Tuesday, December 10, 2019

कहानी - हेलमेट

आज फिर सिंह साहेब चौराहे पर खड़े  थे हाथो में 4 -5 हेलमेट लेकर। रोज की तरह वही उलझी बाल, थकी नजरे, पुराने से कपड़े पहने, अपनी उसी जगह पर चौराहे के नजदीक। तभी उन्हें एक 16 -17  साल का लड़का बाइक से आता दिखा बिना हेलमेट लगाए।  सिंह साहेब ने आवाज देकर उसे रोका और पूछा। 
"बेटा, बिना हेलमेट के जा रहे, ये लो हेलमेट मेरी तरफ से लगा लो", सिंह साहेब
"नहीं नहीं अंकल, मेरे पास है लेकिन घर पे है " लड़का ने कहा
"तो लगाया क्यों नहीं", सिंह साहेब
"बिना हेलमेट काफी मज़ा आता है, खुली हवा में बालो का लहराना, लड़कियों का देखना। अरे अंकल हेलमेट पहन कर वो बात कहाँ।", लड़के ने हँसते हुए कहा
"बात तो ठीक कह रहे, लेकिन जिंदगी भी तो उस सबसे ज्यादा जरूरी है।" सिंह साहेब ने सोचते हुए कहा
"अरे अंकल जाने दो देर हो रही, लेकिन एक बात बताओ ", लड़का
"क्या "
"आप ऐसे फ्री में हेलमेट क्यों बाँट रहे", लड़का
"क्योंकि मैं तुम जैसे लड़को से बहुत प्यार करता हूँ " सिंह साहेब
"क्यों मजाक कर रहे अंकल, मेरे मम्मी पापा मुझसे बहुत प्यार करते हैं ", लड़का
"बेटा अगर वो प्यार कर रहे होते तो बिना हेलमेट तुम्हे घर से निकलने नहीं देते" सिंह साहेब
"अरे अंकल कैसी बाते कर रहे, तुम शायद कोई पागल जान परते हो।"  कहकर लड़का बाइक आगे बढ़ा देता है 

पास में खडे दो लड़के बाते कर रहे थे।
"कौन है ये आदमी, अक्सर देखता हूँ यहाँ खडा रहता है और लोगो को हेलमेट बांटता रहता है ", पहले ने कहा
"पता नहीं कौन है, पर मुझे भी अक्सर दिखता है, होगा कोई पागल। कोई अपने पैसे इस तरह लुटाता है क्या " दूसरे ने कहा
पास में खड़ा एक आदमी उनकी बात सुन रहा था , वो पास आकर कहता है  "क्या तुम इन्हे नहीं जानते, ये मिस्टर दिनेश सिंह हैं, शहर के जाने माने रईस थे, अपनी आधी से ज्यादा सम्पति ईन्होंने दान कर दी, आज कल हर दिन शाम में किसी भी चौराहे पर खडे हो कर हेलमेट बांटते हैं, खासकर जो युवा बिना हेलमेट के जाते हैं उसे रोक कर।"
 "लेकिन ऐसा क्यों" , पहले ने पूछा
फिर वो कहानी सुनाने लगता है।
"ज्यादा नहीं बस एक साल पहले की बात है, एक दिन अपने घर पर वो बैठे थे......
साथ में उनका कोई जूनियर भी बैठा था, तभी उनका 16 -17 साल का लड़का कमरे से निकल रहा थ। 
"पापा मैं जरा दोस्तों के साथ नई बाइक से घूम कर आ रहा", बेटे ने कहा
"अरे, इतनी जल्दी भी क्या है, आओ मेरे पास बैठो।" सिंह साहेब
"नहीं पापा, सभी दोस्तों को पार्टी देनी है, आज तो बहुत मजा आने वाला है " बेटा
"जा बेटा, लेकिन ध्यान से।  पैसे की जरूरत हो तो एटीएम से निकल लेना, और हाँ हेलमेट लगा लेना" ,सिंह साहेब
"अरे पापा, हेलमेट तो बोझ लगती है सर पे, फिर कहाँ वो मस्ती हो पायेगी ", बेटा
"ठीक है जा, लेकिन संभाल के", सिंह साहेब
बेटा निकल जाता है। तभी उनका जूनियर कहता है।
"सर, इनकी उम्र क्या है," जूनियर
"अभी सोलह पूरा कर के सत्रह लगा है, हीरो है पुरे स्कूल का" सिंह साहेब ने गर्व से कहा

"पर सर, इतनी काम उम्र में बाइक दिलाना......., बिना हेलमेट बाइक चलना....... ", जूनियर ने हिचकते हुए कहा
हाँ तो क्या हुआ, खुली हवा में बाले लहरायेंगे, लड़किया देखेगी। हा  हा हा , अरे भाई यही तो उम्र है जिंदगी जीने का, तुम परेशांन मत हो।", सिंह साहेब
"पर सर, आजकल तो फाइन भी काफी बढ़ गयी है", जूनियर
"देखो मिश्रा कर दी न छोटी बात, सिंह साहेब का बेटा है, हजार क्या, लाखो में भी फाइन चला जाये तो दूंगा, आखिर कमाता किस लिए हूँ।", सिंह साहेब
"जी सर ", जूनियर ने कहा और शांत हो गया
सिंह साहेब ने चाय की एक कप उठाई ही थी कि तभी फ़ोन की घंटी बजी। उधर से आवाज आयी।
"हेलो, सिंह साहेब है", उधर से आवाज
"हाँ , बोल रहा हूँ " सिंह साहेब
"सर, आपके बेटे का एक्सीडेंट हो गया है, सर फ्रैक्चर हो गया है, हेलमेट नहीं लगा रखा था,ऑन द स्पॉट डेथ हो गयी है ," उधर से आवाज आयी
सिंह साहेब के हाथ से फोन गिर गया।
  
    फिर आगे बताने लगा
...... बस उसी दिन के बाद इनका जैसे सब ख़तम हो गया, इकलौता लड़का था, अगर हेलमेट लगायी होती तो शायद उसकी जिंदगी बच जाती।", उस आदमी ने अपनी बात पूरी की। (पीछे सिंह साहेब की धुंधली तस्वीर दिख रही, जिसमे वो लोगो को हेलमेट दे रहे होते हैं।)
वो दोनों लड़के सिंह साहेब के पास जाते हैं और उनके साथ लोगो को हेलमेट देने में मदद करते हैं।

कहानी - पापा बेटी

ट्रिंग - टिंग।
तीन बार फ़ोन बज चुकी थी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं।  प्रिया ने धड़कते दिल से फिर एक बार फ़ोन मिलाया।  इस बार फ़ोन उठ गयी।
"हैलो",  उधर से बलबीर सिंह की आवाज आयी।
प्रिया ने जब अपने पापा की आवाज सुनी तो एक सिहरन सी पुरे शरीर में फैल गई।  उसे जबाब देने की हिम्मत नही हो रही थी। वो स्तब्ध सी फ़ोन पर अपने पापा की आवाज सुन रही थी।
" हैलो, हैलो", कई बार बलबीर सिंह ने कहा , "पता नहीं कौन है जवाब ही नहीं दे रहा " फिर फ़ोन को रख दिया।
इस बार प्रिया ने फिर हिम्मत की और फोन मिलाई।  फिर फ़ोन उसके पापा ने उठाया, "हैलो ", लेकिन फिर उधर से कोई आवाज नहीं आयी।  फिर वो जोर से चिल्लाया "पता नहीं कौन है , बार बार फोन कर परेशान कर रहा।
"पापा मैं, प्रिया " , प्रिया बोल बैठी
"कौन प्रिया , मैं किसी प्रिया को नहीं जानता " बलबीर ने कहा
"पापा मैं आपकी बेटी, प्रिया ", प्रिया ने कहा
"कौन बेटी, मर चुकी मेरी बेटी, दुबारा फ़ोन मत करना", बलबीर ने कहा और फ़ोन रख दिया।
प्रिया ने फिर फ़ोन मिलाया, बलबीर ने सोचते हुए फ़ोन उठाया।
"पापा प्लीज फ़ोन मत रखना ", प्रिया ने कहा, "मुझे माफ़ कर दो पापा "
"माफ़ कर दूँ , पर किस लिए, जब तुम मेरी बेटी ही नहीं " बलबीर ने कहा
"नहीं पापा ऐसा मत कहो, काफी हिम्मत जुटा कर आपसे बात कर रही हूँ , मुझे माफ़ कर दो ", प्रिया ने कहा
"कैसे माफ़ कर दूँ , अच्छा बता कैसे माफ़ कर दूँ।  जीते जी तुमने मुझे मार दिया , तेरी माँ ने पिछले तीन सालो से मौन धारण कर रखा।  मैंने पुरे समाज से नाता तोड़ लिया ", बलबीर ने कहा
"सॉरी पापा " , प्रिया ने कहा
"ना ही तेरे से बात करनी और ना ही तेरी शक्ल देखनी", बलबीर ने कहा
"ठीक है पापा, मेरी शक्ल न देखो, लेकिन पीहू की तो देख लो, मेरी बेटी एक साल की होने वाली है", प्रिया ने कहा
" अच्छा एक साल की होने वाली है, कैसी दिखती है , तेरे जैसी ही ना ", बलबीर ने भावुक होकर कहा।
"हाँ पापा, बिलकुल मेरे जैसी", प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा
"उसके जन्म के समय बहुत मन किया था, तुमसे मिलने का, लेकिन ... ," बलबीर ने आंसू पोछे
"पापा बहुत मिस करती मैं आपको", प्रिया ने कहा
"तो तूने ही तो ऐसा काम किया। भाग कर शादी करने की क्या जरूरत थी ?", बलबीर ने कहा
"पापा उसे बहुत चाहती थी मैं ", प्रिया ने कहा
 "अच्छा कितने साल से तू उसे जानती थी ", बलबीर ने पूछा
"पापा, दो साल से " प्रिया ने कहा
"और... और मेरा क्या, जिसने चौबीस साल तुझे अपनी आँखों के सामने बड़ा होते देखा। मेरे प्यार का कोई मूल्य नहीं। इतनी सी थी तू , गोद में लेकर कितना खेलता था। मेरी हर मुस्कान की वजह तुम थी, एक झटके में सब तोड़ दिया।" बलबीर ने कहा
"पापा ऐसा मत बोलिये, बहुत प्यार करती हूँ आपसे।  लेकिन मजबूर थी मैं ", प्रिया ने कहा

" और मेरी मजबूरी कुछ नहीं, सोचा नहीं मेरा कुछ भी।  मेरा मान , सम्मान , बरसो की कमाई प्रतिष्ठा।  बस भाग गई घर छोड़ के। रातो रात।  अरे बताया तो होता एक बार। " बलबीर ने कहा
" I am sorry papa, माफ़ कर दो मुझे, मैं बहुत शर्मिंदा हूँ", प्रिया ने कहा,
"जाने दे बेटा,बस थोड़ा ख्याल रखी होती मेरा,कितने सपने सजाये थे तेरे ब्याह के, कितने अरमान थे मेरे, खैर।
बलबीर ने कहा।
"मैं आपकी अच्छी बेटी नहीं बन सकी पापा " , प्रिया ने कहा
"ना बेटा ना, ऐसा नहीं बोलते, तू तो मेरी सबसे अच्छी बेटी है। गलती मेरी ही थी, मेरी परवरिश में कुछ कमी रह गयी होगी। अपनी बेटी को संस्कार देने में कभी कमी न करना। ध्यान रखना की कभी वो तुझे बिना बताये घर न छोर दे। मैं नहीं चाहता की जो दुःख मैंने झेला, तुझे भी झेलनी पड़े। " बलबीर ने यह कह कर फ़ोन रख दिया।

                                                                              - अभय सुमन "दर्पण"


Friday, September 13, 2019

कहानी - दो भाई

बड़े भाई बाहर बैठ कर कान में ऊँगली कर रहा था। तभी छोटा भाई आता है।
छोटा - भैया मुझे 2000  रूपये की जरूरत है।
बड़ा - अभी पिछले हफ्ते ही तो हजार रूपये दिए थे।
छोटा - वो तो ख़त्म हो गए।
बड़ा - (गुस्से में ) - ख़त्म हो गए , ऐसे कैसे ख़त्म हो गए।
छोटा - अरे।  हो गए तो हो गए।  मुझे तो चाहिए 2000 रूपये।
बड़ा - नहीं है मेरे पास जा।
छोटा - कोई बात नहीं , भाभी से ले लूँगा।
बड़ा - उसके पास भी नहीं है।
छोटा - (नाराजगी में ) - पापा के गुजरने के बाद तुम मेरा बिलकुल ध्यान नहीं रखते।
बड़ा - अरे, अरे।  ऐसा नहीं बोलते , तू तो मेरी जान है।
छोटा - नहीं नहीं , तुम बदल गए हो।  भाभी के लिए तो हर महीने साडी लाते हो और मेरे लिए कुछ नहीं।
बड़ा -  मुझे तेरी बकवास नहीं सुननी।  तुझे जो सोचना है सोच, मैं चला ऑफिस।
                           (उठकर चला जाता है )

शाम में बड़ा भाई ऑफिस से आता है। अंदर से लेडिज की आवाज आती है।

लेडीज - कपड़े बदलने के पहले भाई को बुला लाओ।  पार्क में बैठा है सुबह से , बिना कुछ खाये पिए।
बड़ा - तो तुमने बुलाया क्यों नहीं।
लेडीज- एक बार कहा था, लेकिन मेरी सुनता कहाँ है।
बड़ा - एक बार (बुदबुदाते हुए ). अच्छा अगर तुम्हारी बहन बिना कुछ खाये पिए दिन भर रहती तो क्या तुम ऐसे ही छोर देते।
लेडीज -देखो जी।  अब इन मामलो में मेरे मायके को मत घसीटो।  लाखो में एक है मेरी बहन।
बड़ा - ठीक है, मैं ही जाता हूँ।

पार्क में छोटा बैठा है।  बड़ा आता है और कंधे पर हाथ रखता है। छोटा हाथ हटा देता है।

बड़ा - सुना है तुमने पुरे दिन कुछ खाया - पिया नहीं।
छोटा - तुम्हे इससे क्या मतलब
बड़ा - अच्छा।  मुझे कोई मतलब नहीं।  मैं कोई नहीं।
छोटा - नहीं, कोई नहीं है मेरा।
बड़ा - अभी दूंगा एक लपारा।  ऐसे कोई करता है क्या। मैं तो तेरे अच्छे के लिए कहता हूँ, तू कुछ बन जायेगा तो सबसे ज्यादा खुश मैं ही होऊंगा।
छोटा - तुम क्यों खुस होंगे, बंधे रहो भाभी के पल्लू से।
बड़ा - (मुस्कुराते हुए) तो ये बात है , देख छोटे जिम्मेदारियां बढ़ने से तेरे प्रति प्यार थोड़े न काम हो जायेगा। तू तो आज भी मेरा वही छोटा सा टुल्लू है।  और तूने पुरे दिन कुछ खाया क्यों नहीं।
छोटा - बस भैया, खुद को काफी अकेला महसूस कर रहा था।  लग रहा था जिंदगी में कुछ बन नहीं पाउँगा और मेरा कोई नहीं।
बड़े - बस इतनी सी बात।  अरे , हरेक के जीवन में ऐसा मोड़ आता है।  बस घबराना मत।  और मैं तो हूँ तेरे साथ।
छोटा - आज मुझे मम्मी पापा की बहुत याद आ रही थी।
बड़ा - और मैं
छोटा - तुम पर गुस्सा
बड़ा - कोई बात नहीं , हक़ है तेरा।  लेकिन मुझे तुम पर प्यार आ रहा। याद है, स्कूल में टीचर के पिटाई के डर से कैसे तू भाग कर मेरे क्लास में आकर मेरे पीछे छिप गया था।  भरोसा कर के ही ना। और पूजा, जब वो छोड़ कर तुझे चली गयी थी, कितना रोया था मुझसे लिपट कर।
छोटा - देखो अब पूजा की याद मत दिलाओ
बड़ा - हा, हा , हा , देख छोटे , कल को मेरी फैमिली बढ़ेगी, फिर तेरी फॅमिली बढ़ेगी , तो क्या हम दोनों का प्यार कम हो जायेगा। होने भी मत देना।  है ना।
छोटा - नहीं भैया , हम दोनों का प्यार कभी कम नहीं होगा।
                      (दोनों गले लग जाते हैं)

                                                                                -    अभय सुमन " दर्पण"



Tuesday, August 27, 2019

कहानी - क्लास टीचर

रिटायर्ड  प्रोफेसर  बी. एन. शर्मा,
308, मयूर विहार , शिमला

घर के बहार लगे इस नाम को देखकर सौरभ ने घंटी दबा दी।

टिंग - टाँग।
दरवाजे की घंटी तीन बार बज चुकी , लेकिन कोई आया नहीं। सौरभ वापस जाने की सोच ही रहा था की दरवाजा खुलता है। एक अधेड़ व्यक्ति दरवाजे से बाहर आकर  पूछता है   "कौन".
"सर मैं सौरभ सिंह " उसने कहा
"कौन सौरभ मैंने पहचाना नहीं" उस अधेड़ व्यक्ति ने कहा।
" सर आपका student , Back Bencher ." सौरभ ने मुस्कुराते हुए कहा
कुछ सोचते हुए उसने कहा   "अच्छा बैक बेंचर सौरभ ? How are you my son.
"Good Sir " सौरभ ने कहा
"कालेज के सिर्फ तुम्ही दोनों मुझे याद हो, एक बैक बेंचर सौरभ और एक फ्रंट बेंचर राहुल " उसने कहा " आओ अंदर आओ" दरवाजे से हटते हुए प्रोफेसर ने कहा।
सौरभ घर के अंदर आकर सोफे पर बैठता है और पुरे घर को देखता है.
"क्या लोगे, चाय,काफी या विह्स्की " प्रोफेसर ने पूछा
"सर कुछ नहीं! बस आपसे मिलने की बहुत इच्छा थी। काफी खोजने के बाद आपका पता कालेज के पीयून सर सियाराम जी से मालूम हुआ और ढूंढते ढूंढते मैं यहाँ आ गया। " अजय ने कहा
"हाँ कॉलेज से रिटायर्ड होने के बाद यहाँ आ कर बस गया "  प्रोफेसर ने कहा
तभी सौरभ की निगाह एक फैमिली फोटो पर गयी।
"मैम और बच्चे कहाँ हैं " अजय ने कहा
"सुनीता को गुजरे पांच साल हो गए और एक बेटा है वो अमेरिका में सेटल हो गया" फिर धीमी हंसी से कहा " वो भी फ्रंट बेंचर था। माँ के गुजरने के बाद कभी नहीं आया , कभी कभी फ़ोन कर लेता है। हाँ तुम्हारे साथ का फ्रंट बेंचर राहुल वो भी तो अमेरिका में है, किसी से सुना था।"  प्रोफेसर ने गर्व से कहा।
"और तुम क्या कर रहे, कहीं जॉब मिली या नहीं " प्रोफेसर ने पूछा
"सर, आप तो जानते हैं , मैं बैक बेंचर था, और आप कहा करते थे " my dear student, एक बैक बेंचर और फ्रंट बेंचर कभी दोस्त नहीं होते।" सौरभ ने स्टाइल से कहा
"हाँ कहता था मैं, और ये समाज की सच्चाई है , प्रोफेसर ने कहा।
"सर, जब मेरी एक गलती पर आपने मुझे कॉलेज से सस्पेंड कर दिया तो मैं बिलकुल टूट चूका था।  मैं अपने जीवन का अंत करने का सोच रहा था. फिर आपकी सिखाई एक बात ने मुझे हिम्मत दी कि " जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है।"  मेरे पापा की छोटी सी बिज़नेस थी, मैंने वहां बैठ कर काम सीखा और फिर धीरे धीरे काम को बढ़ाया।  आज पंद्रह देशों में एक्सपोर्ट का बिज़नेस है। करोड़ो का टर्न ओवर है।  उसने शांत भाव से कहा।
"और कॉलेज की पढाई " प्रोफेसर ने आश्चर्य से पूछा
" कहाँ पूरी कर पाया सर, पूरी तरह टूट चूका था मैं, लेकिन आपकी सिखाई अच्छी बातो को धरोहर बना कर रखा हूँ आज तक।" सौरभ ने कहा
"लेकिन मैंने तो काफी बुरा किया था तुम्हारे साथ " प्रोफेसर ने कहा
" नहीं सर, वो मेरे जिंदगी का एक सबक था। आज जिंदगी का कोई भी रिजेक्शन (rejection) मुझे तोड़ नहीं सकता। क्लास में बैक बेंचर था तो क्या हुआ , जिंदगी के रेस में कभी बैक बेंचर नहीं रहा।" सौरभ ने कहा
" अच्छा लगा तुम्हारा confidence देखकर।  जिंदगी सभी को बराबर मौका देती है।  सैकड़ो उदहारण हैं जहाँ बैक बेंचर ने इतिहास रचा है "  प्रोफेसर कुछ सोचते हुए  "sorry  my son, मेरी एक गलती ने तुम्हे काफी दुःख दिया"
 "No सर, मुझे कोई गिला नहीं, जीवन के उस मोड़ ने मुझमे काफी बदलाव लाया और मैं बैक बेंचर से फ्रंट रनर बना। " सौरभ ने कहा
"देखो my son , मैं गलत था , कोई फ्रंट बेंचर या बैक बेंचर नहीं होता , सबकी अपनी खासियत और अहमियत होती है। हर इंसान अपनी खूबी लेकर जन्म लेता है , बस उसे पहचानना होता है। " प्रोफेसर ने कहा
"ठीक है मैं चलता हूँ, हाँ ये एक छोटा सा गिफ्ट है आपके लिए, ना मत कीजियेगा" अजय ने एक पैकेट दिया
Happy Teachers Day , आज teachers day है सर। " अजय ने कहा
हा हा हा, अच्छा तो तुम्हे याद था। खुशी हुई। आजकल तो कोई टीचर को याद भी नही करता।God bless you  सौरभ ," प्रोफेसर ने कहा
सौरभ घरसे बाहर आता है और मन में सोचता है "जिन्दगी की जंग में कभी हार-जीत नहीं होती , हर दिन लड़ना होता है और जीतना होता है".

                                                                                   -  अभय सुमन "दर्पण"

Monday, June 24, 2019

Rape - A discussion

चार दोस्त एक ऑफिस में बैठे हैं।  एक मोबाइल देख रहा था , एक कागज पर ड्राइंग बना रहा था , एक लड़की ऊँगली से खेल रही थी। चौथा सोफे पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था। 


मोबाइल ( राजेश) - अरे यार, अभी ब्रेकिंग न्यूज़ आयी है।  फिर एक चार साल की लड़की का रेप हो गया।  पता नहीं ये रेप होना कब बंद होगा।
ऊँगली (पूजा ) - अब तो ये रोज की बात हो गयी।  हर दिन कहीं न कहीं सुनने को मिलता है।  बहुत दुःख की बात है।
ड्राइंग (मनोज) - चलो यार , शाम में चौराहे पर कैंडल जलाते हैं।  अख़बार में और चैनल पर दिख जायेंगे और फेसबुक भी अपडेट कर देंगे।  पिछली बार जब दिल्ली में रेप हुआ था तो मैंने कैंडल मार्च किया था और फेसबुक पर डाला था।  हजारो में लाइक चला गया था।
राजेश - हाँ यार , गूगल में इवेंट क्रिएट कर देते हैं , कई सारे लोग इकठ्ठा हो जायेंगे। और इसे देखो ( आखबार पड़ने वाले को देखकर ) इसे तो कोई फर्क नहीं परता , अख़बार पढने में ब्यस्त है।  हा  हा  हा ।
मनोज - अरे बोलो भाई , तू भी चलेगा न कैंडल मार्च में।
अख़बार (अनूप ) -  (सर उठा कर) जरूर चलूँगा, पर उस चार साल की लड़की के लिए  नहीं, उस चार साल की बच्ची के लिए।
पूजा - क्या फर्क पड़ता है, लड़की थी या बच्ची।
अनूप (गुस्से से) - फ़र्क़ ? मुर्दे हो तुम सब।
मनोज - अरे यार , तू तो इमोशनल हो गया।  रेप ही तो हुआ है।  कोई पहाड़ तो नहीं टुटा।  हर दिन कहीं न कहीं रेप होता है।  चल यार चिल मार।
अनूप - हाँ रेप ही तो हुआ है।  सच कहा तुमने।  कहीं दो साल की बच्ची के साथ , तो कहीं चार साल, तो कहीं आठ साल।  हाँ रेप ही तो हुआ है।  और हां एक बार तो छह महीने की बच्ची का भी सुना था।  (pause )
जब तुम्हारी छोटी सी बेटी की तबियत ख़राब होती है तो तुम पागलो सा डॉक्टर के चक्कर लगाते हो।  जब उसे कहीं चोट लगती है और खून निकल आता है तो सोचते हो की काश वो चोट तुम्हे लगी होती। और कह रहे की रेप ही तो हुआ है। मुर्दे हो सभी, तुम और ये समाज।
पूजा - पर हम क्या कर सकते , शाम में तो कर रहे कैंडल मार्च।
अनूप - हाँ , क्या कर सकते।  वो बच्ची भी क्या कर सकती थी। (भावुक होकर) , सिर्फ चार साल उम्र थी उसकी और ! और उसके ऊपर एक बिभत्स्य सा आदमी चढ़ा हुआ।  कितना तड़प रही होगी, कितना कराह रही होगी।  उस चीत्कार को एक कैंडल जला कर बुझा देना चाहते हो।  मुर्दे हो तुम सब ( लगभग चिल्लाते हुए) , सोचो जब उस फूल सी बच्ची पर वो हैवान चढ़ा होगा तो उस बच्ची की पीड़ा क्या रही होगी।  जब उसके शरीर को नोचा जा रहा होगा तो उसकी रुदन कैसी रही होगी।  (कहकर रोने लगता है)  (pause) बस सिर्फ उसे याद कर रही होगी।

पूजा - हाँ, ईश्वर को याद कर रही होगी।

अनूप - ईश्वर ? हाँ अपने ईश्वर मम्मी पापा को याद कर रही होगी। कहती होगी, कहाँ हो मम्मी , कहाँ हो पापा।           मुझे बचा लो।  मैं मर रही।  मैं यह दर्द बर्दास्त नहीं कर पा रही।  कुछ तो करो पापा , कुछ तो करो मम्मी।           मुर्दा है ये समाज, ये मुर्दो की बस्ती है।  बस कैंडल मार्च करो और फेसबुक अपडेट करो।

राजेश चल कर आता है और अनूप के कंधे पर हाथ रखती है।

राजेश - कह तो तुम ठीक रहे , लेकिन हम क्या करे। जब रेप करने वाले की मालूम है की अदालत में दसियो साल लग जायेंगे ये साबित करने में की उसने रेप किया भी या नहीं। जज साहेब सबूत पर सबूत मांगेंगे।  तब तक उस बच्ची का , उस लड़की का पता नहीं कितनी बार मानसिक रेप हो चूका होगा।  रेप करने में दस मिनट और साबित करने में दसियों साल। उसने सिर्फ एक बार रेप किया लेकिन अदालत, न्यायपालिका  न जाने कितनी बार रेप करता है।  सच कहा तुमने मुर्दे हैं सब।

पूजा - सिर्फ न्यायपालिका ही क्यों , ये पुलिस तंत्र भी तो लोगो पर सिर्फ हंटर चलना जानती है।  नेताओ और पहुंचवालो की चमचागिरी , वसूली , भ्रस्टाचार से फुर्सत मिले तो आम जनता की सुध ले।  FIR तक दर्ज नहीं होती। कौन था , किस जात का था , किस धर्म का था, हुआ भी था या नहीं।  फिर किसी नेता का केस कमजोर करने का दबाब।  तब तक तो कितनी बार रेप हो चूका होता है।

मनोज - हाँ थोड़ा मीडिया वाले केस हाईलाइट न करे तो लोगो को मालूम ही न चले।

अनूप - हा हा  हा  , मीडिया , वही मीडिया न जो TRP  के चक्कर में दिन रात लगी रहती है। गाला काट COMPETITION  ने इतना अँधा बना दिया है की बस चैनल पर कुछ लोगो को बिठाकर , बहस करा कर , बार बार भुक्तभोगी का रेप करते रहते हैं।  और नेताओ का क्या है , कोई कहता है , " बच्चे हैं गलतियां हो जाती है", तो कोई और कहता है "ये तो छोटी मोटी  बात है"। और हम सब गर्व करते हैं की हम सभ्य समाज में रह रहे।  ये है  तुम्हारा - हमारा सभ्य समाज।  लेकिन मैं कैंडल नहीं जलाऊंगा , मैं मार्च नहीं करूँगा। मैं किसी से शिकायत नहीं करूँगा।  मैंने आज एक फैसला लिया है।

सभी - वो क्या

अनूप - अब मैं... , अब मैं.....

                       
                           ......... To  Be  Continue .


                                                                 (अभय सुमन दर्पण )



Wednesday, June 19, 2019

love and love - EPISODE 2 (CLKK)

                                    सीन -१  (२  मिनट )

पार्क का सीन 

एक लड़का और एक लड़की पार्क के बेंच पर बैठे है 
लड़का - पूजा।      I  MISS YOU  
लड़की - हाँ  sonu। I  ALSO MISS YOU 
लड़का - बस आज का दिन और हम कल जुड़ा हो जायेंगे। 
लड़की - लेकिन मैं आउंगी , तुमसे मिलने, अपने प्यार से मिलने। 
लड़का - हाँ , बस कुछ सालो की बात है।  मैं इंजीनियरिंग पढ़ने बंगलोर जा रहा लेकिन आऊंगा और तुम्हे अपना बनाऊंगा।  मेरा इंतजार करना, करोगी ना ? 
लड़की -  मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ , वो समय भी आएगा जब मैं सिर्फ तुम्हारी बनूँगी , सदा सदा के लिए  . लव यू sonu।  ये मेरा वादा है
लड़का - लव यू टू ।

दोनों अपना हाथ एक दूसरे के उपर रखते हैं 

                               सींन  - २      (३ मिनट)

एक कमरे में पंडित जी कुछ ढूंढ रहे हैं तभी एक किताब गिर जाती है , उसमे एक फोटो होती  हैं।  पंडित जी देखते जाते हैं और गुस्से में चेहरा लाल होता जाता है।  फिर चिल्लाते हैं 
पंडित जी - पूजा...
दूसरे कमरे से लड़की आती है  -  जी बाबू जी। 
पंडित जी - ये क्या है (फोटो  दिखाते हैं ), तुम सोनू से मुहब्बत करती हो ?
पूजा (शर्माते हुए) - जी बाबूजी (आँचल मुँह मे दबा कर)
पंडित जी - तुम्हे मालूम है न वो कायस्थ है।  एक पंडित की बेटी कायस्थ के घर की बहु  बनेगी।  चार लोग क्या कहेंगे। 
पूजा - बाबूजी , मैं उन चार लोगो को देखुंं या अपनी खुशी। 
पंडित जी - जुबान लड़ाती है, जल्द ही तेरी शादी किसी पंडित के बेटे से करता हूँ , अगर नहीं मानी तो मेरा मरा मुँह देखेगी। 
पूजा - (रोते हुए ) - बाबूजी

  background में किसी शादी की धूंधली विडिओ चल रही है और शहनाई की आवाज आ रही। 
                                                 
                                                                 
                              सीन - ३      (३ मिनट)

 सुहागरात का सीन

एक बेड सजी है और दुल्हन बैठी है , एक पंडित टाइप का लड़का बेड के चारो तरफ घूम रहा और मंत्र पढ़ रहा और भुनभुना रहा , लड़की सोच रही , " ये कब आ कर मेरा घूँघट हटाएगा , एक घंटे से पता नहीं क्या पढ़ रहा।
तभी पंडित बोलता है , " हो गयी सिद्धि , अब मुझे जरूर पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।  लेकिन मुहूर्त तो सुबह ३ बजे  का निकला है , तब तक नीचे बैठ कर इंतज़ार करता हूँ।"
लाइट डिम हो जाती है. फिर घडी तीन बजती है।  वो उठ कर बेड पर जाता है तो देखता है दुल्हन सो चुकी है।  वो उसे जगाता है लेकिन वो सोइ रहती है।  वो सर पकड़ कर बैठ जाता है और बोलता है , अरे सुबह मुहूर्त निकलती जा रही, अब क्या होगा।  (रुआंसा हो जाता है )

                   सीन  ४    (२ मिनट)

 पंडित पति   - अरी  ओ  पंडिताइन , दरवाजा खोलो। 
                 (पूजा दरवाजा खोलती है )
पंडित जी - देखो तो पंडिताइन , आज कितना चढ़ावा मिला है। चावल, दाल , दक्षिणा और ये साडी , हाँ तीन चार सौ की तो होगी ही। 
             (पूजा मुँह बनाते हुए अंदर आती है ) पंडित जी साडी लेकर उसके सर पर रखते है और कहते हैं , आज इसी साडी से तुम्हारा श्रृंगार  करूंगा। 
पूजा सोचने लग जाती है - ( इन चार लोगो के चक्कर में बाबूजी ने कहाँ मेरी शादी करा दी।  अगर इन चार अनदेखे लोगो का ख्याल नहीं करते तो मेरा पति कोई और होता और मैं अपने पिया की सजनी होती )
  मुँह बनाती है - हूँह  

                सीन  - ४    (२ मिनट)

टिंग - टोंग, दरवाजा खुलता है 
पंडित जी (पिता जी ) आते हैं और पूछते हैं।  कैसी हो 
पूजा  -   ठीक हूँ , आप ही का दिया प्रसाद खा रही हूँ। 
पंडित जी - मेरा दिया प्रसाद , क्या मतलब 
पूजा -छोड़िये  जाने दीजिये , मैं चाय बनती हूँ (उठ कर जाती है )
फिर कमरे में आते हुए। ...  एक ट्रे में चाय और चार लड्डू हैं , चारो लड्डू अलग अलग तरह के हैं। 
पंडित जी - ये चारो लड्डू अलग -अलग तरह के , लगता है पतिदेव काफी ख्याल रखते हैं। 
पूजा - किस बात का ख्याल , ये चारो लड्डू चार यजमान के घर के हैं।  पूजा पाठ  कर के चढ़ावे वाले।  आपने चार लोगो के चक्कर में कंहा मुझे फंसा दिया।  मेरे  मुताबिक शादी हुई होती तो मैं भी खुश रहती। 
पंडित जी - हाँ बेटा , गलती हो गयी।  ये चार लोग क्या कहेंगे के विषय में न सोचा होता तो कम से कम एक ही तरह के लड्डू खा रहा होता।  लड़का दूसरी जाति का था तो क्या हुआ, तू तो खुश रहती। 
पूजा - हाँ बाबूजी (कहकर गले लग जाती है )


Wednesday, May 15, 2019

माँ - बेटा (तिरुआ ) - कहानी

तड़ाक .. तड़ाक .. दो थप्पड़ ने तिरुआ के दिमाग को हिलाकर रख दिया। अपनी जगह से दस फर्लांग दूर जाकर गिरा था वो और मुँह से एक ही आवाज निकली "माँ"।  किसी तरह वह खड़ा हुआ तो सामने मालिक की घूरती निगाहें उसे देख रही थी। वह वहां से निकलना चाहा तो मालिक ने नजदीक आकर कॉलर पकर लिया और डांटना शुरू कर दिया। 
"इस प्लेट की कीमत कौन देगा, तेरा बाप" उसने चिल्लाते हुए कहा।
"नहीं साहब, मैं ज्यादा काम करूंगा , रात को भी नहीं सोऊंगा लेकिन मुझे मारो मत।  मैं कैसे भी करके इसकी कीमत लौटा दूंगा। " तिरुआ ने कहा।
"ठीक है अगली बार अगर प्लेट तोड़ी तो खाना-पीना बंद कर दूंगा। " फिर एक थप्पड़ जड़ते हुए वो अपने गल्ले पर जाकर बैठ गया।
तिरुआ के आँखों से आंसू नहीं रुक रहे थे। वह चुपचाप जाकर टूटी प्लेटे समेटने लगा।  उसकी तो गलती भी नहीं थी। बस खाने की प्लेट टेबल पर लगाने जा रहा था, तभी किसी ग्राहक की मोबाइल नीचे गिर गयी, एकाएक वो मोबाइल लेने नीचे झुका तो उसका सर प्लेट से टकरा गया और प्लेट गिर गयी। काफी कोशिश करने के बाद भी वह उसे गिरने से नहीं रोक पाया।इसी बात पर वो अपने मालिक से थप्पड़ खा गया।
नाम तो वैसे उसका त्रिभुवन था पर अब सब उसे तिरुआ कहते थे। माँ ने यह सोच कर नाम रखा था की तीनो लोक का स्वामी बनेगा और बड़ा नाम करेगा, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। 
छः साल हुए उसे माँ से अलग हुए लेकिन शायद ही कोई रात या कोई पल ऐसा न रहा होगा जब उसे माँ की याद नहीं आयी होगी। जितना माँ का प्यार पाता था उतना पिता की मार। था भी तो माँ की आँख का तारा, एक मिनट भी खुद से अलग नहीं करती थी। लेकिन उस दिन पता नहीं कैसे मति मर गई थी। उसके पिता के दारू पीने की आदत ने घर को गरीबी के जंजाल में जकड़ रखा था। माँ लोगो के घर में काम करके घर के खर्च पुरे करती और पिता अपनी कमाई दारू में उड़ा  देता।
शाम का वक़्त था, त्रिभुवन के पिताजी किसी को अपने साथ लाये थे। देखने में पैसे वाला लग रहा था।
त्रिभुवन के पिताजी ने उसकी माँ को अंदर कमरे में ले जाकर धीरे से कहा।
"देखो कौन आये हैं , अपने त्रिभुवन की जिंदगी बनाने वाले सेठ"  पिताजी ने लाढ से कहा।
मैं समझी नहीं, कैसी जिंदगी "  माँ ने कहा।
"देखो ये सेठ अपने त्रिभुवन को अपने साथ ले जाना चाहते हैं, अपने घर पर रखेंगे। अच्छी पढाई कराएँगे, बड़ा आदमी बनाएंगे, हमारे साथ रहकर तो ये भी आवारा  बन जायेगा बिना किसी काम का"  पिताजी ने कहा
"नहीं अपने बेटे को मैं खुद से अलग नहीं करुँगी " उसने झपट कर त्रिभुवन को खुद में चिपटा लिया।
"एक बार तो मेरी बात मन लो, देखो इसकी जिंदगी बदल जाएगी। तुम नहीं चाहते ये भी बड़ा आदमी बने खूब पैसे वाला, काफी मुश्किल से सेठ जी तैयार हुए हैं।"   पिताजी ने कहा।
"नहीं मेरा बेटा मुझसे दूर नहीं जायेगा, उन्हें जो देना है यहीं दे।"  माँ ने कहा
"अरे कैसी बात कर रहे, पागल तो नहीं हो गए ! क्या यहाँ वो अच्छी पढाई कर पायेगा, तुम तो अपने बेटे के दुश्मन बनी जाती हो, मैं तो उसके भले की सोच रहा " पिताजी ने कहा
 काफी समझाने बुझाने के बाद आखिरकार माँ ने अपने कलेजे के टुकड़े को जाने की इजाजत दे दी। अभी उम्र ही क्या थी त्रिभुवन की, सिर्फ सात साल। सोची बड़े लोगो की संगत में उसके बेटे की जिंदगी संवर जाएगी।
रात थोड़ी घिर आयी थी। पिताजी, त्रिभुवन और सेठ तीनो घर से निकल चुके थे। त्रिभुवन अपने पिताजी पर विश्वास किये उसका हाथ पकड़े था।  सेठ जी की गाड़ी लगभग एक घंटे बाद रुकी।  गाड़ी से उतरकर त्रिभुवन ने अपने को एक अनजान घर के सामने पाया। उसे थोड़ा डर लगा और उसने जोर से अपने पिताजी की हाथ पकड़ ली। तीनो उस घर में दाखिल हुए , त्रिभुवन और उसके पिताजी को एक कमरे में ठहराया गया। खाना खा कर दोनों सो गए। सुबह त्रिभुवन की आँख खुली तो देखा सामने एक बदसूरत सा आदमी उसे जगा रहा था।
"मेरे पिताजी कहाँ हैं " त्रिभुवन ने कहा
"पिताजी"  उस आदमी ने जोर से हँसते हुए कहा  "अरे वो तो रात में ही निकल गया, तुम भी उठ जाओ और तैयार हो कर काम पर चलो"
त्रिभुवन का दिल धड़क गया और जोर से चिल्लाया  "माँ "
वो आदमी ठठा कर हंस दिया और बोला " चल उठ जा, तेरा बाप तेरा सौदा कर के चला गया "
उस सेठ के कई सारे ढाबे चलते थे, उसी में एक ढाबे पर वो काम पर लग गया। वहां के हर छोटे बड़े काम और धीरे धीरे वहीँ बड़ा होने लगा। हर महीने उसके पिताजी सेठ जी से कुछ रूपये ले जाता था।  उसने उसकी माँ को बता रखा था की त्रिभुवन उस रात बीच रास्ते कहीं भाग गया था।
ऐसे ही कर के कई साल बित गए और वो पंद्रह साल का हो चूका था। उसे कंही से मालूम हुआ की उसके पिताजी हर महीने आकर पैसे ले जाते हैं। उसने सेठ जी के घर पर एक नौकर से बात की और कहा की जब मेरे पिताजी आये तो सुचना दे देना। उसे अपने पिताजी से बेइंतहा नफरत थी जो उम्र बढ़ने के साथ और बढ़ती जा रही थी बस माँ का धुंधला चेहरा उसे याद था। अगली बार जब उसके पिताजी आये तो वो बहाने से एक साइकिल उठाकर वो ढाबे से निकल गया। जब वो सेठ जी के घर पहुँचा तो अपने पिताजी को उस घर से निकलते देखा। उसके पिताजी साइकिल से घर के लिए निकले थे, बस वो भी उसके पीछे छुपते छुपाते निकल गया। लगभग 11 -12  किलोमीटर जाने के बाद उसे सड़के कुछ जानी पहचानी सी लगी। वो अपने पिताजी का पीछा कर रहा था , उसके पिताजी ने एक घर के दरवाजे पर खुंडी खटखटाई। उसे याद आ गया की यही तो है मेरा घर। वो उस समय वापस लौट गया।
अगले दिन बाजार जाने के बहाने फिर वो निकला और अपने घर पहुँचा। दरवाजा अधखुला था, वो दरवाजे पर खड़ा होकर देखा की उसकी माँ रसोई में बर्तन धूल रही है।
उसने धीरे से कहा "माँ"
पता नहीं उसकी माँ को क्या सुनाई दी।
उसने वहीं  से कहा  "कौन है, क्या चाहिए, अभी जाओ बाद में आना।"
उसने अब थोड़ी तेज आवाज में कहा "माँ"
उसकी माँ ने जोर से कहा " क्या माँ- माँ लगा रखा है, मेरा कोई बेटा नहीं। तुम सबो की आदत मैं जानती हूँ , चोरी करने के इरादे से आते हो और माँ कहते हो "
अब त्रिभुवन से रहा नहीं गया और थोड़ी जोर से कहा
"माँ मैं तेरा त्रिभुवन, तेरा बेटा "
माँ के तो जैसे खून जम गए, अपलक उसे देखने लगी और दौड़ती आयी, कुछ छण देखने के बाद जैसे ही उसे लग गया की वो त्रिभुवन ही है, उसे जोर से अपनी बाँहों में समेट ली। दोनों के आंसू एक दूसरे को भिगो रहे थे और पल जैसे थम सा गया था।
                                                                                                   -  अभय सुमन "दर्पण"

Monday, May 6, 2019

अधजला इश्क - कविता

 "अधजला इश्क"

क्या करूं ले इश्क तेरा 
इस उम्र में ऐ प्रियवर
इश्क अब किस्से कहानी
जिंदगी के इस मोड़ पर

अब न चाहत पहले जैसी
अब न हिम्मत सोचने की
ख्वाहिशें कब खो चुकी हैं
सपने भी सब सो चुकी हैं
बरस चुकी हैं बादलें भी
धूल चूका सावन सोलंहवा

पूछा, जाना और माना था तब
साथ चलने का इरादा था तब
पर तुम्हारे सोच में न हम
मेरे इश्क में जायका था कम
तब तुम्हारे सुर सुरीले
मुझमे थे हर रंग फीके

अब कहाँ वो गीत प्यारे
टूटे हैं अल्फ़ाज़ सारे

जिंदगी के जद्दोजहद में 
दब चुके जज्बात हमदम
ढल चुकी तरुणाई सारी
मिट चुकी तन्हाई सारी

साथ ना अब चल सकेंगे
गीत न हम गा सकेंगे
मिल न पाऊँ ऐसा शायद
तुझको तेरा मीत मुबारक
दर्दे गम अब दोस्त मेरे
अधजला इश्क मेरे हिस्से


क्या करूंगा इश्क लेकर
इस उम्र में ऐ प्रियवर
इश्क अब किस्से कहानी
जिंदगी के इस मोड़ पर

                   - अभय सुमन "दर्पण"











Wednesday, March 27, 2019

ग़ज़ल - निकल रहा तुम्हारे शहर से

निकल रहा तुम्हारे शहर से, ओ बेखबर,
छोड़कर कुछ यादें और दबी हसरते,
कुछ तन्हाईयाँ और थोड़ी सी रुसवाइयाँ ,
तम्मनाओं के शहर में ढूंढता फिरता अकेला,
हर खामोश लवो में तलाशता खुद का वजूद,
सितमगर भी न मिला सितम करने को ,
हर मौंजू परेशानियां भी कम करने को ,
संभले ना तपिश दरख़्त की छावं से भी
न दरिया के साहिल पनाह से भी
जुस्तजू बस इतनी जरा सी तो थी
एक खलिश जो छिपी फंसी थी कहीं

दिल तलक ताख पर रख छोरा, 
कोई रहबर न दिखा संभाल कर रखने को ,

निकल रहा तुम्हारे शहर से ...




जुस्तजूखोज, तलाश।


ख़लिशचुभन, कसक।

Monday, March 4, 2019

कहानी - माँ बड़ी हो गयी

ठक ! ठक ! ठक !
"बस मम्मा दो मिनट" अंदर से सुभि की आवाज आयी।
"जल्दी कर बेटा, तेरी सभी सहेलियां ड्राइंग रूम में तेरा इंतजार कर रही", कविता ने बाहर से कहा और किचन में चली गयी। जाते-जाते फिर सुभि को जल्दी तैयार होने की हिदायत देना नहीं भूली । आकर वो किचन में सभी के लिए चाय निकालने लगी। तभी ड्राइंग रूम से सुभि की दोस्त नेहा की जोर की आवाज सुनाई दी,"आंटी सुभि को कितना समय लगेगा, देर हो रही।"
"बस तैयार हो कर आ रही बेटा, तब तक प्याज के पकौड़े और चाय पियो।", ड्राइंग रूम में आते हुए कविता ने कहा और टेबल पर ट्रे रख दी। सभी लड़कियों की खिलखिलाहट उसे काफी अच्छी लग रही थी। सभी ने साडी पहन रखी थी और सब काफी सुन्दर लग रहे थे। लगे भी क्यों ना, सत्रह की उम्र ही ऐसी है, नयी जोश नयी ऊर्जा और आज तो कॉलेज का फेयरवेल भी है। अब बड़े कॉलेज में जाने के सपने, उचाईयों को छूने का ख्वाब, इस उम्र का गुमान और किसी से तारीफ पाने का हसरते। सब मिल कर इन सभी को शबनमी बना रहा था।
कविता को अपनी बाते याद आने लगी जब वो सत्रह साल की थी, वो भी तो ऐसी ही थी। उसने भी कॉलेज के फेयरवेल के लिए पहली बार साडी पहनी थी। माँ के सभी साडी उसने आलमीरा से निकाल कर बिखेर दिए थे और उसे कोई पसंद नहीं आ रहा था। जब पापा से नहीं देखा गया तो मुस्कुराते हुए उसे स्कूटर पर बिठाकर एक बड़े से साडी की दुकान में ले गए और उसकी पसंद की एक साडी खरीद दी। माँ थोड़ी नाराज भी हुई थी लेकिन वो लाड़ली थी पापा की, लाखो में एक।  एक-एक चीज का पापा ख्याल रखते थे, हलकी सी शिकन बर्दास्त नहीं थी उसके चेहरे पर। फिर तो वो नयी साडी पाकर आसमान में उड़ने लगी, मानो पंख लग गया हो। जब तैयार हो कर वो कॉलेज गयी तो सभी की निगाह उसी पर थी। शायद उसकी भी जो अक्सर उसे देखा करता था। शर्मीला सा, अपनी धुन में रहने वाला, किताबो से दोस्ती और बहुत ज्यादा किसी से मतलब नहीं रखने वाला। कविता को मालूम था की वो छिप छिप कर उसे क्लास में देखा करता है लेकिन उससे कभी कुछ कहा नहीं। लेकिन आज वो उससे बात करने की कोशिश में लगा था। वो जमाना आज की तरह नहीं था, एक तो छोटा शहर, कई लोगो की निगाहें और बात का बतंगड़ बनने का डर। तभी वो नजदीक आया और कुछ कहना चाहा, लेकिन कुछ कह नहीं पाया। फिर एक पत्र उसने कविता को दिया, जिसे उसने ले लिया और चुप-चाप पर्स में रख ली। फिर वो अपने कॉलेज के फंक्शन में व्यस्त हो गयी और अपने सहेलियों के साथ मौज मस्ती में गुम हो गयी। उसे तो अपनी नयी साडी में इठलाने में कुछ ज्यादा आनंद आ रहा था। रात को जब सोने जा रही थी तो उसे वो पत्र की याद आयी, जिसे निकालकर वो पढ़ने लगी। पढ़ने के बाद उसे लगा ही नहीं की एक शर्मीला सा दिखने वाला लड़का इतना जज्बाती हो सकता है, लगा की जैसे उसने इस पत्र पर अपना दिल निकाल कर रख दिया हो । लेकिन कविता के तो ख्वाब काफी ऊँचे थे, और उसे अभी कई मंजिलो को छूना था। काफी सोच विचार कर उसने उस पत्र के टुकड़े कर के बालकनी के बाहर फेंक दिया। कॉलेज में अगले दिन कविता उससे कन्नी काटने लगी और कभी नजर मिल जाती तो लगता उसकी सुनी आँखे उससे कुछ कह रही है। कविता को एक हफ्ता ऐसा लगा की जैसे उसकी आँखे कुछ सवाल पूछ रही है और वो जवाब देने से बच रही। बस,एक महीने बाद फाइनल एग्जाम और सभी एक दूसरे से दूर। लेकिन उसे आज भी उन आँखों का सूनापन और पूछते सवाल याद है। बहुत सालो बाद मालूम हुआ की वो किसी दूर शहर में अपने परिवार के साथ एक अच्छी नौकरी में व्यस्त है। उसकी बस एक ही इच्छा थी कि कभी  आमने सामने एक बार उससे बात कर पाती। उसे अपनी पहली साडी और पहला खत आज भी एक भीना सा एहसास दे रहा था।
"मम्मी कैसी लग रही", सुभि की आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग की। अपने आँखों को पोछती जैसे ही उसने पलटा तो बस सुभि को एकटक देखती रह गयी। पहली बार उसने सुभि को साडी पहने देखा था, ऐसा लगा जैसे उसकी प्रतिमूर्ति साक्षात् सामने खडी हो।
"क्या बताऊँ बेटा, लग रहा जैसे मैं खुद को देख रही।उस खुशबू को महसूस कर रही जब मैंने पहली बार साडी पहनी थी। मेरी छोटी सी बेटी तो एकदम से बड़ी हो गयी", यह कहकर उसने सुभि को बाँहों में समेत लिया।
"नहीं माँ, मैं कैसे बड़ी हो सकती। मैं तो हमेशा तुम्हारी छोटी सी बेटी ही बनी रहना चाहूँगी।",सुभि ने कहा।
"हां बेटा, तू हमेशा मेरी छोटी सी बेटी ही रहेगी, लेकिन आज तुझे देख कर तेरी माँ बड़ी हो गयी है, हाँ बेटा तेरी माँ बड़ी हो गयी है।" कविता ने अपने नम आँखों को पोछते हुए कहा और जोर से खुद में उसे समेत लिया।

                           --- अभय सुमन "दर्पण"

हास्य-व्यंग - 26 -27 फ़रबरी 2019, भारत पाकिस्तान में जंग

26 -27  फ़रबरी 2019, भारत पाकिस्तान में हुई जंग पर आधारित   

बहुत हुई जंग भारत पाकिस्तान में।  बहुत सारे लोग हर मुहब्बत में भी जंग ढूंढ़ते रहते हैं। अभी अभी भारत पाकिस्तान में एक मुहब्बत भरी कहानी हुई लेकिन उसमे भी लोग जंग देख रहे। अरे वही, एक सोलह साल की मोहतरमा (F16 ) अपने इक्कीस साल के महबूब (M 21) से मिलने भारत आ गयी वो भी छिपते छिपाते, जान की बाज़ी लगा कर। महबूब ने भी जान की बाज़ी लगा दी उनसे मिलने के लिए। लेकिन कौन समझे, किसे समझाया जाय, सभी को इसमें जंग दिखती है। एक बुरकानशी, पाकिस्तान से हवा में उड़कर अपने भारतीय महबूब से मिलने आती है। एक सोलह साल (F16 ) की आधुनिक ज़माने की कमसिन, नए नए नाजो नखरे से लकदक, हर अदाओ में माहिर, नए नए रंगो रोगन से सजी, इठलाती बलखाती अपने महबूब से मिलने की तड़प में भारत की सीमा में चली आती है  
दूसरी तरफ हमारा इक्कीस साल (M 21) का गबरू जवान जो गठीला, शर्मीला, दिल से हारा, सीधा साधा बैठा अपने महबूबा को याद कर रहा था, प्यार के तराने गा रहा था। देखता है की उसकी महबूबा आसमान में उड़ते हुए उससे मिलने को चली आ रही है। अपने गबरू से यह देखा नहीं गया और वो भी उससे मिलने आसमान में उड़ गया। आज दोनों के बीच सरहद की दिवार ख़त्म हो गयी थी, भला आसमान में कौन सरहद, उड़ते पंछियों का कौन सरहद। सरहद तो जमीन पर बनती है, आसमान में उड़ते मुहब्बत के परवाने कहाँ ये मानने वाले। बस अपना इक्कीस साल का जवान, सोलह साल की नटखट हसीना से आसमान में लुका छिपी खेलने लगा। कभी सरहद के इस तरफ तो कभी सरहद के उस तरफ। जब नाजनीना ने बहुत बेचैन कर दिया तो अपने देसी जवान ने दिल में जलती फुलझरी उनकी तरफ उछाल दी। वो बेचारी इस जवान की शरारत समझ ना सकी और अपने चुन्नट में आग लगा बैठी और अपने वतन लौट गयी। अपना जवान कुछ समझ पाता, कुछ समझा पाता तब तक देर हो चुकी थी। इससे पहले की वो वापस लौटे, खुद को महबूबा की धरती पर पाया वो भी सैकड़ो लोगो से घिरा। अब बात दो देश की हो चुकी थी , मुहब्बत पीछे छूट चूकी थी, राजनीती शुरू हो चुकी थी। इन सब के बीच सोलह और इक्कीस की मुहब्बत की कहानी मीडिया में छाने लगी। पाकिस्तान ने कहना शुरू किया कि हमारी नए ज़माने की आधुनिक बाला को भारत के पुराने ज़माने के देसी छोड़े ने छेरने की जुर्रत कैसे की, बस अब मामला सियासी बन चूका था। उधर सोलह अपने चुन्नट में लगी आग से बुरी तरह जल चुकी थी और अस्पताल में आखिरी सांसे गिन रही थी, उसने अपनी भाभी को पैगाम भिजवाया  कि मेरे महबूब को वतन वापसी करवा दो और कसम दिलवाई की उसे छोरने तुम ही सरहद की सीमा तक जाना। भाभी लग गयी अपने ननद के मुहब्बत को बचाने में, पूरा जोर लगा दी दोनों प्रधान मंत्री को मिलाने में। अंत में मुहब्बत जीती और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को संसद में घोषणा करनी पड़ी की इस गबरू जवान को तुरंत छोरा जाय। तब तक सालियों को सबकुछ पता लग चूका था, बस उसने इस गबरू के जूते चुरा लिए। अपना छोरा भी सब कुछ समझ कर मंद मंद मुस्काने लगा और भाभी को देखने लगा। भाभी ने धीरे से समझाया कि जहाँ इतनी देर , वहीं कुछ घंटे और सही फिर नए जुते की व्यबस्था की और सरहद की सीमा तक छोरने खुद आयी।
जब अपना जवान वापस आया तो मालूम हुआ की जिस फुलझरी से महबूबा के चुन्नट में आग लगी थी, उससे वह पूरी तरह जल चुकी थी और सुपुर्दे ख़ाक हो चुकी है। गबरू के आँखों में आंसू आ गए और मन ही मन सोचा की मैं दिल में महबूबा की यादो को लिए, अपने महबूबा की जमीं को आसमान से देखने फिर जरूर जाऊंगा।
अब इतनी मुहब्बत भरी दास्ताँ को जंग का नाम कैसे दे दिया जाये।