बड़ी चाची और बड़े चाचा का कहा घर में कोई नहीं काटता था। नेहा ने उठ कर सभी को सब्जी परोसना शुरू किया शायद पहली बार, तभी बड़े चाचा को देते समय उसके हाथ से सब्जी की हांड़ी गिर गई और वो भी बड़े चाचा के सिल्क के नए कुर्ते पर। उसे घबराहट में कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसने हांड़ी वहीँ टेबल पर रखी और तेज कदमो से अपने कमरे में चली गयी। उसे इस वक़्त सिर्फ अपने पापा की याद आ रही थी और आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। उसने तकिये में सर दबा लिया और अपने आंसुओ को बहने के लिए छोर दिया। थोड़ी देर हुआ होगा की उसने अपने कंधे पर किसी का हाथ पाया। उसने पलट कर देखा तो पीछे निखिल खरा था, अपना हाथ उसके कंधे पर रखे। नेहा की सूजी आँखे बहुत कुछ कह रही थी, बाकि उसे सब कुछ मालूम चल चूका था। उसने धीरे से नेहा को उठाया और कहा "मैं जानता हूँ तुम्हे तकलीफ पहुंची है, मैं ये भी जानता हूँ की तुम्हे इन सबो की आदत नहीं। ये भी सच है की तुम अपने घर में बड़े लाड़ प्यार से पली हो और अभी शायद तुम्हे अपने पापा की सबसे ज्यादा याद आ रही हो, लेकिन आज से ये घर भी तुम्हारा है। कई लोग हैं कई तरह की बाते हैं, उन सबो के बीच में तुम्हे अपनी जगह बनानी है। सबसे बड़ी बात ये कि तुम्हारे साथ हमेशा मैं खड़ा मिलूंगा एक भरोसे के साथ, एक विश्वास के साथ। तुम्हारे हर सुख-दुःख में खड़ा तुम्हारी हर उम्मीद और आशा के साथ"।
नेहा ने सारी बाते सुनी और अपने आंसुओ को पोछा, अपने पापा के बाद उसे किसी पर एक भरोसे का एहसास हो रहा था । उसने मन ही मन सोचा शायद नई बहु का नया दिन ऐसा ही होता होगा। उसने निखिल की आँखों में देखा और खुद को उसकी बाहों में सिमटा लिया एक नयी सोच के साथ।
                                     
                                                                                                        - अभय सुमन "दर्पण"

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Saturday, June 2, 2018

कविता - "दिल को रखो ताखे पर"

दिल को रखो ताखे पर
मनवा रखो बताशे पर
गोल गोल ये दुनिया है
झोल झोल ये लफड़े हैं
सोच समझकर बातें कर
तोल-मोल कर नाते कर
किसिम किसिम के लोग यहाँ
बड़े बड़े सब ढोल यहाँ
सूट-बूट में दंगल है
बहार हैं कुछ अंदर है
बनते सभी सयाने हैं
पहने फटे पजामे हैं
पूछ जरा सा उनका हाल
सूरत बेहाल,दिल है कंगाल
सोच न भाई ज्यादा कुछ
जीवन एक, मिली छुक-छुक
झूम ले, कर ले, मन की बात
नाच-कूद,कर रिमझिम बरसात
आएंगे भाई अच्छे दिन ,
रात है तो क्या सुबह नहीं
तो,दिल को रखो ताखे पर
मनवा रखो बताशे पर।



                           -      अभय सुमन "दर्पण"

Friday, April 13, 2018

लाल बत्ती

इस शहर में धूल ज्यादा है या पॉल्यूशन ये तो मालूम नहीं लेकिन जब भी हज़रतगंज चौराहे पर मेरी गाड़ी लाल बत्ती पर रूकती है और कोई दस साल का बच्चा गाड़ी के शीशे साफ करता है तो ये जरूर लगता है की हवा  साफ नहीं है। आज भी मेरी गाड़ी हज़रतगंज चौराहे, लाल बत्ती पर रुकी थी और मेरी सूनी आँखे किसी को ढूंढ रही थी। बस एक उम्मीद में कि शायद वो दिख जाये। 
मुझे याद आने लगा जब तीन महीने पहले मुझे रेलवे स्टेशन जाना था किसी को लेने, शायद कोई मित्र था। उस दिन शहर में धुल भरी आंधी चल रही थी और गहरे काले बादल भी मंडरा रहे थे। हज़रतगंज चौराहे पर मेरी गाड़ी रुकी थी और मैं ग्रीन सिग्नल का इंतजार कर रहा था। मेरी ड्राइविंग सीट के साइड वाले शीशे पर धूल की मोती परत जमा थी और बाहर कुछ दिख नहीं रहा था। तभी शीशे साफ होते गए और वो मुझे दिखा शीशे साफ करते हुए और फिर कुछ पैसे मांगते। 
"कुछ करते क्यों नहीं, भीख मांगते शर्म नहीं आती।"  मुझे बड़ी कोफ़्त हुई और दो बातें सुना गया, शायद मैं जल्दी में था। 
"भीख नहीं मांग रहा साहब, शीशे साफ किया है।" उसकी आवाज सुनी। 
मैंने न चाहते हुए उसे पांच रूपये दे दिया, लेकिन उसकी स्वाभिमान में डूबी आवाज मेरे दिल में बैठ गयी। 
ऑफिस मेरा कैंट रोड पर था और हर दिन मुझे उसी चौराहे से जाना होता था। अक्सर मुझे वो लड़का दिखने लगा और मैं उसे पहचानने लगा। मेरी गाड़ी जब भी लालबत्ती पर रूकती वो आता और शीशे साफ कर जाता फिर मैं कुछ पैसे दे जाता। अब तो उसे और मुझे इसकी आदत सी हो गयी थी। एक दिन मैंने उससे उसका नाम पूछा। 
"कोई भी किसी नाम से बुला लेता है, वैसे मेरे साथ के लोग राजू कह कर बुलाते हैं।" उसने  कहा
"और माता पिता।" मैंने पूछा
" माता-पिता का मालूम नहीं और एक चाचा हैं जो शाम में सारे पैसे ले लेते हैं।" उसकी आवाज में दर्द था। 
मुझे कुछ और पूछने का मन था लेकिन तभी ग्रीन सिग्नल हो गयी और मैं चल दिया। दिन भर यही सोचता रहा इतने तीखे नैन-नक्श, इतना साफ रंग जरूर किसी अच्छे घर का रहा होगा। हो सकता है अवैद्य संतान हो और किसी ने छोड़ दिया हो या माँ बाप से कहीं बिछड़ गया हो या किसी ने चुरा लिया हो। लेकिन ये सच है की किसी अच्छे घर में होता तो फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहा होता या किसी टीवी के रियलिटी शो में होता। अब तो हर दिन चौराहे पर उससे बात करता और मुझे देखकर वो भी दौरा चला आता। एक दिन ऑफिस में काफी मूड ख़राब था और थका भी था। लौटते वक़्त मेरी गाड़ी फिर उसी लाल बत्ती पर रुकी और वो मेरे पास चला आया। पता नहीं क्यूँ मैंने गाड़ी पार्किंग में खड़ी की और उसे अपने साथ लेकर एक अच्छे से रेस्टोरेंट में चला गया। मैंने कॉफी पी और उसे भर पेट खाना खिलाया। वो इसका आदी नहीं था और एक संकोच एवं कशमकश में खाये जा रहा था। 
मैंने पूछा "बेटा पढाई करना है।" 
वो कुछ समझ नहीं पा रहा था और मेरी बातों में बस सर हिला रहा था। शायद मुझसे ज्यादा ध्यान उसका खाने में था। खाना ख़तम करने के बाद हमलोग बाहर निकले और मैं कुछ सोचता हुआ उसे छोर अपने घर निकल गया। कल मुझे ऑफिसियल टूअर पर एक हफ्ते के लिए बंगलोर जाना था और घर पहुँच कर उसकी भी तैयारी करनी थी। अगले दिन मैं बंगलोर चला गया। 
एक हफ्ते बाद वापस लौट कर जब ऑफिस जा रहा था तो उस लालबत्ती पर मुझे वो नहीं दिखा। फिर जब शाम में घर जाने के लिए लौटा तब भी मुझे वो नहीं दिखा। ऐसे ही तीन-चार दिन बीत गए और मुझे वो नहीं दिखा। अब मन में कुछ संशय सा होने लगा परन्तु मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया शायद ऑफिस और घर के तनाव ने ज्यादा सोचने का मौका नहीं दिया। लेकिन छठे दिन भी वो नहीं दिखा तो मैं गाड़ी पार्क कर चौराहे पर पहुंचा। थोड़ी पूछताछ की लेकिन कोई भी बता नहीं सका, तभी उसके एक दोस्त पर मेरी नजर पड़ी। मैंने उसे बुलाया और जब उससे पूछा तो वो बताने लगा "साहब दस दिन पहले किसी राजनीतिक पार्टी की गाड़ियों का काफिला इधर से गुजर रहा था। वो सड़क किनारे खड़ा उन गाड़ियों को देख रहा था तभी किसी तेज गाड़ी ने आकर उसे जोर की टक्कर मार दी, अस्पताल पहुँचने के पहले ही उसने दम तोड़ दिया।" इतना कहकर वो रोने लगा। 
मैं अपने आँसुओ को सँभालने की कोशिश कर रहा था और कदम तो शायद वहीँ जम गए थे।  मैं बोझिल कदमो से घर वापस जाने की ओर मुड़ा, शायद एक दर्द को पीने की कोशिश कर रहा था। मन ही मन सोच रहा था कौन हैं ये, क्यों पैदा हुए ये, गाड़ी पोछने के लिए या गुब्बारे बेचने के लिए या लाल बत्ती और ग्रीन बत्ती के बीच के फासले को कम करने के लिए।

                                                                                                           -    अभय सुमन "दर्पण"

Tuesday, March 27, 2018

कामवाली की छुट्टी

सुबह के सात बजे थे। मिसेज चंद्रा चाय की पहली घूँट ले अखबार के पन्ने पलट रही थी। तभी  What's App की आवाज ने तन्द्रा भंग की। वैसे आज मिसेज चंद्रा काफी खुश थी, उनके भैया-भाभी अपने दोनों बच्चो के साथ दोपहर की ट्रैन से दिल्ली आ रहे थे। मिसेज चंद्रा ने काफी सारा प्लान बना रखा था, घूमने का और नए नए तरह के डिश बनाने का, वो भी अपने हाथो से। उन्हें काफी कुछ बनाने का शौख था और नयी नयी डिश सीखा करती थी। 
वो मोबाइल हाथ में ले What's App देखने को हुई, मन में आया शायद भैया का होगा ट्रैन की सुचना देनी होगी या किसी दोस्त की गुड मॉर्निंग वाली मैसेज। जैसे ही पहला मैसेज देखा, तो कामवाली "लल्लो" का था। दिल धरक उठा। शायद देर से आएगी, यह सोचकर उसने मैसेज देखी। 
" मैडम तबीयत अच्छी नहीं, चार दिन छुट्टी पर रहूंगी।"  लल्लो का मैसेज था। 
मिसेज चंद्रा ने गिन कर सात बार ये मैसेज पढ़ा। यही सोच रही थी शायद गलती से किसी और का मैसेज आ गया होगा। जब पूरी तरह विश्वास हो गया तो लल्लो को फोन मिलाया।  फोन उसके पति ने उठाया और बताया लल्लो की तबियत कल रात से खराब है, चार दिन डॉक्टर ने आराम को बोला है। मिसेज चंद्र को काटो तो खून नहीं, ये क्या हो गया, आज ही तबीयत ख़राब होना था। भैया को भी तो चार दिन ही रहना है। किचेन में बर्तन की ढेर लगी है, घर की भी सफाई फिर सबों के लिए खाना बनाना। भाभी वैसे ही नकचढ़ी है, ठीक से स्वागत ना करो तो भैया को ताने देगी। खैर चाय की पहली चुस्की को आखिरी चुस्की बना मिसेज चंद्रा काम में जुट गयी। समझ नहीं आ रहा था कंहा से शुरू करूँ। अभी तो पतिदेव भी नहीं जगे, वैसे भी वो कोई मदद करने से रहे। इसी जद्दोजहद में पतिदेव की आवाज कानों में गूंजी " बेड टी नहीं आयी" । गुस्से में मिसेज चंद्रा कभी किचन को, कभी पति को और कभी घर को देख रही थी। खैर पति को चाय देकर वो काम में जुट गयी। 
पति बेड पर चाय का लुफ्त लेते हुए किचन की बर्तनो की आवाज सुन रहे थे। सोच रहे थे बर्तनो की इतनी तेज आवाज, शायद लल्लो ने आज छुट्टी ले ली है। चाय ख़तम कर वो फिर से बिस्तर पर लेट गए, वैसे भी आज उन्हें ऑफिस देर से जाना है। 
उधर मिसेज चंद्रा मन ही मन खुद को कोस रही थी की कल क्यों घर में भैया-भाभी के आने की चर्चा कर दी। बता बच्चो को रही थी और वो कलमुही बर्तन मांजते कान इधर कर रखी थी। काश कल वो न सुनी होती तो कम से कम मैं पूरा चाय तो पी लेती, अभी तो ये चाय भी करेले का जूस लग रहा। मेरी तो मति मारी गयी थी जो उसके सामने बात की। तभी मोबाइल की घंटी बजी। मिसेज चंद्रा सोचने लगी कौन सुबह सुबह परेशान कर रहा। मोबाइल देखा तो लल्लो का फोन था। गुस्से में फोन उठा एक बार में मिसेज चंद्रा बोल उठी " क्या है, तेरी तबियत को आज ही क्या हो गया"। 
उधर से आवाज आयी , "मैडम जी आज वो मेरी........"
मिसेज चंद्रा ने उसकी बात काटते हुए कहा " क्या हो गया, तेरी तबियत को, चार दिन बाद ख़राब नहीं हो सकती थी। तुम्हारी हर बार की एक ही आदत है, मेरा तो कोई ख्याल नहीं तुम सारे लोग ऐसे ही हो"।
तभी लल्लो ने कहा, "मैडम मेरी बात तो सुनो"। 
मिसेज चंद्रा ने कहा, "क्या सुनूं तुम्हारी बात, हमेशा मेरे साथ ऐसा ही करती हो"। 
"मैडम सुनो तो"  लल्लो ने जोर से कहा  "मैडम मेरी तबियत सचमुच ख़राब है कल रात से बीमार हूँ। मुझे मालूम है आज आपके भैया-भाभी आने वाले हैं, इसीलिए मैं अपनी छोटी बहन को आपके घर भेज रही हूँ यही बताना था। मुझे मालूम है आपके पास काफी काम होगा और आपको मदद की जरूरत है। बस  15 मिनट में वो आपके पास पहुँच जाएगी"।
"क्या सच " मिसेज चंद्रा ने आश्चर्य से कहा। उसे विस्वास नहीं हो रहा था। 
" हाँ मैडम, हम सब एक दूसरे का ख्याल नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा। आप भी तो हमारा इतना ख्याल रखती हैं"। लल्लो ने कहा 
मिसेज चंद्रा ने मीठी सी मुस्कान के साथ कहा "तुम कितनी अच्छी हो लल्लो, भगवान करे हर मैडम को तुम्हारे जैसी कामवाली मिले। अपना ख्याल रखना और जल्दी तबियत सही कर के आना। चलो मैं उसके आने का इंतजार कर रही"। 
बात ख़तम करके मिसेज चंद्रा ने अपनी ठंडी चाय की दूसरी घूँट ली, उस ठंडी चाय में भी आज उसे अलग आनंद की अनुभूति हो रही थी।










Tuesday, February 27, 2018

एक थी श्रीदेवी

वक़्त भी अजीब होता है। उसे सिर्फ अपनी फिक़र होती है, इंसानी जज्बात शायद उसके रूह तक दखल नहीं रखता। तभी तो एक अदाकारा जो करोड़ों लोगों की खुशी का कारण थी, अपनी खुशी और अपनों के खुशी के पल में हमेशा के लिए छोड़ कर उस वक़्त की तरफदारी करने चली गई। कई बातें श्रीदेवी की मौत के बारे में कही गई या कही जाती रहेंगी पर क्या उनका व्यक्तित्व इतने में ही सिमट कर रह जाएगा । कहा जाता है कि उन्होंने पांच साल में अभिनय की शुरुआत की थी, और चौबन साल की उम्र में भी फिल्में कर रही थी। यानी लगभग आधी शताब्दी तक उन्होंने इस फिल्मी दुनिया को जिया है।  कितने हैं ऐसे, शायद अँगुलियों पर गिनती के ही होंगे। 

तमिलनाडु के शिवकाशी में 13 अगस्त 1963 को श्रीदेवी का जन्म  'अयय्पन ' और 'राजेश्वरी ' की पुत्री के रुप में हुआ था। श्रीदेवी का पूरा नाम 'श्री अम्मा यंगर अयप्पन ' था पर यह नाम पर्दे पर शायद काफी भारी था और पुकारने में भी जुबान पर नहीं आता था, इसीलिए एक छोटा सा नाम 'श्रीदेवी' का जन्म हुआ जो अपने नाम के अनुरूप परदे पर देवी साबित हुई। हिंदी फिल्मो के अलावा तमिल, तेलगु , कन्नड़ , मलयालम की भी वो सुपरस्टार रह चुकी थी। संभवतः पहली लेडी सुपरस्टार थी जो अपने फिल्म के हीरो से ज्यादा पैसे लेती थी। फिल्मफेयर के दस से ज्यादा अवार्ड और भारत सरकार द्वारा 2013 में पदमश्री से नवाजी गयी। उनकी फिल्मे सफलता की गारंटी थी और उन्हें ध्यान में रखकर फिल्मे लिखी जाती थी। हर कलाकार उनके साथ काम कर के अपने कैरियर को आगे बढ़ाना चाहता था।  हिंदी फिल्मे मसलन  मिस्टर इंडिया, चालबाज़, चांदनी, सदमा, खुदा गवाह, नगीना इत्यादि वो फिल्मे थी जो श्रीदेवी के बिना कल्पना भी नहीं की  सकती। 


शुरुआत में उनकी हिंदी भाषा पर पकड नहीं थी और उनकी आवाज़ किसी और के द्वारा डब की जाती थी। पहली बार चांदनी (1989) में उनकी आवाज़ सुनने को मिली। आखरी रास्ता (1986) में रेखा ने उनकी आवाज़ डब की थी। शायद अनगिनत बाते हैं उनकी कही-अनकही।

उनकी लव लाइफ काफी उतार चढाव वाली रही। एक समय मिथुन चक्रवर्ती से उनका रिश्ता काफी प्रगाढ़ रहा जो बोनी कपूर के दूसरी पत्नी बनने पर खत्म हुआ। ग्लैमर की चकाचौंध में, सच्चे प्यार को ढूँढ़ते ढूढ़ते इंसान को जो भा जाये वो उसी का हो जाता है। ये अलग बात है की वो प्यार में तृप्त है या अतृप्त। शायद इसीलिए इसे मायानगरी कहा जाता है।

उनकी मृत्यु 24 फरबरी 2018 को दुबई में हुई, जब वो एक पारिवारिक समारोह में गयी थी। मृत्यु भी अजीब परिस्थियों में और एक अनचाहा विवाद खरा कर गयी। वैसे सिर्फ चौबन (54) साल में जाना एक अजीब सी खामोशी दे गया और सीख भी की अपनी ख्वाहिशों को कल पर मत टाले और जी ले हर अरमान।
क्या पता कल हो न हो।





Thursday, February 8, 2018

कविता - चलो आज थोड़ा लड़ते हैं

चलो आज थोड़ा लड़ते हैं,
कुछ अपनी फिक्र कहते हैं,
कुछ तुम्हारी जिक्र सुनते हैं,
बस थोड़ा तेज ना बोलना,
दिलो के सारे गांठ खोलना,
बार बार ही सही,
सौ दफा ही सही,
गमों के सारे राज खोलना,
कह ना सको अगर कुछ,
पलकों के रास्ते ही बरस्ता,
आंसुओं की न राह रोकना,
गिले शिकवे विराने हो चले,
प्यार मनुहार पुराने हो चले,
आज तो बैठ कर लड़ेंगे,
हर हद पार कर लड़ेंगे,
पर इतना देखो याद रखना,
मेरे हमसफर ये ख्याल रखना,
आज होगी अंतिम लड़ाई,
हर कही-अनकही होगी पराई,
जीवन की इस कश्मकश में,
थोड़ी पुरवाई बहने दो,
कुछ अपनी और तुम्हारी सुनते हैं
चलो आज थोड़ा लड़ते हैं। 

Wednesday, January 31, 2018

हास्य-व्यंग - वेतन का पहला हफ्ता


आज अविनाश बाबू ऑफिस से जैसे ही घर के अंदर दाखिल हुए तो पत्नी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "जी आज दिन कैसा बीता"।  अविनाश बाबू ने कुछ धड़कते दिल से पूछा - "क्यूँ  क्या हुआ, वैसे ही जैसे हर दिन बीतता है। फिर पत्नी ने पूछा , क्या लोगे ठंडा या गरम।  अविनाश बाबू कुछ सोचकर बोले , अच्छा चाय ले आओ।  फिर सोचने लगे की आज उलटी गंगा कैसे बह रही। अभी तीन दिन पहले ही तो ऑफिस से आने के बाद और दो चक्कर बाज़ार का लगाने के बाद चाय पीना दूभर हो गया था। खैर, कपड़े बदलने के बाद बैठा ही था की सामने गरमा गरम पकौड़े और चाय हाज़िर। पत्नी मुस्कुराते हुए पूछी, और कुछ चाहिए। अविनाश बाबू ना में सर हिलाते हुए TV देखने लगे। फिर कुछ याद आया और कोट की जेब से इस महीने की तनख्वाह निकाल कर पत्नी को दे दिया। पत्नी ने भोलेपन से कहा तुम सब कुछ भूल सकते हो लेकिन पहली तारीख को तनख्वाह देना नहीं भूलते, कितने अच्छे हो तुम। अविनाश बाबू मंद मंद मुस्कुराते हुए कुछ बुदबुदाने लगे, काश यह वसंती मुस्कान महीने के आखिरी हफ्ते में भी बरक़रार रहे।

एक हफ्ता बीता, दूसरे हफ्ते की शुरूआत थी। अविनाश बाबू अपनी पत्नी के साथ कोई नई मूवी देख कर आ रहे थे तभी रास्ते में उनकी स्कूटर पंचर हो गयी। अविनाश बाबू ने पंचर बनबाई और प्यार से पत्नी को देखा की पंचर के पैसे दे देगी। पत्नी ने कुछ समझकर थोड़ा लहजे में पूछा कुछ चाहिए। अविनाश बाबू सकपका कर बोले, नहीं नहीं, वो पंचर के पैसे चलो कोई बात नहीं मैं दे देता हूँ वैसे मूवी कैसी लगी। पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा, अच्छी थी लेकिन थोड़ी डरावनी थी। अविनाश बाबू ने लाढ से कहा "घर चलो तुम्हारा डर दूर कर देता हूँ। 
दूसरे हफ्ते के चार दिन बीत चुके थे। ऑफिस से आया तो पत्नी ने मुस्कुरा कर कहा उनके मायके से दीदी-जीजा और उनके दो बच्चे कल आ रहे हैं। जीजाजी का ऑफिस टूर इसी शहर में है तो वो सोचे सभी चलते हैं। अविनाश बाबू ने कुछ सोचकर कहा, अभी पिछले महीने ही तो तुम्हारे भैया-भाभी पुरे परिवार के साथ एक हफ्ते के लिए आये थे। अभी इस महीने इंस्युरेन्स का प्रीमियम, होम लोन की तिमाही क़िस्त और दोनों बच्चों के एक्स्ट्रा क्लासेज के फीस भी जमा करनी है, दीदी को बोल दो अगले महीने आ जाये। शायद इतना कहना ज्यादा हो गया था और पत्नी का बसंती चेहरा जून के दोपहर जैसा लाल हो गया। खैर किसी तरह व्यवस्था बना कर चार-पांच दिन कटे और दूसरे हफ्ते में गर्मी की तपती दोपहरी का मजा लिया।
महीने का तीसरा हफ्ता शुरू हो चूका था और अपने पुरे ताप पर था। जब तपिश कुछ ज्यादा बढ़ रही थी तभी महीने की 18 तारीख को अविनाश बाबू के स्कूटर का ऑफिस से लौटते वक्त एक्सीडेंट हो गया। एक्सीडेंट कुछ ज्यादा बड़ा तो नहीं था पर घुटने में बड़ा सा जख्म हो गया था, डॉक्टर ने चार पांच दिन आराम को बोला था। इधर अविनाश बाबू की पत्नी का रो रो कर बुरा हाल और कह रही थी "कितनी बार बोला आराम से स्कूटर चलाया करो, घर से जल्दी निकला करो, तुम्हे कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता " आदि। खैर अविनाश बाबू पांच दिनों बाद फिर ऑफिस गए लेकिन डॉक्टर दबा वगैरह में घर का बजट थोड़ा ऊपर चला गया था। किसी तरह बजट के उतर चढ़ाव और पत्नी के आंसुओ की बारिश के बीच महीने का तीसरा हफ्ता भी बीत गया।
यूँ तो कहने को चार हफ्ते का महीना होता है पर एक सैलरी वाला ही जानता है की दूसरे हफ्ते से अगली सैलरी का कितना इंतजार रहता है। इसी कश्मकश में महीने की 28 तारीख आ गयी। कल अविनाश बाबू की शादी की सालगिरह है। रात में सोते वक्त अविनाश बाबू बस ये सोच रहे थे कल कैसे कटेगा और पत्नी को क्या गिफ्ट दूंगा अभी तनख्वाह मिलने में भी दो दिन है। गुस्सा पिताजी पर आ रहा था की शादी महीने के पहले हफ्ते में क्यों नहीं कराया,महीने के आखिरी हफ्ते में क्यों। अगली सुबह चुपचाप तैयार होकर अविनाश बाबू ऑफिस चले गए, बिना पत्नी से ज्यादा कुछ बाते किये। ऑफिस पहुंचकर राहत की सांस ली की शायद पत्नी को याद नहीं, वैसे भी चौदह साल हो गए शादी को,सोचा किसी तरह शाम भी कट जाये। शाम में ऑफिस में थोड़ी देर हो गयी और आज घर जाने की भी जल्दी में भी वो नहीं थे। महीने के आखिरी हफ्ते ने पूरी रंगत बिगड़ दी थी। रात 9 बजे घर पहुंचे तो घर में काफी मेहमानो को देखा और पत्नी सुर्ख लाल साड़ी में नई  नवेली दुल्हन सी लग रही थी। आश्चर्यचकित हो पत्नी से आँखों आँखों में पूछा, कुछ जवाब नहीं मिला तो कमरे में ले जाकर पूछा ये क्या है। पत्नी मानो बरस पड़ी, "कितनी देर से हम सब तुम्हारा इंतजार कर रहे, तुमने सुबह भी विश नहीं किया, तुमने क्या सोचा मुझे याद नहीं, अरे पुरे साल पैसे जमा किये है आज के लिए।अविनाश बाबू हतप्रभ रह गए और बोले लेकिन मैं तो तुम्हारे  लिए कोई उपहार भी नहीं लाया। तभी अबिनाश बाबू की बिटिया और बेटे कमरे में दाखिल हुए और बोले पापा उसकी चिंता आप बिलकुल ना करो, हम भाई बहन ने आप दोनों के लिए गिफ्ट ले रखा है, अब बाहर चलिए मेहमान इंतजार कर रहे हैं।अविनाश बाबू मन ही मन सोच रहे थे महीने का आखरी हफ्ता कैसे कैसे मौसम दिखा रहा है। खैर कोई बात नहीं, दो दिन बाद नई सैलरी बांहे पसार इंतजार कर रही है।

                              
                                                                                                          - अभय सुमन "दर्पण"















Wednesday, January 24, 2018

कविता - एक प्याली चाय और हम-तुम

एक प्याली चाय और खोये हम तुम
बैठे खामोश कुछ अनमने उधेरबुन में
ख़याले बुन रही थी अपना भॅवर जाल
कुछ बीते कल,कुछ आने वाले पल की
उसने पूछी, चीनी कितनी लोगे तुम
कुछ तन्द्रा भंग हुई और बोला सोचकर
बंद किये चीनी, कई साल बीत गए शायद
हर सुबह बतलाता, पर याद नहीं रहता तुम्हे
कुछ बादाम खाया करो, और हाँ अखरोट भी

पहली बार चीनी पूछी थी,जब मैं आया था,
तुम्हारे घर किताबे लेने, जो दी थी तुम्हे
तुम्हारे पापा के घूरती निगाहों से बचता
तुम्हारे भाभी के शरारती आँखों से निपटता
उस दिन जो डाली थी तुमने चाय में चीनी
था माँगा एक,पर उस दिन भी थी तुम भूली
पांच चम्मच डाला था, मेरे कहने पर रुकी
एहसास याद है अब तक, और मिठास उसकी


कई साल बीत चुके, बैठें हैं, हम-तुम  गुम  
एक प्याली चाय, हम दोनों से पूछ रही संग
मेरा क्या कसूर,आज भी उबालते खौलाते हो
ठंड होने से पहले पी जाते, कलेजा जलाते हो 
कुछ ख्याल रखो अपने दिल और जुबान का
थोड़ी देखभाल करो अपना और सेहत का

वो चाय का प्याला भी, होगा याद तुम्हे शायद
जब बारिश की बूंदो और बनते इंद्रधनुष में,
कॉलेज के बाहर पी थी चाय, छोटे से ढ़ाबे पर
तुम्हारी लटों में लिपटी, बिखरी बूंदो की चांदनी
और मेरे गाल के गड्डे में फंसी खनकती हंसी
उस प्याले में लजाती, इठलाती अदरक की चाय
तड़पती, बेताब लबों को,चूमने को मचलती चाय

सोचा न था ये चाय एक दिन इतनी करवी लगेगी
चाय में एक दाना चीनी भी जहर लगेगी

कैसे भूलूँ , की वो नौ महीने काटे किस तरह थी
मेरे बनाये चाय से तुम्हारी सुबह और शाम थी
अस्पताल के बाहर, चाय, बेचैनी और बेताबियाँ
अधूरी चाय छोड़ दौड़ा, जान बेटे की किलकारियां
समझ नहीं आता वो कौन सी चाय थी, और ये कौन

ऑफिस से आकर तुम्हारे हाथो बनी वो मीठी चाय
और मीठी लगती,जब होता शिकवों शिकायतों का साथ
शिकवे हुई कम और धीरे से, बढ़ती गयी शिकायतें
इतनी बढ़ गयी शायद, की तवरिखों में दर्ज़ होती गयी
आज चाय भी गुमसुम है अपनी मासूमियत खो कर
दर्द से परे, उबलना खौलना अपनी नियति समझकर
आज भी एक प्याली चाय है हमारे तुम्हारे दरम्यान
लबों का साथ पाने को, बस ठंड होने के इंतजार में।


                ----   अभय सुमन "दर्पण"

Wednesday, January 17, 2018

कविता - तेरे इन पैसो पर सबका हक़ है

तेरे इन पैसो पर सबका हक़ है
तेरा हक़ है, मेरा हक़ है

जिस माटी में यौवन चमका
उस शहर,उस गांव का हक है

जिस माँ ने आँचल में पाला
थोड़ा सा तो उनका हक़ है

संगी साथी,  ताल तलैय्या
समझो मानो,उनका भी हक़ है

ऊँगली पकड़ी, कलम थमाई
उस गुरु, गुरूज्ञान का हक़ है

कंधे पर जिनके है झूला
उस पिता, उस बाप का हक़ है

जिस बहना संग माटी गुंथे
उस राखी,उस क़र्ज़ का हक़ है

प्रेम में जिनके, भुला सबकुछ
उस प्रीत, उस गीत का हक़ है

जिन रिश्तों से आशीष पाया
उन  भाई, नातो का हक़ हैं 

राह किनारे, हाथ पसारे
कुछ ना कुछ तो उनका हक़ है

तेरा हक़ है, मेरा हक़ है
तेरे इन पैसो पर सबका हक़ है














Thursday, January 11, 2018

हास्य-व्यंग - प्यार का नाम या पुकार का नाम

हमारी पहचान अक्सर दो नामो से होती है, एक ऑफिसियल और दूसरा पुकार का नाम। ऑफिसियल नाम जैसा भी हो, पुकार का नाम बड़ा प्यारा होता है, जैसे ईंटु,चिंटू,पिंटू,गपलू,ढपलू,पप्लू इत्यादि। पुकार का नाम वैसे सरकारी तो नहीं होता परन्तु इसका असर बहुत जोरदार होता है। आजकल पति-पत्नी में पुकार कहे या प्यार के नाम का बड़ा फैशन है जैसे बेबी,सोना,हनी,जानु,चम्पू,बाबू  इत्यादि और ये नाम तभी तक कामयाब रहता है जबतक मोहब्बत बनी रहती है, नहीं तो सोना कब मिट्टी बन जाये कहा नहीं जा सकता। पहले ऐजी , ओजी, सुनोजी चलता था और वो भी घूंघट की आर में, सोना भले पीतल हो जाये लेकिन मिट्टी नहीं होती थी।
और तो और इंसान का क्या है देश तक के नाम पुकार वाले बन जाते हैं, जैसे अपने देश भारत के दसियों नाम हैं पर कोई विदेशी आकर पुकार का नाम इंडिया कह गया और हमारे लिए ये प्यार का नाम बन गया। बड़े लोगो के तो और भी कारनामे हैं। नमो, पप्पू, दिग्गी, चीची, लोलो, चिंटू इत्यादि तमाम सेलिब्रटी के प्यार के नाम हैं। पप्पू नाम से लोगो ने इतना प्यार किया की 2017 गुजरात इलेक्शन में कोर्ट ने इस नाम को बैन कर दिया। किसी का कोई पुकार का नाम हो, एक माँ अपने बेटे के लिए सिर्फ एक ही नाम होता है वो है 'आँख का तारा' । दोस्तों में तो प्यार का नाम पूछिए मत, शायद ही कोई जानवर बचता हो। लड़कियां तो खास सहेलियों को एक नया नाम दे देती है। कइयों के ऑफिसियल नाम इतने खूबसूरत होते हैं लेकिन प्यार का नाम राम-राम, लगता है नाक में सर्दी जमा हो। बहुत सारे शहर-
गांव अपने पुकार के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हैं, खोजिये मिल जायेंगे।
वैसे आपका प्यार का नाम क्या है ?











Tuesday, January 2, 2018

कविता - मैं बीस का तुम उन्नीस की हो जाए

काश एक ऐसा कोई
हसीन मौसम आ जाए।

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

मेरी हर अधूरी उम्मीद और
मेरा इंतजार खत्म हो जाये।
वो लम्हा जो काटा तन्हाइयों में
कतरा-कतरा मोम बन पिघल जाये

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

सोशल मीडिया के फ़साने में
जींस और टॉप के ज़माने में
सलवार सूट में कभी आओ
खत कोई पुराने लिखे जाएँ

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

अब उम्र लम्बी बीत चुकी
सांसे भी मद्धम हो  चली
ख्वाहिशें अब भी पूछ रही
फिर से मासूम बना जाए

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

 तेरे इंकार का वो क्षण
मेरे इंतजार का वो पल
मिटा कर उस पल और क्षण को
कोई नई इबारत लिखी जाये

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ।

कुछ लम्हे मुझे दे दो
कुछ कदम साथ चल दो
जरा तुम भी ठहर जाओ
जरा हम भी ठहर जायें

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ 

तेरा छोड़ कर चले जाना 
एहसास मेरे समझ पाना 
वो दर्द जब भी समझ पाओ 
एक बार मिलने चले आओ 

मैं फिर से बीस का और
तुम उन्नीस की हो जाओ 

           -  अभय सुमन दर्पण




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